नई दिल्ली: गृह मंत्रालय (MHA) ने शनिवार को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए, जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की हिरासत को “तत्काल प्रभाव से” रद्द करने के अपने फैसले की घोषणा की.
1980 का यह अधिनियम अधिकतम 12 महीनों तक निवारक हिरासत की अनुमति देता है, और वांगचुक पहले ही इस अवधि का लगभग आधा समय हिरासत में बिता चुके थे.
यह रिहाई उनकी पत्नी, गीतांजलि जे. आंगमो द्वारा सितंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट में हेबियस कॉर्पस याचिका दायर करने के लगभग छह महीने बाद हुई.
पिछले पांच महीनों में यह याचिका अदालत के सामने लगभग 24 बार सूचीबद्ध हुई, जिसमें हाल की कई सुनवाई केंद्र सरकार के अनुरोध पर स्थगित कर दी गईं. भारत सरकार ने बार-बार सुनवाई स्थगित करने का अनुरोध किया था, जिसका कारण सॉलिसिटर जनरल की बीमारी और वांगचुक के भाषणों की जांच करने तथा उस मामले में अपना जवाब तैयार करने के लिए आवश्यक समय बताया गया था, जिसे सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला बताया था.
जब 10 मार्च को इस मामले पर सुनवाई हुई, तो याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा बार-बार सुनवाई स्थगित करने का अनुरोध पूरे देश में एक “गलत संदेश” भेज रहा है.
इसके बाद, जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी.बी. वराले की बेंच ने संकेत दिया कि वह अब और अधिक स्थगन नहीं देगी, और मामले की सुनवाई 17 मार्च तक के लिए स्थगित करते हुए, अगले सप्ताह के लिए अपना फैसला सुरक्षित रख लिया. यह स्थगन केंद्र सरकार के अनुरोध पर हुआ था, जब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए अदालत में उपस्थिति दर्ज नहीं कराई थी.
इससे पहले, 26 फरवरी को भी सुनवाई सरकार के अनुरोध पर ही स्थगित कर दी गई थी. उस समय, केंद्र सरकार ने वांगचुक के भाषणों के वीडियो का अनुवाद करने और उनकी समीक्षा करने के लिए और अधिक समय मांगा था; सरकार का कहना था कि यही वीडियो कठोर NSA के तहत उनकी हिरासत का आधार बने थे.
केंद्र का वांगचुक को हिरासत में लेने और फिर रिहा करने का फैसला
जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को सितंबर 2025 में लेह में हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद हिरासत में लिया गया था. ये प्रदर्शन लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और उसे ‘छठी अनुसूची’ में शामिल करने की मांगों को लेकर हुए थे. लेह पुलिस ने उन पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाते हुए उन्हें हिरासत में लिया था.
लेह में पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शन 24 सितंबर 2025 को हिंसक हो गए, जब प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़पें हुईं. पुलिस की गोलीबारी में चार प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई. दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों ने BJP के दफ़्तर और कई गाड़ियों में आग लगा दी.
हिंसा की घटना के दो दिन बाद, 26 सितंबर 2025 को सोनम वांगचुक को NSA (राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून) के तहत हिरासत में ले लिया गया. तब से उन्हें राजस्थान की जोधपुर सेंट्रल जेल में रखा गया था.
गीतांजलि जे. आंगमो के अनुसार, वांगचुक पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग को लेकर शांतिपूर्ण भूख हड़ताल पर बैठे थे, और झड़पों को भड़काने में उनकी कोई भूमिका नहीं थी.
शनिवार को जारी गृह मंत्रालय की प्रेस रिलीज़ में कहा गया, “24 सितंबर 2025 को लेह जैसे शांतिप्रिय शहर में पैदा हुई गंभीर क़ानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से, लेह के ज़िला मजिस्ट्रेट द्वारा जारी आदेश के तहत, 26 सितंबर 2025 को श्री सोनम वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून (NSA) के प्रावधानों के तहत हिरासत में लिया गया था. श्री सोनम वांगचुक इस क़ानून के तहत निर्धारित हिरासत की अवधि का लगभग आधा समय पहले ही पूरा कर चुके थे.”
“…बंद और विरोध प्रदर्शनों के मौजूदा माहौल ने समाज के शांतिप्रिय स्वरूप को नुक़सान पहुंचाया है, और समुदाय के विभिन्न वर्गों—जिनमें छात्र, नौकरी के इच्छुक युवा, कारोबारी, टूर ऑपरेटर और पर्यटक शामिल हैं—के साथ-साथ पूरी अर्थव्यवस्था पर भी इसका बुरा असर पड़ा है.”
इसमें आगे कहा गया, “सरकार को पूरी उम्मीद है कि इस क्षेत्र से जुड़े मुद्दों का समाधान रचनात्मक बातचीत और संवाद के ज़रिए, जिसमें ‘उच्च-स्तरीय समिति’ की व्यवस्था और अन्य उपयुक्त मंचों का उपयोग शामिल है, कर लिया जाएगा.”
अदालत में सुनवाई और केंद्र सरकार के आरोप
गीतांजलि जे. आंगमो की हेबियस कॉर्पस याचिका में सोनम वांगचुक की गिरफ़्तारी को गैरकानूनी, मनमाना और उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया गया था.
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में अधिकारियों को हिरासत में लिए गए व्यक्ति को अदालत के सामने पेश करना होता है और यह बताना होता है कि हिरासत कानूनी है या नहीं.
सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर पहली सुनवाई 6 अक्टूबर 2025 को की थी और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था.
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि सरकार ने वीडियो को गलत तरीके से पेश किया और “उधार ली गई सामग्री” के आधार पर यह दावा किया कि वांगचुक हिंसा भड़का रहे थे.
उनकी पत्नी ने NSA लगाए जाने को “राजनीतिक मकसद से किया गया कदम” और “witch hunt” बताया, जिसका मकसद लद्दाख में शांतिपूर्ण विरोध और बातचीत को दबाना था.
जनवरी 2026 में जोधपुर सेंट्रल जेल में वांगचुक की तबीयत बिगड़ गई. उन्हें पेट से जुड़ी गंभीर दिक्कतें हुईं, जिसके बाद AIIMS जोधपुर में गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट द्वारा कई बार जांच की गई.
लेकिन केंद्र सरकार ने इसे “बनावटी और कृत्रिम तस्वीर” बताया और हिरासत जारी रखने को सही ठहराया.
जोधपुर जेल में पानी की खराब गुणवत्ता की शिकायतों के बाद अदालत ने वांगचुक के लिए विशेष इलाज का निर्देश दिया. अदालत ने केंद्र सरकार से यह भी पूछा कि क्या उनकी हिरासत पर दोबारा विचार किया जा सकता है, क्योंकि “उनकी स्वास्थ्य स्थिति बहुत अच्छी नहीं है”.
NSA के तहत वांगचुक की हिरासत को सही ठहराते हुए केंद्र सरकार ने लेह के विरोध प्रदर्शनों को अरब स्प्रिंग जैसी स्थिति बताया. सरकार ने आरोप लगाया कि वांगचुक ने हिंसा भड़काई, संवेदनशील सीमा क्षेत्र में राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डाला, और “नेपाल/बांग्लादेश जैसी” अशांति फैलाने की कोशिश की. यह भी आरोप लगाया गया कि वह “मुख्य उकसाने वाले” थे, जिन्होंने गांधी से प्रेरित भाषा का इस्तेमाल करके Gen Z को हिंसक विरोध, आत्मदाह और असहयोग के लिए प्रेरित किया.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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