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Sunday, 15 February, 2026
होममत-विमतHAL पर पहले से ही काम का भार है. AMCA में निजी क्षेत्र को शामिल करना समझदारी भरा फैसला है

HAL पर पहले से ही काम का भार है. AMCA में निजी क्षेत्र को शामिल करना समझदारी भरा फैसला है

आने वाले साल भारत की डिफेंस इंडस्ट्री का पहले कभी नहीं हुआ ऐसा टेस्ट करेंगे. सफलता DRDO, ADA, HAL, प्राइवेट फर्मों और इंटरनेशनल पार्टनर्स के बीच कोलेबोरेशन पर निर्भर करेगी.

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भारत का एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट कार्यक्रम (AMCA), जिसकी पहली चरण की कीमत करीब 15,000 करोड़ रुपये है, ने अचानक नया मोड़ ले लिया है. देश की प्रमुख एयरोस्पेस सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को शुरुआती सूची में शामिल नहीं किया गया है. इसके बजाय टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड, लार्सन एंड टुब्रो और भारत फोर्ज लिमिटेड जैसी निजी कंपनियों को निर्माण की भूमिका के लिए विचार किया जा रहा है.

डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन और उसकी एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी, जो लंबे समय से हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के साथ काम करती रही हैं, के लिए यह निजी उद्योग के साथ सहयोग का नया दौर है.

एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट परियोजना सिर्फ एक और रक्षा कार्यक्रम नहीं है. यह भारत की महत्वाकांक्षा दिखाती है कि वह पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर विमान तैयार करे, जो उसे उन्नत एयरोस्पेस ताकतों की कतार में खड़ा करता है. इतने अहम चरण में निजी कंपनियों को शामिल करने का फैसला साफ नीति बदलाव का संकेत है. यह भारत के रक्षा निर्माण ढांचे को नया रूप दे सकता है.

HAL की गैरमौजूदगी

HAL को बाहर रखने से कई लोगों को हैरानी हुई है. आठ दशक से ज्यादा अनुभव के साथ, HAL ने वायुसेना, थलसेना और नौसेना के लिए लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, ट्रेनर और अन्य सिस्टम बनाए हैं. उसकी उपलब्धियों में तेजस लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट, ध्रुव हेलीकॉप्टर और कई लाइसेंस पर बने विमान शामिल हैं. इसके मुकाबले, चुनी गई निजी कंपनियों के पास फाइटर जेट बनाने का सीधा अनुभव कम है. फिर भी एडीए डिजाइन और विकास की जिम्मेदारी अपने पास रखेगा, जबकि निजी क्षेत्र निर्माण और समय पर डिलीवरी पर ध्यान देगा.

काम का यह बंटवारा व्यावहारिक तरीका दिखाता है. HAL के पास पहले से तेजस Mk1A लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर और अन्य प्लेटफॉर्म की बड़ी ऑर्डर सूची है. आलोचकों का कहना है कि AMCA प्रोटोटाइप का काम जोड़ने से और देरी हो सकती है. निजी कंपनियों को शामिल कर सरकार क्षमता बढ़ाने और काम में तेजी लाने की उम्मीद कर रही है.

मैंने पेट्रोकेमिकल क्षेत्र में बदलाव देखा है, खासकर इंडियन पेट्रोकेमिकल्स कॉरपोरेशन लिमिटेड जैसी बड़ी सरकारी कंपनी का 2007 में रिलायंस इंडस्ट्रीज में विलय. रक्षा निर्माण में भी कुछ ऐसा ही हो सकता है. जैसे आज HAL भारत के विमानन तंत्र का मुख्य आधार है, वैसे ही निजी क्षेत्र जटिल परियोजनाएं पूरा करने की क्षमता दिखा सकता है.

