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Friday, 27 February, 2026
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अकाली की आटा-दाल रेसिपी को AAP ने रीब्रांड किया और नए ‘मसाले’ जोड़े लेकिन फंड कहां से आएगा

मुख्यमंत्री भगवंत मान को उम्मीद है कि मेरी रसोई फ़ूड स्कीम AAP को अगले साल सत्ता में बने रहने में मदद करेगी. लेकिन अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि इससे पंजाब की पहले से ही तंग हालत पर और दबाव पड़ सकता है.

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चंडीगढ़: करीब 20 साल पहले शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी तथा बादल परिवार ने पंजाब में लोकप्रिय ‘आटा दाल’ योजना के सहारे सत्ता हासिल की थी. अब मुख्यमंत्री भगवंत मान उम्मीद कर रहे हैं कि उसी आजमाए हुए फॉर्मूले में थोड़ा सा ‘तड़का’ लगाकर वह अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की राजनीतिक किस्मत बदल सकेंगे.

सोमवार को पंजाब कैबिनेट ने ‘पंजाब सरकार फूड प्रोग्राम’ को मंजूरी दी. इसके तहत 2020 की प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत आने वाले 40 लाख लाभार्थियों को गेहूं, दाल, चीनी, तेल, हल्दी और नमक दिया जाएगा. इस योजना का नाम ‘मेरी रसोई’ रखा गया है.

कैबिनेट बैठक से पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्यमंत्री ने कहा कि यह “ऐतिहासिक पहल” अप्रैल से शुरू होगी और इसका मकसद पंजाब के सबसे गरीब लोगों तक मदद पहुंचाना है.

मान ने बताया कि हर ‘मेरी रसोई’ किट में दो किलो उड़द दाल, चना दाल और चीनी, एक किलो आयोडीन युक्त नमक, 200 ग्राम हल्दी पाउडर और एक लीटर सरसों का तेल शामिल होगा.

ये किट हर तीन महीने में बांटी जाएंगी. आमतौर पर अप्रैल, जून, अक्टूबर और दिसंबर में वितरण होगा. इसका मकसद आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों, खासकर बच्चों के पोषण स्तर को बेहतर बनाना है, क्योंकि उनमें कुपोषण पाया गया है.

खाद्य और नागरिक आपूर्ति विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “मेरी रसोई योजना प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत मिलने वाले गेहूं के साथ प्रोटीन के रूप में दाल, खाना बनाने की जरूरी चीजें और मसाले जोड़ती है. इससे खाद्य सहायता का दायरा बढ़ेगा.”

सरकार ने इस कार्यक्रम के लिए लगभग 1,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है. किट तैयार करने के लिए मार्कफेड यानी पंजाब स्टेट कोऑपरेटिव सप्लाई एंड मार्केटिंग फेडरेशन को नोडल एजेंसी बनाया गया है. वितरण और गुणवत्ता नियंत्रण की जिम्मेदारी खाद्य और नागरिक आपूर्ति विभाग की होगी.

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत हर तीन महीने में बांटे जाने वाले गेहूं पर भारत सरकार सालाना 2,600 करोड़ रुपये खर्च करती है. इसके अलावा ‘मेरी रसोई’ योजना पर पहले से आर्थिक दबाव झेल रही राज्य सरकार को करीब 1,000 करोड़ रुपये और खर्च करने होंगे. इसमें खरीद, पैकेजिंग और वितरण का खर्च शामिल है.

आम आदमी पार्टी की सरकार का कहना है कि इसे 2026-27 के बजट अनुमान में शामिल किया जाएगा और इसमें गुणवत्ता सुनिश्चित करने और सप्लाई लगातार जारी रखने का प्रावधान होगा.

करीब दो दशकों में पंजाब सरकार की आटा दाल योजना में कई बदलाव हुए और आखिरकार यह राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं में मिल गई. इस योजना में आटा कहे जाने के बावजूद असल में गेहूं दिया जाता रहा. दाल 2017 तक बीच-बीच में बांटी जाती थी, लेकिन उसके बाद पूरी तरह बंद कर दी गई.

2013 में जब इस योजना को केंद्र सरकार के राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून में मिला दिया गया, तब राज्य सरकार पर इसका आर्थिक बोझ कम हुआ. इस कानून के तहत गरीबों को सब्सिडी वाला अनाज दिया जाता है. 2020 में फैसला हुआ कि इस कानून के तहत आने वाले लाभार्थियों को प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत अनाज मुफ्त दिया जाएगा.

