नई दिल्ली: सरकार एक ऐसा बिल लाने जा रही है जिससे यह सुनिश्चित होगा कि केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) के शीर्ष पद भारतीय पुलिस सेवा (IPS) अधिकारियों के पास रहें. ड्राफ्ट कानून के अनुसार डायरेक्टर और स्पेशल डायरेक्टर जनरल की नियुक्ति आईपीएस से प्रतिनियुक्ति (डेप्यूटेशन) पर की जाएगी.
CAPF (जनरल एडमिनिस्ट्रेशन) बिल 2026, जिसे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सोमवार को संसद में पेश करेंगे, इसमें यह भी प्रस्ताव है कि अन्य दो वरिष्ठ स्तर के पद भी मुख्य रूप से आईपीएस से प्रतिनियुक्ति के जरिए भरे जाएं.
ड्राफ्ट बिल में यह भी प्रस्ताव है कि एडिशनल डायरेक्टर जनरल स्तर के कम से कम 67 प्रतिशत पद आईपीएस अधिकारियों के लिए प्रतिनियुक्ति पर आरक्षित किए जाएं. इंस्पेक्टर जनरल (आईजी) के पद के लिए यह सीमा 50 प्रतिशत तय की गई है.
बिल की शर्तें CAPF में पहले से लागू व्यवस्था के अनुसार हैं, जहां ज्यादातर शीर्ष पद आईपीएस अधिकारियों के पास ही होते हैं. बलों के प्रमुख, स्पेशल डायरेक्टर जनरल और एडिशनल डायरेक्टर जनरल भी आईपीएस से ही होते हैं.
आईजी स्तर पर आईपीएस अधिकारियों के लिए 50 प्रतिशत पद आरक्षित रखने की व्यवस्था पहले से चली आ रही प्रथा के अनुसार है.
हालांकि, नए बिल में डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल (डीआईजी) लेवल पर आईपीएस अधिकारियों के लिए कोई आरक्षण प्रस्तावित नहीं है. यह मौजूदा नियमों से अलग है, जहां डीआईजी लेवल के लगभग 20 प्रतिशत पद आईपीएस अधिकारियों के लिए आरक्षित होते हैं.
यह नया बिल पांच CAPF पर लागू होगा: सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स (CRPF), सेंट्रल इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी फोर्स (CISF), इंडो-तिब्बतन बॉर्डर पुलिस (ITBP), सशस्त्र सीमा बल (SSB), और बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (BSF).
यह बिल ऐसे समय आ रहा है जब करीब एक महीने पहले गृह मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि वह CAPF में आईपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति के मुद्दे पर “कानूनी हस्तक्षेप” पर विचार कर रहा है.
गृह मंत्रालय ने यह बात अदालत में अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान कही थी. यह याचिका पिछले साल मई में दिए गए कोर्ट के आदेश को लागू न करने के आधार पर दायर की गई थी. उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा था कि दो साल के भीतर सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड (SAG) स्तर तक प्रतिनियुक्ति को धीरे-धीरे कम किया जाए.
केंद्र सरकार ने इस आदेश को चुनौती दी थी, लेकिन पिछले साल अक्टूबर में अदालत ने इसे खारिज कर दिया. अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान गृह मंत्रालय ने संकेत दिया था कि आईपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति को नियमों में शामिल और औपचारिक बनाने के लिए कानून लाया जा सकता है. इस कदम पर सोशल मीडिया पर CAPF के पूर्व अधिकारियों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी थी.
एक ‘अम्ब्रेला कानून’
गृह मंत्रालय ने ड्राफ्ट बिल में कहा है कि CAPF के संगठनात्मक ढांचे और कमान को नियंत्रित करने वाला एक समान कानून न होने के कारण सेवा से जुड़े मामलों में “अनावश्यक मुकदमेबाजी” हुई है.
ड्राफ्ट बिल में कहा गया है, “हाल के वर्षों में एक समान कानून के अभाव में नियम अलग-अलग तरीके से विकसित हुए, जिससे सेवा से जुड़े कई मामलों में मुकदमे हुए और इससे कामकाज व प्रशासन में कुछ कठिनाइयां आईं.”
इसमें कहा गया है कि केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की प्रकृति और उद्देश्य को देखते हुए और अनावश्यक मुकदमों से बचने के लिए भर्ती, प्रतिनियुक्ति, पदोन्नति और अन्य सेवा शर्तों को नियंत्रित करने के लिए एक समान कानून बनाना जरूरी है. यह कानून ग्रुप A जनरल ड्यूटी अधिकारियों और अन्य अधिकारियों पर लागू होगा, साथ ही इन बलों से जुड़े अन्य नियम भी तय करेगा.
ड्राफ्ट बिल के अनुसार, एक नया कानून इसलिए जरूरी है ताकि कानूनी स्पष्टता बनी रहे, CAPF की अलग-अलग कार्य जरूरतों को सुरक्षित रखा जा सके और अदालत के निर्देशों को प्रशासनिक व संघीय जरूरतों के साथ संतुलित किया जा सके.
इसमें कहा गया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और उग्रवाद विरोधी अभियानों में लगे CAPF के प्रभावी कामकाज को बनाए रखना भी इस बिल का एक उद्देश्य है.
ड्राफ्ट बिल में कहा गया है, “ऐतिहासिक रूप से भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं, जो इन बलों के अधिकारियों और कर्मियों के साथ प्रतिनियुक्ति पर सेवा देते रहे हैं. केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल राष्ट्रीय सुरक्षा और उग्रवाद विरोधी कार्यों में राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम करते हैं.”
आगे कहा गया है, “इसलिए केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय बनाए रखने और प्रभावी कामकाज सुनिश्चित करने के हित में, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों की मौजूदा प्रतिनियुक्ति व्यवस्था को बनाए रखना ज़रूरी है.”
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