अमेरिकी नौसेना ने ईरान के युद्धपोत ‘IRIS डेना’ को ध्वस्त कर दिया, और इसके खिलाफ जो व्यापक आक्रोश व्यक्त किया जा रहा है उसे इस हेडलाइन से समझा जा सकता है: डॉनल्ड ट्रंप ने अब खासतौर से अपने सहयोगियों और मित्रों को ही अपमानित करना शुरू कर दिया है. भारत इसका जवाब किस तरह दे सकता है, यह हम आगे बताएंगे.
इसे समझने का एक सरल तरीका भी है, जिसे अगर हम भारत में हाइवे पर चलने वाले ट्रकों के पीछे लिखी सूक्तियों से समझें तो इस सूक्ति का इस्तेमाल कर सकते हैं— ‘ऐसा कोई सगा नहीं, जिसको हमने ठगा नहीं’. इसमें ‘सगा’ की जगह सहयोगी/पार्टनर/दोस्त को रख दें और ‘ठगा’ की जगह अपमानित शब्द को रख दें तो तस्वीर साफ हो जाती है. ट्रंप का तरीका अमेरिका के मित्रों पर खुलकर अशिष्टता के साथ धौंस जमाने वाला रहा है. ट्रंप को मालूम है कि उनमें से कोई भी, अपनी पुरानी निर्भरता के कारण उनका प्रतिकार नहीं कर सकता, मसलन यूरोप. या भारत जैसा देश, जिसने हाल में उनके साथ भरोसे का रिश्ता जोड़ा है.
वे इन देशों के नेताओं को अक्सर नीचा दिखाते रहे हैं. इसी हफ्ते उन्होंने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के साथ वैसा ही सुलूक किया जैसा वे स्पेन, डेनमार्क, नॉर्वे, कनाडा, यूक्रेन, दक्षिण अफ्रीका, फ्रांस, तटस्थ स्विट्ज़रलैंड और न जाने कितने देशों के नेताओं के साथ कर चुके हैं. स्पेन ने जब ईरान के खिलाफ युद्ध में उन्हें अपने यहां के सैन्य अड्डों का इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं दी तो ट्रंप ने कहा कि अमेरिका किसी से इजाजत नहीं मांगता. डेनमार्क और नॉर्वे के मामले में क्रमशः ग्रीनलैंड और नोबेल पुरस्कार वाला मसला उनके लिए आड़े आता है. दक्षिण अफ्रीका के लिए उन्होंने एलन मस्क के ‘श्वेत’ जनसंहार वाले बयान का इस्तेमाल किया, तो जेलेंस्की के प्रति उनके ‘प्रेम’ को हम सब देख ही चुके हैं. और यह भी कि इसने उन्हें ईरान के ड्रोन हमलों के खिलाफ अब यूक्रेन की मदद लेने से नहीं रोका.
इस तरह, दो बातें साफ दिखती हैं. एक यह कि ट्रंप व्यवहारकुशल हैं. वे अपने मित्रों का जो अपमान करते हैं उसे अपने दिल में नहीं रखते. कि वे उनसे यही अपेक्षा रखते हैं कि वे उनके लिए मुश्किल न पैदा करें. यूरोप उनके ऊपर इतना निर्भर है कि कोई शिकायत नहीं कर सकता. अगर आप अपनी रक्षा खुद नहीं कर सकते, तो आपने अपनी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी जिसे सौंपी है वह अगर आपको नीचा दिखाता है तो उसे चुपचाप बर्दाश्त करना होगा.
लेकिन जिन लोकतांत्रिक देशों के पास अपने लोकप्रिय नेता हैं और वे अपनी सुरक्षा खुद कर सकते हैं उनके साथ यह तरीका नहीं चलेगा. ऐसे देशों में भारत सबसे उल्लेखनीय है. नरेंद्र मोदी के बारे मैं ट्रंप ने एक बार अपनी रौ में कैमरे के सामने बोल दिया था कि “मैं उनका राजनीतिक केरियर बरबाद नहीं करना चाहता”.