इस तरह गरीबों को सस्ती दर पर अनाज देने का मूल मकसद धीरे-धीरे बदलकर उन्हें मुफ्त अनाज देने में बदल गया.

‘लोकलुभावन राजनीति पंजाब को बर्बाद कर रही है’

विशेषज्ञों का कहना है कि 4.17 लाख करोड़ रुपये के कर्ज बोझ से दबे पंजाब के लिए अपनी उदार मुफ्त योजनाओं के वादों को सीमित बजट के साथ संतुलित करना मुश्किल हो सकता है. अगर सरकार चुनाव से पहले वाले साल में इस योजना को लागू नहीं कर पाती, तो यह फायदा पहुंचाने के बजाय नुकसान कर सकती है.

अमृतसर की गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी के रणजीत सिंह घुम्मन, जो पंजाब के जाने-माने वित्त विशेषज्ञ हैं, ने दिप्रिंट से कहा कि ऐसी लोकलुभावन योजनाएं चुनावी फायदे के लिए होती हैं और इससे राज्य का कोई आर्थिक विकास नहीं होता.

घुम्मन ने कहा, “ऐसे कदम बताते हैं कि रोजगार और ग्रामीण ढांचे जैसे बुनियादी मुद्दों से निपटने की राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है.”

उन्होंने कहा कि अगर ऐसी योजनाओं पर खर्च होने वाला पैसा मार्कफेड के जरिए फूड प्रोसेसिंग में लगाया जाए, तो ग्रामीण शिक्षित युवाओं को रोजगार मिल सकता है. “इसके बजाय अब मार्कफेड पर यह काम लाद दिया गया है.”

घुम्मन ने कहा कि वह सब्सिडी के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन सबको एक समान सब्सिडी देने के खिलाफ हैं.

उन्होंने कहा, “सब्सिडी जरूरतमंद की भुगतान क्षमता के हिसाब से तय और श्रेणीबद्ध होनी चाहिए. सरकार को सिर्फ अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य को मुफ्त देने पर ध्यान देना चाहिए. इसके बजाय उन लोगों को भी मुफ्त खाना और बिजली दी जा रही है, जिन्हें इसकी जरूरत नहीं है.”

उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले मुफ्त योजनाएं लाना एक तरह से वोटरों को “रिश्वत” देने जैसा है. “यह बिना आधार की प्रतिस्पर्धी राजनीतिक लोकलुभावन दौड़ कभी खत्म नहीं होगी. एक बार कोई फायदा दे दिया जाए, तो बाद में आने वाली किसी भी सरकार के लिए उसे वापस लेना लगभग असंभव होता है.”

घुम्मन ने कहा, “यह एक गहरी सोच का हिस्सा है, एक विकास मॉडल का हिस्सा है, जो रोजगार पैदा करने पर आधारित नहीं है. इसका मूल संदेश यह है कि अगर आप कोई काम नहीं भी करेंगे, तो भी हम आपको मरने नहीं देंगे.”

पंजाब के प्रमुख अर्थशास्त्री सुचा सिंह गिल, जो पटियाला की पंजाबी यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र विभाग के प्रमुख रह चुके हैं, ने दिप्रिंट से कहा कि पंजाब की वित्तीय स्थिति “बहुत ही गंभीर” है और मुफ्त योजनाओं की घोषणाएं इसे और खराब कर रही हैं.

गिल ने कहा, “पंजाब सरकार की ताजा घोषणा बिहार के चुनाव नतीजों से प्रेरित है, जहां बीजेपी ने बड़ी जीत हासिल की और इसका एक बड़ा कारण मुफ्त योजनाएं थीं.”

उन्होंने कहा, “पंजाब सरकार पहले से ही भारी कर्ज में डूबी हुई है और अपने लोकलुभावन वादों को पूरा करने के लिए उसे और कर्ज लेना पड़ेगा. पंजाब के पूरे बजट का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा कर्ज चुकाने में चला जाता है. यह कर्ज का जाल है, जो सामाजिक अराजकता की ओर ले जा सकता है. और हम पहले ही इसके संकेत देख रहे हैं, जहां बढ़ती बेरोजगारी से हिंसा बढ़ रही है.”

