सौंदला: महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव सौंदला में शाम ढलते ही, एक जवान औरत अपने घर से चाय की ट्रे लेकर बाहर निकलती है और अपने बरामदे पर जमा हुए गांव के सरपंच समेत कुछ आदमियों को चाय के कप देती है. आदमी गर्म चाय पीते हैं, मुस्कुराते हैं और औरत को धन्यवाद देते हैं.
ग्रामीण महाराष्ट्र में यह एक सामान्य सा दृश्य है. लेकिन कुछ साल पहले तक वहां बैठे ये सभी “ऊंची जाति” के पुरुष उस घर की देहलीज पार नहीं करते थे. अहिल्यानगर जिले के इस गांव में, जहां कभी जाति चुपचाप दूरी तय करती थी, वहां साथ बैठकर चाय पीना बराबरी का एक छोटा लेकिन बड़ा कदम बन गया है.
सौंदला ने एक साहसिक कदम उठाया है. 5 फरवरी को ग्राम सभा ने एक प्रस्ताव पास किया, जिसमें गांव को “जाति-मुक्त” घोषित किया गया. इस घोषणा में किसी से उसकी जाति पूछने पर रोक लगाई गई है. सार्वजनिक जीवन बिना ऊंच-नीच के साझा करने और इंसानियत की भाषा बोलने पर जोर दिया गया है.
इस बदलाव की झलक छोटे-छोटे इशारों में दिखती है. दलित परिवार के घर पर साथ बैठकर चाय पीना. बच्चों का बिना किसी पुरानी सीमा के साथ खेलना. त्योहारों का अलग-अलग नहीं, बल्कि मिलकर मनाया जाना.
यह प्रस्ताव राजधानी मुंबई से करीब 350 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव के सरपंच द्वारा बुलाई गई विशेष ग्राम सभा में सर्वसम्मति से पास किया गया. यह जिला पहले ध्रुवीकरण और सामाजिक बहिष्कार की खबरों के लिए सुर्खियों में रहा है.
सौंदला के सरपंच शरद शरद अर्गडे ने दिप्रिंट से बात करते हुए इस पहल के बारे में बताया. उन्होंने कहा कि पड़ोसी इलाकों और पूरे महाराष्ट्र में हाल के वर्षों में बढ़ते जातीय और सांप्रदायिक तनाव ने उन्हें जल्दी कदम उठाने के लिए प्रेरित किया.
उन्होंने कहा, “हम गाय को मां मानते हैं, लेकिन अपने ही जैसे इंसानों को इंसान मानने से इनकार कर देते हैं. इसे बदलने की जरूरत है. लोग एक खास जाति के व्यक्ति से सामान खरीदने से मना कर रहे हैं. कुछ जगहों पर लोग निचली जाति के डॉक्टर से इलाज कराने से भी मना कर रहे हैं. यह सोच मेरे गांव में भी जड़ न जमा ले, इससे पहले मैं डरने लगा था. इसलिए मैंने कदम उठाने का फैसला किया.”

ग्राम पंचायत कार्यालय के बाहर मराठा राजा छत्रपति शिवाजी महाराज और उनके मावलों की तस्वीरें लगी हैं. अर्गडे ने कहा कि इसका मकसद शिवाजी के धर्मनिरपेक्ष स्वभाव को दिखाना है और यह बताना है कि उन्होंने अपने मावलों में जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया. सरपंच ने समझाया कि ये तस्वीरें ग्रामीणों को याद दिलाती हैं कि एक साम्राज्य तब बना जब लोग एकजुट थे, धर्म और जाति के आधार पर बंटे नहीं थे.
अर्गडे के अनुसार, “जाति-मुक्त गांव” का विचार उन्हें एक सामाजिक कार्यकर्ता प्रमोद झिंजाडे ने सुझाया था. साथ ही उनके पिता का प्रभाव और उनकी पत्नी के प्रयासों ने भी सोच बदलने में भूमिका निभाई.
