तिरुवनंतपुरम: 2016 में, केरल के मुख्यमंत्री का पद संभालने के तुरंत बाद, पिनाराई विजयन ने अभिनेता-फिल्म निर्माता श्रीनिवासन के साथ एक इंटरव्यू दिया.
बातचीत की शुरुआत में श्रीनिवासन ने कहा, “मुझे पार्टी के मामलों के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है, लेकिन मुझे आपकी निजी ज़िंदगी के बारे में बात करने में दिलचस्पी है.” उन्होंने विजयन के 2002 में एक मलयालम अख़बार को दिए इंटरव्यू का ज़िक्र किया, जिसमें CPI(M) नेता ने एक निजी सवाल का जवाब देने से मना कर दिया था. विजयन ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “यह पूरी तरह से कोई राज़ नहीं है.”
आमतौर पर गंभीर और शांत स्वभाव के माने जाने वाले विजयन, श्रीनिवासन के साथ बातचीत करते समय ज़्यादा नरम और बेझिझक नज़र आए. उन्होंने अपनी निजी ज़िंदगी के उन पहलुओं के बारे में भी बात की, जिनके बारे में पहले वह बात करने से कतराते थे.
तब से लेकर अब तक, विजयन ने मलयालम जगत की मशहूर हस्तियों के साथ ऐसे तीन इंटरव्यू दिए हैं. इनमें सबसे ताज़ा इंटरव्यू पिछले महीने ही सुपरस्टार मोहनलाल के साथ हुआ था.
उनके आलोचक उन्हें ‘मुंडू मोदी’ (धोती पहनने वाले नरेंद्र मोदी) कहकर पुकारते हैं. आलोचकों के मुताबिक, विजयन का प्रशासनिक अंदाज़ “तानाशाही” और “सत्ता को अपने हाथ में रखने वाला” है. लेकिन CPI(M) और उसके समर्थकों के लिए, वह एक ऐसे “कप्तान” हैं, जिन्होंने राज्य में विकास से जुड़ी उन परियोजनाओं को भी पूरा कर दिखाया, जिन्हें कभी नामुमकिन माना जाता था.

अब 80 साल के हो चुके CPI(M) के सबसे ताक़तवर नेता और भारत के सबसे उम्रदराज़ मुख्यमंत्री विजयन के नाम एक अनोखी उपलब्धि दर्ज है. उन्होंने केरल के इतिहास में लगातार दो विधानसभा चुनाव जीते हैं, और दूसरी बार तो उन्होंने पहले से भी ज़्यादा वोटों के अंतर से जीत हासिल की.
वह एक बार फिर पार्टी की कमान संभालते हुए एक और बेहद अहम विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं. पार्टी और उसके समर्थक इस चुनाव को वामपंथी विचारधारा के “अस्तित्व की लड़ाई” बता रहे हैं, क्योंकि पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा जैसे अपने सभी दूसरे गढ़ों में वामपंथी पार्टियां सत्ता गंवा चुकी हैं.
सत्ता-विरोधी लहर के बावजूद पूरे आत्मविश्वास के साथ चुनाव लड़ रही कांग्रेस से मुक़ाबला करते हुए, विजयन को इस बात के लिए भी आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है कि उनके नेतृत्व में पार्टी कई मौकों पर कम्युनिस्ट विचारधाराओं से भटक गई है. यहां तक कि पार्टी के अस्तित्व को बचाने के लिए उसने पर्दे के पीछे से BJP के साथ भी मिलकर काम किया है. लेकिन विजयन का एक युवा कार्यकर्ता से “कैप्टन” बनने का सफ़र, राज्य में कम्युनिस्ट पार्टी के अपने बदलाव के भी समानांतर चलता है. एक सामूहिक नेतृत्व मॉडल से हटकर, एक ऐसे मॉडल की ओर जो सहकारी समितियों के ज़रिए आर्थिक संस्थानों के नेटवर्क को संभालता है और नेता-केंद्रित राजनीति में सहज महसूस करता है.
मुख्यमंत्री, जिन्होंने राज्य में सबसे लंबे समय तक पार्टी के राज्य सचिव की भूमिका निभाई है, उन्हें अक्सर “विद्रोही” कहा जाता है. लेकिन कई लोग उन्हें एक “व्यावहारिक” कम्युनिस्ट और “विकास-समर्थक” नेता भी कहते हैं, जो कभी भी “गपशप या फालतू की बातों” में शामिल नहीं होते और जिन्होंने कभी भी अपनी सार्वजनिक छवि की परवाह नहीं की.

पत्रकार और लेखक उल्लेख एन.पी., जिन्होंने राजनीति पर काफ़ी कुछ लिखा है. जिसमें 2018 की किताब कन्नूर: इनसाइड इंडियाज़ ब्लडीएस्ट रिवेंज पॉलिटिक्स भी शामिल है. कहते हैं कि विजयन शायद केरल के अब तक के सबसे शक्तिशाली मुख्यमंत्री हैं.
