मुंबई: एक तरफ 35.95 हेक्टेयर जंगल की जमीन, 18,024 पेड़, 60 बाघ और 650 गांव हैं.
दूसरी तरफ 54 मीटर गहरी खदान, सालाना करीब 1 लाख टन आयरन ओर का उत्पादन, कुछ सड़कें और 120 नौकरियां हैं.
महाराष्ट्र सरकार ने ताडोबा-अंधारी टाइगर रिज़र्व और घोड़ाजारी सैंक्चुअरी के पास एक वाइल्डलाइफ़ कॉरिडोर पर आयरन ओर प्रोजेक्ट को मंज़ूरी दे दी है. इसके बाद चिंता बढ़ गई है. पर्यावरण कार्यकर्ताओं को डर है कि चंद्रपुर जिले के ब्रह्मपुरी डिवीजन में खनन से 18,000 से ज्यादा पेड़ काटे जाएंगे और वहां मौजूद करीब 60 बाघों को अपना इलाका छोड़ना पड़ सकता है.
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की अध्यक्षता वाले स्टेट बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ ने 6 जनवरी को इस प्रोजेक्ट के प्रस्ताव की सिफारिश की. यह फैसला बोर्ड की एक विशेषज्ञ समिति के कड़े विरोध के बावजूद लिया गया.
एक महीने से ज्यादा समय से कार्यकर्ता इस प्रोजेक्ट के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं. पिछले हफ्ते बॉम्बे हाई कोर्ट ने खुद संज्ञान लेते हुए इस मामले को उठाया और वकील गोपाल मिश्रा को एमिकस क्यूरी नियुक्त किया. अदालत ने मिश्रा से कहा कि दो हफ्ते के अंदर याचिका दाखिल करें.
महाराष्ट्र के अतिरिक्त मुख्य सचिव वन मिलिंद म्हैसकर ने दिप्रिंट से कहा कि SBWL की भूमिका केवल सिफारिश देने की होती है.
उन्होंने कहा, “प्रस्ताव की SBWL ने विस्तार से जांच की थी. साथ ही उस तकनीकी समिति की सिफारिशों पर भी गंभीरता से विचार किया गया था, जिसे खास तौर पर इस प्रस्तावित खनन परियोजना के पर्यावरण और वन्यजीव प्रभाव का आकलन करने के लिए बनाया गया था.”
उन्होंने आगे कहा, “तकनीकी समिति ने पूरी जांच के बाद माना कि इस इलाके में इंसान और जानवर के बीच संभावित टकराव को लंबे समय में कम करने के लिए मौजूदा वन्यजीव कॉरिडोर को मजबूत करना और बाघ क्षेत्र के अतिरिक्त हिस्सों को राज्य के संरक्षित क्षेत्र नेटवर्क में शामिल करना प्रभावी तरीका हो सकता है.”
उन्होंने बताया कि तकनीकी समिति ने करीब 35,000 हेक्टेयर में एक नया वन्यजीव अभयारण्य घोषित करने की सिफारिश की है. यह इलाका प्रोजेक्ट के क्षेत्र से लगभग हजार गुना बड़ा है और एकरा कंजर्वेशन रिजर्व और घोड़ाजारी वाइल्डलाइफ सैंक्चुरी के बीच के महत्वपूर्ण कॉरिडोर को कवर करेगा. उन्होंने कहा कि SBWL ने इस सिफारिश को स्वीकार किया और प्रोजेक्ट पर विचार इसी सख्त शर्त के साथ किया.
म्हैसकर ने कहा, “इसलिए यह स्पष्ट किया जाता है कि SBWL ने इस प्रोजेक्ट को मंजूरी नहीं दी है, जैसा कि मीडिया के कुछ हिस्सों में गलत तरीके से दिखाया गया है. सिफारिश शर्तों के साथ थी और इसमें बड़े संरक्षण संबंधी वादे शामिल थे. अंतिम मंजूरी या अस्वीकृति का अधिकार केवल नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ के पास है, जो लागू कानून और तय प्रक्रिया के अनुसार स्वतंत्र और सूचित फैसला करेगा.”
राज्य के वन मंत्री गणेश नाइक ने मंगलवार तक कई बार संपर्क करने के बावजूद कोई जवाब नहीं दिया.
प्रोजेक्ट क्या है
यह प्रोजेक्ट नागपुर की निजी स्टील कंपनी सनफ्लैग आयरन एंड स्टील कंपनी लिमिटेड को दिया गया है. इसके लिए 35.95 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि को डायवर्ट करना होगा. SBWL की विशेषज्ञ समिति के अनुमान के अनुसार, ब्रह्मपुरी में खनन के लिए 18,024 पेड़ काटने पड़ेंगे.
