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Monday, 9 February, 2026
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मीम्स से मार्च तक: जमात के खिलाफ सड़कों पर क्यों उतरीं बांग्लादेश की महिलाएं

चुनाव से पहले बांग्लादेश जमात प्रमुख की एक्स पोस्ट उलटी पड़ गई. ऐसे देश में, जहां महिलाओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा है, यह बहस शायद थोड़ी देर से शुरू हुई है.

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बांग्लादेश की बेहद बंटी हुई राजनीति में 12 फरवरी को होने वाले राष्ट्रीय चुनाव से पहले जमात-ए-इस्लामी के लिए सबसे बड़ा दुश्मन अब बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) नहीं, बल्कि अब उसका सामना बांग्लादेश की महिलाओं से है. ये महिलाएं जमात के अमीर यानी पार्टी प्रमुख डॉ. शफीकुर रहमान के खिलाफ सड़कों पर उतर आई हैं. आरोप है कि उन्होंने कामकाजी महिलाओं की तुलना ‘वेश्याओं’ से की.

ऐसे देश में, जहां महिलाओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा है — जनसंख्या और आवास जनगणना 2022 के अनुसार कुल आबादी में 8,73,90,000 महिलाएं और 8,42,00,000 पुरुष हैं — यह विवाद आने वाले चुनाव में जमात को भारी नुकसान पहुंचा सकता है.

हालांकि, रहमान के एक्स अकाउंट से वह पोस्ट हटा दी गई और जमात अमीर ने दावा किया कि उनका अकाउंट हैक हो गया था, लेकिन बीएनपी ने इसे तुरंत चुनावी मुद्दा बना लिया. पार्टी की महिला शाखा, जातीयताबादी महिला दल की कार्यकर्ता 2 फरवरी को ढाका में सड़कों पर उतरीं और अमीर की टिप्पणी के खिलाफ झाड़ू को विरोध के प्रतीक के रूप में दिखाया.

बीएनपी प्रमुख तारिक रहमान ने महिला मतदाताओं से अपील की कि वे महिलाओं के खिलाफ किए गए “अपमानजनक और शर्मनाक बयानों” के लिए जमात-ए-इस्लामी को मतदान के जरिए करारा जवाब दें.

लेकिन असली नेतृत्व बांग्लादेश की महिलाओं ने संभाल लिया है. बड़ी संख्या में महिलाएं सड़कों पर और यूनिवर्सिटी कैंपस में उतरीं, मीम्स फैलाए और टीवी टॉक शो में आकर जमात प्रमुख की कथित टिप्पणी के खिलाफ विरोध जताया. इससे उस देश में महिलाओं के भविष्य पर राष्ट्रीय बहस छिड़ गई है, जो तेज़ी से कट्टरता की ओर बढ़ रहा है.

दुर्भाग्य से, यह बहस शायद थोड़ी देर से हो रही है और नए बांग्लादेश में महिलाएं और ज्यादा हाशिये पर धकेले जाने के खतरे में हैं.

कामकाजी महिलाएं और अमीर

विवादित एक्स पोस्ट से पहले ही जमात अमीर अल जज़ीरा को दिए एक इंटरव्यू में महिलाओं को लेकर अपने विचारों के कारण आलोचना झेल चुके थे.

जब उनसे पूछा गया कि क्या कोई महिला जमात की प्रमुख बन सकती है, तो शफीकुर रहमान ने कहा, “यह संभव नहीं है. यह संभव नहीं है क्योंकि अल्लाह ने हर किसी को अलग-अलग बनाया है क्योंकि आप कभी बच्चे को जन्म नहीं दे सकते.”

उन्होंने आगे कहा, “हम कभी बच्चे को अपना दूध नहीं पिला सकते. यह अल्लाह ने बनाया है और पुरुषों व महिलाओं के बीच कुछ अंतर हैं. जो अल्लाह ने बनाए हैं, उसे हम बदल नहीं सकते.”

12 फरवरी को होने वाले राष्ट्रीय चुनाव के लिए जमात ने कितनी महिलाओं को उम्मीदवार बनाया है, इस सवाल पर अमीर ने कहा, “संसदीय चुनाव में एक भी नहीं, लेकिन हम तैयारी कर रहे हैं.”

