थांगस्को: बूमी राज राय 24 घंटे कार से सफर कर यहां पहुंचे. जेब में पैसे कम थे, उम्मीद ज्यादा थी. वह अपने भाई का शव लेकर नेपाल वापस जाना चाहते थे, लेकिन दो अस्पतालों के चक्कर लगाने और अधिकारियों से बात करने के बाद भी उन्हें अपने भाई का शव नहीं मिला. बूमी मान चुके हैं कि उनके भाई की मौत हो चुकी है, लेकिन वह अपने गांव में अंतिम संस्कार करना चाहते हैं.
बूमी राज के भाई कविराज राय उन 27 लोगों में शामिल थे, जिनकी 5 फरवरी को मेघालय के पूर्वी जयंतिया हिल्स के थांगस्को इलाके में एक अवैध कोयला खदान में धमाके में मौत हो गई. नौ मजदूर घायल हैं और अस्पताल में भर्ती हैं.
राय ने अपने भाई का पहचान पत्र हाथ में लेकर कहा, “एक रिश्तेदार से फोन आया कि यहां धमाका हुआ है, तभी मैं यहां के लिए निकल पड़ा. मुआवजे की बात सुनी है, लेकिन अभी तक शव नहीं मिला और नेपालियों के लिए मुआवजा देने की कोई व्यवस्था भी नहीं है.”
जिला पुलिस ने कार्रवाई शुरू कर दी है. कुछ विस्फोटक जब्त किए गए हैं और दो लोगों को गिरफ्तार किया गया है, लेकिन खदान में काम करने वाले मजदूर और स्थानीय लोग कहते हैं कि अवैध खनन सबको पता था.
खदान के एक मज़दूर ने दिप्रिंट को बताया, “यह अवैध कैसे है? अवैध वही होता है जिसे पुलिस गलत कहे. यहां हज़ारों लोग इन खदानों में काम करते हैं, पुलिस को पता है, नेताओं को पता है, इसलिए हम इसे अवैध नहीं मानते.”

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में रैट-होल खनन पर रोक लगा दी थी, फिर भी खनन जारी रहा. ठेकेदार बहुत गरीब पृष्ठभूमि के लोगों को काम पर रखते रहे. अब मेघालय हाई कोर्ट ने इस हादसे पर जिले से रिपोर्ट मांगी है.
मेघालय सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईस्ट जयंतिया हिल्स की इस घटना में मरने वालों के लिए क्रमशः 3 लाख रुपये और 2 लाख रुपये मुआवजे की घोषणा की है, लेकिन ज्यादातर पीड़ित नेपाली नागरिक थे और उनके लिए मुआवजे के नियम साफ नहीं हैं. कई परिवार नेपाल से यहां आए हैं, लेकिन प्रशासन अभी तक उनकी मदद का कोई रास्ता नहीं निकाल पाया है.
ज़िला कलेक्टर मनीष कुमार ने कहा, “हम मुआवजा बांट रहे हैं. नेपाल के नागरिकों के बारे में मुझे अपने वरिष्ठ अधिकारियों से पूछना होगा, क्योंकि इसमें कानूनी बातें और दूतावास भी जुड़ेगा. फिलहाल हम राज्य सरकार का मुआवजा दे रहे हैं और प्रधानमंत्री मोदी की ओर से आने वाला मुआवजा भी जल्द शुरू होगा.”

‘दवाइयों के लिए भी पैसे नहीं’
बीस साल की संजना पिछले चार दिनों से शिलांग के NIGRIM अस्पताल में हैं. वे अपने पति के लिए दुआ कर रही हैं, जो धमाके में शरीर के ऊपरी हिस्से में घायल हो गए हैं. दरअसल, संजना को ही दूसरे मजदूरों की मदद से अपने पति को कोयला ढोने वाले ट्रक में अस्पताल लाना पड़ा. उनके पास न पैसे हैं, न मोबाइल फोन और न ही कोई रिश्तेदार जो उनकी मदद कर सके.
संजना ने पास खड़ी उस स्थानीय महिला का हाथ पकड़ते हुए, जिन्होंने उनकी मदद की, कहा, “मेरे पास कोई पैसा नहीं है. डॉक्टर ने कुछ दवाइयां लाने को कहा था, तो मुझे इस ‘दीदी’ से पैसे उधार लेने पड़े. 2,000 रुपये थे, लेकिन वह कब तक मेरी मदद करेंगी?”
संजना के पति देब पिछले छह साल से कभी-कभी रैट-होल खदान में काम कर रहे थे. धमाके वाले दिन उनकी तबीयत ठीक नहीं थी, लेकिन ठेकेदार ने उन्हें काम पर जाने को मजबूर किया. संजना ने याद किया, “उन्होंने मुझे बताया था कि वह काम पर नहीं जाना चाहते थे, लेकिन जाना पड़ा.”
खनन के दौरान ब्लास्टिंग आम बात है, लेकिन संजना, जो खदान के मुहाने से सिर्फ 50 मीटर दूर रहती हैं, उन्होंने कहा कि उन्होंने कभी इतना तेज़ धमाका नहीं सुना था.
उन्होंने कहा, “मेरे हाथ से खाना गिर गया, आग बहुत ऊंची उठी, पत्थर गिरते रहे. हमारी झोपड़ी से बाहर निकलने में दो मिनट से ज्यादा लग गए. मैंने खदान से बिना सिर वाले शव निकलते देखे. यह बहुत डरावना था. मैं बस अपने पति का नाम चिल्ला रही थी.”
अब तक, उनके मुताबिक, उन्हें कोई सरकारी मदद नहीं मिली है. उनके पति त्रिपुरा से हैं, लेकिन उनके पास अधिकारियों को दिखाने के लिए कोई दस्तावेज़ नहीं है.
उन्होंने कहा, “मैंने उनके घर फोन किया, लेकिन वे हमारी मदद नहीं कर रहे हैं. मुझे सच में मदद चाहिए. मैं बस चाहती हूं कि वह ठीक हो जाएं.”

