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Saturday, 14 February, 2026
होममत-विमततैयार मुस्कान से ‘सत्ता के आगे झुकने’ के आरोप तक: स्पीकर के रूप में ओम बिरला का विवादों भरा सफर

तैयार मुस्कान से ‘सत्ता के आगे झुकने’ के आरोप तक: स्पीकर के रूप में ओम बिरला का विवादों भरा सफर

एक के बाद एक कड़वे टकराव के बाद—विपक्ष द्वारा बिरला को हटाने की मांग का असाधारण कदम लंबे समय से बन रहा था.

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19 जून 2019 को लोकसभा में स्पीकर के रूप में अपने पहले दिन, ओम बिरला का स्वागत उनके शांत स्वभाव और हमेशा तैयार रहने वाली मुस्कान की गर्मजोशी से भरी तारीफों के साथ हुआ—ऐसी खूबियां जिन्हें सभी दलों के सांसदों ने उनकी सार्वजनिक पहचान बताया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजस्थान के कोटा से दूसरी बार सांसद बने बिरला को बधाई देते हुए कहा कि उन्हें कभी-कभी चिंता होती है कि बिरला की विनम्रता और नरम बोलने का तरीका सदन में उनके खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है.

मोदी ने तब कहा, “सदन में भी हमने देखा है कि अगर वह मुस्कुराते हैं तो बहुत हल्के से मुस्कुराते हैं. अगर वह बोलते हैं तो बहुत धीरे बोलते हैं.” उन्होंने बिरला के लंबे राजनीतिक सफर को याद किया—बीजेपी युवा मोर्चा से लेकर विधायक बनने और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में काम करने तक.

कुछ ही देर बाद, उस समय लोकसभा में कांग्रेस के नेता रहे अधीर रंजन चौधी ने बिरला को एक शेर समर्पित किया: “खुदा से क्या मांगूं तेरे वास्ते, सदा खुशियों से भरे हों तेरे रास्ते, हंसी तेरे चेहरे पर रहे इस तरह, खुशबू फूलों के साथ रहती है जिस तरह.”

बिरला को शुभकामनाएं देते हुए, चौधरी ने उन्हें यह भी याद दिलाया कि स्पीकर का कर्तव्य है “सदन में हमारी सही तरीके से रक्षा करना, क्योंकि आप इस सदन के पीठासीन अधिकारी और संरक्षक हैं.”

सात साल और एक लोकसभा चुनाव बाद, माहौल पूरी तरह बदल गया. 10 फरवरी 2026 को कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष ने बिरला को स्पीकर पद से हटाने की मांग करते हुए नोटिस दिया और उन पर “खुले तौर पर पक्षपात करने” और “संवैधानिक पद का दुरुपयोग करने” का आरोप लगाया.

यह कदम—जो बढ़ते राजनीतिक ध्रुवीकरण और बीच का रास्ता खत्म होने का संकेत है—सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच बढ़ते अविश्वास और स्पीकर के साथ रिश्तों में आई दूरी को भी दिखाता है. यह बिरला के उस सफर को दिखाता है, जहां कभी उन्हें उनकी सहज मुस्कान के लिए जाना जाता था, लेकिन अब उन्हें बढ़ते संदेह के साथ देखा जा रहा है.

इसी वजह से ओम बिरला दिप्रिंट के न्यूज़मेकर ऑफ द वीक हैं.

पहला टकराव

स्पीकर पद पर बिरला का शुरुआती चयन बिल्कुल भी अनुमानित नहीं था. पिछली लोकसभा के दौरान उनका चयन राजनीतिक हलकों को और बताया जाता है कि खुद बिरला को भी, चौंका गया था.

2014 में प्रधानमंत्री के रूप में अपने पहले कार्यकाल में नरेंद्र मोदी ने वरिष्ठता और अनुभव को प्राथमिकता दी थी और अनुभवी सांसद सुमित्रा महाजन को चुना था, जो तब आठ बार की सांसद थीं, ताकि वे सदन की अध्यक्षता करें, लेकिन पांच साल बाद, उन्होंने बिरला को चुना, जो तब केवल अपने दूसरे कार्यकाल के सांसद थे. इससे यह संकेत मिला कि परंपरा से हटकर एक अपेक्षाकृत युवा चेहरे को मौका दिया जा रहा है.

स्पीकर के रूप में अपने पहले कार्यकाल में—खासकर शुरुआती वर्षों में,बिरला को इस बात के लिए सराहना मिली कि उन्होंने पहली बार चुने गए सांसदों और छोटी पार्टियों के सांसदों को बोलने का मौका दिया.