जब इंटरव्यू लेने वाले ने कहा कि बांग्लादेश समेत कई देशों में महिला नेता रह चुकी हैं, तो शफीकुर रहमान ने कहा, “कुछ ही देश.”

इसके बाद 31 जनवरी को वह विवादित एक्स पोस्ट सामने आई, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर लिखा: “हम मानते हैं कि जब आधुनिकता के नाम पर महिलाओं को घर से बाहर धकेला जाता है, तो वे शोषण, नैतिक गिरावट और असुरक्षा का शिकार होती हैं. यह वेश्यावृत्ति का ही एक और रूप है. सोशल मीडिया की अश्लीलता, कार्यस्थल पर उत्पीड़न और महिलाओं का वस्तुकरण प्रगति के संकेत नहीं हैं — ये नैतिक पतन के लक्षण हैं.”

विरोध बढ़ने के बीच रहमान ने 4 फरवरी को कहा कि चार दिन पहले उनका एक्स अकाउंट हैक कर लिया गया था और झूठी जानकारी फैलाई गई. उन्होंने कहा, “मेरा अकाउंट हैक होने के बाद एक समूह ने ऑनलाइन हमले किए और कथित तौर पर ‘ताई रे नाई रे’ के नारे लगाए.”

चुनाव में अब सिर्फ कुछ ही दिन बचे हैं और जमात और बीएनपी समर्थकों के बीच इस बात को लेकर तीखी बयानबाजी हो रही है कि अमीर का एक्स अकाउंट सच में हैक हुआ था या यह पोस्ट खुद रहमान ने की थी.

बीएनपी के तारिक रहमान ने जोर देकर कहा है कि अमीर का अकाउंट हैक नहीं हुआ था. उन्होंने विशेषज्ञों की राय का हवाला देते हुए कहा कि इस तरह किसी अकाउंट को हैक नहीं किया जा सकता. तारिक रहमान ने खुलना शहर में एक चुनावी रैली में कहा, “उनकी सिर्फ एक ही पहचान है, वे झूठे हैं”

इस बीच, इंटरनेट मीम्स से भर गया है.

क्या हास्य मिसोजिनी को ठीक कर सकता है?

जमात अमीर का एक अब वायरल हो चुका कार्टून शेयर करते हुए, जिसमें गुस्साई महिलाओं की भीड़ उन्हें चप्पलों से मारने के लिए दौड़ती दिख रही है और वह छिपते भाग रहे हैं, विजुअल आर्टिस्ट इशरत जहान प्रीतीलता ने फेसबुक पर लिखा कि शफीकुर रहमान के पास छिपने की कोई जगह नहीं होगी.

फेसबुक/स्क्रीनग्रैब
फेसबुक/स्क्रीनग्रैब

बांग्लादेशी मॉडल और टीवी प्रेजेंटर मारिया किसपोट्टा ने फेसबुक पर अपनी स्विमसूट वाली तस्वीर साझा की और लिखा: “अगर जमात सत्ता में आई तो मैं स्विमसूट की तस्वीरें पोस्ट नहीं कर पाऊंगी, इसलिए मैंने सोचा कि उनके सब कुछ अपने कब्ज़े में लेने से पहले मैं अपनी सारी बिकिनी, स्विमवियर और लांजरी की तस्वीरें पोस्ट कर दूं.”

नेशनल सिटीजन पार्टी की पूर्व नेता नीला इस्राफिल ने एक व्लॉग जारी कर कहा कि जमात अमीर “इनसिक्योर मस्कुलिनिटी डिसऑर्डर” से पीड़ित हैं और वह एक “मानसिक मरीज” हैं. उन्होंने कहा कि अमीर संसद में महिलाओं को नहीं चाहते, ताकि सत्ता में आने की उनकी अपनी संभावनाएं मजबूत हो सकें.

कार्टून, विरोध वाले पोस्ट और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे एक बड़ा सवाल है: क्या जमात अमीर की कथित पोस्ट बांग्लादेशी महिलाओं के भविष्य की झलक देती है?

अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद से बांग्लादेश यौन हिंसा में चिंताजनक बढ़ोतरी से जूझ रहा है. इस बढ़ोतरी ने देशभर में विरोध-प्रदर्शन और छात्रों के नेतृत्व में कैंपस आंदोलनों को जन्म दिया है. कई लोग अंतरिम सरकार की निष्क्रियता और पुलिस की नाकामी पर सवाल उठा रहे हैं. अधिकार समूहों ने इस स्थिति को “महामारी-स्तर का संकट” बताया है.