विजयन एक ऐसे नेता हैं जिन्होंने “एक ही समय में सरकार और पार्टी, दोनों को नियंत्रित किया”, जो पिछले कम्युनिस्ट मुख्यमंत्रियों से अलग है, वे दिप्रिंट को बताते हैं. “विजयन ने एक कट्टर मार्क्सवादी कार्यकर्ता के तौर पर शुरुआत की, लेकिन वे एक व्यावहारिक प्रशासक के रूप में विकसित हुए, जो शासन के लिए अपनी विचारधारा को ढालने को तैयार रहते हैं.”
लेकिन उनके करीबी लोग कहते हैं कि उनकी आलोचना को एक अलग नज़रिए से देखा जाना चाहिए. उनकी अपनी निजी यात्रा. एक दबे-कुचले सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से ऊपर उठने की, और कन्नूर का राजनीतिक इतिहास, जो अक्सर अपनी हिंसक राजनीति के लिए जाना जाता है.
“आप विजयन को कम्युनिस्ट किताबों के ज़रिए नहीं समझ सकते. वे अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं. वे उत्तरी मालाबार से आते हैं. और आपको ये सारी बातें ध्यान में रखनी होंगी,” विजयन के एक करीबी परिचित कहते हैं, जो अपना नाम ज़ाहिर नहीं करना चाहते.
उन्होंने कहा कि यह नेता बेहद दयालु है, अपने करीबी लोगों की ज़िंदगी के बारे में पूरी जानकारी रखता है, और अपनी निजी ज़िंदगी में काफ़ी खुले विचारों वाला है. इसी वजह से उन्होंने श्रीनिवासन और हाल ही में मोहनलाल जैसी हस्तियों के साथ बेझिझक इंटरव्यू दिए हैं.
राजनीतिक विश्लेषक जोसेफ़ सी. मैथ्यू, जिन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री वी.एस. अच्युतानंदन के साथ मिलकर काम किया है, कहते हैं कि विजयन ने एक कम्युनिस्ट नेता के तौर पर विभिन्न समुदायों के नेताओं के साथ तालमेल बिठाया है, जिससे पार्टी सचिवों की ताक़त कुछ कम हुई है. “वह हर समुदाय के नेता से मिलते हैं. CPI(M) के किसी भी नेता ने ऐसा नहीं किया. मुझे लगता है कि यह पूरी तरह से एक नया दौर है.”
हालांकि, वह आगे कहते हैं कि इससे “पार्टी का केंद्रीकृत संगठनात्मक लोकतंत्र टूटकर सिर्फ़ एक व्यक्ति तक सिमट गया, जिसने, मेरे विचार से, पार्टी को बर्बाद कर दिया है.”
कन्नूर से क्लिफ़ हाउस तक
एक राजनेता, जो एक छात्र कार्यकर्ता के तौर पर एकदम नीचे से ऊपर उठा, विजयन पहली बार मार्च 1977 में केरल विधानसभा में दिए गए एक ऐतिहासिक भाषण से सुर्खियों में आए थे.
दो साल पहले आपातकाल के दौरान ‘आंतरिक सुरक्षा रखरखाव अधिनियम’ (MISA), 1971 के तहत गिरफ़्तार किए जाने के बाद हिरासत में दी गई यातना के अपने अनुभव को बताते हुए, उन्होंने अपनी खून से सनी कमीज़ ऊपर उठाई थी और तत्कालीन कांग्रेस मुख्यमंत्री करुणाकरण से सवाल पूछे थे.
“श्री करुणाकरण से मैं यह कहता हूं: हमने ज़ोरदार बहस की है और अपनी बात मज़बूती से रखी है. हम ऐसा करते रहेंगे. मैंने अच्युत मेनन को लिखे अपने पत्र में भी यही बात लिखी थी. इन बातों को दबाया नहीं जा सकता. यही तो राजनीति है. हमारी पार्टी ने इससे भी बुरे हालात देखे हैं. हमारे साथी (कॉमरेड) लॉक-अप में ही शहीद हो गए.
कुछ लोग विरोध प्रदर्शनों के दौरान गोलीबारी में मारे गए. कुछ को भाड़े के गुंडों ने चाकू मारकर या गोली चलाकर मौत के घाट उतार दिया,” उन्होंने कहा था. “यह सब जानते हुए भी, हम आज भी इस पार्टी के साथ मज़बूती से खड़े हैं. क्योंकि हमें ऐसे खतरों की उम्मीद पहले से ही होती है. लेकिन अगर आपको लगता है कि आप हममें से किसी एक को लॉक-अप में डालकर, और उस पर चार पुलिसवालों और एक इंस्पेक्टर को छोड़ देकर, चुप करा सकते हैं, तो आप गलत हैं. इससे हम चुप नहीं होंगे. बल्कि इससे हम और भी ज़्यादा मज़बूत होंगे.”
पिछले महीने मोहनलाल को दिए एक इंटरव्यू में, विजयन ने बताया कि उन्होंने उस कमीज़ को कुछ समय तक संभालकर रखा था.
