गुरुग्राम: गुरुवार तड़के करीब 3:30 बजे एक संदिग्ध के दोनों पैरों में गोली मारी गई. पुलिस ने कहा कि रोहतक के बेरी रोड पर जब क्राइम इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (सीआईए) की टीम ने उसे घेर लिया, तो उसने फायरिंग की. इसके जवाब में पुलिस ने गोली चलाई.
सीआईए-1 के प्रभारी कुलदीप ने कहा कि एक गोली एक सहायक उप-निरीक्षक (एएसआई) के सीने पर लगी, लेकिन सौभाग्य से उन्होंने बुलेट-प्रूफ जैकेट पहनी थी. आरोपी पर शराब के ठेके पर फायरिंग करने का मामला दर्ज था. उसे इलाज के लिए सांपला के कम्युनिटी हेल्थ सेंटर (सीएचसी) ले जाया गया.
रोहतक की यह फायरिंग सामान्य पुलिस कार्रवाई जैसी लग सकती है, लेकिन ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें कथित रूप से गैंगस्टर और उगाही करने वाले शामिल थे. इनमें से कई को उनके निचले अंगों में गोली लगने के बाद गिरफ्तार किया गया.
मंगलवार देर रात, राजस्थान का एक व्यक्ति फरीदाबाद के पाली इलाके में हथियार बरामदगी के दौरान कथित रूप से एक पुलिस अधिकारी से पिस्तौल छीनकर फायरिंग करने लगा. फिलहाल अस्पताल में उसका इलाज चल रहा है.
पिछले हफ्ते, यमुनानगर में दो कथित उगाही करने वालों और उनके साथियों को हिरासत में लिया गया. दोनों मुख्य संदिग्ध भी घायल हुए.
ऐसी ही कार्रवाई फतेहाबाद के टोहाना में भी हुई, जहां ‘बॉक्सर गैंग’ के दो संदिग्ध सदस्यों को घेरा गया. 4 फरवरी को गुरुग्राम के सोहना में भी इसी तरह का ऑपरेशन हुआ.
फिर 31 जनवरी को, गुरुग्राम में पुलिस हिरासत से भागने की कोशिश करते समय एक आरोपी के पैर में गोली मारी गई और दूसरे को फ्रैक्चर हो गया.
क्या यह राज्य की मंजूरी से?
हरियाणा पुलिस, खासकर गुरुग्राम और फतेहाबाद में, इन घायल आरोपियों की तस्वीरें नियमित रूप से सोशल मीडिया पर डाल रही है—अस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए लोग, जिनके पैरों पर पट्टी बंधी होती है.
इन तस्वीरों के साथ हथियार बरामदगी और आरोपियों के आपराधिक इतिहास की जानकारी भी दी जाती है. साफ तौर पर इसका मकसद यह संदेश देना होता है कि पुलिस संदिग्धों के खिलाफ सख्त कार्रवाई कर रही है. कैप्शन में पुलिस की “निर्णायक कार्रवाई” को रेखांकित किया जाता है.
9 फरवरी को एक सोशल मीडिया पोस्ट में हरियाणा के मंत्री कृष्ण बेदी ने इस प्रथा के बारे में खुलकर बात की.
फेसबुक पोस्ट में एक खबर की कटिंग थी, जिसमें लिखा था: “कोई गुंडा मेरी बहन, बेटी, मेरे व्यापारी भाई, मेरे मजदूर व कमजोर वर्ग की तरफ आंख उठाकर देखेगा, तो उसकी पिंडी में आर-पार सुराख होगा.” यह बात जींद जिले से विधायक मंत्री ने कही थी.
गणतंत्र दिवस पर हरियाणा पुलिस की सीआईए के दीपक गुलिया, जिन्हें उनके साथी अक्सर “एनकाउंटर स्पेशलिस्ट” कहते हैं, को राज्य सरकार ने बहादुरी पुरस्कार से सम्मानित किया. पुरस्कार के विवरण में कहा गया कि उन्होंने 14 मुठभेड़ों का नेतृत्व किया.
हरियाणा पुलिस के एक प्रवक्ता ने दिप्रिंट को बताया कि जनवरी 2025 से अब तक 162 मुठभेड़ों में 18 अपराधी मारे गए और 221 घायल हुए. प्रवक्ता ने कहा कि हरियाणा पुलिस नियम के अनुसार केवल आत्मरक्षा में जवाबी कार्रवाई करती है.
यह रुझान नया नहीं लगता.
1 सितंबर पिछले साल, तब के पुलिस महानिदेशक शत्रुजीत सिंह कपूर ने कानून-व्यवस्था की समीक्षा बैठक में कहा था कि हरियाणा पुलिस ने 1 जनवरी 2024 से 110 मुठभेड़ की हैं.
इन पुलिस कार्रवाइयों में 13 संदिग्ध मारे गए और 156 अन्य घायल हुए. कपूर ने पुलिस के साहस की तारीफ की और बल से इसी तरह काम जारी रखने को कहा.
इससे कुछ दिन पहले, मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने राज्य विधानसभा में यही आंकड़े पेश किए थे. उन्होंने कहा था कि यह उन गैंगस्टरों के खिलाफ अभियान का हिस्सा है, जो विदेश भाग गए थे.
कार्रवाई वही भाषा है जो अपराधी समझते हैं
पुलिस मुठभेड़ों को कुछ ऐसे समूहों से भी सराहना मिली है, जिनसे इसकी उम्मीद नहीं थी.
हरियाणा प्रदेश व्यापर मंडल के अध्यक्ष बजरंग दास गर्ग ने दिप्रिंट से कहा, “हरियाणा में शायद ही कोई दिन ऐसा जाता हो जब किसी न किसी को फिरौती की कॉल न आती हो. आज भी महम के पूर्व विधायक बलराज कुंडू ने फिरौती की कॉल को लेकर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है.” गर्ग, कांग्रेस के हिसार अध्यक्ष भी हैं.