पर्यावरण कार्यकर्ताओं का मानना है कि जिस इलाके में ओपन कास्ट माइन बनाई जानी है, वहां 5 से 6 बाघ घूमते हैं. उनका डर है कि पूरे इलाके पर असर पड़ेगा और करीब 60 बाघों को विस्थापित होना पड़ सकता है. उनका कहना है कि इससे आसपास के 650 गांवों में इंसान और जानवर के बीच टकराव बढ़ सकता है.
समिति की रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रोजेक्ट से 120 लोगों को रोजगार मिलेगा, जिनमें से केवल 32 स्थायी नौकरियां होंगी.
चंद्रपुर के रहने वाले पर्यावरण कार्यकर्ता, पूर्व वन्यजीव वार्डन और SBWL के पूर्व सदस्य बांदू धोत्रे ने कहा, “सरकार इस इलाके में बढ़ रहे इंसान और जानवर के टकराव को कैसे नजरअंदाज कर रही है. बाघ कॉरिडोर में खनन परियोजना बहुत खतरनाक है. इससे टकराव बढ़ेगा. इसलिए हम इस प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे हैं.”
महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में स्थित चंद्रपुर में घने जंगल हैं. यहां बड़ा जुड़ा हुआ जंगल क्षेत्र है जो टाइगर रिजर्व बनाता है और जिले के अलग अलग हिस्सों में फैला है. कार्यकर्ताओं का मानना है कि जिले में कुल 250 बाघ हैं, जिनमें से कई शिकार और पानी की तलाश में एक जंगल से दूसरे जंगल जाते हैं. ब्रह्मपुरी डिवीजन न केवल बाघ कॉरिडोर है बल्कि यहां बहावा, तेंदू, सागौन, आंवला और महुआ जैसे कई पेड़ों की प्रजातियां भी हैं.
सनफ्लैग आयरन एंड स्टील कंपनी लिमिटेड, जो भारत की बड़ी स्टील कंपनियों में से एक है, को यह प्रोजेक्ट पिछले महीने राज्य सरकार ने दिया था. कंपनी भंडारा में एक इंटीग्रेटेड आयरन ओर माइनिंग और स्टील मैन्युफैक्चरिंग प्लांट चलाती है, जो ब्रह्मपुरी से करीब 100 किलोमीटर दूर है.
समिति की रिपोर्ट के अनुसार, यह प्लांट हर साल 5 लाख टन स्टील बनाता है, जो ब्रह्मपुरी में प्रस्तावित खनन से करीब पांच गुना ज्यादा है. इसका ज्यादातर स्टील टाटा, वोल्वो, टीवीएस, मारुति सुजुकी, बजाज और हार्ले डेविडसन जैसी ऑटोमोबाइल कंपनियों को सप्लाई होता है.
ब्रह्मपुरी में यह आयरन ओर प्रोजेक्ट लोहर्डोंगरी गांव के पास प्रस्तावित है. इसके लिए करीब 36 हेक्टेयर वन क्षेत्र को डायवर्ट करना होगा और अतिरिक्त 8 हेक्टेयर जमीन सहायक ढांचे और सड़क निर्माण के लिए चाहिए होगी. खदान 54 मीटर गहरी होगी और 12 साल में कुल 1.1 मिलियन टन उत्पादन का अनुमान है, यानी सालाना 1 लाख टन से कम.
धोत्रे ने पूछा, “गढ़चिरौली सुरजगढ़ में पहले से ही इतना खनन हो रहा है. फिर वे इस छोटी खदान के पीछे क्यों पड़े हैं.”
कंपनी ने मंगलवार तक कई बार संपर्क करने के बावजूद कोई जवाब नहीं दिया.
पूर्व राज्य पर्यावरण मंत्री आदित्य ठाकरे भी इस विवाद में शामिल हुए और पिछले महीने उन्होंने केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को पत्र लिखा.
उन्होंने लिखा, “ये प्रोजेक्ट उन जंगलों और वहां रहने वाले वन्यजीवों दोनों के लिए नुकसानदेह हैं. मैं आपसे आग्रह करता हूं कि इन जंगलों और वाइल्डलाइफ़ की रक्षा करें. मैं विनम्र निवेदन करता हूं कि नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ में इन प्रोजेक्ट्स पर दोबारा विचार करें और इन्हें खारिज करें. हमारे जंगलों और वाइल्डलाइफ़ का भविष्य अब आपके हाथ में है.”