वैसे, यह उलझन भरे संदर्भ में दिया गया बयान है, जिसकी व्याख्या व्यापार से लेकर रूसी तेल और पूर्वाग्रह तक कई मुद्दों के आधार पर की जा सकती है. ट्रंप एक दर्जन बार दावा कर चुके हैं, और हमने तो इसकी गिनती करनी भी छोड़ दी है, कि उन्होंने व्यापार बंद कर देने की धमकी देकर भारत-पाकिस्तान युद्ध रुकवा दिया, कि ऑपरेशन सिंदूर में कितने विमान मार गिराए गए. बेशक उन्होंने यह नहीं बताया कि गिराए गए विमान किसके थे. ट्रंप बारीकियों में बात करने वाले व्यक्ति नहीं हैं. उन पर सुर्खियां बटोरने का जुनून हावी रहता है. किसी दिन उन्हें यह लगा कि उन्हें सुर्खी नहीं मिली है, तो इसके लिए वे अपने किसी मंत्री की ही छुट्टी कर दे सकते हैं. उन्होंने अपनी होमलैंड सिक्यूरिटी मंत्री क्रिस्टी नोएम को किस तरह बर्खास्त किया उस पर गौर कीजिए. और इसके बाद उन्होंने एक सामंती शासक की तरह बेअदबी से जो अविश्वसनीय किस्म का संदेश पोस्ट किया उस पर भी गौर कीजिए जिसमें उन्होंने कहा कि अब देखना है कि उन्होंने क्रिस्टी के लिए जो “विशाल फार्म तैयार किया है” उस पर उनका भविष्य क्या होगा.
इसका अगला कदम यह कि जो उनके ऊपर जो निर्भर हैं, अमेरिका के संप्रभु मित्र या उनकी अपनी टीम के सदस्य, उन पर हमला करने पर उन्हें कितना सुकून मिलता है. वे शी जिनपिंग के साथ शराफत से पेश आते हैं, व्लादिमीर पुतिन और किम जोंग उन (पहले) के साथ दोस्ताना रुख रखते हैं. ट्रंप ने अपने इस कार्यकाल में अब तक ‘एनएसए’ और सिग्नल पर ‘मिस्टर फास्ट फिंगर’ रखने वाले माइकल वाल्ज़ के बाद क्रिस्टी नोएम दूसरी प्रमुख हस्ती हैं जिनकी उन्होंने छुट्टी की है. लेकिन उनके पिछले रेकॉर्ड को देखें तो यही कहा जाएगा कि अभी तो आपने कुछ भी नहीं देखा.
अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने कैबिनेट दर्जे के सात अधिकारियों को बर्खास्त किया था और करीब इतने को ही पद छोड़ने पर मजबूर किया था. आज भी कई ऐसे हैं जिनसे वे खार खाए बैठे हैं. मसलन, पूर्व एनएसए जॉन बोल्टन और सलाहकार स्टीव बैनन.
कई मौकों पर ट्रंप अपने लोगों के लिए ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते रहे हैं, जो हमारी तहजीब में बेइज्जती मानी जाएगी.
यानी यह साबित हो चुका है कि ट्रंप की खास ‘मोहब्बत’ अपने दोस्तों और कॉमरेड्स के प्रति ही उमड़ती है. इसलिए, जब वे आपको अपना “बहुत अच्छा दोस्त” कहने लगें तो समझ लीजिए कि आपके सावधान हो जाने का वक़्त आ गया है. यानी वे अपने चाकू को धार दे रहे हैं. वे स्कूल के उस दादा के समान हैं जो अपने गैंग के साथियों को याद दिलाता रहता है कि असली बॉस वही है, कि प्रतिद्वंद्वी दादाओं से दूर ही रहो.
अब सवाल यह है कि भारत और मोदी उनसे कैसे निबटें? यह कोई यूरोप नहीं है, और मोदी कोई स्टारमर नहीं हैं. उकसावे में न आकर मोदी ने ट्रंप के साथ रिश्ते निभाने में अब तक समझदारी ही दिखाई है. ‘सजा’ के रूप में सिर्फ अपने ऊपर टैरिफ थोपे जाने पर भी भारत शांत रहा.
मैं नहीं मानता कि भाजपा अगर विपक्ष में होती तब उसने कांग्रेस की सरकार को इसके लिए बख्श दिया होता.
कांग्रेस विपक्ष में होते हुए सिर्फ ट्वीट करके संतुष्ट है. इस ‘राष्ट्रीय अपमान’ के विरोध में प्रदर्शन के लिए वे 10 हजार लोगों को भी इकट्ठा नहीं कर पाए हैं. लेकिन दबाव जबकि बढ़ रहा है, मोदी सरकार/बीजेपी कब तक खामोशी बरतती रहेगी? भारतीय राजनयिक देवयानी खोबरागड़े की ‘बेइज्जती’ के घपले जैसे बेहद मामूली किस्म के विदेशी उकसावे पर प्रतिक्रिया न देने के लिए मनमोहन सिंह को ‘मौनी बाबा’ कहने वाली भाजपा इसे भूलकर अब ट्रंप के मामले में ‘मौन व्रत’ धारण करके समझदारी का परिचय दे रही है. अमेरिका-विरोध भारतीय जनमत का स्वाभाविक रुझान है और यह दोनों पक्षों को माकूल लगता है.