हालाँकि इस घटना ने एक राजनेता के तौर पर उनके भविष्य की नींव रखी थी. जिस रूप में वे बाद में जाने गए. लेकिन उनके करीबी लोग उन्हें एक “होशियार छात्र” के तौर पर याद करते हैं. एक ऐसा छात्र जो स्वभाव से शर्मीला था, लेकिन बचपन से ही लोगों के बीच सुलह कराने (मध्यस्थता करने) में माहिर था. उनके शिक्षक ने तो उन्हें प्यार से ‘मुख्यस्थान’ (यानी मध्यस्थ/सुलह कराने वाला) नाम भी दे दिया था.
इस नेता के व्यक्तित्व को उनके सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि ने भी काफी हद तक आकार दिया था.
1945 में कन्नूर के पिनाराई कस्बे में जन्मे विजयन, श्री मारोली कोरन और अलक्कट्ट कल्याणी की 14 संतानों में सबसे छोटे बेटे थे. जिनमें से 11 बच्चे जीवित नहीं रह पाए थे. विजयन अक्सर अपने बचपन में झेली गई मुश्किलों को याद किया करते थे.
प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्हें बीड़ी बनाने का काम करने के लिए भेज दिया गया था, लेकिन शिक्षकों के ज़ोर देने पर उनकी माँ ने उन्हें दोबारा स्कूल भेज दिया. उन्होंने गवर्नमेंट ब्रेनन कॉलेज, तलश्शेरी में दाखिला लेकर अपनी प्री-यूनिवर्सिटी की पढ़ाई और अर्थशास्त्र में स्नातक की डिग्री हासिल करने से पहले, एक साल तक हथकरघा बुनकर के तौर पर भी काम किया था.

कन्नूर, जो केरल के मालाबार इलाके में आता है, पर ब्रिटिश लोग सीधे तौर पर शासन करते थे. यह मद्रास प्रेसिडेंसी के तहत मालाबार ज़िले का हिस्सा था. इतिहासकार और जानकार कहते हैं कि यह इलाका सामाजिक विकास के मामले में मध्य और दक्षिणी केरल से पीछे रह गया, क्योंकि त्रावणकोर और कोचीन जैसी रियासतों ने शिक्षा और सामाजिक सुधारों में ज़्यादा निवेश किया था. मालाबार की ज़मींदारी प्रथा और असमानताओं ने किसानों और मज़दूरों के संगठित आंदोलनों को बढ़ावा दिया.
1939 में, पिनाराई में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की केरल इकाई बनाई गई. यह इस इलाके में कम्युनिस्ट राजनीति के विकास का एक अहम पल था. वामपंथी दल, खासकर CPI(M), इस ज़िले में आज भी एक मज़बूत कैडर-आधारित संगठनात्मक ढांचा बनाए हुए हैं.
हालांकि, इस ज़िले का इतिहास कम्युनिस्ट पार्टी, कांग्रेस और RSS के बीच राजनीतिक हिंसा के लिए भी बदनाम रहा है. RSS का शुरुआती विस्तार भी इसी इलाके में हुआ था.
विजयन, जो कम्युनिस्ट पार्टी के CPI और CPI(M) में बंटने के कुछ ही समय बाद CPI(M) में शामिल हो गए थे, केरल स्टूडेंट्स फेडरेशन (KSF) के सदस्य थे. KSF ही बाद में स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) बना. बाद में उन्होंने KSF और केरल स्टेट यूथ फेडरेशन (KSYF) के अध्यक्ष के तौर पर काम किया.
1968 में, यह राजनेता CPI(M) की कन्नूर ज़िला समिति के लिए चुने गए, और फिर 1978 में पार्टी की केरल राज्य समिति के लिए चुने गए.

इस दौरान, उन्होंने ज़िला और राज्य सहकारी बैंकों में भी भूमिकाएं निभाईं. 1986 में विजयन को CPI(M) का कन्नूर ज़िला सचिव चुना गया. यह तब हुआ जब वरिष्ठ नेता एम.वी. राघवन “वैकल्पिक दस्तावेज़ मुद्दे” पर पार्टी छोड़कर चले गए थे. यह भूमिका उनके राजनीतिक करियर में एक अहम मोड़ साबित हुई.
यह वैकल्पिक दस्तावेज़ राघवन ने जारी किया था. इसमें उन्होंने पार्टी के महासचिव ई.एम. नंबूदरीपाद की उस रणनीति की आलोचना की थी, जिसके तहत राज्य में “सांप्रदायिक” या धर्म-आधारित पार्टियों. जैसे इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) या केरल कांग्रेस. के साथ गठबंधन न करने का फ़ैसला लिया गया था.
राघवन के दस्तावेज़ में इस कदम की आलोचना की गई थी और कहा गया था कि कांग्रेस का विरोध करने के लिए पार्टी को रणनीतिक रूप से काम करना चाहिए. कन्नूर के एक कद्दावर नेता राघवन को “संशोधनवाद” के आरोप में पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था.
