नई दिल्ली: यह देखते हुए कि भारतीय अदालतों में सभी विचाराधीन कैदियों को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार है, सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिल्ली हाई कोर्ट से कहा कि वह भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के पूर्व विधायक कुलदीप सेंगर की उस अपील को—जो 2017 के उन्नाव बलात्कार पीड़िता के पिता की हिरासत में मौत के मामले में उसकी दोषसिद्धि और 10 साल की सज़ा को चुनौती देती है—‘आउट ऑफ टर्न’ यानी तय क्रम से पहले सुने, ताकि मामले का जल्द निपटारा हो सके.
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अगुआई वाली तीन-जजों की सुप्रीम कोर्ट पीठ ने यह अनुरोध किया. पीठ सेंगर की उस अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें 19 जनवरी के हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें सज़ा को निलंबित करने और ज़मानत देने की मांग खारिज कर दी गई थी.
सेंगर के वकील, वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि सेंगर इस मामले में अपनी वास्तविक 10 साल की सज़ा में से सात साल से अधिक समय काट चुका है. दवे ने कहा कि लंबे समय तक जेल में रहने को देखते हुए सेंगर सज़ा निलंबन और ज़मानत के हकदार है.
हालांकि, शीर्ष अदालत ने सज़ा निलंबन पर अलग राय रखी.
न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और एन.वी. अंजारिया के साथ बैठी पीठ ने कहा कि पीड़िता के पिता की हिरासत में यातना और मौत से जुड़े मामले में सेंगर के खिलाफ आरोप ‘नैतिक अधमता’ वाले अपराधों के हैं और इसी आधार पर 10 साल की सज़ा निलंबित करने से इनकार किया.
फिर भी, पीठ ने मामले की तेज़ सुनवाई की ज़रूरत को स्वीकार किया.
यह देखते हुए कि हाई कोर्ट में सेंगर की अपील 11 फरवरी को सुनी जानी थी, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसे, हिरासत में यातना वाले मामले में सेंगर की सज़ा बढ़ाने की मांग वाली पीड़िता के परिवार की अपील के साथ, एक साथ सुना जाएगा और तेज़ प्रक्रिया में निपटाया जाएगा. इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने पीड़िता के वकील को हाई कोर्ट में मामले का उल्लेख करने की छूट दी.
शीर्ष अदालत ने कहा, “दिल्ली हाई कोर्ट एक हफ्ते के भीतर अपील ले. अगर हाई कोर्ट को लगे कि इसे सेंगर की दूसरी अपील के साथ तय किया जा सकता है, तो दोनों को साथ में सुनकर फैसला किया जा सकता है. अगर इसके लिए पीठ की संरचना बदलनी पड़े, तो वह भी किया जा सकता है.”
सेंगर उन्नाव गैंगरेप मामले में आजीवन कारावास की सज़ा भी भुगत रहा है. हाई कोर्ट ने पिछले साल 23 दिसंबर को गैंगरेप मामले में उसकी सज़ा निलंबित कर ज़मानत दी थी, लेकिन छह दिन बाद, जांच एजेंसी सीबीआई की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश पर रोक लगा दी.
आरोप है कि सेंगर के इशारे पर गिरफ्तार किए गए उन्नाव बलात्कार पीड़िता के पिता की 9 अप्रैल 2018 को पुलिस हिरासत में मौत हो गई थी. मार्च 2020 में, सेंगर समेत अन्य लोगों को इस मामले में दोषी ठहराते हुए 10 साल की सज़ा सुनाई गई थी.
गैंगरेप मामले में सेंगर पर आरोप है कि उसने 11 जून से 20 जून 2017 के बीच नाबालिग का अपहरण कर अन्य लोगों के साथ मिलकर उसका बलात्कार किया. इसके बाद कथित तौर पर उसे 60,000 रुपये में बेच दिया गया. इसके बाद पुलिस अधिकारियों ने लड़की को लगातार धमकाया और चुप रहने की चेतावनी दी.
विवाद तब और बढ़ गया जब बिना नंबर प्लेट वाले एक ट्रक ने उस कार को टक्कर मार दी, जिसमें पीड़िता और उनके वकील सवार थे. दोनों गंभीर रूप से घायल हुए और पीड़िता की दो मौसियों की मौत हो गई.
दिसंबर 2019 में सेंगर को दो मामलों में दोषी ठहराया गया—पीड़िता के बलात्कार के मामले में और उनके पिता की हिरासत में मौत के मामले में. बलात्कार मामले में सेंगर को आजीवन कारावास और हिरासत में मौत के मामले में 10 साल की सज़ा दी गई.
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में पेश होते हुए सेंगर के वकील दवे ने कहा कि हिरासत में मौत के मामले में कुछ सह-आरोपी ज़मानत पर हैं, इसलिए समानता के आधार पर सेंगर को भी ज़मानत मिलनी चाहिए.
दवे ने अदालत को बताया कि हाई कोर्ट के आदेश में कहा गया था कि नौ साल से ज्यादा जेल में रहने, जिसमें रिहाई की छूट (रिमिशन) भी शामिल है—को सज़ा निलंबन का आधार नहीं माना जा सकता.
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की पीठ की राय थी कि केवल जेल में बिताया गया समय ही सज़ा निलंबन का एकमात्र आधार नहीं हो सकता, खासकर तब जब अपील अंतिम सुनवाई के लिए पहले से सूचीबद्ध हो.
शीर्ष अदालत ने कहा, “हम सज़ा निलंबित क्यों करते हैं? सिर्फ तब, जब हमें यह स्पष्ट न हो कि अपील के निपटारे में कितना समय लगेगा.”
अदालत ने कहा कि जब अपील सूचीबद्ध हो चुकी है, तो सजा निलंबन का सवाल अपने-आप महत्वहीन हो जाता है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: भारत में इंसाफ का नया चेहरा: सेंगर, आसाराम, अखलाक के हत्यारों के लिए अलग कानून