सौंदला ने खुद को केवल जाति-मुक्त घोषित नहीं किया है, बल्कि ग्रामीणों ने अन्य सुधार भी किए हैं. जैसे गांव को गाली-गलौज और अपमानजनक शब्दों से मुक्त बनाना. विधवा विवाह को बढ़ावा देना और महिलाओं की शिक्षा को प्रोत्साहित करना.
पड़ोसी बीड जिले का उदाहरण देते हुए, जहां इस समय मराठा और ओबीसी के बीच खुला तनाव चल रहा है, अर्गडे ने कहा, “आज हमारे राज्य में जो हो रहा है, वह बहुत चिंताजनक है. लोग बंट रहे हैं और दंगे हो रहे हैं. भविष्य में ऐसा लग रहा है कि हमें पाकिस्तान से नहीं, बल्कि एक-दूसरे से लड़ना पड़ेगा.”

अहिल्यानगर जिला, जिसे 2023 तक अहमदनगर कहा जाता था, पिछले दो वर्षों से कई गांवों में ध्रुवीकरण और सांप्रदायिक तनाव की घटनाओं को लेकर खबरों में रहा है. नफरत भरे भाषण, मुसलमानों के सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार की अपील, और धार्मिक ढांचों को लेकर विवाद की खबरें आम रही हैं.
धीरे-धीरे आया बदलाव
सौंदला की आबादी लगभग 2,500 है और यहां करीब 450 परिवार रहते हैं. ग्रामीणों के अनुसार, लगभग 70 प्रतिशत निवासी “ऊंची जाति” से हैं और बाकी दलित हैं. करीब 4 परिवार मुस्लिम समुदाय से हैं, जबकि 10 से 15 परिवार ईसाई धर्म मानते हैं.
5 फरवरी का प्रस्ताव अचानक नहीं आया. ग्रामीणों का कहना है कि अर्गडे और उनकी पत्नी प्रियंका, जो पूर्व सरपंच रह चुकी हैं, ने धीरे-धीरे इसके लिए जमीन तैयार की.
अर्गडे 2003 से स्थानीय राजनीति में सक्रिय हैं. उनके पिता बाबा अर्गडे गांव में अनुभवी कम्युनिस्ट नेता थे. जब अर्गडे पहली बार 2003 में सरपंच बने, जो कि अब उनका तीसरा कार्यकाल है, तब उन्होंने गांव में प्रगतिशील विचार लागू करने शुरू किए. शुरुआत में यह चुनौतीपूर्ण था, लेकिन समय के साथ सोच बदलने लगी, उन्होंने कहा.

जब 2018 में प्रियंका सरपंच बनीं, तो उन्होंने अपने काम के तहत गांव के लोगों के घर-घर जाना शुरू किया. यह उनके लिए निजी बदलाव की एक नई शुरुआत बन गया.
उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “शुरुआत में मैं भी निचली जाति के लोगों के घर के अंदर जाने को लेकर संकोच में थी. मैं सोचती थी कि लोग क्या कहेंगे अगर मैंने उनके घर पानी पी लिया. मैं हिचकिचाती थी.”
यह हिचकिचाहट दिखाती है कि सामाजिक सोच कितनी गहराई से बैठी होती है. लेकिन पति के सुधार के प्रयासों के साथ उन्होंने खुद बदलाव लाने का फैसला किया. उन्होंने कहा, “जैसे कहा जाता है कि बदलाव की शुरुआत घर से होती है. वैसे ही मुझे वही बदलाव लाना था, जो मैं देखना चाहती थी.”
समय के साथ लोग एक-दूसरे के करीब आने लगे. आपस में नमस्ते और बातचीत बढ़ी. एक-दूसरे के घर आना-जाना शुरू हुआ. लंबे समय से चली आ रही दूरियां कम होने लगीं.