राजनीतिक विश्लेषक के.पी. सेतुनाथ कहते हैं, “उनके प्रशंसक अक्सर उन्हें एक मज़बूत राजनेता के तौर पर पेश करते हैं, क्योंकि वे 1971 में ही विधायक बन गए थे. लेकिन उस समय उनके पास उतना ज़्यादा प्रभाव या ताक़त नहीं थी. CPI(M) की संगठनात्मक संरचना के अनुसार, सिर्फ़ विधायक होने से किसी को उतनी ताक़त नहीं मिलती. असली ताक़त तो संगठनात्मक पदों से ही मिलती है.”
लगभग इसी समय, विजयन का चुनावी राजनीति में करियर भी रफ़्तार पकड़ रहा था. 1970 में, कन्नूर की कुथुपरम्बा सीट से चुनाव जीतने के बाद, वे 25 साल की उम्र में केरल के सबसे कम उम्र के विधायक बन गए. उन्होंने 1991 तक इस सीट का प्रतिनिधित्व किया. 1996 में, उन्होंने पय्यानूर सीट से जीत हासिल की और उस समय ई.के. नयनार के नेतृत्व वाली कैबिनेट में बिजली और सहकारिता मंत्री बने.
केरल की सहकारी समितियों को मज़बूत करने और मालाबार क्षेत्र में बिजली की पहुंच बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभाने का श्रेय विजयन को ही दिया जाता है.
लेकिन उनके मंत्री कार्यकाल के दौरान एक विवाद भी सामने आया. यह विवाद एसएनसी-लवलीन सौदे में भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़ा था. यह सौदा केरल राज्य बिजली बोर्ड और कनाडा की कंपनी एसएनसी-लवलीन के बीच, केरल में तीन पनबिजली परियोजनाओं के नवीनीकरण के लिए हुआ था. सबूतों के अभाव में विजयन को इस मामले से बरी कर दिया गया था.
कन्नूर में 1971 के थालास्सेरी दंगों के दौरान शांति बनाए रखने के प्रयासों में अपनी भागीदारी के लिए भी विजयन को याद किया जाता है. दिसंबर 1971 में हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच एक हफ़्ते तक चले दंगे, आज़ादी के बाद केरल में हुए पहले सांप्रदायिक दंगों के तौर पर दर्ज किए गए. इन दंगों में बड़े पैमाने पर तबाही हुई, 100 से ज़्यादा घरों और कई दुकानों में लूटपाट हुई, साथ ही 60 से ज़्यादा मस्जिदों और तीन मंदिरों को भी नुकसान पहुँचा.
जस्टिस जोसेफ़ विथयाथिल आयोग की जांच के मुताबिक, दंगों की शुरुआत RSS और जनसंघ द्वारा फैलाई गई एक अफ़वाह से हुई थी. यह अफ़वाह थी कि परप्रम मंदिर को मुसलमानों ने अपवित्र कर दिया है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि विजयन, जो CPI(M) की शांति प्रयासों की अगुवाई कर रहे थे, वे भी पुलिस की कार्रवाई का निशाना बने थे.
चडयन गोविंदन के निधन के बाद 1998 में विजयन पार्टी के प्रदेश सचिव बने और उसी साल उन्होंने अपने मंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया. उन्होंने 18 साल तक इस पद पर काम किया, जिससे पार्टी में कई तरह के बदलाव आए और CPI(M) की केरल इकाई, दूसरे राज्यों में मौजूद अपनी समकक्ष इकाइयों से अलग पहचान बनाने में कामयाब रही.
इन अहम बदलावों में से एक बदलाव पार्टी की मीडिया रणनीति में आया. साल 2000 में पार्टी ने ‘कैराली टीवी’ लॉन्च किया, और अपने रोज़ाना छपने वाले मुखपत्र ‘देशाभिमानी’ के दफ़्तरों को भी किसी भी दूसरे बड़े मीडिया संस्थान की तरह ही आधुनिक रूप दिया गया.

“उन्होंने संगठन को इस तरह से बदला कि वह वैश्वीकरण के बाद के दौर में भी टिक सके. यह उन्हीं के समय की बात है जब पार्टी ने संगठन में कई बड़े बदलाव किए. कैराली चैनल शुरू किया गया, और देशभिमानी के दफ़्तर किसी भी बड़े मीडिया हाउस की तरह विशाल हो गए, साथ ही उनसे जुड़ी संपत्तियां और सहकारी उद्यम भी बढ़े,” सेतुनाथ कहते हैं.
“पार्टी एक बड़ा उद्यम बन गई. बंगाल और केरल की कम्युनिस्ट पार्टियों के बीच यही मुख्य अंतर है. केरल में, पार्टी की इकाइयों और कार्यकर्ताओं की संपत्ति पार्टी के ज़रिए ही बनती है. इसलिए पार्टी का अस्तित्व ही व्यक्ति का अस्तित्व है,” वे आगे कहते हैं.
इस नेतृत्व में, पार्टी ने 2004 के आम चुनाव, 2006 के विधानसभा चुनाव, और 2016 और 2021 के विधानसभा चुनावों जैसे अहम चुनाव जीते. पिछले राज्य चुनावों में पार्टी ने लगातार जीत हासिल करके इतिहास रच दिया.
