इस दुनिया में कुछ ही बातें तय हैं. सिवाय मौत, टैक्स और उस खतरनाक रेगुलरिटी के जिससे बेहूदा इंडियन टूरिस्ट वायरल होते हैं.
कभी वे एक हफ्ते रोहतांग पास पर बिना कपड़ों के डांस करते दिखते हैं. अगले हफ्ते थाईलैंड में ट्रांस सेक्स वर्कर्स से पिटते नजर आते हैं. उसके अगले हफ्ते लंदन की मेट्रो में तेज म्यूजिक बजाते दिख जाते हैं. और लगभग हर कुछ समय में गोवा इन वायरल हरकतों का भरोसेमंद मंच बन जाता है. लेकिन पिछले हफ्ते आखिरकार एक अच्छी खबर आई.
5 फरवरी को गोवा पुलिस ने, शायद सब्र की हद पर पहुंचकर, ऐलान किया कि जो भी लोग जबरदस्ती टूरिस्ट्स के साथ सेल्फी लेते पकड़े जाएंगे, उन्हें 24 घंटे तक हिरासत में रखा जाएगा. तमिलनाडु के दो लोगों को तुरंत बागा बीच पर गिरफ्तार किया गया. यह कार्रवाई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 170 के तहत हुई, जो पुलिस को बिना वारंट गिरफ्तारी का अधिकार देती है.
यह कदम उन महीनों पुराने वायरल वीडियो के बाद आया है, जिनमें साफ दिख रहा था कि गोवा के लोग अब तंग आ चुके हैं. पिछले गुरुवार को एक व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज किया गया, जिसने कलंगुट बीच पर तैर रही एक विदेशी महिला का वीडियो बनाया और उसे सोशल मीडिया पर फैलाया. उसके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 79 (महिला की गरिमा भंग करना) और 356(2) (मानहानि) के तहत एफआईआर दर्ज की गई. पिछले हफ्ते ओडिशा के दो पर्यटकों को भी एक रूसी महिला को परेशान करने के आरोप में हिरासत में लिया गया.
ये तो सिर्फ वही मामले हैं, जो प्रशासन की नजर में आएं. हकीकत यह है कि गोरी महिला टूरिस्ट्स के पास मैचिंग कपड़ों में घूमते पुरुषों के झुंड का आ जाना बेहद आम बात है. उनके हाथ में पहले से सेल्फी कैमरा चालू रहता है. ज्यादातर महिलाएं मजबूरी में हामी भर देती हैं, कभी शिष्टाचार के कारण, तो कभी उस स्थिति से निकलने के लिए. लेकिन अक्सर फोटो सिर्फ बहाना होता है, ताकि महिला को गलत तरीके से छुआ जा सके.
पिछले हफ्ते कलंगुट बीच पर एक महिला को पुरुषों ने घेर लिया. महिला साफ तौर पर असहज दिख रही थी. पुरुष उसके कंधों पर हाथ डाल रहे थे और उसके शरीर को गलत तरीके से छू रहे थे. उनमें से एक आदमी फोटो खिंचवाने की इतनी जल्दी में था कि उसने अपने बच्चे को रेत में गिरा दिया. एक और घटना में, एक व्यक्ति ने खुद का वीडियो बनाया, जिसमें वह बीच पर विदेशी महिलाओं के पास जाकर बिना पूछे उनका हाथ मिलाता है और उन्हें घुमाने की कोशिश करता है. कई महिलाएं उसे नजरअंदाज करती रहीं, फिर भी वह वीडियो बनाता रहा.
जब इस तरह का बर्ताव बिना रोक-टोक चलता रहता है, तो ऐसे पुरुष खुद को और ज्यादा हकदार समझने लगते हैं. कुछ हफ्ते पहले एक वीडियो सामने आया, जिसमें एक आदमी नशे में एक महिला का रास्ता रोकता है और उसके मुंह में एक नोट (पैसे) होता है. जब महिला ने विरोध किया, तो वह गुस्से में अश्लील इशारे करने लगा. नवंबर में मुंबई की 19 साल की एक इन्फ्लुएंसर को, जिसे विदेशी समझ लिया गया था, बागा बीच पर परेशान किया गया. कई पुरुष उसके पास आए और उससे वही पारंपरिक भारतीय सवाल पूछा, “कितना.”
