बजट सत्र जैसे गर्म माहौल में सरकारें अक्सर बढ़ा-चढ़ाकर बोलने के लालच में आ जाती हैं. राज्यपाल के अभिभाषण से उम्मीद भी यही होती है कि वह आशावादी हो, लेकिन अंतरराज्यीय नदियों के पानी के मामले में ज्यादा आशावाद की कीमत चुकानी पड़ सकती है. जब कोई राज्य सिंचाई में बड़ी उपलब्धि और नहरों के विस्तार के बारे में बहुत बड़े दावे करता है, तो वह अनजाने में चल रहे नदी जल विवाद में अपनी ही स्थिति को कमजोर कर सकता है.
पंजाब अभी इसी जोखिम का सामना कर रहा है.
राज्य के बजट के कुछ पहलुओं की सराहना की जानी चाहिए. नहरों से सिंचाई को ज्यादा प्रभावी बनाने और पानी की हर बूंद बचाने पर जोर देना सराहनीय है. इसी तरह फसल नुकसान के मुआवजे को तेज़ी से देना भी महत्वपूर्ण है, खासकर पिछले साल रावी नदी के क्षेत्र में आई अभूतपूर्व बाढ़ को देखते हुए, लेकिन अंतरराज्यीय नदी जल के मामले में श्रेय लेने में सावधानी ज़रूरी है.
तालियों वाली बातें जो बाद में स्वीकारोक्ति बन सकती हैं
6 मार्च 2026 के राज्यपाल के अभिभाषण और उससे जुड़े बजट में सिंचाई को लेकर बड़ी सफलता की कहानी पेश की गई है. बताया गया है कि तीन साल में नहर सिंचाई क्षमता दोगुनी हो गई है; सतही पानी का उपयोग 6.6 MAF तक पहुंच गया है; पहली बार 1,365 स्थानों तक नहर का पानी पहुंचा है और साल के अंत तक नहर सिंचाई के दायरे में आने वाला क्षेत्र करीब 70 लाख एकड़ तक पहुंच जाएगा.
राजनीतिक मंच पर ये बातें तालियां बटोरती हैं, लेकिन किसी ट्रिब्यूनल या अंतरराज्यीय बातचीत में यही बातें राज्य के खिलाफ स्वीकारोक्ति बन सकती हैं. पंजाब का पुराना तर्क एक ही बात पर टिका रहा है: कि उसके पास पानी सीमित है, खेती पर उसकी निर्भरता बहुत ज्यादा है, भूजल पर दबाव गंभीर है और इसलिए उसके पास जबरन पानी मोड़ने की गुंजाइश बहुत कम या बिल्कुल नहीं है.
अगर राज्य खुद ही यह कहे कि नहरों से सिंचाई तेज़ी से बढ़ रही है और पानी का इस्तेमाल बहुत बढ़ गया है, तो दूसरे दावेदार यह सवाल उठा सकते हैं कि फिर वह कमी कहां है जिसके आधार पर पंजाब पानी देने का विरोध करता रहा है?
इसी वजह से सार्वजनिक भाषा बहुत मायने रखती है.
जारी विवाद
रावी–ब्यास नदी के पानी का विवाद कोई खत्म हो चुका मामला नहीं है. ट्रिब्यूनल को एक और विस्तार मिला है, जो अब 5 अगस्त 2026 तक है, और हाल ही में ज़मीन स्तर पर हुई गतिविधियों से नए विरोध भी शुरू हो गए हैं. पंजाब सरकार द्वारा किया गया हर आधिकारिक दावा उसके बड़े तर्क की सच्चाई को परखने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.
कोई यह नहीं कह रहा कि पंजाब को नहरों के सुधार में हुई असली प्रगति छिपानी चाहिए, लेकिन धीरे-धीरे हुए सुधार की जानकारी देने और उसे बड़ी उपलब्धि बताकर पेश करने में फर्क होता है. जब कोई राज्य पानी के चल रहे विवाद में शामिल हो, तो वह एक तरफ यह नहीं कह सकता कि उसके पास अतिरिक्त पानी नहीं है और दूसरी तरफ सार्वजनिक रूप से सिंचाई की बहुतायत की तस्वीर पेश करे.
एक व्यावहारिक चिंता भी है. पंजाब के कई हिस्सों के किसान ज़मीन पर बिल्कुल अलग स्थिति बताते हैं. माझा और दक्षिण-पश्चिम पंजाब में नहर के आखिरी छोर तक पानी न पहुंचना आज भी एक बड़ी शिकायत है. खुद सरकार ने भी माना है कि फाजिल्का जिले के अबोहर के लिए फिरोजपुर फीडर को मजबूत करने की ज़रूरत है.
माझा क्षेत्र में अपर बारी दोआब नहर प्रणाली को गुरदासपुर, अमृतसर और तरनतारन में सिंचाई की रीढ़ होना चाहिए था, लेकिन शिकायत आज भी वही है: पानी आखिरी छोर तक नहीं पहुंचता.
इस तरह पंजाब असली समस्या हल किए बिना ही अपने कानूनी और राजनीतिक मामले को कमजोर कर सकता है.
उझ परियोजना और शाहपुर कंडी
दूसरा खतरा रणनीतिक चूक का है. पंजाब ने केंद्र सरकार पर रावी नदी की एक सहायक नदी पर बनने वाली उझ बहुउद्देश्यीय परियोजना को लागू करने के लिए पर्याप्त जोर नहीं दिया है. यह पूर्वी नदियों के ढांचे के भीतर पानी के भंडारण का एक समझदारी भरा विकल्प है, जिसे कई साल पहले मंजूरी मिल चुकी है, लेकिन इस पर काम रुक-रुक कर ही आगे बढ़ा है.
