नई दिल्ली: 2021 में, अफ़गानिस्तान में अमेरिका और उसके सहयोगियों पर तालिबान की जीत और काबुल में सत्ता में उसकी वापसी का पाकिस्तान ने बड़े उत्साह के साथ स्वागत किया था. फिर भी, आधे दशक से भी कम समय में, दोनों देश अब खुले युद्ध की स्थिति में हैं, क्योंकि तालिबान और इस्लामाबाद के बीच संबंधों की बुनियाद लगातार कमज़ोर होती जा रही है.
मौजूदा संघर्ष की जड़ें इस्लामाबाद द्वारा लगाए गए उन आरोपों में हैं कि तालिबान, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) और कई अन्य उग्रवादी समूहों का लगातार समर्थन कर रहा है, जो कथित तौर पर पाकिस्तान के खिलाफ काम करते हैं. पिछले एक साल में पाकिस्तान ने अपनी सीमाओं के भीतर उग्रवादी हमलों में भारी बढ़ोतरी देखी है, और इस्लामाबाद ने इसका दोष तालिबान पर मढ़ा है.
TTP एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंधित संगठन है, जो अपनी मौजूदा वापसी से पहले, 2007 और 2014 के बीच पाकिस्तान में एक शक्तिशाली आतंकवादी संगठन रहा था.
यह बढ़ता तनाव अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान के बीच, विशेष रूप से तालिबान और पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान के बीच, दशकों से चले आ रहे गहरे अविश्वास को दर्शाता है. भले ही इस्लामाबाद ने काबुल में तालिबान की सत्ता में वापसी का स्वागत करते हुए इसे अफ़गानिस्तान की “गुलामी की बेड़ियों का टूटना” बताया था.
तालिबान की वापसी के कुछ ही हफ़्तों के भीतर, पाकिस्तान के तत्कालीन खुफिया प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल फ़ैज़ हमीद काबुल पहुंच गए थे, क्योंकि इस्लामाबाद इस समूह के साथ अपने संबंधों को मज़बूत करना चाहता था. हालांकि, यह मेल-जोल कुछ ही महीनों में खत्म हो गया, और 2022 का पहला आधा साल खत्म होने से पहले ही, इस्लामाबाद ने डुरंड रेखा के पार हमले कर दिए थे.
सोमवार को काबुल में एक नशा मुक्ति केंद्र पर पाकिस्तानी हवाई हमले में कम से कम 408 लोग मारे गए और 265 घायल हो गए. काबुल और इस्लामाबाद के बीच चल रहे संघर्ष में यह अब तक का सबसे घातक हमला है.
इसके अलावा, दोनों पक्षों के बीच सीमा भी स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं है, क्योंकि अफ़गानिस्तान डुरंड रेखा को एक अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में मान्यता नहीं देता है. जिससे काबुल और इस्लामाबाद के आपस में गुंथे हुए इतिहास में जटिलता की एक और परत जुड़ जाती है. दिप्रिंट, तालिबान और इस्लामाबाद के बीच के इस उथल-पुथल भरे रिश्ते को विस्तार से समझा रहा है.
पाकिस्तान ‘भरोसे के लायक नहीं, हेरफेर और कंट्रोल करने वाला’
सितंबर 2021 में, इंटर-सर्विसेज़ इंटेलिजेंस (ISI) के तत्कालीन प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल फ़ैज़ हमीद ने तालिबान नेतृत्व से मिलने के लिए काबुल पहुंचने पर कहा था, “चिंता मत करो, सब ठीक हो जाएगा.”
अमेरिका और उसके नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन (NATO) सहयोगियों के ख़िलाफ़ दो दशकों की बगावत के बाद, काबुल में तालिबान की सत्ता में वापसी, पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान के लिए एक बहुत ही खुशी का पल था. तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने तालिबान की वापसी को अफ़ग़ानिस्तान के लोगों के लिए “गुलामी की बेड़ियों” का टूटना बताया था. तालिबान की वापसी को काबुल में पाकिस्तान के प्रभाव का शिखर भी माना गया, क्योंकि इससे पहले की लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकारें नई दिल्ली के क़रीब मानी जाती थीं.