साल 2023, जो उनके कार्यकाल का चौथा साल था, विपक्ष के साथ उनका पहला बड़ा टकराव लेकर आया.

संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान कुल 146 सांसद—100 लोकसभा से और 46 राज्यसभा से, निलंबित कर दिए गए थे. इन सांसदों ने सदन की सुरक्षा में हुई चूक पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से बयान देने की मांग की थी.

जैसा कि उम्मीद थी, स्पीकर पद पर बिरला का दोबारा चुनाव आसान नहीं था. उनके दूसरे कार्यकाल के पहले दिन ही यह साफ दिख गया कि उनके और विपक्ष के बीच दूरी बढ़ गई है, खासकर क्योंकि इस बार विपक्ष की संख्या ज्यादा थी. बिरला, 1985 में बलराम जाखड़ के बाद दूसरे स्पीकर बने, जिन्हें पूरा पांच साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद फिर से चुना गया.

विपक्ष ने इस पद के लिए चुनाव करवाने पर जोर दिया, जो आज़ाद भारत के इतिहास में केवल चौथी बार हुआ. विपक्ष ने कांग्रेस के कोडिकुन्निल सुरेश को उम्मीदवार बनाया. हालांकि, बिरला को ध्वनि मत से फिर से चुन लिया गया.

यह चुनाव इसलिए ज़रूरी हुआ क्योंकि सरकार और विपक्ष के बीच सहमति नहीं बन पाई. विपक्ष का कहना था कि सहमति तभी संभव है, जब सरकार संसदीय “परंपरा” का हवाला देते हुए डिप्टी स्पीकर का पद विपक्ष को दे.

टकराव की रेखाएं

कई मायनों में, बिरला के दोबारा स्पीकर बनने पर उन्हें बधाई देने के दौरान राहुल गांधी का भाषण आगे आने वाले टकराव का संकेत था. कांग्रेस की सीटें बढ़ने के कारण राहुल गांधी लोकसभा में विपक्ष के नेता बने थे.

राहुल ने कहा, “यह सोचना कि आप विपक्ष की आवाज़ को दबाकर सदन को अच्छे से चला सकते हैं, एक गैर-लोकतांत्रिक सोच है और इस चुनाव ने दिखाया है कि भारत के लोग उम्मीद करते हैं कि विपक्ष संविधान की रक्षा करे…” उनके बाद बोलने वाले कुछ विपक्षी सांसदों ने इससे भी कड़े शब्दों में बात कही.

टीएमसी के सांसद सुदीप बंदोपाध्याय, जो पांच बार सांसद रह चुके हैं, ने कहा कि कुछ मौकों पर बिरला को “सत्ताधारी पार्टी के आगे झुकना पड़ा”. एनसीपी की सांसद सुप्रिया सुले ने कहा कि पिछली लोकसभा में सांसदों के निलंबन से विपक्ष के सांसदों को गहरा दुख पहुंचा. वहीं एनसी के सांसद आगा रुहुल्लाह मेहदी ने कहा कि बिरला के कार्यकाल को इस बात के लिए भी याद किया जाएगा कि उनके सामने सदन में एक मुस्लिम सांसद को “आतंकवादी” कहा गया.

तनाव और बढ़ गया, जब बिरला ने अपने दूसरे कार्यकाल के पहले ही दिन आपातकाल की निंदा करने वाला एक प्रस्ताव पढ़ा. विपक्ष ने इसे सरकार के “टकराव वाले रवैये” की निरंतरता बताया.

एक हफ्ते बाद, जब राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान राहुल गांधी बोलने के लिए खड़े हुए, तो उन्होंने इस बात का ज़िक्र किया कि स्पीकर बनने के बाद बिरला ने उन्हें और मोदी को अलग-अलग तरीके से बधाई दी.

उन्होंने कहा, “जब मोदीजी ने आकर आपसे हाथ मिलाया और मैंने भी हाथ मिलाया, तो मैंने एक चीज़ देखी. जब मैंने हाथ मिलाया, तो आप सीधे खड़े थे, लेकिन जब मोदीजी ने हाथ मिलाया, तो आप झुक गए.” इस पर विपक्ष के सांसदों ने तालियां बजाईं.

एक तरह से, यहीं से आगे की घटनाओं का माहौल तय हो गया. विपक्ष द्वारा बिरला को हटाने की मांग का असाधारण कदम लंबे समय से बन रहा था—एक के बाद एक कड़वे टकराव, एक के बाद एक निलंबन, और एक के बाद एक बिल का जल्दी-जल्दी पास होना.

(न्यूज़मेकर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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