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Wednesday, 18 February, 2026
होमविज्ञानखून या यूरिन टेस्ट की जरूरत खत्म? ब्रेसलेट जैसी डिवाइस रियल-टाइम में देगी महिलाओं के हार्मोन का डेटा

खून या यूरिन टेस्ट की जरूरत खत्म? ब्रेसलेट जैसी डिवाइस रियल-टाइम में देगी महिलाओं के हार्मोन का डेटा

एक भारतीय मूल के स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के ग्रेजुएट और को-फाउंडर द्वारा बनाई गई यह डिवाइस, शरीर में अंदर जाने वाले या यूरिन टेस्ट की ज़रूरत को खत्म करती है; यह फर्टिलिटी ट्रीटमेंट को बदल सकती है.

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नई दिल्ली: अगर सब कुछ प्लानिंग के हिसाब से होता है, तो महिलाओं को अपने हार्मोन को रियल-टाइम में ट्रैक करने के लिए सिर्फ ब्रेसलेट जैसी एक डिवाइस पहननी होगी—यह एक ऐसा इनोवेशन है जो फर्टिलिटी ट्रीटमेंट को आसान बना सकता है और महिलाओं के स्वास्थ्य के बारे में हमारी जानकारी को बढ़ा सकता है.

अभिनव अग्रवाल, जो जयपुर में बड़े हुए और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई की, उन्होंने जेनी डुआन के साथ मिलकर ‘Clair’ की को-फाउंडिंग की, ताकि एक ऐसी नॉन-इनवेसिव पहनने वाली डिवाइस बनाई जा सके, जो हार्मोन में होने वाले बदलाव को मॉनिटर करने के लिए खून, लार या यूरिन टेस्ट की ज़रूरत को खत्म कर दे.

कलाई पर पहनी जाने वाली यह डिवाइस कई बायोसेंसर का यूज़ करती है, जो 100 से ज्यादा फिजियोलॉजिकल सिग्नल को ट्रैक करती है और मशीन-लर्निंग मॉडल का यूज़ करके पांच महत्वपूर्ण हार्मोन—ओएस्ट्रोजन (एस्ट्राडियोल), प्रोजेस्टेरोन, ल्यूटिनाइजिंग हार्मोन (LH), फॉलिकल-स्टिमुलेटिंग हार्मोन (FSH) और प्रेग्नानडायोल ग्लुकुरोनाइड (PdG)—के लेवल का अनुमान लगाती है.

अग्रवाल ने दिप्रिंट को बताया, “हम Food and Drug Administration (US FDA) की मंजूरी लेने की कोशिश करेंगे. पहले यह क्लास I मेडिकल डिवाइस या क्लास I जनरल वेलनेस डिवाइस होगी और फिर जब इसे एफडीए की मंजूरी मिल जाएगी, तो इसे क्लास II मेडिकल डिवाइस के रूप में बेचा जाएगा.”

यूएस एफडीए के अनुसार, क्लास I डिवाइस कम जोखिम वाले प्रोडक्ट होते हैं, जिन पर सामान्य नियम लागू होते हैं, जबकि क्लास II डिवाइस मध्यम जोखिम वाले प्रोडक्ट होते हैं, जिनके लिए ज्यादा निगरानी और सुरक्षा व प्रभावशीलता साबित करने के लिए औपचारिक मंजूरी ज़रूरी होती है.

रिसर्च की कमी को पूरा करना

कई सालों से मेडिकल रिसर्च में महिलाओं पर कम स्टडी हुई है. इसकी वजह से महिलाओं की सेहत से जुड़ा सही डेटा कम है और उनकी हेल्थ को समझने में प्रगति धीमी रही है.

हार्मोन शरीर के केमिकल मैसेज होते हैं. ये खून के ज़रिए पूरे शरीर में जाते हैं और मेटाबॉलिज्म, मूड, नींद, फर्टिलिटी और दिल की सेहत जैसी ज़रूरी चीज़ों को कंट्रोल करते हैं. महिलाओं में ओएस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरोन, LH और FSH जैसे हार्मोन पीरियड्स के दौरान बदलते रहते हैं.