हालांकि, पाकिस्तान की यह खुशी, तालिबान और इस्लामाबाद—विशेष रूप से ISI—के बीच लंबे समय से मौजूद दरारों को छिपाने की एक कोशिश थी. 2012 में, NATO के नेतृत्व वाली इंटरनेशनल सिक्योरिटी असिस्टेंस फ़ोर्स (ISAF) के लिए विशेष ऑपरेशन करने वाले पूछताछकर्ताओं द्वारा तैयार की गई एक रिपोर्ट में इस बात की एक दुर्लभ झलक मिली कि कैसे तालिबान के निचले स्तर के लड़ाके भी ISI और पाकिस्तान को देखते थे.
“तालिबान खुद पाकिस्तान पर भरोसा नहीं करते, फिर भी कोई दूसरा यथार्थवादी विकल्प न होने के कारण वे मौजूदा स्थिति को बड़े पैमाने पर स्वीकार करते हैं. पाकिस्तान, बाहरी संस्थाओं के साथ तालिबान के मेलजोल पर नज़र रखना, उसमें हेरफेर करना और उसे निर्देशित करना जारी रखता है. पाकिस्तान द्वारा दिए गए सुरक्षित ठिकाने, किसी भी तालिबान कर्मी को—जिसे असहयोगी माना जाता है—तुरंत गिरफ़्तार करने की उनकी तत्परता के साथ-साथ चलते हैं,” रिपोर्ट में कहा गया है.
रिपोर्ट में आगे कहा गया है: “तालिबान के कर्मी—निचले स्तर के लड़ाकों से लेकर कमांडरों तक—पाकिस्तान सरकार को लगातार ‘भरोसे के लायक नहीं’, ‘हेरफेर करने वाला’, ‘कंट्रोल करने वाला’, ‘अपमानजनक’ और मूल रूप से ‘अफ़ग़ानिस्तान के हितों के प्रति उदासीन’ बताते हैं. यह व्यापक धारणा है कि, अपने घोषित समर्थन के बावजूद, ISI का तालिबान को युद्ध समाप्त करने और अफ़ग़ानिस्तान लौटने देने का कोई इरादा नहीं है. तालिबान नेतृत्व पाकिस्तान के ऐतिहासिक दोहरेपन से भली-भांति परिचित है.” तालिबान के तीन उप-नेताओं में से एक, अब्दुल गनी बरादर, 2010 से 2018 के बीच आठ साल तक पाकिस्तान की जेल में रहे. वहीं, 2000 से 2001 के बीच पाकिस्तान में तालिबान के पूर्व राजदूत रहे अब्दुल सलाम ज़ईफ़ को इस्लामाबाद ने गिरफ़्तार किया था और बाद में अमेरिकी अधिकारियों ने उन्हें ग्वांतानामो बे में हिरासत में रखा.
2013 में, तालिबान ने कतर की राजधानी दोहा में अपना पहला विदेशी दफ़्तर खोला. यह जगह जल्द ही उस समय की अमेरिकी-समर्थित ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ अफ़गानिस्तान’, तालिबान और अमेरिका के बीच ज़ोरदार कूटनीति का केंद्र बन गई. यहाँ यह बात ध्यान देने लायक है कि कतर उन तीन देशों में शामिल नहीं था, जिन्होंने 1996 से 2001 के बीच काबुल में तालिबान शासन को मान्यता दी थी. पाकिस्तान उन देशों में से एक था.
तालिबान के भीतर TTP का उदय
तालिबान के पहली बार सत्ता से हटने के बाद, पाकिस्तान ही वह आखिरी देश था जिसने उसे दी गई कूटनीतिक मान्यता वापस ली थी. हालांकि, दोनों के इतिहास आपस में जुड़े होने के बावजूद, तालिबान और इस्लामाबाद की सत्ता के बीच अभी भी काफी दूरी बनी हुई है.
इस दूरी को पाकिस्तान के भीतर TTP की मौजूदगी और उसकी गतिविधियों से और भी बेहतर ढंग से समझा जा सकता है. TTP के संस्थापक—बैतुल्ला महसूद—ने अपने करियर की शुरुआत तालिबान के भीतर मौजूद हक्कानी नेटवर्क में एक जिहादी के तौर पर की थी. साल 2007 में, महसूद ने TTP की स्थापना की, और 2009 में उसकी मौत हो गई. लेकिन अपनी मौत से पहले, उसने अपना ध्यान पाकिस्तान की ओर मोड़ दिया था.