जाति-मुक्त प्रस्ताव से दो महीने पहले गांव ने एक और प्रतीकात्मक प्रस्ताव पास किया था. इसमें तय हुआ कि हर सुबह करीब 10 बजे मंदिर के ऊपर लगे लाउडस्पीकर से राष्ट्रगान बजाया जाएगा. लोग अपने खेतों में काम करते हुए भी राष्ट्रगान के सम्मान में खड़े होने लगे.
अर्गडे ने कहा, “ऐसा करके मैं लोगों को बताना चाहता था कि हम पहले भारतीय हैं. हम सिर्फ अपने देश के बेटे हैं, जाति के आधार पर बंटे हुए नहीं.”
फिर 5 फरवरी को पंचायत ने विशेष ग्राम सभा बुलाई. उस सुबह रक्तदान शिविर लगाया गया. दोपहर में अर्गडे ने गांव के सामने प्रस्ताव रखा.
उन्होंने कहा, “जैसे स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह ने कहा था, मैंने उनसे कहा कि हमारा खून न केसरिया है, न हरा और न कोई दूसरा रंग. हम सबका खून एक जैसा लाल है, जो एक बार मिल जाए तो अलग नहीं किया जा सकता. ईश्वर ने यह फर्क नहीं बनाया. और मैंने उन्हें समझाया कि कुछ स्वार्थी लोग समाज को बांटना चाहते हैं.”
इस प्रस्ताव की एक प्रति, जिसे द प्रिंट ने देखा, में कहा गया है कि सौंदला “जाति, धर्म, पंथ या रंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा” और “मेरी जाति इंसानियत है” के सिद्धांत पर काम करेगा.
इसमें आगे कहा गया है कि सभी सार्वजनिक स्थान, मंदिर, श्मशान घाट, पानी के स्रोत, स्कूल, कार्यक्रम और सरकारी सेवाएं सभी के लिए बराबर रूप से उपलब्ध होंगी. जाति या धर्म से जुड़े बयानों, धार्मिक बहिष्कार या जाति के आधार पर अन्याय को लेकर किसी तरह का सांप्रदायिक तनाव नहीं होना चाहिए. गांव का कोई भी सदस्य सोशल मीडिया पर कोई भड़काऊ या आपत्तिजनक पोस्ट साझा नहीं करेगा. अगर ऐसा करते पकड़ा गया तो सजा दी जाएगी.
एक अलग दौर
कई ग्रामीणों के मुताबिक साउंडाला में खुला भेदभाव पहले ही कम हो चुका था. लेकिन बुजुर्गों को एक अलग समय भी याद है.
चालीस की उम्र के आसपास के संजय गोरे, जिनके घर पर सरपंच और अन्य लोगों ने चाय पी थी, ने बताया कि बचपन में उन्हें शादी के भोजन से खींचकर अलग कर दिया जाता था क्योंकि वह अनुसूचित जाति से थे. उन्होंने कहा कि उनके समुदाय को अलग बैठाया जाता था, अक्सर मवेशियों के पास, और अपने बर्तन खुद लाने पड़ते थे. कभी-कभी उन्हें बचा हुआ या खराब खाना दिया जाता था.
उन्होंने द प्रिंट से कहा, “25-30 साल पहले जाति का भेदभाव बहुत ज्यादा था.”
गोरे ने कहा, “जब मैं बच्चा था, अगर हमारे गांव में ओपन कैटेगरी यानी ऊंची जाति में शादी होती थी, तो हमारे एससी समुदाय को बुलाया नहीं जाता था. और अगर मैं उनके साथ बैठकर खाने लगता था, तो मेरा हाथ पकड़कर मुझे बाहर फेंक दिया जाता था. मैंने यह सब झेला है. लेकिन आज हालात अलग हैं.”
59 साल के मंगल बोधक को अलग-अलग जातियों के लिए अलग कुएं और गांव के कार्यक्रमों में देर से बुलाया जाना याद है. निचली जाति के परिवारों को दूर खड़ा रहने की उम्मीद की जाती थी. बोधक ने कहा, “हमें दूर खड़ा किया जाता था और चप्पल भी दूर ही उतारने को कहा जाता था.”