लेकिन यह दौर पार्टी में दो गुटों में बंटने के लिए भी याद किया जाता है, जिनकी अगुवाई दिग्गज नेता विजयन और अच्युतानंदन कर रहे थे. यह आपसी रंजिश अक्सर सार्वजनिक रूप से सामने आती थी और एक दशक से भी ज़्यादा समय तक चली.
जिस समय विजयन धीरे-धीरे पार्टी में ताक़तवर बन रहे थे, इस आपसी रंजिश का पहला बड़ा टकराव तब सामने आया जब अच्युतानंदन. जिन्हें आम तौर पर ‘वीएस’ के नाम से जाना जाता है. ने लावालिन सौदे के मामले में विजयन के ख़िलाफ़ बयान दिया. 1996 में माराारिकुलम स्थित अपने गढ़ में कांग्रेस के सी.जे. फ्रांसिस के हाथों वीएस की अप्रत्याशित हार के बाद तनाव और बढ़ गया. इस हार की वजह पार्टी के भीतर की गुटबाज़ी को माना गया.
2005 में, मलप्पुरम में हुए 18वें राज्य सम्मेलन में भी वीएस को एक बड़ा झटका लगा, जब उनके द्वारा नामित सभी 12 उम्मीदवार राज्य समिति के चुनावों में हार गए.
विजयन तीसरी बार राज्य सचिव चुने गए, और प्रतिनिधियों ने उनके पैनल का भी समर्थन किया. उसी साल, वीएस को देशभिमानी के संपादक पद से हटा दिया गया.
2006 के विधानसभा चुनावों में वीएस को लगभग टिकट देने से मना ही कर दिया गया था, जिसके बाद उनके समर्थकों ने ज़ोरदार विरोध प्रदर्शन किए. लेकिन आख़िरकार उन्होंने चुनाव लड़ा और मुख्यमंत्री बने. 2007 में, पार्टी ने पार्टी सेक्रेटरी और मुख्यमंत्री वीएस दोनों को उनकी आपसी सार्वजनिक कलह के कारण कुछ समय के लिए निलंबित कर दिया था.
वीएस. ने टीपी चंद्रशेखरन का भी समर्थन किया था, जिन्हें विजयन ने एक बार “गद्दार” कहा था. इस बागी कम्युनिस्ट नेता की 2012 में हत्या कर दी गई थी, और उनकी मौत के लिए पार्टी को दोषी ठहराया गया था.
चंद्रशेखरन, जो 18 साल की उम्र में CPI(M) में शामिल हुए थे, उन्होंने पार्टी छोड़कर ‘रिवोल्यूशनरी मार्क्सवादी पार्टी’ (RMP) बनाई. इस नई पार्टी ने 2009 के स्थानीय निकाय चुनावों में अपने गढ़, कोझिकोड जिले की ओंचियम पंचायत में जीत हासिल की.
मई 2012 में हमलावरों के एक समूह ने चंद्रशेखरन की हत्या कर दी. जब वे बाइक पर जा रहे थे, तब हमलावरों ने पहले उन पर बम फेंका. इसके बाद धारदार हथियारों से काटकर उनकी हत्या कर दी गई, और जांच में उनके शरीर पर 55 घाव पाए गए.
विशेष जांच दल (SIT) ने बाद में तीन मुख्य संदिग्धों. जिनमें कोडी सुनी भी शामिल था. को उन ठिकानों से गिरफ्तार किया, जो CPI(M) के गढ़ माने जाने वाले इलाकों के पास स्थित थे. पुलिस ने 50 से अधिक आरोपियों को गिरफ्तार किया, जिनमें CPI(M) के कई पदाधिकारी भी शामिल थे. 2014 में, इस मामले में 12 आरोपियों को दोषी ठहराया गया, जिनमें CPI(M) के तीन नेता भी शामिल थे.
वीएस और विजयन के बीच की प्रतिद्वंद्विता अक्सर उनकी विपरीत छवियों के माध्यम से सामने आती थी. अच्युतानंदन को एक हाशिए पर धकेले गए नेता और कम्युनिस्ट विचारधारा के पैरोकार के रूप में चित्रित किया जाता था, जबकि विजयन को कॉरपोरेट्स का समर्थन करने वाले नेता के रूप में देखा जाता था.
उदाहरण के लिए, जब वीएस मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने 2007 में मुन्नार में एक बड़ा अतिक्रमण हटाओ अभियान चलाया था. इसका उद्देश्य ‘भूमि माफिया’ द्वारा सरकारी ज़मीन और जंगलों पर किए गए कथित अतिक्रमण को हटाना था. हालाँकि, स्थानीय CPI(M) और कुछ राज्य नेताओं ने इस कदम का विरोध किया. उनका कहना था कि इस अभियान से बड़े अतिक्रमणकारियों की तुलना में गरीब लोग ज़्यादा प्रभावित हुए हैं. पार्टी ने तो अपनी ही सरकार का विरोध करने के लिए ‘मुन्नार संरक्षण समिति’ भी बना ली थी.