ISAF की रिपोर्ट में बताया गया है, “बैतुल्ला महसूद लगभग 2007 तक हक्कानी नेटवर्क में ही रहा. इसके बाद उसने अपने अधीन काम करने वाले लोगों को नए सिरे से संगठित किया और अपने सारे प्रयास पाकिस्तान के खिलाफ लगा दिए.”
साल 2007 से 2014 के बीच पाकिस्तान में TTP बेहद सक्रिय था. इसके बाद, जून 2014 में पाकिस्तानी सेना ने TTP और पाकिस्तान में सक्रिय अन्य उग्रवादी समूहों से निपटने के लिए ‘ज़रब-ए-अज़ब’ नाम से एक बड़ा सैन्य अभियान शुरू किया.
पाकिस्तानी तालिबान ने पाकिस्तानी सेना के इस अभियान का जवाब कई हमलों के ज़रिए दिया. इनमें पेशावर के आर्मी पब्लिक स्कूल पर किया गया वह आतंकवादी हमला भी शामिल था, जिसमें 149 लोगों की जान चली गई थी. जिनमें 132 स्कूली बच्चे भी शामिल थे.
इसके बाद के वर्षों में TTP का प्रभाव कम होता गया. लेकिन अगस्त 2021 में काबुल में तालिबान की सत्ता में वापसी के साथ ही, पाकिस्तानी तालिबान की ताकत में एक बार फिर से ज़बरदस्त उछाल देखने को मिला.
2021 के बाद से TTP का फिर से मज़बूत होना
काबुल में तालिबान की सत्ता में वापसी के ठीक बाद, इस्लामाबाद ने इन दोनों संगठनों के बीच अंतर स्पष्ट करने की कोशिश की. उसने इस बात पर ज़ोर दिया कि TTP, अफगानिस्तान पर शासन कर रहे तालिबान से पूरी तरह से एक स्वतंत्र संगठन है.
सितंबर 2021 तक, TTP ने इस्लामाबाद के साथ बातचीत शुरू कर दी थी, जिसमें काबुल ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी. लेकिन 2021 के अंत तक ये बातचीत विफल हो गई, और TTP ने एक बार फिर पाकिस्तानी सत्ता के खिलाफ हमले करने शुरू कर दिए. अप्रैल 2022 में, पाकिस्तानी तालिबान ने अकेले इसी महीने में कम से कम 54 हमले करने का दावा किया, जो अपने आप में एक नया रिकॉर्ड था. जवाबी कार्रवाई में, पाकिस्तानी सेना ने अफ़गानिस्तान के अंदर सीमा पार हमले किए, जिससे इस्लामाबाद और काबुल के बीच हिंसा का सिलसिला शुरू हो गया. हालाँकि, तालिबान ने TTP और पाकिस्तानी सरकार के बीच हिंसा को खत्म करने के लिए मध्यस्थता करने की कोशिश की. इस पहल की अगुवाई उस समय के प्रधानमंत्री इमरान खान ने की थी.
लेकिन, अप्रैल 2022 में खान को अचानक प्रधानमंत्री पद से हटाकर उनकी जगह शहबाज़ शरीफ़ को प्रधानमंत्री बना दिया गया. खान अभी भी पाकिस्तान की जेल में बंद हैं, जबकि तालिबान पर इस्लामाबाद का जो प्रभाव था—जो इस समूह को ऐतिहासिक समर्थन देने और दो दशकों से ज़्यादा समय तक सुरक्षित पनाह देने की वजह से बना था—वह अब पूरी तरह खत्म हो चुका है.
पाकिस्तान के सीमा पार ऑपरेशन
अप्रैल 2022 में, जब शहबाज़ शरीफ़ ने ख़ान की जगह प्रधानमंत्री का पद संभाला, उसके कुछ ही दिनों बाद पाकिस्तानी सेना ने अफ़गानिस्तान के खोस्त और कुनार प्रांतों में सीमा पार हमले किए. रिपोर्टों के अनुसार, इन हमलों में कम से कम 47 लोगों की मौत हो गई.