पैनल ने ‘अपूरणीय नुकसान’ की चेतावनी दी
आयरन ओर प्रोजेक्ट, हालांकि इस साल अलॉट हुआ है, कुछ समय से इस पर विचार किया जा रहा है.
अक्टूबर 2023 में एसबीडब्ल्यूएल ने तीन सदस्यीय विशेषज्ञ समिति बनाई थी. इसमें चंद्रपुर के मुख्य वन संरक्षक डॉ. जितेंद्र रामगांवकर और राज्य वन्यजीव बोर्ड के सदस्य प्रवीण सिंह परदेशी और पूनम धनवात्रे शामिल थे.
समिति ने अपनी पहली रिपोर्ट 24 जनवरी 2024 को राज्य बोर्ड को सौंपी. और अधिक जानकारी देने के निर्देश के बाद, अगस्त 2024 में इसने एक विस्तृत रिपोर्ट जमा की.
अंतिम रिपोर्ट में समिति ने कड़े शब्दों में कहा, “इस जंगल में किसी भी तरह की खनन गतिविधि से पर्यावरण और वन्यजीवों को अपूरणीय नुकसान होगा, बड़े पेड़ों की भारी कटाई होगी और हवा व पानी में बहुत प्रदूषण फैलेगा. जंगल के टुकड़े टुकड़े होने से इंसानों और बड़े मांसाहारी जानवरों के बीच टकराव बढ़ेगा और इंसानों, उनके रहने की जगहों और वन्यजीवों के लिए खतरा और बढ़ जाएगा.”
रिपोर्ट में कहा गया कि सिंचाई परियोजनाओं और सड़क चौड़ीकरण जैसे विकास कार्यों से इलाके का भू दृश्य पहले ही टूट चुका है. इससे बड़े मांसाहारी जानवर सीमित इलाकों में फंस गए हैं और उन्हें “लोगों के साथ मिलकर रहने के लिए मजबूर होना पड़ा है, जिससे इंसान और बड़े मांसाहारी जानवरों के बीच टकराव अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है.”
कमेटी ने प्रोजेक्ट की सिफारिश नहीं की, लेकिन उसने इसके खिलाफ भी साफ तौर पर सलाह नहीं दी. इसके बजाय, उसने कुछ सिफारिशें कीं कि क्या प्रोजेक्ट को नेशनल वाइल्डलाइफ बोर्ड से मंजूरी मिलनी चाहिए.
समिति ने कहा कि “परियोजना की समीक्षा केवल टिकाऊपन, लागत लाभ अनुपात और वन्यजीव कॉरिडोर की अखंडता बनाए रखने के आधार पर ही की जानी चाहिए.”
इसमें कहा गया कि “प्रोजेक्ट का रिव्यू सिर्फ़ सस्टेनेबिलिटी, कॉस्ट बेनिफिट रेश्यो और वाइल्डलाइफ कॉरिडोर की इंटीग्रिटी बनाए रखने के आधार पर किया जाना चाहिए.” इसमें यह भी सुझाव दिया गया कि NBWL को प्रोजेक्ट को मंज़ूरी देने पर तभी विचार करना चाहिए जब घोड़ाजारी सैंक्चुअरी से एकारा कंज़र्वेशन रिज़र्व तक के जंगल के हिस्से को वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी घोषित कर दिया जाए। इसमें कहा गया कि प्लान की गई खदान का एरिया प्रस्तावित सैंक्चुअरी में शामिल होना चाहिए.
डॉ. रामगांवकर ने दिप्रिंट को बताया कि कोई भी डेवलपमेंट प्रोजेक्ट इलाके की इकोलॉजी को नुकसान पहुंचाएगा.
रामगांवकर ने कहा, “यह बिल्कुल साफ है कि पारिस्थितिक दृष्टि से यह बहुत महत्वपूर्ण इलाका है. बस एक ही राहत की बात है कि अगर हमारी सिफारिशें लागू होती हैं, तो कुछ हद तक नुकसान कम किया जा सकता है. लेकिन देखिए, कोई भी खनन परियोजना नकारात्मक असर डालेगी और इसे राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के साथ तौला जाना चाहिए, जिस पर हम टिप्पणी नहीं कर सकते.”
रिपोर्ट में स्थानीय लोगों की चिंताओं का भी जिक्र है, लेकिन यह नहीं बताया गया कि समिति ने कितने लोगों से बात की. कुछ स्थानीय लोगों को उम्मीद है कि उन्हें स्थायी रोजगार मिलेगा, लेकिन उन्हें वन्यजीवों से टकराव, प्रदूषण और स्वास्थ्य पर असर का डर भी है.