साउंडाला में रहने वाली कुछ मुस्लिम परिवारों में से एक रुकसाना शेख ने भी शादी के बाद दूसरों के घर जाने का अपना अनुभव साझा किया.
उन्होंने कहा, “अगर वे मुझे खाना देते भी थे, तो कहते थे कि अपने बर्तन खुद उठाकर धो लो. उसके बाद मैंने उनके घर जाना बंद कर दिया.”
ग्रामीणों का कहना है कि ऐसी प्रथाएं पिछले दो दशकों में कम होनी शुरू हो गई थीं, लेकिन अब यह प्रस्ताव भेदभाव के खिलाफ रुख को औपचारिक रूप देता है.
बोधक ने कहा, “अब यह बदल गया है. 5 फरवरी के बाद जिन त्योहारों को हमने मनाया, उनमें हम सब साथ बैठकर खाए, जो पहले नहीं होता था.”
कई ग्रामीणों के मुताबिक, दूसरे गांवों में उनके रिश्तेदार अब भी खुद को अलग-थलग महसूस करते हैं, लेकिन साउंडाला में बराबरी का माहौल है.
हालांकि जाति अभी भी सरकारी नीतियों में मौजूद है, खासकर शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण के मामलों में.
सरपंच ने कहा, “हां, सरकार की नीतियां अपनी जगह रहेंगी. मैं यह नहीं कह रहा कि आरक्षण खत्म होना चाहिए. लेकिन मैं चाहता हूं कि मेरे गांव में जाति सिर्फ सरकारी कागजों तक सीमित रहे, रोजमर्रा के व्यवहार में नहीं.”
5 फरवरी के प्रस्ताव के बाद से ग्रामीण दो त्योहार साथ मना चुके हैं, जिनमें शिव जयंती भी शामिल है. एक अन्य ग्रामीण ज्योति बोधक ने द प्रिंट से कहा, “मेरी पीढ़ी ने मुश्किलें देखी हैं, लेकिन मेरे बच्चों को फर्क महसूस नहीं होता. वे स्कूल जाते हैं और सबके साथ खेलते हैं, उन्हें कभी अलग नहीं किया जाता.”
दूसरे सामाजिक प्रयोग
जाति-मुक्त घोषणा साउंडाला का पहला सामूहिक सुधार नहीं है.
ग्रामीणों ने गाली-गलौज पर जुर्माना लगाने का प्रस्ताव भी पास किया है. दोषी पाए जाने पर 500 रुपये का जुर्माना लगाया जाता है. शिकायतों की जांच के लिए गांव के कुछ हिस्सों में सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं. पंचायत सदस्यों ने बताया कि अब तक 13 लोगों को एक-दूसरे को गाली देने पर सजा दी गई है और इस नियम के लागू होने के बाद शराब के नशे में होने वाले झगड़े कम हुए हैं.
एक साल पहले गांव ने भेदभावपूर्ण विधवा प्रथाओं को औपचारिक रूप से हतोत्साहित किया और विधवा पुनर्विवाह का समर्थन शुरू किया. ऐसे मामलों में ग्राम पंचायत 11,000 रुपये की आर्थिक सहायता देती है और अब तक कम से कम एक पुनर्विवाह कराया जा चुका है.
लड़कियों की शिक्षा को भी समर्थन दिया जा रहा है. कक्षा 12 तक यूनिफॉर्म, किताबें और स्टेशनरी उपलब्ध कराई जाती हैं.
एक अलग पहल के तहत गांव में छात्रों के लिए रोज दो घंटे का “नो मोबाइल” समय अनिवार्य किया गया है. इस दौरान पंचायत सदस्य चक्कर लगाकर पढ़ाई के लिए प्रेरित करते हैं.
अर्गडे ने कहा, “हम मानते हैं कि इलाज से बेहतर रोकथाम है. बाद में पछताने से अच्छा है कि अभी सावधानी बरती जाए.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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