इसी तरह, 2000 के दशक के मध्य में, वीएस ने दुबई स्थित ‘TECOM इन्वेस्टमेंट्स’ और केरल सरकार के बीच हुए ‘स्मार्टसिटी कोच्चि’ समझौते को लेकर चिंताएँ जताई थीं. विशेष रूप से, उन्होंने समझौते की उस शर्त पर आपत्ति जताई थी, जिसके तहत IT टाउनशिप परियोजना स्थापित करने के लिए TECOM इन्वेस्टमेंट्स को परियोजना-भूमि पर ‘फ्रीहोल्ड अधिकार’ (पूर्ण स्वामित्व अधिकार) दिए गए थे. विजयन और CPI(M) के कई नेताओं ने इस प्रोजेक्ट का समर्थन किया.
उल्लेख कहते हैं कि यह आपसी रंजिश असल में पार्टी के दो वरिष्ठ नेताओं के बीच सत्ता की लड़ाई थी.
उल्लेख कहते हैं, “यह ऐसा मामला नहीं था कि वीएस हीरो हों और पिनाराई विलेन. यह तो बस पार्टी के भीतर सत्ता के लिए एक राजनीतिक संघर्ष था.”
लेकिन, मैथ्यू कहते हैं कि वीएस की लड़ाई पार्टी से थी, न कि विजयन से.
वह कहते हैं, “वीएस को सत्ता के लिए इन दोनों के बीच लड़ाई मोल लेने की ज़रूरत नहीं थी. लेकिन उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वैचारिक रूप से वह इन लोगों के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहे थे.” वह आगे कहते हैं कि पार्टी, जिसकी कभी पार्टी सचिव की बात न मानने के लिए आलोचना होती थी, अब पूरी तरह से विजयन के नेतृत्व में चल रही है.
‘कैप्टन’ का उदय
विजयन का चुनावी राजनीति में दूसरा दौर 2016 में शुरू हुआ, जब उन्होंने विधानसभा चुनावों में पार्टी के प्रचार अभियान की कमान संभाली. उन्होंने ओमन चांडी के नेतृत्व वाली UDF सरकार के खिलाफ अभियान चलाया, जो सोलर स्कैम सहित कई घोटालों का सामना कर रही थी.
विजयन के नेतृत्व में LDF “LDF varum, ellam shariyakum (अगर LDF आएगी, तो सब ठीक हो जाएगा)” के नारे के साथ सत्ता में आई, और कुल 140 सीटों में से 91 सीटें जीतीं.
विजयन की पहली कैबिनेट ने शुरू में कई योजनाएं शुरू कीं, जैसे कि ‘लाइवलीहुड इन्क्लूजन एंड फाइनेंशियल एम्पावरमेंट’ (LIFE) मिशन, जिसका मकसद बेघर लोगों को घर देना था. स्वास्थ्य क्षेत्र को आधुनिक बनाने के लिए ‘आर्द्रम मिशन’. और कचरा प्रबंधन के लिए ‘हरित केरलम मिशन’.

सरकार ने इंटरनेट पहुंच के लिए कई बड़े डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट भी शुरू किए, जैसे कि ‘केरल फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क’ (K-FON) और तिरुवनंतपुरम में ‘इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड वायरोलॉजी’.
हालांकि, उनके कार्यकाल की सबसे बड़ी पहचान संकटों की एक श्रृंखला से निपटने का उनका तरीका रहा. 2018 की केरल बाढ़, 2018 में निपाह वायरस का प्रकोप, और कोविड-19 महामारी. महामारी के दौरान, विजयन हर शाम प्रेस कॉन्फ्रेंस करते थे, जिसमें वे रोज़ाना के मामलों, ठीक होने वाले मरीज़ों और नीतिगत फैसलों का ब्योरा देते थे.
शाम 6 बजे होने वाली यह प्रेस कॉन्फ्रेंस, जो मार्च 2020 में शुरू हुई थी, एक महीने तक रोज़ाना चलती रही, जिसके बाद धीरे-धीरे इसकी आवृत्ति कम होती गई. इन ब्रीफिंग को बड़े पैमाने पर देखा जाता था, और बताया जाता है कि इस दौरान टीवी चैनलों की TRP रेटिंग में भी बढ़ोतरी हुई थी.
इस दौर के चलते, 2021 के विधानसभा चुनावों से पहले विजयन को “कैप्टन” के तौर पर पेश किया जाने लगा.
विजयन के अतिरिक्त निजी सचिव, राथीश कालियादान के अनुसार, मुख्यमंत्री बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर लगातार नज़र रखते हैं और अधिकारियों को काम पूरा करने के लिए समय सीमा (डेडलाइन) देते हैं. उनके करीबी लोग यह भी कहते हैं कि वह “नंबरों पर ध्यान देने वाले व्यक्ति” हैं, जो हर प्रोजेक्ट के लिए हमेशा क्वांटिटेटिव डेटा (संख्यात्मक जानकारी) की तलाश में रहते हैं.
