आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई सिर्फ एक राजनीतिक नेता नहीं थे. वे एक तानाशाह थे, एक धर्मतांत्रिक शासक और ट्वेल्वर शिया परंपरा के एक वरिष्ठ इस्लामी विद्वान थे, जिनका प्रभाव ईरान की सीमाओं से कहीं आगे तक था. दुनिया भर के कई शिया मुसलमानों के लिए वे एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक भी थे.
इसी वजह से उनकी मौत दुनिया भर के शिया समुदायों के लिए भावनात्मक मायने रखती है, जिनमें भारत भी शामिल है, जहां ईरान और इराक के बाहर शिया आबादी सबसे बड़ी मानी जाती है.
और इस तरह हज़ारों किलोमीटर दूर चल रहा एक संघर्ष अचानक घर के बहुत करीब की ज़िंदगियों को छूने लगता है.
भू-राजनीति कभी भी आसान नहीं होती, चाहे हम उसे कितनी भी सरल कहानी में बदलने की कोशिश करें. हम प्रतिक्रियाओं का पूरा दायरा देख सकते हैं, जहां कुछ लोग ख़ामेनेई की मौत का जश्न मना रहे हैं और इसे एक क्रूर तानाशाह के अंत के रूप में देख रहे हैं, वहीं कुछ लोग अमेरिका-इज़राइल के हमलों की आलोचना कर रहे हैं और इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन और युद्ध की कार्रवाई बता रहे हैं. वहीं कई भारतीय मुसलमानों ने उनकी मौत पर शोक जताया और उन्हें एक धार्मिक शहीद के रूप में देखा.
हर व्यक्ति उसी घटना को अपने-अपने नज़रिए से देखता है—विचारधारा, राजनीति, इतिहास और अपने अनुभवों के आधार पर.
सालों से आम ईरानी लोग एक दमनकारी व्यवस्था के तहत जी रहे हैं. वे बुनियादी आज़ादी के लिए अपनी जान जोखिम में डालते रहे हैं. आवाज़ उठाने पर उन्हें गिरफ्तारी, हिंसा और यहां तक कि मौत का सामना करना पड़ता है.
अब एक बार फिर वही आम लोग इस टकराव के शिकार बनने की संभावना रखते हैं. विदेशी हमले, जवाबी कार्रवाई और अस्थिरता—इन सबका असर सबसे पहले आम लोगों की ज़िंदगी पर पड़ता है. दूर बैठी राजधानियों में चाहे जितनी रणनीतिक योजनाएं बनें, हर सुबह अनिश्चितता, डर और यह सवाल लेकर ईरानी परिवार ही उठेंगे कि कल क्या होगा.
और यही सच्चाई है—सबसे ज्यादा नुकसान लगभग हमेशा आम नागरिकों का ही होता है. हर रणनीतिक बहस और विचारधारात्मक चर्चा से परे, मेरे विचार सबसे पहले उन्हीं लोगों की ओर जाते हैं, जो इंसान होने के नाते ऐसी ताकतों में फंस जाते हैं जो उनसे कहीं बड़ी होती हैं.
युद्ध सिर्फ जानें ही नहीं लेता; यह भविष्य भी छीन लेता है.
भारतीय मुसलमानों के लिए शोक का वक्त
हम में से जो लोग युद्ध को केवल खबरों की सुर्खियों के ज़रिए देखते हैं, उन्हें यह गलती नहीं करनी चाहिए कि ये संघर्ष किसी बहुत दूर की जगह के हैं. दूरी का यह भ्रम हमें सुकून देता है, लेकिन यह सच नहीं है. अगर आप भारत में भी रहते हैं, तो भी युद्ध की कीमत आखिरकार आप तक पहुंचती है.
युद्ध अर्थव्यवस्था, समाज और रोज़मर्रा की ज़िंदगी को ऐसे बदल देता है, जिनका असर पीढ़ियों तक बना रहता है और जब मध्य पूर्व जैसा महत्वपूर्ण क्षेत्र संघर्ष में फंस जाता है, तो यह कोई रहस्य नहीं है कि दुनिया भर में तेल और गैस की कीमतें बढ़ेंगी. भारत अपनी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व से आयात करता है और बड़ी मात्रा में वहां से आने वाली कमाई (रेमिटेंस) पर भी निर्भर करता है.
इज़राइल, ईरान और अमेरिका के बीच का संघर्ष भारत को और भी साफ तरीके से प्रभावित कर रहा है, खासकर भारतीय शिया मुसलमानों के बीच, इन बड़े प्रभावों के साथ. खामेनेई की मौत के बाद से समुदाय के कई लोग शोक में हैं. उनके लिए वह सिर्फ ईरान के राजनीतिक नेता ही नहीं थे, बल्कि एक धार्मिक अधिकार भी थे. खामेनेई को मरजा-ए-तक़लीद माना जाता है, जिसका मतलब है “अनुकरण का स्रोत”, यानी कई शिया लोग ऐसे धार्मिक व्यक्तियों से आध्यात्मिक और धार्मिक मार्गदर्शन लेते हैं.
भारत में, खासकर श्रीनगर, लखनऊ और हैदराबाद जैसे शहरों में जहां शिया समुदाय बड़ी संख्या में है, वहां उनका प्रभाव धार्मिक होने के साथ-साथ भावनात्मक भी था. अब इसका असर भारतीय समाज के भीतर भी दिखाई दे रहा है.