कार्यकर्ताओं को टकराव बढ़ने का डर
ताडोबा में संरक्षित क्षेत्र लगभग 1,700 वर्ग किलोमीटर में फैले हैं और यहां करीब 92 गांव हैं, जो बड़े और लगभग जुड़े हुए जंगल क्षेत्र में बसे हैं.
लेकिन ब्रह्मपुरी डिवीजन, जहां यह परियोजना प्रस्तावित है, वन संरक्षण अधिनियम के तहत संरक्षित नहीं है. यह करीब 1,100 वर्ग किलोमीटर में फैला है और इसमें बिखरे हुए जंगलों के बीच लगभग 650 गांव हैं.
यह इलाका इसलिए भी बहुत ज़रूरी है क्योंकि यह ताडोबा रिज़र्व से करीब 20 km दूर घोड़ाज़री वाइल्डलाइफ़ सैंक्चुअरी के पास है. धोत्रे के मुताबिक, यहां पानी की ऐसी जगहें हैं जो बाघों और लोकल लोगों, दोनों के लिए पानी का ज़रिया हैं.
विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट में इस जगह को “ताडोबा अंधारी टाइगर रिजर्व में मौजूद बाघों की मुख्य आबादी को ब्रह्मपुरी गढ़चिरौली इलाके और उत्तर के बाघ वाले जंगलों से जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण बाघ कॉरिडोर” बताया गया है.
पिछले महीने केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को लिखे पत्र में धोत्रे ने कहा कि ताडोबा रिजर्व के कोर और बफर जोन में 90 बाघ हैं, जबकि ब्रह्मपुरी डिवीजन में 65 वयस्क बाघ हैं. इनमें 43 मादा बाघ, 59 शावक और 12 किशोर बाघ शामिल हैं. उन्होंने कहा कि लोहाड़ोंगरी इलाके में खास तौर पर दो मादा बाघ हैं, जिनमें से एक के साथ शावक है, और तीन वयस्क नर बाघ हैं.
बाघों के अलावा यहां 8 से 10 तेंदुए, 5 से 7 भालू, जंगली कुत्ते, जंगली बिल्लियां, लकड़बग्घे, हिरण, खरगोश, बंदर, जंगली सूअर और कई पक्षी प्रजातियां पाई जाती हैं. यह इलाका औषधीय पौधों, फलदार पेड़ों, जल स्रोतों और झीलों से भरपूर है.
स्थानीय लोगों को डर है कि अगर जंगल में छेड़छाड़ हुई तो इंसान और जानवरों के बीच टकराव और बढ़ेगा.
धोत्रे ने कहा, “2025 में चंद्रपुर जिले में बाघों के हमलों में 47 मौतें दर्ज हुईं. एक साल के अंदर ब्रह्मपुरी डिवीजन में बाघों से जुड़े टकराव में कम से कम 18 लोगों की मौत हुई, और 10 बाघों को पकड़कर हटाना पड़ा.”
उन्होंने समझाया कि जैसे जैसे बाघों की संख्या बढ़ती है और शावक बड़े होते हैं, उन्हें नया इलाका चाहिए होता है. जंगल सिमट रहे हैं, इसलिए उनके पास जाने की जगह नहीं बचती.
उन्होंने कहा, “हम चाहते हैं कि सरकार हमें इस मुसीबत से राहत दे. हम पर हमले हो रहे हैं और यहां लोग डर और तनाव में जी रहे हैं. पिछले 15 साल से यहां लॉकडाउन जैसी स्थिति है.”
धोत्रे ने कहा कि उनका खनन विरोध विकास बनाम पर्यावरण का मुद्दा नहीं है.
“विकास का सवाल तब उठता है जब लौह अयस्क के लिए कोई और जगह न हो और लोहाड़ोंगरी ही एकमात्र स्रोत हो. लेकिन यहां से 100 किलोमीटर दूर गढ़चिरोली क्षेत्र में खनन चल रहा है,” उन्होंने कहा.
रामगांवकर के अनुसार, पर्यावरण पर चर्चा करते समय इलाके के लोगों की आर्थिक आकांक्षाओं को भी ध्यान में रखना चाहिए.
उन्होंने कहा, “तकनीकी विभाग के तौर पर हमारी भूमिका नुकसान को कम करना है. इसलिए वही किया गया है. और पर्यावरण और विकास के बीच संतुलित नजरिया अपनाने की जरूरत है.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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