उन्होंने कहा, “बड़े प्रोजेक्ट्स की लगातार मॉनिटरिंग की जाएगी, जिसमें हर महीने रिव्यू भी शामिल होंगे. इससे काम में प्रगति होगी और CM को पूरी जानकारी होगी. मीटिंग्स के दौरान उन्हें गलत जानकारी नहीं दी जा सकेगी.” उन्होंने आगे कहा कि संकट की स्थितियों में भी यही तरीका अपनाया जाता है.
पिनाराई की पहली कैबिनेट को सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का समर्थन करने के अपने शुरुआती रुख को लेकर आलोचना का सामना करना पड़ा था, जिसके चलते 2018 में कांग्रेस और BJP ने विरोध प्रदर्शन किए थे. 2021 के विधानसभा चुनावों में भी यह मुद्दा छाया रहा.
लेकिन CPI(M) ने ऐतिहासिक जनादेश के साथ वापसी की और 99 सीटें जीतीं, जो पिछली बार से आठ ज़्यादा थीं.
हालांकि, 2019 के लोकसभा चुनावों में LDF को बड़ा झटका लगा और उसे 20 में से 19 सीटें UDF के हाथों गंवानी पड़ीं.
इस बार मुख्यमंत्री को कई विवादों का भी सामना करना पड़ा, जिनमें CMRL-एक्सालॉजिक मामला भी शामिल है. इस मामले में आरोप है कि विजयन की बेटी वीना टी. की कंपनी को गलत तरीके से पेमेंट किया गया था. मुख्यमंत्री ने किसी भी गलत काम से इनकार किया है.
2019 में शुरू हुए इस मामले के अनुसार, कोच्चि की कंपनी ‘कोचीन मिनरल्स एंड रूटाइल लिमिटेड’ (CMRL) ने 2017 में बेंगलुरु की IT कंपनी ‘एक्सालाजिक सॉल्यूशंस’ के साथ एक कॉन्ट्रैक्ट किया था. यह कंपनी वीना की थी और कॉन्ट्रैक्ट सॉफ्टवेयर अपडेट के लिए था, जिसके लिए कंपनी वीना की फर्म को लगातार पेमेंट करती रही. आयकर विभाग ने कहा कि कंपनी की तरफ से कोई सेवा नहीं दी जा रही थी.
हालांकि यह मामला अभी भी कोर्ट में चल रहा है, लेकिन राज्य के विपक्ष ने बार-बार आरोप लगाया है कि जांच की धीमी गति से पता चलता है कि सत्ताधारी ‘लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट’ (LDF) और BJP के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के बीच कोई मिलीभगत है.
विजयन की दूसरी कैबिनेट ने भी सभी मौजूदा मंत्रियों को हटाकर उनकी जगह नए और युवा चेहरों को लाने का फैसला किया, जिसमें विजयन खुद शामिल नहीं थे.
नई कैबिनेट में विजयन के दामाद पी.ए. मोहम्मद रियास को पर्यटन और PWD मंत्री बनाया गया. रियास, जो लेफ्ट पार्टी के छात्र संगठन SFI के ज़रिए पार्टी में शामिल हुए थे और धीरे-धीरे पार्टी में ऊपर उठे, कोझिकोड के बेपोर विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं.
हटाए गए मंत्रियों में के.के. शैलजा भी शामिल थीं, जो विजयन की पहली कैबिनेट की सबसे लोकप्रिय मंत्रियों में से एक थीं. शैलजा ने स्वास्थ्य मंत्री के तौर पर निपाह वायरस के प्रकोप और कोविड-19 महामारी को जिस तरह से संभाला था, उससे उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली थी. 2021 के चुनावों में उन्होंने 60,000 से ज़्यादा वोटों के सबसे बड़े अंतर से जीत हासिल की थी, जबकि जनता की तरफ से उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की ज़ोरदार मांग हो रही थी.
हालांकि उन्होंने कहा कि उन्होंने पार्टी के फैसले को स्वीकार कर लिया है, लेकिन इस कदम पर कई लोगों ने हैरानी जताई और पार्टी की आलोचना भी हुई कि उसने शैलजा को किनारे कर दिया है.
जहां पहली कैबिनेट ने ज़्यादातर जन-कल्याणकारी उपायों पर ध्यान दिया था, वहीं दूसरी कैबिनेट ने बुनियादी ढांचे को मज़बूत करने पर ज़ोर दिया. इसमें कोच्चि वॉटर मेट्रो, K-स्मार्ट जैसे ई-गवर्नेंस सिस्टम, राष्ट्रीय राजमार्गों का विस्तार, और सेमी-हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर ‘K-Rail’ को शुरू करने की कोशिशें शामिल थीं. हालांकि, केंद्र सरकार से मंज़ूरी न मिलने के कारण ‘के-रेल’ का काम आखिरकार रुक गया. इनमें से कई प्रोजेक्ट, जिनमें कोच्चि-मंगलुरु गैल पाइपलाइन भी शामिल है, 2000 के दशक के आखिर में सोचे गए थे, लेकिन फंड की कमी और विरोध प्रदर्शनों की वजह से पूरे नहीं हो पाए.
सरकार ने अत्यधिक गरीबी खत्म करने की एक पहल भी शुरू की, जिसका मकसद खास योजनाओं के ज़रिए राज्य के ‘अत्यधिक गरीब’ लोगों का उत्थान करना था.