दूसरी समझदारी इन्होंने यह दिखाई है कि दूसरे मित्रों की भी तलाश कर रहे हैं. इसका बढ़िया उदाहरण कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी का गर्मजोशी भरा स्वागत है. आखिर, कनाडा अमेरिका सबसे करीबी साथी रहा है, तभी तो उसकी भारी बेइज्जती अमेरिका का ‘51वां राज्य’ बताकर की गई है. ट्रंप ने जिन्हें निशाना बनाया उन्हें ज्यादा मौके भी उपलब्ध करा रहे हैं. मझोली शक्तियां सुकून के लिए एक-दूसरे की बाहों के सहारे की तलाश कर रही हैं.
किसी ने अब तक यह सवाल नहीं उठाया है कि जब बारी नेतन्याहू के भारत दौरे की थी तब बिना बारी के मोदी ने इजरायल का दौरा क्यों किया? वह भी यह जानते हुए कि ईरान के साथ लड़ाई कभी भी शुरू हो सकती थी.
एकमात्र तार्किक अनुमान मैं यह लगा सकता हूं कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना के भंडार में आई कमी को पूरा करना काफी जरूरी हो गया होगा. पीएसएलवी के लगातार दो प्रक्षेपण नाकाम हो गए; सैन्य उपयोग वाले मूल्यवान उपग्रह नष्ट हो गए; खुफियागीरी, निगरानी और टोही संसाधन कमजोर हो रहे थे; इसके अलावा स्टैंड-ऑफ हथियारों, ड्रोनों, सेंसरों की जरूरत बढ़ गई थी और हवाई सुरक्षा को मजबूत करने के लिए दूसरा दौर जरूरी हो गया था.
यह भी स्पष्ट है कि मध्य-पूर्व के मामले में भारत ने एक पक्ष को चुन लिया है. यह पक्ष है इजरायल-यूएई गठबंधन. यह यूएई के शासक शेख मोहम्मद बिन जाएद के औचक तथा रहस्यमय दौरे को एक संदर्भ प्रदान करता है. तीसरी समझदारी यह की गई है कि चीन को व्यापार के मामले में मौके प्रदान किए गए हैं. दुनियाभर में असुरक्षा के इस माहौल में भारत अपनी सीमित क्षमता और कमजोरियों के कारण भला कितने ‘पंगे’ ले सकता है?
मोदी सरकार चौथी समझदारी यह कर सकती है, जो वह शायद ही करेगी, कि विपक्ष (यानी कांग्रेस) के साथ रिश्ता सुधार ले. भारत में राष्ट्रहित के मसलों पर सरकार द्वारा विपक्ष को भरोसे में लेने की एक स्वस्थ परंपरा रही है. लेकिन आप विपक्ष को लुटेरा और उसके नेता को जोकर मानते हों तब आप क्या कर सकते हैं?
मैं मानता हूं कि आज की राजनीति रूखी और निर्मम है. लेकिन ट्रंप के अपमानजनक हमले बंद नहीं होने वाले. इसी सप्ताह उन्होंने उस युद्धपोत को डुबो दिया जो आपके अपने बेड़े से अलग हुआ था. कल को इससे भी बुरा हो सकता है. विपक्ष की ओर से दबाव बढ़ेगा तब आपके लिए विकल्प सिमटते जाएंगे. रणनीतिक स्वायत्तता की एक खिड़की घरेलू राजनीति की ओर भी खुलती है. इसे बंद करने से आपके लिए विकल्प सीमित हो जाते हैं.
सार यह है कि हमने दुनिया में अपनी हैसियत को कुछ ज्यादा ही आंक लिया. हमने खुद को एक उभरती हुई, अपरिहार्य दुनिया की ताकत मान लिया और जोश में आ गए. ट्रंप ने हमारे इस जोश पर अपनी पोटोमैक नदी का बर्फ़ीला पानी डाल दिया है.
अब समय आ गया है कि हम गहरी सांस लेकर अपनी पीठ खुद ठोकना बंद करें और अपनी अर्थव्यवस्था, सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करें; सामाजिक एकता को बहाल करें, घरेलू राजनीति में बदलाव लाएं, और द्विपक्षीय राष्ट्रीय एकता को मजबूत करें. मुश्किल काम है न? लेकिन ट्रंप के बाकी बचे तीन साल का सामना करने के लिए हमें उस ‘विनम्रता’ की जरूरत होगी जिसे हमने बीते जोशीले 11 वर्षों में दफन कर दिया. ट्रंप के दुनिया भर में चल रहे मानमर्दन अभियान का मुक़ाबला करने की शुरुआत हम अपने घर में थोड़ी विनम्रता अपना कर ही कर सकते हैं.
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