इस्लामाबाद ने अप्रैल 2022 में इन हमलों को अंजाम देने की आधिकारिक तौर पर पुष्टि नहीं की थी, लेकिन हमलों के कुछ दिनों बाद ही उसके विदेश मंत्रालय ने काबुल से आग्रह किया था कि वह आतंकवादियों को पनाह न दे. पाकिस्तान के भीतर हिंसा में हुई बढ़ोतरी के चलते, इस्लामाबाद ने काबुल से आग्रह किया कि वह उन विभिन्न आतंकवादी और उग्रवादी संगठनों पर नकेल कसने के लिए और अधिक प्रयास करे, जो कथित तौर पर अफ़गानिस्तान के भीतर सक्रिय थे.
मई 2022 तक, पाकिस्तानी तालिबान ने पाकिस्तान सरकार के साथ संघर्ष-विराम की घोषणा कर दी थी, और साथ ही इस्लामाबाद के साथ बातचीत भी एक बार फिर शुरू हो गई थी. हालांकि, कहा जाता है कि जुलाई 2022 में काबुल पर हुए अमेरिकी हवाई हमले के बाद यह संघर्ष-विराम समाप्त हो गया, जिसमें अल-कायदा के सरगना अयमान अल-ज़वाहिरी की मौत हो गई थी. काबुल में मौजूद तालिबान ने पाकिस्तान पर यह आरोप लगाया कि उसने अल-ज़वाहिरी को मारने के लिए अमेरिका को अपने क्षेत्र से हमला करने की अनुमति दी, जिसके नतीजे में दोनों के बीच कूटनीतिक संबंधों में खटास आ गई.
सितंबर 2022 तक, TTP ने एक बार फिर पाकिस्तानी राज्य के विरुद्ध हमले शुरू कर दिए थे. दिसंबर 2024 में, पाकिस्तान ने एक बार फिर अफ़गानिस्तान में हवाई हमले किए, जिसके जवाब में तालिबान ने भी डूरंड रेखा के पार जवाबी हमले किए. भारत ने इस मामले में हस्तक्षेप किया और उस समय पाकिस्तान के हवाई हमलों की निंदा की. भारत ने यहां तक कह दिया कि इस्लामाबाद की ये कार्रवाइया उसकी “अपने घरेलू मसलों के लिए पड़ोसियों पर दोष मढ़ने की पुरानी आदत” का ही एक हिस्सा हैं.
अक्टूबर 2025 में, पाकिस्तान ने डूरंड रेखा के पार हवाई हमले किए, जिसके परिणामस्वरूप काबुल और इस्लामाबाद के बीच स्थित विभिन्न सीमा-व्यापार चौकियों को बंद करना पड़ा. तालिबान ने अपनी विदेश नीति में बदलाव लाने का प्रयास किया और भारत की ओर रुख करते हुए, अपने वरिष्ठ अधिकारियों को नई दिल्ली के दौरे पर भेजा.
21 फरवरी, 2026 को पाकिस्तान ने एक बार फिर सीमा पार हवाई हमले किए, जिसके परिणामस्वरूप पाँच दिन बाद दोनों पक्षों की ओर से तनाव और अधिक बढ़ गया. तब से लेकर अब तक, तालिबान और पाकिस्तान दोनों ही एक-दूसरे पर लगातार हमले करते आ रहे हैं. इसी क्रम में अंततः काबुल स्थित एक नशा-मुक्ति केंद्र पर हवाई हमला हुआ, जिसमें 408 लोगों की जान चली गई.
ऐतिहासिक विवाद—डुरंड रेखा
अफ़गानिस्तान डुरंड रेखा को मान्यता नहीं देता है. यह 2,670 किलोमीटर लंबी सीमा रेखा है जो चीन से ईरान तक फैली हुई है—असल में यह पाकिस्तान के साथ अफ़गानिस्तान की सीमा है. हालाँकि, मौजूदा टकराव का मुख्य कारण डुरंड रेखा नहीं है, फिर भी यह दोनों देशों के संबंधों में एक अड़चन बनी हुई है.
