इस हफ्ते की शुरुआत में भारत की कूटनीतिक धैर्य और लगातार कोशिशों का असर तब दिखा, जब भारतीय झंडे वाले दो एलपीजी टैंकर, शिवालिक और नंदा, लड़ाई जैसी परिस्थितियों के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ पार करके घरेलू इस्तेमाल के लिए पूरा माल लेकर भारत पहुंचे.
हालांकि अभी भी कई भारतीय जहाज इस अहम समुद्री रास्ते के आसपास फंसे हुए हैं, लेकिन नई दिल्ली चुपचाप कूटनीतिक और ऊर्जा से जुड़े रास्तों पर काम कर रही है ताकि तेल और प्राकृतिक गैस की सप्लाई जारी रहे. इसके संकेत साफ दिखाई दे रहे हैं और इस दिशा में आगे बढ़कर काम करने वाले तीन प्रमुख लोगों की सराहना की जानी चाहिए.
यह पारंपरिक क्रिकेट जैसा तीन बल्लेबाजों का मामला नहीं है, बल्कि फुटबॉल की उस अग्रिम तिकड़ी जैसा है जो मैदान में मिलकर असर दिखाती है. प्रधानमंत्री के उच्च स्तर के हस्तक्षेप से लेकर विदेश मंत्री की लगातार कोशिशों तक, और पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री के धैर्यपूर्ण सहयोग के साथ, भारत अपनी आपूर्ति सुरक्षित कर रहा है और साथ ही अपनी लंबी अवधि की ऊर्जा जरूरतों के लिए भी कुछ सुरक्षा सुनिश्चित कर रहा है.
सारे अंडे एक ही टोकरी में रखना कभी अच्छा नहीं माना जाता, लेकिन भौगोलिक स्थिति और क्षेत्रीय राजनीति जैसी है, उसके कारण नई दिल्ली के पास वर्षों से बहुत ज्यादा विकल्प नहीं रहे हैं. हालांकि ईरान पर हुआ यह अनावश्यक युद्ध संकेत देता है कि अब आगे चलकर दिशा बदलनी पड़ सकती है.
अब समय आ गया है कि एक चौथा खिलाड़ी भी मैदान में उतरे और उन कूटनीतिक, राजनीतिक और व्यावसायिक बातचीतों को अतिरिक्त सहारा दे, जो पहले से ही बहुत जटिल हैं. इस स्थिति में नौसेना की बड़ी भूमिका हो सकती है और अब रक्षा मंत्रालय को आगे आकर समुद्र में अपनी भूमिका मजबूत करनी चाहिए.
खाड़ी क्षेत्र में नौसेना क्या कर सकती है
भारत की ऊर्जा और आर्थिक सुरक्षा में योगदान देने के लिए नौसेना अभी इससे कहीं ज्यादा कर सकती है, क्योंकि पिछले कई वर्षों में उसने खाड़ी के कई देशों में लगातार औपचारिक नौसैनिक दौरे किए हैं. वास्तव में नौसेना खासकर खाड़ी क्षेत्र में सैन्य कूटनीति का सबसे मजबूत उदाहरण रही है. एयरक्राफ्ट कैरियर से लेकर कई आधुनिक युद्धपोतों तक, भारतीय तिरंगा खाड़ी के कई बंदरगाहों पर पूरी शान से लहराता रहा है. अब समय है कि वह युद्धक तैयारी के साथ सामने आए.
इसका मतलब यह नहीं है कि नौसेना खाड़ी में लड़ाई में शामिल हो, या इस बेकार संघर्ष में किसी एक पक्ष के साथ खड़ी दिखाई दे. बिल्कुल नहीं. जरूरी यह है कि नौसेना खुले समुद्र में दिखाई दे और भारतीय हितों, संपत्तियों और नागरिकों की सुरक्षा करे. आखिर भारत की सशस्त्र सेनाएं राजनीतिक नेतृत्व द्वारा तय राष्ट्रीय हितों को पूरे सुरक्षा दायरे में आगे बढ़ाने और बचाने के लिए ही हैं. नौसेना हमेशा भारत की सीमाओं के बाहर राष्ट्रीय कूटनीतिक और अन्य पहुंच से जुड़े प्रयासों में आगे रही है. अब और सक्रिय होने का समय है.
शुरुआत के तौर पर नौसेना, अन्य सेनाओं और रक्षा मंत्रालय के साथ मिलकर चल रही सैन्य कार्रवाई का एक स्पष्ट और तैयार विश्लेषण दे सकती है. जरूरत है कि भारत की तरफ से यह आकलन हो कि वहां किस तरह की सैन्य कार्रवाई चल रही है, यह कितने समय तक चल सकती है, और सबसे अहम यह कि तीनों लड़ने वाले पक्षों की सैन्य सोच क्या है.