इन क्षेत्रों में कुछ मौलवी और धार्मिक संस्थान ईरान के मदरसों और धार्मिक संस्थानों से जुड़े भी रहते हैं, जिससे समुदाय के कुछ हिस्सों में खामेनेई जैसे व्यक्तियों को देखने का नजरिया भी प्रभावित होता है.
हालांकि, शोक का यह वक्त सोशल मीडिया पर जल्दी ही एक और वफादारी की परीक्षा में बदल गया है, सिर्फ शिया मुसलमानों के लिए नहीं, बल्कि सभी भारतीय मुसलमानों के लिए.
मैं समझती हूं कि कई उदारवादी लोग ऐसे व्यक्ति के लिए शोक मनाने की नैतिकता पर सवाल उठाते हैं, जिसे ईरान में तानाशाही, क्रूरता और महिलाओं के खिलाफ भेदभाव से जोड़ा जाता है और वे अपनी राय भी रखते हैं. ये आलोचनाएं सही हैं और ईमानदार चर्चा का हिस्सा भी होनी चाहिए. भारतीय मुसलमानों—चाहे शिया हों या सुन्नी, को भी यह सोचना चाहिए कि वे किन नेताओं और व्यक्तियों को अपना आदर्श मानते हैं. समुदाय के भीतर कुछ आत्ममंथन ज़रूरी है.
लेकिन इसके साथ ही लोगों को शांति से शोक मनाने का अधिकार भी है, भले ही जिस व्यक्ति के लिए शोक मनाया जा रहा हो वह विवादित क्यों न हो. दुख हमेशा साफ-सुथरी राजनीतिक तर्क के अनुसार नहीं चलता.
विदेशी संघर्ष, देश के अंदर की दरारें
चिंता की बात यह है कि कुछ दक्षिणपंथी आवाजें इस समय का इस्तेमाल सभी भारतीय मुसलमानों को गद्दार और अमानवीय दिखाने के लिए कर रही हैं. झूठे दावे फैलाए जा रहे हैं कि भारत में आतंकी हमलों के समय मुसलमान चुप रहे, लेकिन अब एक विदेशी नेता के लिए शोक मना रहे हैं. सच जानने में रुचि रखने वाला कोई भी व्यक्ति आसानी से उन कई घटनाओं को देख सकता है—कश्मीर से लेकर लखनऊ तक, जहां भारतीय मुसलमान आतंकवादी हमलों के खिलाफ सबसे आगे खड़े होकर आवाज़ उठा रहे थे.
प्रोपेगेंडा इन सच्चाइयों को नज़रअंदाज़ करता है और जानबूझकर शक पैदा करता है. यह एक जटिल और भावनात्मक पल को धोखे की एक आसान कहानी में बदल देता है, जिससे सिर्फ अविश्वास और ध्रुवीकरण बढ़ता है.
मुझे इससे भी ज्यादा चिंता इस बात की है कि दूर के संघर्ष कितनी आसानी से हमारे अपने सामाजिक विभाजनों में घुस आते हैं. हज़ारों किलोमीटर दूर का युद्ध अचानक देश के अंदर पहचान की राजनीति का एक और मैदान बन जाता है. लोग अपने ही नागरिकों से पूछने लगते हैं कि उनकी वफादारी किसके साथ है, जैसे दुख, आलोचना या चुप्पी भी धर्म के हिसाब से तय होनी चाहिए.
ऐसे माहौल में सहानुभूति गायब हो जाती है और उसकी जगह शक ले लेता है. एक-दूसरे को जटिल दुनिया में जी रहे साथी भारतीयों के रूप में देखने के बजाय, हम एक-दूसरे को वैश्विक धार्मिक खेमों के प्रतिनिधि की तरह देखने लगते हैं. किसी भी समाज के लिए यह बहुत खतरनाक स्थिति होती है.
आज मध्य पूर्व में जो हो रहा है, वह कई चीजों को प्रभावित करेगा—वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और देशों के गठबंधन, लेकिन अगर हम सावधान नहीं रहे, तो यह इस बात को भी प्रभावित करेगा कि हम अपने देश में एक-दूसरे के साथ कैसा व्यवहार करते हैं. दूर के संघर्षों को अपने सामाजिक विभाजनों में लाना समाज के रूप में हमें ही कमजोर करता है.
भारत हमेशा तब सबसे मजबूत रहा है जब उसने लोगों को धार्मिक खेमों में बांटकर नहीं देखा और जब उसने समझा कि साझा नागरिकता बाहरी वफादारियों से ज्यादा महत्वपूर्ण है.
एक ऐसी दुनिया में जो धीरे-धीरे युद्ध में उलझती जा रही है, शायद असली चुनौती यही है: अपनी इंसानियत को बनाए रखना, शक के आसान रास्ते से बचना, और याद रखना कि किसी भी पहचान से पहले हम सब बस इंसान हैं, जिन्हें शांति का अधिकार है.
आमना बेगम अंसारी एक स्तंभकार और टीवी समाचार पैनलिस्ट हैं. वह ‘इंडिया दिस वीक बाय आमना एंड खालिद’ नाम से एक साप्ताहिक यूट्यूब शो चलाती हैं. उनका एक्स हैंडल @Amana_Ansari है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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