इस तरह के बर्ताव को अक्सर गोवा की “दिल्लीफिकेशन” कहा जाता है. दिल्ली के पुरुषों को जो बेइज्ज़ती झेलनी पड़ती है, वे उसके हकदार हैं. लेकिन दूसरे राज्यों के पुरुष भी कुछ बेहतर नहीं हैं. कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश से आने वाले पुरुष गोवा में टूरिस्ट महिलाओं को परेशान करने ऐसे आते हैं, जैसे यह फैशन हो. लेकिन बदनामी गोवा के हिस्से आती है. ट्रैवल एडवाइजरी में गोवा का नाम जाता है. और विदेशी महिलाएं गोवा के बीचों से दूरी बनाना सीखती हैं.
उन्हें सलाखों के पीछे डालो
लेकिन यह कहानी गोवा पर खत्म नहीं होती. असल में, यहीं से डरावना सपना शुरू होता है. यह राज्य अब उस किस्म के भारतीय पुरुषों के लिए एक रिहर्सल ग्राउंड बन गया है, जो विदेश जाने से पहले अपने ही देश में “विदेशीपन” की प्रैक्टिस करना चाहते हैं. और फिर वे इसे विदेशों में एक्सपोर्ट भी करते हैं.
इंडियन टूरिस्ट ने दुनिया भर में इतनी ज़बरदस्त पहुंच बना ली है कि थाई स्पा ने उन्हें “खराब बर्ताव” के लिए ब्लैकलिस्ट करना शुरू कर दिया है और ग्रीस के बीच क्लबों ने हमें एंट्री देने से मना करना शुरू कर दिया है. चाहे वह कलंगुट हो या कोह फा नगन: विदेशी महिलाओं और विदेशी जगहों को इज्ज़त की हकदार चीज़ों की तरह नहीं, बल्कि दुनियादारी दिखाने के लिए एक सहारा माना जाता है जिसे अपने देश में रिकॉर्ड करके दिखाया जाना है.
इस सबका नतीजा यह है कि हम जैसे बाकी लोग, जो सम्मान से यात्रा करते हैं, सहमति और निजी स्पेस की अहमियत समझते हैं, सेकेंड-हैंड शर्म के साथ घूमते हैं. इमिग्रेशन पर हमें घूरकर देखा जाता है. होटलों में हमें जज किया जाता है. सिर्फ इसलिए क्योंकि हमारे जैसे दिखने वाले पुरुष बार-बार साबित कर चुके हैं कि वे ढंग से पेश नहीं आ सकते.
बुनियादी शालीनता की अपील नाकाम हो चुकी है. शर्म अब असर नहीं करती. कभी भारतीय सरकार ने “अतिथि देवो भव” अभियान पर करोड़ों रुपये खर्च किए थे, ताकि हमें अच्छा मेज़बान बनना सिखाया जा सके. लेकिन साफ है कि वे सबक कहीं टिके नहीं. और पुलिसिंग हमेशा प्रतिक्रियात्मक होती है, क्योंकि शिकायत दर्ज होने तक उत्पीड़न हो चुका होता है.
तो अब हम यहां खड़े हैं. भारतीय पुरुषों को सुधारने वाला “जेंटल पेरेंटिंग” तरीका पूरी तरह फेल हो चुका है. अब जरूरत है उन्हें काबू में रखने की एक व्यवस्थित रणनीति की. जब पारंपरिक तरीके बेअसर साबित हो चुके हैं, तो जाहिर है कि कुछ ज्यादा रचनात्मक उपायों की जरूरत है. तो इस समस्या को संभालने का एक “मामूली प्रस्ताव” आखिर कैसा हो सकता है.
चलिए, विदेशी टूरिस्ट के आने-जाने वाली सभी टूरिस्ट जगहों पर कांच के पिंजरे लगाना ज़रूरी कर देते हैं. बेशक, हवादार. भारतीय पुरुष टूरिस्ट इन बाड़ों के अंदर से नज़ारे देख सकते हैं, जिससे कोई भी “गलती से” उनके पास न आ जाए. बेशक, यह बहुत ज़्यादा रोक-टोक वाला लग सकता है, तो महिलाओं के चारों ओर तीन मीटर के दायरे में एक दिखाई न देने वाली इलेक्ट्रिक बाड़ लगाने के बारे में क्या ख्याल है? जब आप इस दायरे को तोड़ते हैं तो लगने वाले झटकों को सीखने का मौका समझें.