इसी अस्पताल में पांच और लोग भर्ती हैं—तीन आईसीयू में हैं और तीन वार्ड में. राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ) अभी भी धमाके वाली जगह पर ज़िंदा बचे लोगों और शवों की तलाश कर रहा है.
खनन स्थल पर मौजूद एनडीआरएफ के एक सूत्र ने कहा, “कल हमें कुछ नहीं मिला, लेकिन आज हम फिर तलाश करेंगे. मुझे लगता है कि कल तक यह ऑपरेशन खत्म हो जाएगा.”
मेघालय में खनन का इतिहास
2014 तक मेघालय में कोयला खनन पर कोई सख्त नियम नहीं थे. इसके बाद अवैज्ञानिक तरीके से खनन, मजदूरों की मौत और भारी पर्यावरण नुकसान की शिकायतों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी. नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने बड़े पैमाने पर पानी के प्रदूषण और असुरक्षित मजदूरी तरीकों का हवाला दिया था.
2019 में सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रतिबंध को बरकरार रखा और इस प्रथा को अवैध घोषित किया. हालांकि, निजी ज़मीन पर खनिज संसाधनों का स्वामित्व, कोयले पर आर्थिक निर्भरता और जयंतिया हिल्स में हज़ारों छोटी-छोटी, बिना नियम वाली खदानों के फैलाव के कारण इस रोक को लागू करना कमजोर ही रहा है.
सामाजिक कार्यकर्ता एग्नेस ने कहा, “ईस्ट जयंतिया हिल्स में रैट-होल खनन की सैकड़ों जगहें हैं. खदानों के अंदर मजदूरों को ले जाने वाली क्रेनों को आसानी से देखा जा सकता है. गूगल इमेजेज वहां हो रहे अवैध खनन की सच्चाई दिखाती हैं. जब भी जांच होती है, मजदूरों को बाहर जाने को कहा जाता है, लेकिन बाद में वे वापस आकर काम जारी रख देते हैं,” .
दशकों तक मेघालय में, खासकर जयंतिया हिल्स में, कोयला खनन रोजगार का एक बड़ा स्रोत रहा है. इसमें राज्य के भीतर से ही नहीं, बल्कि असम, बिहार और नेपाल से भी हज़ारों मजदूर काम करने आते थे. ज्यादातर खनन रैट-होल खदानों के जरिए होता था, जिन्हें निजी ज़मीन मालिक चलाते थे. मेघालय की खास भूमि स्वामित्व व्यवस्था में व्यक्ति और समुदाय के कबीले खनिज संसाधनों पर अधिकार रखते हैं, जिससे सरकार का सीधा नियंत्रण मुश्किल हो जाता है.
2022 में अवैध खनन और कोयला परिवहन की जांच के लिए हाई कोर्ट द्वारा बनाई गई जस्टिस बी. पी. काटेकी समिति ने बार-बार नियमों की कमी, बिना हिसाब का कोयला भंडार और कमजोर कार्रवाई की ओर इशारा किया है. इससे साफ होता है कि कानूनी रोक के बावजूद यह उद्योग इलाके की अर्थव्यवस्था और मजदूरी व्यवस्था में गहराई से जुड़ा रहा है.
समिति की 27 जनवरी को मेघालय हाई कोर्ट में सौंपी गई रिपोर्ट में कहा गया, “ऐसा लगता है कि खदान संचालकों, परिवहन करने वालों और अधिकारियों के बीच एक गठजोड़ है, जो अवैध खनन और कोयले की आवाजाही को संभव बनाता है. कई डिपो में घोषित मात्रा से कहीं ज्यादा बिना हिसाब का कोयला पाया गया है.”
रिपोर्ट में कहा गया, “जमीनी स्तर पर निगरानी और कार्रवाई की व्यवस्था बेहद कमज़ोर है. दूर-दराज के इलाकों में चोरी-छिपे अवैध खनन किया जा रहा है, जिसे लगातार निगरानी के बिना पकड़ना मुश्किल है.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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