इसी तरह शाहपुर कंडी बांध, जिसका निर्माण कई दशकों से चल रहा है और अब अपने अंतिम चरण में है, उसे बिना और देरी के पूरी तरह चालू किया जाना चाहिए. इसका मतलब दोनों हिस्सों को पूरा करना है: सिंचाई वाला हिस्सा, जिससे गुरदासपुर और पठानकोट तक पानी पहुंचे और बिजली उत्पादन वाला हिस्सा, जिससे पंजाब को ज़रूरी बिजली मिल सके. अगर इसे आंशिक रूप से ही चालू छोड़ा गया, तो व्यवहार में पंजाब वही छोड़ देगा जिस पर वह सिद्धांत रूप में जोर देता है.
न तो उझ परियोजना और न ही शाहपुर कंडी को कभी मामूली मुद्दा माना जाना चाहिए था. पंजाब को साफ फर्क करना होगा कि कागज़ पर क्या है, ज़मीन पर क्या चल रहा है और क्या केवल प्रशासनिक ढिलाई के कारण अब तक पूरा नहीं हो पाया है.
राज्य अक्सर राजनीतिक गुस्से और प्रशासनिक निष्क्रियता के बीच झूलता रहा है. अब यह स्थिति पहले से भी कम सही ठहराई जा सकती है.
सिंधु जल संधि
अप्रैल 2025 में भारत के सिंधु जल संधि को स्थगित रखने के फैसले ने नीति की स्थिति को बदल दिया. भारतीय राज्य ने पश्चिमी और पूर्वी दोनों नदियों के सवाल पर ज्यादा कड़ा रुख दिखाने का संकेत दिया है. पंजाब को अब रक्षात्मक तरीके से नहीं, बल्कि व्यापक सोच के साथ सोचना होगा—कि संविधान, पर्यावरण और इंजीनियरिंग की सीमाओं के भीतर अब कौन-सा नया बुनियादी ढांचा, जल भंडारण और नदी जोड़ने की योजनाएं संभव हो सकती हैं.
अगर संधि स्थगित ही रहती है या आगे चलकर खत्म हो जाती है, तो भारत को लंबे समय की रणनीति के तहत चिनाब नदी प्रणाली के एक हिस्से को रवि नदी बेसिन से जोड़ने की संभावना पर विचार करना चाहिए. यह कई पीढ़ियों का बड़ा प्रोजेक्ट होगा. इससे उत्तरी क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले पानी की मात्रा बढ़ सकती है, पानी की बर्बादी कम हो सकती है और जम्मू-कश्मीर व पंजाब दोनों को लंबे समय की योजना बनाने के लिए ज्यादा जगह मिल सकती है—यह भरोसा भी मिलेगा कि पूर्वी नदियों का दबाव हमेशा अंदरूनी संघर्ष का कारण नहीं रहेगा.
ऐसी नदी जोड़ने की योजना के लिए गंभीर अध्ययन, बड़ा वित्तीय निवेश और राष्ट्रीय संकल्प की ज़रूरत होगी, लेकिन पंजाब की जल राजनीति अक्सर तुरंत पैदा हुए डर और छोटे समय की राजनीतिक बयानबाजी के बीच फंसी रही है. अब ज़रूरत रणनीतिक नीति की है.
तीन ज़रूरी कदम
पहला, पंजाब को ऐसे बढ़ा-चढ़ाकर दावे करना बंद करना चाहिए जो बाद में अंतरराज्यीय विवादों में उसी के खिलाफ जा सकते हैं. सुधारों की जानकारी सादगी और संतुलन के साथ दी जानी चाहिए, न कि नाटकीय तरीके से.
दूसरा, राज्य को नई दिल्ली पर दबाव बनाना चाहिए कि शाहपुर कंडी परियोजना को तय समय में पूरी तरह—सिंचाई और बिजली दोनों के साथ पूरा किया जाए और उझ परियोजना को लागू किया जाए तथा रवि नदी प्रणाली से जुड़ी अन्य परियोजनाओं का बेहतर उपयोग किया जाए.
तीसरा, पंजाब को देश की नई जल नीति की संरचना तैयार करने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए, ताकि उसकी खेती की मजबूत बुनियाद सुरक्षित रहे और साथ ही भारत के व्यापक हितों के साथ तालमेल भी बना रहे.
सबसे बड़ी गलती यह होगी कि भाषण को ही रणनीति समझ लिया जाए. नदी जल विवाद तालियों से तय नहीं होते. इन्हें निरंतरता, सावधानी, जल विज्ञान की समझ और मजबूत बुनियादी ढांचे से आकार मिलता है.
अगर राज्य अपने अधिकारों को लेकर गंभीर है, तो उसे बोलना भी ऐसे होगा जैसे कोई कानूनी पक्षकार बोलता है, योजना ऐसे बनानी होगी जैसे कोई रणनीतिकार बनाता है, और निर्माण ऐसे करना होगा जैसे वह भारत के बदलते जल भविष्य में एक जिम्मेदार साझेदार हो.
के बी एस सिद्धू पंजाब के पूर्व आईएएस अधिकारी हैं और स्पेशल चीफ सेक्रेटरी के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं. उनका एक्स हैंडल @kbssidhu1961 है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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