गिल ने कहा कि केंद्र सरकार ने राज्यों को रोकने का नैतिक अधिकार खो दिया है, क्योंकि वह खुद भी भारी कर्ज में है. “भारत सरकार को खुद उदाहरण पेश करना चाहिए.”

चंडीगढ़ के इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट एंड कम्युनिकेशन के प्रमुख प्रमोद कुमार ने कहा कि मुफ्त योजनाओं का सीधे वोट में बदल जाना जरूरी नहीं है.

उन्होंने कहा, “विश्वास और विचारधारा जैसे कारक भी चुनावी असर डालने में बराबर भूमिका निभाते हैं. यह कभी एक ही चीज नहीं होती, बल्कि कई कारकों का समूह होता है.”

‘सरकार को विकास का एजेंडा वापस लेना चाहिए.’

पटियाला के थापर स्कूल ऑफ लिबरल आर्ट्स एंड साइंसेज में प्रोफेसर और जाने-माने अर्थशास्त्री लखविंदर सिंह गिल ने कहा कि उदारीकरण के बाद विकास का एजेंडा निजी हाथों में चला गया, जिससे सरकार की विकास गतिविधियों में हिस्सेदारी कम हो गई.

गिल ने कहा, “जब राज्य के पास आर्थिक गतिविधियों और विकास में निवेश का कोई एजेंडा नहीं होता, तो वह राजनीतिक रूप से दिखाने के लिए एक खालीपन पैदा करता है. और अगर राजनीतिक नेताओं को वोट जीतने हैं, तो उनके पास मुफ्त योजनाएं देने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता.”

उन्होंने कहा, “एकमात्र समाधान यह है कि सरकार विकास का एजेंडा और सार्वजनिक नीति फिर से अपने हाथ में ले. वरना राजनीतिक सत्ता में बने रहने के लिए वोट मांगने का तरीका सिर्फ मुफ्त योजनाओं का दायरा बढ़ाना ही रह जाएगा.”

बठिंडा की सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ पंजाब में एसोसिएट प्रोफेसर नरेश सिंगला ने दिप्रिंट से कहा कि मुफ्त योजनाएं मुख्य रूप से चुनावी फायदे के लिए दी जाती हैं, न कि लंबे समय की संरचनात्मक नीति के तहत.

सिंगला ने कहा, “मुफ्त योजनाएं कमजोर वर्गों की खर्च करने योग्य आय बढ़ाकर तुरंत राहत देती हैं. इससे खासकर आर्थिक मंदी के समय स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है. इस तरह मुफ्त योजनाएं सामाजिक सुरक्षा जाल का काम करती हैं और समावेशी विकास को सहारा देती हैं.”

उन्होंने कहा कि कई बार जरूरत से ज्यादा और खराब तरीके से बनाई गई योजनाएं राजस्व खर्च बढ़ा देती हैं, वित्तीय घाटा और सार्वजनिक कर्ज बढ़ा देती हैं, और उत्पादक पूंजी निवेश को कम कर देती हैं, जिससे लंबे समय की विकास संभावनाएं प्रभावित होती हैं.

सिंगला ने कहा, “राजनीतिक दलों के बीच प्रतिस्पर्धी लोकलुभावन राजनीति से वित्तीय अनुशासन और कमजोर होता है. विकास के शुरुआती चरण में मुफ्त योजनाएं आर्थिक मजबूती के लिए जरूरी हो सकती हैं. लेकिन इन्हें धीरे-धीरे उत्पादक पूंजी निवेश में बदलना चाहिए, ताकि वित्तीय स्थिरता बनी रहे और लंबे समय का विकास हो.”

उन्होंने कहा कि पंजाब की अर्थव्यवस्था अभी भी ऊंचे राजस्व घाटे, बढ़ते सार्वजनिक कर्ज और घटते पूंजीगत खर्च का सामना कर रही है.

सिंगला ने कहा, “खपत पर आधारित लोकलुभावन नीति से हटकर उत्पादकता से जुड़े निवेश की ओर बदलाव ही वित्तीय सेहत बहाल करने का मुख्य रास्ता है, साथ ही सामाजिक कल्याण को भी सुरक्षित रखना है. खेती में विविधीकरण कर पशुपालन और अन्य कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा देकर और ग्रामीण औद्योगीकरण के जरिए ग्रामीण आय बढ़ाना राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद जरूरी है.”