उन्होंने आगे कहा, “मैं इसे सीधी भाषा में कहूंगा—पुलिस को अपराधियों से उसी भाषा में बात करनी चाहिए जो वे समझते हैं, ताकि शांति पसंद लोग बिना डर के रह सकें और व्यापारी बिना उगाही के डर के अपना कारोबार कर सकें.”
लेकिन रास्ते में रुकावटें भी आई हैं.
जनवरी के मध्य में, एक पुलिस टीम ने दावा किया कि झज्जर में चार बदमाशों के साथ उनकी गोलीबारी हुई, जिसमें एक के पैर में गोली लगी. बाद में पता चला कि घायल व्यक्ति दिगल गांव के एक भाजपा पदाधिकारी का बेटा था.
इस मुठभेड़ को “फर्ज़ी” बताते हुए भाजपा पदाधिकारी ने आरोप लगाया कि उसके बेटे की एक होटल में पुलिसकर्मियों से बहस हुई थी, जिसके बाद उसे उठा लिया गया और पुलिस ने पकड़कर उसके पैर में गोली मार दी.
आरोपों की जांच के लिए बनाई गई विशेष जांच टीम (एसआईटी) ने बाद में निष्कर्ष निकाला कि यह “तथ्य की गलती” थी. इस मामले में हिरासत में लिए गए दो लोगों, जिनमें घायल व्यक्ति भी शामिल था, को अदालत के आदेश पर रिहा कर दिया गया, जब पुलिस ने अपनी गलती मानते हुए आवेदन दाखिल किया.
ऐसी कार्रवाई की आलोचना करने वाली आवाजों ने कहा है कि “हाफ-एनकाउंटर”—जैसा कि पुलिस और अपराधी जगत में इन्हें कहा जाता है—उत्तर प्रदेश से प्रेरित हैं.
पिछले महीने, उत्तर प्रदेश में मुठभेड़ों का मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचा. अदालत ने ऐसी ही कार्रवाइयों पर कड़ी नाराज़गी जताई और कहा कि यूपी पुलिस के अधिकारी “सराहना, समय से पहले पदोन्नति और सोशल मीडिया की तालियों” के लिए घुटने के नीचे गोली चला रहे हैं.
अदालत ने पुलिस को चेतावनी दी कि अगर मुठभेड़ों पर सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन हुआ, तो एसपी, एसएसपी और पुलिस आयुक्त व्यक्तिगत रूप से अवमानना के लिए जिम्मेदार होंगे. अदालत ने यह भी दोहराया कि सज़ा देना न्यायपालिका का काम है, पुलिस का नहीं.
सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश और विशेषज्ञ क्या कहते हैं
सुप्रीम कोर्ट के 2014 के फैसले पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ (पीयूसीएल) बनाम महाराष्ट्र राज्य में 16 बाध्यकारी दिशा-निर्देश तय किए गए थे, ताकि ‘फर्ज़ी’ मुठभेड़ों को रोका जा सके और यह सुनिश्चित किया जा सके कि हर पुलिस फायरिंग जिसमें मौत या गंभीर चोट हो, उसकी पारदर्शी और स्वतंत्र जांच हो.
इनमें जांच को एक स्वतंत्र टीम को सौंपना, अनिवार्य मजिस्ट्रेट जांच, राज्य या राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को तुरंत रिपोर्ट भेजना, हथियारों को बैलिस्टिक और फॉरेंसिक जांच के लिए जमा करना, घायल को तुरंत मेडिकल सहायता देना और अगर वह बोल सकता है तो मजिस्ट्रेट के सामने उसका बयान दर्ज करना और जांच पूरी होने तक तुरंत वीरता पुरस्कार या पदोन्नति पर सख्त रोक शामिल है.
गैर-घातक मामलों में भी, सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि गंभीर रूप से घायल लोगों के मामले में भी ये सुरक्षा उपाय “जहां तक संभव हो” लागू होते हैं.
सेवानिवृत्त आईपीएस प्रकाश सिंह, जिन्होंने सीमा सुरक्षा बल, उत्तर प्रदेश और असम पुलिस का नेतृत्व किया था, उन्होंने दिप्रिंट को बताया कि बात यह नहीं है कि कितने मामलों में अपराधियों के पैरों में गोली लगी, बल्कि यह है कि पुलिस दिशा-निर्देशों का पालन कर रही है या नहीं.
सिंह ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश बहुत साफ और विस्तार से बताए गए हैं. सवाल यह है कि हरियाणा पुलिस उनका पालन कर रही है या नहीं, जहां तक यूपी पुलिस की बात है, वह हमेशा कहती रही है कि वह इन दिशा-निर्देशों का पालन कर रही है और ऐसे सभी मामलों में अनिवार्य मजिस्ट्रेट जांच कराती है.”
हरियाणा पुलिस के पूर्व प्रमुख के.पी. सिंह ने कहा कि कानून पुलिस को अपराधियों को पकड़ने के लिए बल प्रयोग करने की अनुमति देता है. उन्होंने जोर देकर कहा कि गिरफ्तारी के लिए न्यूनतम बल का इस्तेमाल होना चाहिए.
सिंह ने कहा, “जब पुलिस किसी अपराधी के पैर में गोली मारती है, तो उसका मकसद उसे असमर्थ करना होता है ताकि वह जवाबी हमला न कर सके या भाग न सके. यह पहले भी होता रहा है और इसमें कुछ नया नहीं है.”
हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि अगर यह रुझान बढ़ा है, तो यह जांच का विषय है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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