मूल रूप से 1893 में बनाई गई डुरंड रेखा ‘ग्रेट गेम’ का एक हिस्सा थी—यह 19वीं सदी में ब्रिटिश और रूसी साम्राज्यों के बीच मध्य एशिया पर अपना प्रभाव जमाने की होड़ थी. अफ़गानिस्तान पर कब्ज़ा करने की अपनी बार-बार की कोशिशों के दौरान, ब्रिटिश आखिरकार उस समय के अफ़गान अमीर अब्दुर रहमान खान के साथ एक समझौते पर पहुँचे. इस समझौते का मकसद ब्रिटिश भारत और अफ़गानिस्तान के बीच प्रभाव वाले क्षेत्रों को तय करना था.
इसका नतीजा यह हुआ कि 1893 में डुरंड रेखा की स्थापना हुई. इसका नाम एक ब्रिटिश सिविल सेवक, मॉर्टिमर डुरंड के नाम पर रखा गया था. इस एक पन्ने के समझौते ने मध्य एशिया में रूस और यूनाइटेड किंगडम के बीच अफ़गानिस्तान को एक ‘बफ़र स्टेट’ (मध्यवर्ती राज्य) के रूप में स्थापित किया. ब्रिटिश राज को बलूचिस्तान पर नियंत्रण मिल गया, और इस तरह उन्होंने पश्तून-बहुल क्षेत्र को असल में दो हिस्सों में बाँट दिया.
आखिरकार, 1919 में एंग्लो-अफ़गान संधि के ज़रिए इस रेखा में कुछ बदलाव किए गए. 1947 में भारत के बंंटवारे के बाद, पाकिस्तान को डुरंड रेखा विरासत में मिली. हालांकि, अफ़गानिस्तान की कई सरकारों ने इस रेखा को एक अंतर्राष्ट्रीय सीमा के तौर पर मान्यता देने से इनकार किया है, जिससे काबुल और इस्लामाबाद के बीच के संबंधों में और ज़्यादा तनाव आ गया है.
भारत के साथ संबंधों में सुधार
पिछले एक साल में, तालिबान और नई दिल्ली ने आपस में ज़्यादा करीबी कामकाजी संबंध बनाने की कोशिश की. इसका नतीजा यह हुआ कि अक्टूबर 2025 में अफ़गानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री मौलवी अमीर खान मुत्ताकी भारत की यात्रा पर आए.
जब मुत्ताकी भारत में थे, तभी पाकिस्तान ने डुरंड रेखा के पार हमले किए. 11 अक्टूबर 2025 को, दोनों देशों ने अपनी-अपनी सीमा पर स्थित व्यापारिक चौकियों को बंद कर दिया, जिससे इस्लामाबाद और काबुल के बीच के संबंधों में दरार और गहरी हो गई.
काबुल और नई दिल्ली ने कूटनीतिक संबंधों को और मज़बूत करने के लिए तेज़ी से कदम उठाए. पिछले साल अक्टूबर में, दोनों ने अपने-अपने मिशनों का दर्जा बढ़ाकर उन्हें ‘दूतावास’ का दर्जा देने की घोषणा की. मौजूदा तालिबान शासन के शुरुआती वर्षों के दौरान, भारत ने काबुल को लगातार मानवीय सहायता मुहैया कराई. हालांकि भारत तालिबान को अफ़गानिस्तान की आधिकारिक सरकार के तौर पर मान्यता नहीं देता, फिर भी उसने उन इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को फिर से शुरू करने का इरादा ज़ाहिर किया है, जो 2021 में काबुल के पतन के बाद से रुके हुए थे.
हेल्थकेयर से लेकर ईरान में चाबहार बंदरगाह के इस्तेमाल और मानवीय सहायता तक, भारत ने काबुल के साथ कई क्षेत्रों में जुड़ाव पर ज़ोर दिया है. ठीक उसी समय जब इस्लामाबाद के साथ उसके रिश्ते बहुत खराब हो गए थे. दोनों पक्षों ने कमर्शियल अटैच नियुक्त करने का इरादा भी ज़ाहिर किया, क्योंकि काबुल अपनी अर्थव्यवस्था पर पाकिस्तान के प्रभाव को और कम करना चाहता था.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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