उन्होंने अंत में कहा, “संस्थाओं में सामाजिक शासन और नियमों के पालन को मजबूत करना भी जरूरी है, ताकि पंजाब की अर्थव्यवस्था के विकास पर दीर्घकालिक और बहुगुणक असर पड़े.”

‘पिछले प्रयोगों को सीमित सफलता मिली’

2007 की आटा-दाल योजना में करीब 13.5 लाख गरीबी रेखा से नीचे यानी बीपीएल लाभार्थियों को भारी सब्सिडी पर गेहूं और दाल दी गई थी. हर महीने गेहूं 4 रुपये प्रति किलो और दाल 20 रुपये प्रति किलो दी जाती थी. एक महीने में अधिकतम 25 किलो की सीमा तय थी.

सितंबर 2009 तक पंजाब का खजाना इस योजना का खर्च उठाने में परेशान होने लगा और दाल का वितरण रुक-रुक कर होने लगा.

2013 में भारत सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून लागू किया. इसके तहत पात्र नागरिकों को टारगेटेड पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम के जरिए सब्सिडी वाला अनाज देने का अधिकार मिला. “प्राथमिकता वाले परिवारों” को प्रति व्यक्ति हर महीने 5 किलो अनाज तय दर पर देना अनिवार्य किया गया. इस योजना में कोई ऊपरी सीमा नहीं है.

इस योजना के लिए आय की पात्रता के नियम समय-समय पर बदलते रहे हैं और इन्हें राज्य सरकारें तय करती हैं.

पुरानी आटा-दाल योजना के कार्डधारकों को गेहूं वितरण के लिए केंद्र सरकार की योजना में शामिल किया गया और 2017 के अंत तक लाभार्थी परिवारों की संख्या बढ़कर 36 लाख से ज्यादा हो गई. शिरोमणि अकाली दल-बीजेपी सरकार के दौरान दाल का वितरण जारी रहा, लेकिन वह भी रुक-रुक कर.

2017 में जब अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार सत्ता में आई, तो पंजाब ने घोषणा की कि नई आटा-दाल योजना जारी रहेगी, लेकिन बायोमेट्रिक सत्यापन के बाद ही.

उसी साल राज्य की वित्तीय स्थिति पर जारी सरकारी श्वेत पत्र में कहा गया कि आटा-दाल योजना का खर्च पूरा करने के लिए शिरोमणि अकाली दल-बीजेपी सरकार ने राज्य खरीद एजेंसियों से धन की व्यवस्था की.

इन एजेंसियों ने गेहूं और धान की सालाना खरीद के लिए भारत सरकार से मिली क्रेडिट कैश लिमिट से पैसा मोड़ दिया. 31 मार्च 2017 तक 1,747 करोड़ रुपये की देनदारियां अभी भी बाकी थीं, श्वेत पत्र में यह भी जोड़ा गया.

श्वेत पत्र में यह भी कहा गया कि 2012 से 2017 के बीच दाल सिर्फ 16 महीनों के लिए ही दी गई. उस समय की पंजाब सरकार ने केंद्र सरकार से वित्त पोषित योजना तो जारी रखी, लेकिन दाल का वितरण पूरी तरह बंद कर दिया.

2020 में कोविड फैलने के बाद राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के लाभार्थियों को प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना में शामिल कर लिया गया और अनाज की सब्सिडी वाली कीमत भी हटा दी गई.

जब 2022 में आम आदमी पार्टी सत्ता में आई, तो उसके राज्य वित्त पर जारी श्वेत पत्र में कहा गया कि 2017 से राज्य खरीद एजेंसियों की 1,747 करोड़ रुपये की बकाया देनदारियां बढ़कर 2021-22 में 2,274 करोड़ रुपये हो गईं.

सरकार ने 2024 में लाभार्थियों का सत्यापन अभियान भी चलाया. विपक्ष ने आरोप लगाया कि इसमें 11 लाख से ज्यादा लाभार्थियों को बाहर कर दिया गया. आम आदमी पार्टी सरकार ने गेहूं की जगह आटा देने का भी प्रयोग किया, लेकिन वह सफल नहीं हुआ और फिर से गेहूं देना शुरू कर दिया गया.

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत करीब 40 लाख कार्डधारक लाभार्थी हैं. उन्हें अब गेहूं के साथ-साथ पंजाब सरकार की ओर से दाल और अन्य जरूरी चीजें भी मिलेंगी.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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