पश्चिमी देशों के आकलन या सिर्फ दूर बैठकर राय देने वाले विशेषज्ञों पर निर्भर रहने के बजाय, भारत की पेशेवर सैन्य समझ होनी चाहिए कि ये तीनों पक्ष क्या सोच रहे हैं, किस तरह कार्रवाई कर रहे हैं, और आगे स्थिति किस दिशा में जा सकती है.
सबसे बढ़कर यह समझने में मदद मिलनी चाहिए कि इस पूरे हालात में भारत के सैन्य हित कहां हैं.
ईरान की रणनीति को समझना
जिस सुबह इज़राइल ने दावा किया कि उसने ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव अली लारीजानी को मार दिया है, उसी सुबह अमेरिका को जो केंट की सेवाएं खोनी पड़ीं. जो केंट, जिन्हें ट्रंप ने नेशनल काउंटरटेररिज्म सेंटर का निदेशक बनाया था, ईरान के खिलाफ युद्ध कैसे चलाया जा रहा है इस पर मतभेद के कारण पद छोड़कर चले गए. वहीं अली लारीजानी लगभग यह तय कर चुके थे कि ईरान पर थोपी गई इस लड़ाई को किस तरह रणनीतिक तरीके से आगे बढ़ाया जाए. इज़राइल और अमेरिका ने अनुमान के मुताबिक अपनी सैन्य ताकत का इस्तेमाल पश्चिमी सिद्धांत के आधार पर किया, जिसमें भारी मारक क्षमता और चुनिंदा नेतृत्व को खत्म करने की रणनीति प्रमुख होती है. यह पूर्वी समाजों की ऐतिहासिक स्मृतियों और उनकी मूल ताकतों से बिल्कुल अलग है.
ईरान के मामले में, सदियों से उसके चारों ओर गैर-फ़ारसी और शिया विरोधी ताकतें रही हैं, इसलिए सत्ता में खालीपन हमेशा गहरी चिंता का कारण रहा है. इतिहास में फ़ारसी प्रभाव के कमजोर होने की एक बड़ी वजह उत्तराधिकार की कमजोर व्यवस्था मानी गई है, जिसे 1979 की क्रांति के बाद बने शासन ने सुधारने की कोशिश की. काफी हद तक यह शासन अपने खिलाफ खड़ी ताकतों के बावजूद नेतृत्व परिवर्तन को उल्लेखनीय सफलता के साथ संभालता रहा है. इसलिए अलग-अलग नेताओं को खत्म कर देने से शायद वह नतीजा न निकले जिसकी उम्मीद इज़राइल और अमेरिका कर रहे हैं. इसके उलट इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया ज्यादा विकेंद्रीकृत हो सकती है और ईरान सैन्य रूप से ज्यादा अप्रत्याशित बन सकता है.
ईरान जिस तरह सैन्य ठिकानों, आर्थिक संसाधनों या खाड़ी क्षेत्र में कथित नागरिक ढांचों को निशाना बनाता है, उसमें एक स्पष्ट पैटर्न दिखाई देता है. अली लारीजानी ने साफ कहा था कि ईरान के लिए इस संघर्ष को लंबा खींचना जरूरी है, क्योंकि उसका मानना है कि उसकी सहनशक्ति उसके पश्चिमी विरोधियों से ज्यादा है. अब तक तेहरान उसी दिशा में आगे बढ़ा है और उसने मिसाइलों तथा ड्रोन को अप्रत्याशित तरीके से इस्तेमाल किया है.
करीब 30 साल पहले ऐसे तरीकों की आशंका बीजिंग में प्रकाशित एक किताब में जताई गई थी, जो असमान परिस्थितियों में युद्ध लड़ने पर आधारित थी. यह किताब थी अनरिस्ट्रिक्टेड वॉरफेयर, जिसे चीनी वायुसेना के अधिकारियों कियाओ लियांग और वांग शियांगसुई ने लिखा था.
इसे भविष्य के युद्धों की एक तरह की मार्गदर्शिका माना जा सकता है. भारतीय विश्लेषण की शुरुआत के लिए यह एक उपयोगी आधार हो सकता है.
मानवेन्द्र सिंह बीजेपी नेता, ‘डिफेंस एंड सिक्योरिटी अलर्ट’ के एडिटर-इन-चीफ और राजस्थान की सैनिक कल्याण सलाहकार समिति के अध्यक्ष हैं. वे @ManvendraJasol पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: राजनाथ सिंह भारत और पाकिस्तान की साझा सभ्यता की धरोहर को नए सिरे से खोज रहे हैं
