आगरा: उत्तर प्रदेश की एक अदालत ने गुरुवार को 2018 में सिकंदरा थाने में राजू गुप्ता की हिरासत में मौत के मामले में निलंबित पुलिस सब-इंस्पेक्टर और एक अन्य आरोपी को दोषी ठहराया, जिससे आठ साल से चल रहा मुकदमा खत्म हो गया. आगरा कोर्ट के अतिरिक्त जिला जज नितिन कुमार ठाकुर ने फैसला सुनाया और मामले की जांच के तरीके की कड़ी आलोचना की.
यह मामला उस समय काफी चर्चा में आया था. इसमें पुलिस हिरासत में 30 साल के एक व्यक्ति को कथित तौर पर प्रताड़ित करने और उसकी मौत का आरोप था. इसने पुलिस व्यवस्था में जवाबदेही, जांच के तरीके और उन सिस्टम की कमियों पर गंभीर सवाल खड़े किए, जिनकी वजह से हिरासत में हिंसा पर रोक नहीं लग पाई.
अदालत ने सब-इंस्पेक्टर अनुज सिरोही को गैर-इरादतन हत्या और मारपीट का दोषी पाया और उसे 10 साल की सज़ा सुनाई. सह-आरोपी अंशुल प्रताप सिंह को जानबूझकर चोट पहुंचाने के लिए 7 साल की सज़ा सुनाई गई. दोनों पर 10,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है. तीसरे आरोपी विवेक कुमार, जिस पर राजू गुप्ता को चोट पहुंचाने का आरोप था, सबूतों की कमी के कारण बरी कर दिया गया.
हालांकि, अदालत ने कहा कि जिम्मेदारी सिर्फ दोषी ठहराए गए लोगों तक सीमित नहीं है. “…संबंधित पुलिस ने केवल एक पुलिसकर्मी यानी आरोपी अनुज सिरोही को ही दोषी ठहराया. इससे यह स्पष्ट होता है कि इस मामले के जांच अधिकारी (चमन सिंह चावड़ा और पुलिस इंस्पेक्टर राजेश कुमार पाण्डेय) ने जानबूझकर सच्चाई को नज़रअंदाज़ किया और जांच इस तरह की कि इस घटना के लिए जिम्मेदार अन्य पुलिसकर्मियों तक बात पहुंची ही नहीं.”
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में चल रही समानांतर जांच में आगरा सीआईडी ने उस समय सिकंदरा थाने में तैनात 17 पुलिसकर्मियों के नाम बताए हैं.
आगरा सीआईडी ने घटना के दौरान मौजूद सभी पुलिसकर्मियों को गैर-इरादतन हत्या और अवैध हिरासत जैसे अपराधों के लिए जिम्मेदार माना है. आरोपियों की सूची में वरिष्ठ अधिकारी और कई सब-इंस्पेक्टर शामिल हैं. आरोपपत्र राज्य सरकार को भेज दिया गया है ताकि मुकदमा चलाने की मंजूरी मिल सके.
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, आगरा के नरेंद्र एन्क्लेव निवासी राजू गुप्ता को 21 नवंबर 2018 को अंशुल प्रताप सिंह के घर से जेवर चोरी के शक में घर से उठाया गया था. आरोप है कि बिना औपचारिक शिकायत के उसे हिरासत में रखा गया और थाने के अंदर उसके साथ गंभीर मारपीट की गई. उसकी मां रेनू गुप्ता को भी हिरासत में रखा गया और उसके सामने ही उन्हें निर्वस्त्र कर पीटा गया.
अगले दिन राजू की हालत बिगड़ गई और पुलिस उसे अस्पताल लेकर गई, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.
इस घटना से काफी आक्रोश फैल गया. डॉक्टरों के पैनल द्वारा किए गए पोस्टमार्टम में गुप्ता के शरीर पर कई चोटें पाई गईं. बाद में रेनू गुप्ता ने शिकायत दर्ज कराई, जिसमें सिरोही, सिंह, विवेक कुमार और कई अज्ञात पुलिसकर्मियों पर अपने बेटे की हत्या का आरोप लगाया. लेकिन वह इस सदमे से उबर नहीं सकीं और छह महीने बाद उनकी भी मौत हो गई.
मामला दर्ज होने के बाद सिरोही गायब हो गया था और बाद में 4 जनवरी 2019 को कोर्ट में सरेंडर किया. उस पर जानकारी देने वाले के लिए 20,000 रुपये का इनाम घोषित किया गया था और लोगों के दबाव के बाद उसने आत्मसमर्पण किया. बाद में उसे जमानत मिल गई और उसे ट्रैफिक पुलिस में तैनात किया गया, लेकिन लंबे समय तक ड्यूटी पर अनुपस्थित रहने के कारण उसे निलंबित कर दिया गया.
शुरुआत में जांच इंस्पेक्टर राजेश कुमार पांडेय को दी गई थी, लेकिन देरी और कथित कमियों को लेकर आलोचना होने के बाद इसे सर्कल ऑफिसर चमन सिंह चावड़ा को सौंप दिया गया. 7 फरवरी 2019 को आरोपपत्र दाखिल किया गया, जिसमें हत्या की धारा को घटाकर गैर-इरादतन हत्या और मारपीट कर दिया गया.
मुकदमे के दौरान 11 गवाहों के बयान दर्ज किए गए, जिनमें स्थानीय लोग और मेडिकल विशेषज्ञ शामिल थे. बाद में कुछ गवाह मुकर गए.
82 पन्नों के फैसले में अदालत ने कहा कि गुप्ता एक निर्दोष व्यक्ति था, जिसे थाने के अंदर प्रताड़ित कर मार दिया गया, जबकि वहां मौजूद अन्य पुलिसकर्मियों ने उसे बचाने की कोशिश नहीं की. अदालत ने कहा कि जांच ढीले तरीके से की गई, जिससे यह संकेत मिलता है कि अधिकारियों की सच्चाई सामने लाने में दिलचस्पी नहीं थी.
अदालत ने जांच अधिकारियों की आलोचना करते हुए कहा कि उन्हें संविधान के सिद्धांतों और सबूतों से जुड़े कानून की सही समझ नहीं थी. अदालत ने कहा कि सिरोही ने अपने बयान में गुप्ता को पीटने की बात स्वीकार की थी, लेकिन जांच अधिकारियों ने सही निष्कर्ष नहीं निकाला, जिससे न्याय में रुकावट आई.
अदालत ने आदेश दिया है कि फैसले की कॉपी उत्तर प्रदेश के गृह सचिव और आगरा पुलिस कमिश्नर को भेजी जाए, ताकि सेवा नियमों के अनुसार संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की जा सके.
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