हालाँकि, लेफ्ट पार्टी द्वारा निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए किए गए नए प्रयासों—जिनमें निवेश शिखर सम्मेलन आयोजित करना और केंद्र की योजनाओं से जुड़ना शामिल है—की आलोचना भी हुई. आलोचकों का कहना था कि केरल की कम्युनिस्ट पार्टी अपनी मूल मार्क्सवादी विचारधारा से भटक रही है.

आलोचना तब और बढ़ गई जब पिछले साल राज्य सरकार ने सबरीमाला में एक ‘ग्लोबल अयप्पा कॉन्क्लेव’ आयोजित किया. इस कदम को सरकार के हिंदू वोट बैंक को बनाए रखने और उसे BJP की ओर जाने से रोकने की एक कोशिश माना गया.
हालाँकि, विजयन के दफ़्तर का कहना है कि यह राज्य के लिए एक व्यावहारिक कदम है.
“भारत में एकमात्र कम्युनिस्ट पार्टी-शासित राज्य होने के नाते, केरल के पास अपने दम पर काम करने की आज़ादी नहीं है. इसलिए, अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए उसे केंद्र सरकार और उसकी नीतियों का पालन करना पड़ता है. लेकिन उन्होंने कभी भी कम्युनिज्म के मूल आदर्शों को कमज़ोर करने की कोशिश नहीं की,” कालियादान कहते हैं.
पहले ज़िक्र किए गए एक पुराने परिचित का कहना है कि यह बदलाव—जिसमें विजयन द्वारा आध्यात्मिक गुरु नारायण गुरु का बार-बार ज़िक्र करना भी शामिल है—दो बातों को दर्शाता है. एक तो हिंदुत्व के सांस्कृतिक नैरेटिव का एक विकल्प पेश करने की कोशिश, और दूसरा विजयन का वह पहलू जिस पर सार्वजनिक रूप से शायद ही कभी चर्चा होती है.
उनके अनुसार, यह नेता के व्यक्तित्व के एक अधिक “आध्यात्मिक” आयाम की ओर भी इशारा करता है, जो हमेशा से मौजूद रहा है, लेकिन उनकी राजनीतिक छवि में उसे शायद ही कभी उजागर किया जाता है.
अब, जब यह नेता एक और चुनाव में पार्टी का नेतृत्व करने के लिए तैयार है, तो पार्टी को उनके बाद अपने भविष्य को लेकर भी सवालों का सामना करना पड़ रहा है. “इस चुनाव में, पार्टी के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए सत्ता के बदलाव के दौर में वह बने हुए हैं. उनकी ताक़त के कुछ नकारात्मक पहलू भी हैं,” उन्होंने कहा.
यह घोषणा करते हुए कि विजयन आगामी विधानसभा चुनावों में पार्टी का नेतृत्व करेंगे, CPI(M) के महासचिव एम.ए. बेबी ने जनवरी में कहा था कि पार्टी चुनावों से पहले मुख्यमंत्री पद के लिए किसी चेहरे की घोषणा नहीं करेगी.
सेतुनाथ कहते हैं कि विजयन को देखने का नज़रिया, देखने वाले के दृष्टिकोण के आधार पर बदल सकता है. “जब आप पिनाराई विजयन को एक आदर्श कम्युनिस्ट नेता के रूप में और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) को एक आदर्श कम्युनिस्ट पार्टी के रूप में देखते हैं, तो उनका मूल्यांकन वैचारिक हो जाता है. अन्यथा, वह किसी भी अन्य राजनीतिक नेता की तरह ही अच्छे या उतने ही कमियों वाले इंसान हैं. बहुत से लोग उनका विश्लेषण मुख्य रूप से इस सवाल के आधार पर करते हैं कि क्या वह एक ‘अच्छे कम्युनिस्ट नेता’ हैं.”
वह आगे कहते हैं, “लेकिन अगर आप इस बात को एक तरफ रख दें, तो उनके साथ काम कर चुके नौकरशाह अक्सर उन्हें अच्छे अंक देते हैं. उनका कहना है कि उनके काम करने के तरीके में किसी भी तरह की टालमटोल या देरी नहीं होती.”
लेकिन विजयन खुद को मूल रूप से एक ‘पार्टी का आदमी’ मानते हैं, जिनका एकमात्र डर पार्टी की विचारधारा या ‘पार्टी लाइन’ से भटक जाना है. “आम तौर पर, मैं ऐसा व्यक्ति हूं जो पार्टी के आदेशों का पालन करता है. पार्टी के कुछ सामान्य रुख होते हैं, जिनकी वह अपेक्षा करती है,” उन्होंने मोहनलाल के साथ एक इंटरव्यू में कहा था. “मैं ऐसा व्यक्ति हूं जो यह मानता है कि उन रुख़ों से ज़रा सा भी भटकाव नहीं होना चाहिए. मैं इसी डर के साए में जीता हूँ. अगर आप चाहें तो कह सकते हैं कि मुझमें ऐसा ही एक डर है.”
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