पिछले जुलाई में ढाका यूनिवर्सिटी के अंग्रेज़ी के प्रोफेसर डॉ. शमसाद मर्तुजा ने डेली स्टार में लिखा था कि जब क्रांति की भाषा, हमले की भाषा जैसी हो जाए, तो सावधान रहने की ज़रूरत है.

मर्तुजा ने चेतावनी दी, “जब हम हर वैचारिक विरोधी को यौन हिंसा के शब्दों में पेश करते हैं, तो हम असल में किसके खिलाफ विद्रोह कर रहे हैं? हम एक तरह के अत्याचार को हटाकर उसकी जगह दूसरे तरह के अत्याचार को रखने के खतरे में हैं.”

यौन हिंसा के अलावा, इस्लामी पहरेदार समूहों की नैतिक निगरानी के कारण कई महिलाओं के फुटबॉल मैच रुकवाए जा चुके हैं, जो अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां बने.

रंगपुर के तारागंज इलाके में इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश के नेता मौलाना अशरफ अली ने बीबीसी से कहा, “अगर महिलाएं फुटबॉल खेलना चाहती हैं, तो उन्हें पूरा शरीर ढकना चाहिए और वे सिर्फ महिला दर्शकों के सामने ही खेल सकती हैं. पुरुष उन्हें खेलते हुए नहीं देख सकते.”

सिर्फ खेल के मैदानों में ही नहीं, बल्कि कॉरपोरेट जगहों पर भी महिलाओं पर पाबंदियां बढ़ रही हैं. जुलाई 2025 में बांग्लादेश बैंक ने महिला कर्मचारियों के लिए एक सलाह जारी की, जिसमें उन्हें साड़ी और दुपट्टे के साथ सलवार-कमीज पहनने को कहा गया. इसमें छोटे बाजू या छोटे कपड़े और लेगिंग पहनने पर भी रोक लगाई गई. बैंक ने कहा था कि नियम न मानने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी, हालांकि, बाद में ऑनलाइन आलोचना के बाद ‘सादे’ कपड़ों से जुड़ी ये गाइडलाइंस वापस ले ली गईं.

पश्चिम बंगाल की बंगाली सिनेमा में भी काम कर चुकी एक बांग्लादेशी अभिनेत्री ने नाम न छापने की शर्त पर दिप्रिंट से कहा, “हसीना सरकार के गिरने के बाद से धार्मिक अल्पसंख्यक, कलाकार, पत्रकार और खासकर महिलाएं इस्लामवादी निशाने पर आ गई हैं. हसीना में कई खामियां थीं, लेकिन वह यह समझती थीं कि महिलाओं को ज्यादा से ज्यादा कामकाजी जगहों में आगे बढ़ाना ज़रूरी है. अब स्थिति इसके उलट है.”

बांग्लादेशी पत्रकार साहिदुल हसन खोकोन के लिए यह मुद्दा अब सिर्फ राजनीतिक नहीं रह गया है. उन्होंने दिप्रिंट से कहा कि धार्मिक कट्टरता को बांग्लादेशी समाज में गहराई से जड़ जमाने दी गई है और इसका सबसे ज्यादा नुकसान महिलाओं को हो रहा है.

उन्होंने कहा, “बांग्लादेश दुनिया में एक ऐसे मुस्लिम-बहुल देश के रूप में जाना जाता था, जो मध्यमार्गी, धर्मनिरपेक्ष था और जहां एक नहीं बल्कि दो महिला प्रधानमंत्री रह चुकी हैं. अब यह अफगानिस्तान जैसा बनने की कोशिश कर रहा है, जहां धार्मिक उपदेशक हमारी जिंदगी तय करते हैं.”

इस तरह जमात अमीर की कथित एक्स पोस्ट एक बड़ी बीमारी का लक्षण है. सिर्फ चुनावी नतीजा ही ज़रूरी नहीं कि इस समस्या को ठीक कर दे.

दीप हलदर एक लेखक और दिप्रिंट में कॉन्ट्रिब्यूटिंग एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @deepscribble है. व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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