भारत का निजी क्षेत्र कई बार बड़े और जटिल प्रोजेक्ट पूरे कर चुका है. पेट्रोकेमिकल प्लांट, रिफाइनरी, मेट्रो रेल सिस्टम और बंदरगाह जैसे कामों में टाटा, लार्सन एंड टुब्रो, अडानी, रिलायंस और अन्य कंपनियों ने तेजी, वित्तीय ताकत और बेहतर प्रबंधन दिखाया है. लेकिन रक्षा निर्माण अलग चुनौती है. इसमें तकनीकी जटिलता, लंबा समय और ग्लोबल सप्लाई चेन पर निर्भरता शामिल है.

फिर भी ये कंपनियां बिल्कुल नई शुरुआत नहीं कर रही हैं. टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड गुजरात के वडोदरा में एयरबस C-295 ट्रांसपोर्ट विमान असेंबल कर रही है, जो भारतीय वायुसेना के साथ 56 विमानों के सौदे के तहत है. 16 विमान स्पेन से आएंगे और 40 भारत में बनेंगे. लार्सन एंड टुब्रो ने मिसाइल लॉन्चर, पनडुब्बी और नौसेना सिस्टम में योगदान दिया है. भारत फोर्ज ने तोप और बख्तरबंद वाहन के हिस्सों में निवेश किया है. मिलकर ये पिछले दो दशकों में विकसित हो चुके रक्षा औद्योगिक तंत्र का हिस्सा हैं.

जोखिम और मौके

AMCA कार्यक्रम बहुत महत्वाकांक्षी है. पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर बनाना आसान नहीं है. इसमें डिजाइन, उन्नत एवियोनिक्स, कंपोजिट सामग्री और इंजन तकनीक में महारत चाहिए. इंजन के लिए विदेशी सप्लायर पर भारत की निर्भरता बड़ी कमजोरी है. इंजन की कमी के कारण HAL को पहले भी देरी झेलनी पड़ी है, और निजी कंपनियों को भी ऐसी चुनौती आ सकती है. सफलता इस पर निर्भर करेगी कि भारत अंतरराष्ट्रीय साझेदारी कैसे संभालता है और साथ ही अपनी क्षमता कैसे विकसित करता है.

लेकिन मौका भी बड़ा है. अगर निजी कंपनियां सफल होती हैं, तो भारत एक ही सरकारी कंपनी पर निर्भर नहीं रहेगा. इससे प्रतिस्पर्धा, नवाचार और तेज डिलीवरी बढ़ सकती है. यह सरकार की “आत्मनिर्भर भारत” सोच के अनुरूप भी होगा, जिसमें निजी पूंजी और प्रतिभा को राष्ट्रीय सुरक्षा में योगदान देने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है.

AMCA के पहले चरण में HAL की गैरमौजूदगी बड़ा बदलाव है, लेकिन इसका मतलब स्थायी बाहर होना नहीं है. भारत की विमानन क्षमता की रीढ़ HAL रही है और उसका अनुभव बेमिसाल है.

HAL की आलोचना अक्सर देरी और गुणवत्ता को लेकर होती है, लेकिन इनमें से कई समस्याएं व्यवस्था से जुड़ी रही हैं. सप्लाई चेन की दिक्कत, इंजन की कमी और बदलती जरूरतों ने डिलीवरी को प्रभावित किया है. साथ ही HAL का पारंपरिक कामकाज तरीका कुछ हद तक धीमा और कम लचीला रहा है, जिससे निजी कंपनियों की तुलना में फुर्ती कम रही है.

तेजस Mk1A कार्यक्रम को भी मुख्य रूप से GE-404 इंजन की कमी के कारण झटका लगा, जो HAL के नियंत्रण से बाहर था. अगर सही जगह पर अधिक जनशक्ति और संगठन में ज्यादा लचीलापन लाया जाए, तो कंपनी अपनी कार्यक्षमता और डिलीवरी सुधार सकती है.

