नई दिल्ली: जब INDIA ब्लॉक के सांसदों ने मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ग्यानेश कुमार को हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव दिया है, तब इसके संवैधानिक प्रक्रिया—जो सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने की प्रक्रिया जैसी है—पर ध्यान केंद्रित हो गया है.
पहले भी भारत में सीईसी के खिलाफ विरोध देखा गया है, लेकिन पहली बार किसी सीईसी को हटाने के लिए औपचारिक नोटिस दिया गया है.
खबरों के अनुसार नोटिस में सीईसी के खिलाफ सात आरोप लगाए गए हैं. इनमें शामिल हैं: “पद पर रहते हुए पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण व्यवहार, चुनावी धोखाधड़ी की जांच में जानबूझकर बाधा डालना, बड़े पैमाने पर मतदाताओं को अधिकार से वंचित करना, दुर्व्यवहार, स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) को मनमाने तरीके से संभालना, किसी राजनीतिक दल के प्रति पक्षपात, और चुनावी अनियमितताओं की शिकायतों को नजरअंदाज करना.”
भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के 1988 बैच के केरल कैडर के अधिकारी ज्ञानेश कुमार ने फरवरी 2025 में सीईसी का पद संभाला था.
उनकी नियुक्ति खुद विवादों में रही थी. यह नियुक्ति पहली बार मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 के तहत हुई थी, जिसमें चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को हटा दिया गया था.
2023 के इस कानून में सीजेआई की जगह केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया, जिससे सरकार को चयन समिति में 2-1 का बहुमत मिल गया. इससे चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को लेकर चिंताएं उठी थीं.
इस हफ्ते कोलकाता दौरे के दौरान ग्यानेश कुमार को काले झंडे भी दिखाए गए. पश्चिम बंगाल में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठे हैं.
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग पर असली मतदाताओं के नाम हटाने का आरोप लगाया है.
नवंबर 2025 में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी हरियाणा चुनाव में कथित वोट हेरफेर को लेकर ‘वोट चोरी’ की बात कही थी. हालांकि, निर्वाचन आयोग ने इन आरोपों को “गलत और बेबुनियाद” बताया था.
हटाने की प्रक्रिया क्या है
संसद की कार्यवाही के नियमों के अनुसार, सीईसी को हटाने के लिए लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर ज़रूरी होते हैं.
खबरों के अनुसार, लोकसभा के 130 सांसदों और राज्यसभा के 63 सांसदों ने सीईसी ग्यानेश कुमार को हटाने के लिए नोटिस पर हस्ताक्षर किए हैं.
सूत्रों के मुताबिक इस नोटिस पर INDIA गठबंधन के सभी दलों के सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं, जिनमें आम आदमी पार्टी के सदस्य भी शामिल हैं. हालांकि, पार्टी अब आधिकारिक तौर पर विपक्षी गठबंधन का हिस्सा नहीं है.
विपक्षी दलों ने कई मौकों पर आरोप लगाया है कि सीईसी ज्ञानेश कुमार सत्तारूढ़ बीजेपी की मदद कर रहे हैं, खासकर चुनावी रोल के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) में.
हटाने के आधार कैसे तय होते हैं
भारतीय संविधान के भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार, सीईसी को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है—यानी “सिद्ध दुर्व्यवहार” या “अक्षम्यता” के आधार पर.
इसके लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना ज़रूरी होता है.
यह प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है. प्रस्ताव पास होने के लिए उस सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत की ज़रूरत होती है.
न्यायाधीश जांच अधिनियम 1968 की धारा 3 के अनुसार, यदि दोनों सदनों में एक ही दिन नोटिस दिया जाता है तो तब तक कोई जांच समिति नहीं बनेगी जब तक दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकार न हो जाए.
इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति मिलकर जांच के लिए एक समिति बनाएंगे.
यह तीन सदस्यीय समिति होगी, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित सुप्रीम कोर्ट के जज, किसी एक हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित विधि विशेषज्ञ शामिल होंगे.
समिति की कार्यवाही अदालत की तरह होती है, जहां गवाहों और आरोपियों से जिरह की जाती है.
सीईसी को भी समिति के सामने अपना पक्ष रखने का पूरा मौका मिलेगा. समिति की रिपोर्ट आने के बाद उसे संसद में पेश किया जाएगा. इसके बाद हटाने के प्रस्ताव पर चर्चा और मतदान होगा. जब संसद में प्रस्ताव पर चर्चा होगी, तब ग्यानेश कुमार को भी सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह अपना बचाव करने का अधिकार होगा.
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