इन बदलावों को ट्रैक करने से यह पता चलता है कि ओव्यूलेशन कब हुआ, पीरियड्स रेगुलर हैं या नहीं, फर्टिलिटी ट्रीटमेंट में मदद मिलती है और PCOS जैसी बीमारी का पता भी चल सकता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, PCOS प्रजनन उम्र की लगभग 10-13 प्रतिशत महिलाओं को प्रभावित करता है.

ये सभी हार्मोन मिलकर पीरियड्स को कंट्रोल करते हैं.

FSH अंडे को बढ़ने में मदद करता है, LH ओव्यूलेशन शुरू करता है, ओएस्ट्रोजन गर्भाशय की परत बनाता है, प्रोजेस्टेरोन पीरियड्स के दूसरे हिस्से को संभालता है.

अगर सिर्फ एक हार्मोन को मापा जाए, तो पूरी सही जानकारी नहीं मिलती.

अभी घर पर हार्मोन चेक करने के ज्यादातर तरीके यूरिन टेस्ट किट हैं, जैसे Mira और Proov के किट. इनमें सुबह का पहला यूरिन टेस्ट करना पड़ता है.

भारतीय कंपनियां भी ऐसे डिवाइस बना रही हैं. जैसे Inito का मॉनिटर, जो फोन से जुड़कर यूरिन टेस्ट से हार्मोन मापता है.

बेंगलुरु की Ultrahuman एक डिवाइस देती है, जो स्किन का तापमान, हार्ट रेट और नींद को ट्रैक करती है. इससे पीरियड्स का पैटर्न समझने में मदद मिलती है.

लेकिन अभी ऐसा कोई पहनने वाला डिवाइस नहीं है, जो सीधे और लगातार हार्मोन माप सके.

कुछ रिसर्च ग्रुप, जैसे Caltech, पसीने से हार्मोन मापने वाले सेंसर बना रहे हैं, लेकिन ये अभी बाजार में आसानी से उपलब्ध नहीं हैं.

Clair के को-फाउंडर अभिनव अग्रवाल ने कहा कि सिर्फ एक हार्मोन को मापना काफी नहीं है. सही जानकारी के लिए सभी ज़रूरी हार्मोन को मापना ज़रूरी है.

कुछ कंपनियां, जैसे Imply, त्वचा के नीचे लगाने वाले सेंसर बना रही हैं, लेकिन इसमें डिवाइस को शरीर के अंदर लगाना पड़ता है.

Clair अपनी डिवाइस का टेस्ट Stanford Gladstone Initiative के एक स्टडी में करेगी. इसमें करीब 150 महिलाएं 3 महीने तक डिवाइस पहनेंगी. इसके बाद कंपनी यूएस एफडीए से मंजूरी मांगेगी.

अगर सब ठीक रहा, तो यह डिवाइस इस साल नवंबर तक अमेरिका में आ सकती है.

अग्रवाल ने कहा कि इसका सबसे बड़ा फायदा आईवीएफ कराने वाली महिलाओं को होगा. अभी उन्हें बार-बार ब्लड टेस्ट कराना पड़ता है. इस डिवाइस से बार-बार अस्पताल जाने की ज़रूरत कम हो सकती है.

इसका इस्तेमाल स्पोर्ट्स में भी हो सकता है. हार्मोन के हिसाब से ट्रेनिंग करने से एसीएल जैसी घुटने की चोट का खतरा कम हो सकता है, जो महिला खिलाड़ियों में ज्यादा होती है.

प्राइवेसी सेफ्टी

अग्रवाल ने कहा कि Clair डिवाइस का डेटा यूजर के फोन में ही सेव होता है. ज़रूरत पड़ने पर इसे सुरक्षित तरीके से क्लाउड में सेव किया जा सकता है.

उन्होंने कहा, इस डेटा से किसी की फर्टिलिटी हिस्ट्री पता चल सकती है, इसलिए प्राइवेसी का खास ध्यान रखा गया है.

उन्होंने कहा कि हार्मोन के बारे में अभी बहुत कुछ पता नहीं है, क्योंकि डेटा कम है. लगातार ट्रैकिंग से नई जानकारी मिलेगी.

अगर यह डिवाइस सफल होती है, तो हार्मोन ट्रैक करना भी उतना ही आसान हो सकता है, जितना आज शुगर और हार्ट रेट को रियल-टाइम में ट्रैक करना आसान है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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