हालांकि HAL की मजबूत स्थिति को कभी-कभी एकाधिकार माना गया है, लेकिन उसका ढांचा, कुशल कर्मचारी और जटिल एयरोस्पेस प्रोजेक्ट संभालने का अनुभव अब भी बड़ी ताकत है. महत्वपूर्ण बात यह है कि HAL ने संकेत दिया है कि वह AMCA के दूसरे चरण में भाग ले सकता है, जब बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू होगा. करीब 120 विमानों और ₹1.5 लाख करोड़ से ज्यादा के कुल मूल्य वाले इस कार्यक्रम में HAL की विशेषज्ञता फिर काम आ सकती है.

इस तरह AMCA में HAL की कहानी बाहर होने की नहीं, बल्कि बदलाव की है. पहला चरण निजी उद्योग का हो सकता है, लेकिन आगे के चरणों में HAL फिर शामिल हो सकता है और भारत की रक्षा निर्माण यात्रा में भरोसेमंद साझेदार की भूमिका निभा सकता है. हालांकि HAL की भविष्य की भूमिका को लेकर अनिश्चितता ने निवेशकों और जनता की सोच को प्रभावित करना शुरू कर दिया है, जिससे बाजार और हितधारकों के बीच तेज प्रतिक्रियाएं देखने को मिल सकती हैं.

आगे की तस्वीर

AMCA के फैसले को भारत के रक्षा उद्योग के बड़े बदलाव के संदर्भ में देखना चाहिए. कई दशकों तक HAL और दूसरी सरकारी कंपनियों का इस क्षेत्र पर दबदबा रहा, जबकि निजी कंपनियां सिर्फ पुर्जे सप्लाई करती थीं. पिछले 20 साल में नीतिगत सुधारों ने निजी भागीदारी, संयुक्त उपक्रम और विदेशी सहयोग को बढ़ावा दिया है. सी-295 कार्यक्रम, नौसेना के जहाज निर्माण के अनुबंध और तोप परियोजनाएं इस बदलाव को दिखाती हैं.

AMCA में निजी कंपनियों को शामिल कर सरकार इस बदलाव को तेज कर रही है. मकसद HAL को किनारे करना नहीं है, बल्कि ऐसा संतुलित तंत्र बनाना है जिसमें कई खिलाड़ी योगदान दें. यह विविधता जोखिम कम कर सकती है, कार्यक्षमता बढ़ा सकती है और सप्लाई चेन में रुकावट के खिलाफ मजबूती दे सकती है.

AMCA के पहले चरण में पांच उड़ने वाले प्रोटोटाइप और एक स्ट्रक्चरल टेस्ट नमूना बनाना शामिल है. असली बड़ा काम बाद के चरणों में है, जब बड़े पैमाने पर उत्पादन और निर्यात की संभावना सामने आएगी. HAL अभी भी भूमिका निभा सकता है, या तो साझेदारी के जरिए या अगले चरणों में शामिल होकर. निजी कंपनियों के लिए चुनौती यह साबित करना है कि वे उस क्षेत्र में सक्षम हैं जिस पर लंबे समय से HAL का दबदबा रहा है.

आने वाले साल भारत के रक्षा उद्योग की कड़ी परीक्षा लेंगे. सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि DRDO, ADA, HAL, निजी कंपनियां और अंतरराष्ट्रीय साझेदार कितनी अच्छी तरह साथ काम करते हैं. अगर इसे सही ढंग से संभाला गया, तो AMCA भारत की तकनीकी परिपक्वता और औद्योगिक ताकत का प्रतीक बन सकता है.

भारत का रक्षा निर्माण एक बदलाव के दौर में है. HAL की विरासत अब भी अहम है, लेकिन निजी कंपनियों के पास अब अपनी क्षमता दिखाने का मौका है. अंतिम लक्ष्य साफ है—देश की रक्षा जरूरतों को भरोसेमंद और स्वदेशी समाधान से पूरा करना. अगर यह बदलाव पूरे तंत्र को मजबूत करता है, तो भारत और मजबूत, ज्यादा आत्मनिर्भर और आने वाली चुनौतियों के लिए बेहतर तैयार होगा.

गोपाल सुतार HAL के पूर्व प्रवक्ता और SABIC/ARAMCO के मीडिया एनालिस्ट हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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