कोझिकोड/तिरुवनंतपुरम: जब 33 साल के बेनु दास आठ साल पहले बेहतर कमाई के लिए पश्चिम बंगाल के दक्षिण ताजपुर गांव से मजबूर होकर निकले, तो उनके मन में एक ही विकल्प था. केरल की उरलुंगल लेबर कॉन्ट्रैक्ट को-ऑपरेटिव सोसाइटी यानी ULCCS.
गांव के एक व्यक्ति ने उन्हें वहां काम की बेहतर परिस्थितियों के बारे में बताया था. इसके बाद दास कोझिकोड ज़िले पहुंचे और काम की तलाश में ULCCS के रामनट्टुकारा फ्लाईओवर निर्माण स्थल पर गए. दो दिन के भीतर ही उन्हें काम मिल गया. तब से वे कभी बेरोज़गार नहीं रहे.
दास ने कहा, “उसने मुझे बताया कि साइट पर खाना मिलता है, रहने की जगह और मेडिकल मदद भी है, और लोग अच्छे हैं.” दास तब से ULCCS में निर्माण मज़दूर के तौर पर काम कर रहे हैं. फिलहाल वे राज्य की राजधानी तिरुवनंतपुरम में नए MLA हॉस्टल के निर्माण स्थल पर करीब 145 अन्य मज़दूरों के साथ काम कर रहे हैं.
पूर्व कृषि मज़दूर दास और साइट पर काम करने वाले करीब 100 अंतरराज्यीय मज़दूरों को रोज़ 1,030 रुपये मिलते हैं. इसके अलावा उन्हें मेडिकल हेल्थ इंश्योरेंस और सालाना कुल सैलरी का 12 प्रतिशत बोनस भी मिलता है. उन्हें मुफ़्त खाना और रहने की सुविधा भी दी जाती है.

दास ने बताया कि महामारी के दौरान सोसाइटी ने उन्हें मुफ़्त क्वारंटीन सुविधा, टीकाकरण और मुफ़्त रहने की व्यवस्था भी दी. यही वजह है कि केरल आने के बाद से उन्होंने ULCCS नहीं छोड़ा.
दास उन करीब 18,000 मज़दूरों में से एक हैं, जो ULCCS में काम करते हैं. इनमें से लगभग 70 प्रतिशत मलयाली हैं.
कोझिकोड ज़िले के वटकारा में मुख्यालय वाली यह मज़दूरों के स्वामित्व वाली सहकारी संस्था 1925 में शुरू हुई थी. इसका मक़सद ऐसे सिस्टम में रोज़गार और सम्मान देना था, जो भेदभाव से भरा हुआ था.
करीब सौ साल बाद, ULCCS देश की सबसे बड़ी लेबर को-ऑपरेटिव में से एक बन चुकी है. यहां मज़दूरों की भलाई से कोई समझौता नहीं होता और कर्मचारी आज भी इसके सारे शेयर रखते हैं.
लेकिन कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती.
ऐसे समय में जब भारत में सहकारी ढांचे कई मुश्किलों का सामना कर रहे हैं, ULCCS न सिर्फ़ टिकी रही है बल्कि निर्माण के बाहर भी तेज़ी से फैलाव किया है.
इस सोसाइटी ने तकनीक के क्षेत्र में कदम रखा है और कोझिकोड का पहला साइबरपार्क बनाया है. इसके अलावा पर्यटन और हॉस्पिटैलिटी में भी निवेश किया है. इसने मज़दूरों के अधिकार सुनिश्चित किए हैं और बुज़ुर्गों व बौद्धिक रूप से दिव्यांग लोगों के लिए पहल शुरू की है.
केरल से बाहर विस्तार के इरादे से, पिछले साल ULCCS ने ‘यू-स्फियर’ की शुरुआत की. यह एक ऐसा वर्टिकल है, जो भविष्य की निर्माण तकनीक और नए बाज़ारों पर केंद्रित है.
इसके 2023-24 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, को-ऑपरेटिव की कुल आय करीब 2,007.87 करोड़ रुपये रही. इसमें से लगभग 100 करोड़ रुपये वेतन और कल्याण पर ख़र्च किए गए.
ULCCS के चेयरमैन और पूर्व सुपरवाइज़र रमेशन पालरी ने कहा, “हमारा जो शुरुआती उद्देश्य था, उसे हमने बदला नहीं. काम करने की संस्कृति भी वही है. हमारा मक़सद रोज़गार पैदा करना है. लेकिन हम कर्मचारियों के लिए सम्मान और अधिकारों की संस्कृति चाहते हैं.”