पुरुषों के लिए निगरानी
फिर भी, सही सर्टिफिकेशन के बिना तकनीक भी बहुत कुछ नहीं कर सकती. भारत के सभी टूरिस्ट स्थलों पर एक बुनियादी सहमति परीक्षा अनिवार्य की जानी चाहिए, जिसमें मल्टीपल चॉइस सवाल हों. उदाहरण के लिए.
एक महिला महल के परिसर में चल रही है. आप क्या करेंगे.
- उससे सेल्फी के लिए बीच में रोकेंगे.
- उससे उसका “डेली रेट” पूछेंगे.
- उसे पूरी तरह अकेला छोड़ देंगे.
पास होने का स्कोर 100 प्रतिशत तय हो, बिना किसी छूट के. और शायद तभी आपको होटल के कमरे की चाबी मिले.
यह तभी काम करेगा जब इसे 360 डिग्री तरीके से लागू किया जाए, इसलिए निगरानी का सहारा लेना होगा. सभी पुरुष पर्यटकों के लिए अनिवार्य बॉडीकैम, जिसकी फुटेज सीधे स्थानीय पुलिस को लाइव दिखाई जाए. और उनकी पत्नियों को भी. जियो-फेंसिंग तकनीक, जो किसी भी महिला के दस फीट के भीतर पहुंचते ही आपके फोन का कैमरा अपने आप बंद कर दे. एआई आधारित सेंटिमेंट एनालिसिस यह पहचान कर अलर्ट भेज सके कि आप किसी अनिच्छुक व्यक्ति की ओर बढ़ रहे हैं. संभावनाएं अनगिनत हैं.
बेशक, इन सबके लिए फंडिंग चाहिए. एयरपोर्ट पर पहले ही वसूला जाने वाला 50,000 रुपये का “उत्पीड़न टैक्स” उचित लगता है. यह भारतीय पुरुषों के संभावित खराब व्यवहार के खिलाफ एक तरह की इंश्योरेंस डिपॉजिट होगी. पीक फॉरेन टूरिस्ट घंटों के दौरान सर्ज प्राइसिंग लागू की जा सकती है. विदेशी महिलाओं वाले किसी भी स्पेस के आसपास भारतीय पुरुषों की मौजूदगी को अपने आप कैलकुलेट कर बिल किया जा सकता है. यह सारा डेटा एक अंतरराष्ट्रीय “डू नॉट एडमिट” ब्लैकलिस्ट में साझा किया जा सकता है.
जो बिल्कुल न सुधरने वाले हों, उनके लिए चैपरोन प्रोग्राम भी है. शायद भारतीय पुरुषों के व्यवहार पर सच में काबू पाने का एकमात्र तरीका यह हो कि हर यात्रा में उनकी मां उनके साथ जाए. अगर वे किसी अजनबी से बात करना चाहें, तो पहले मम्मी से अनुमति लें.
इनमें से कोई भी सुझाव उतना बेतुका नहीं है, जितना भारतीय पुरुषों का असली, दर्ज किया गया व्यवहार है. दशकों बीत चुके हैं, लेकिन अब तक बात समझ में नहीं आई है. महिलाएं—चाहे विदेशी हों या कोई भी—उस साज-सज्जा का हिस्सा नहीं हैं, जिसे देखने का टिकट आपने खरीदा हो. आपकी छुट्टी एन्जॉय करने की आज़ादी वहीं खत्म हो जाती है, जहां किसी और का बिना परेशान हुए जीने का अधिकार शुरू होता है.
एक ही और वर्ग है, जो खुद को नियंत्रित नहीं कर सकता. छोटे बच्चे. कम से कम उनमें इतनी समझ तो होती है कि वे घर पर ही रहते हैं.
करनजीत कौर एक जर्नलिस्ट, Arré की पूर्व एडिटर और TWO Design में पार्टनर हैं. वह @Kaju_Katri पर ट्वीट करती हैं. विचार निजी हैं.
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