पालरी ने कहा कि सोसाइटी की साख बिना भ्रष्टाचार और गुणवत्ता वाली संस्कृति से बनी है. इसी वजह से इसे राज्य सरकार और जनता का समर्थन मिला.
उन्होंने बताया कि पारदर्शिता बनाए रखने के लिए हर महीने बैठकें होती हैं और साल में एक बार आम सभा होती है. उन्होंने याद किया कि एक बार 400 रुपये की हेराफेरी के आरोप में एक कर्मचारी को नौकरी से निकाल दिया गया था.
सम्मान की लड़ाई
ULCCS की शुरुआत एक सामाजिक सुधार आंदोलन से जुड़ी हुई है.
1917 में, जब सामाजिक असमानताएं फैली हुई थीं, तो कोझिकोड के उरलुंगल गांव के कुछ ग्रामीण पुडुचेरी के माहे में धार्मिक नेता और समाज सुधारक वाग्भटानंद का भाषण सुनने गए.
उनके भाषण से प्रेरित होकर गांव वालों ने उन्हें अपने गांव आने का न्योता दिया. इसी से उसी साल सामाजिक सुधार संगठन ‘आत्म विद्या संगम’ बना.
छुआछूत के ख़िलाफ़ लड़ने और सम्मान के साथ काम पाने की तलाश में, आत्म विद्या संगम के 14 सदस्यों ने 1925 में ULCCS की स्थापना की. इस सहकारी संस्था के पहले अध्यक्ष चथयिल कुंज्येकु गुरुक्कल थे.
ULCCS के मुताबिक, इसका पहला प्रोजेक्ट 1924 की बाढ़ में मलाबार क्षेत्र में टूट गए खेतों के बांधों का पुनर्निर्माण था.
इसके बाद काम धीरे-धीरे गांवों को जोड़ने वाले रास्तों, कोझिकोड की सांस्कृतिक रूप से अहम कैनॉली नहर के चौड़ीकरण, और फिर बायपास, हाइवे और अन्य PWD कार्यों तक फैलता गया.
आज, इस सहकारी संस्था के पास 13 सदस्यों वाला बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स है, जिन्हें आपसी चर्चा से चुना जाता है. इनमें से तीन शैक्षणिक रूप से योग्य हैं और लंबे समय से संस्था से जुड़े हैं, जबकि बाकी लंबे समय से काम करने वाले मज़दूर हैं.
संस्था में अलग-अलग प्रोजेक्ट्स के लिए प्रबंधन टीमें भी हैं, जिन्हें विशेषज्ञता और शैक्षणिक योग्यता के आधार पर भर्ती किया जाता है. पालरी को 1995 में नौवां चेयरमैन चुना गया था.
ULCCS के प्रमुख प्रोजेक्ट्स में कोझिकोड का 39 किलोमीटर लंबा थलप्पाड़ी-चेंगला NH-66 सेक्शन, वलियाझिक्कल ब्रिज और सरोवरम प्रोजेक्ट शामिल हैं.
इस संस्था को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है. इसमें 2023 में सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय का नेशनल हाइवे एक्सीलेंस अवॉर्ड और 2024 का बेस्ट परफॉर्मर अवॉर्ड शामिल है.

ULCCS के चीफ प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर किशोर कुमार टी.के. ने कहा, “केरल में ULCCS ही एकमात्र संस्था है जो ऐसे प्रोजेक्ट्स के लिए बोली लगाने के योग्य है. और पूरे भारत में ULCCS ही एकमात्र को-ऑपरेटिव संस्था है जो नेशनल हाइवे डेवलपमेंट में काम कर रही है. हम अडानी जैसी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों से मुकाबला करते हैं. हमें मज़दूरों का पूरा समर्थन मिलता है.”
कुमार ने बताया कि छह लेन वाले हाइवे और सर्विस रोड का 1,704 करोड़ रुपये का टेंडर जुलाई 2025 में पूरा कर केंद्र सरकार को सौंप दिया गया.
विविधीकरण की रणनीति के तहत, ULCCS ने 2013 में कोझिकोड में UL साइबरपार्क विकसित किया. यह ज़िले का पहला साइबरपार्क था और इसमें 180 करोड़ रुपये का निवेश हुआ. कर्ज़ लंबित होने के कारण UL साइबरपार्क अभी बड़ा मुनाफ़ा नहीं कमा पाया है. यहां 93 कंपनियों और स्टार्टअप्स में करीब 2,700 लोग काम करते हैं.
कुमार ने कहा कि यह विचार 2007 में आया, जब नेतृत्व ने देखा कि उत्तरी केरल में IT ढांचे की बड़ी कमी है, जबकि दक्षिणी केरल में तिरुवनंतपुरम में टेक्नोपार्क और मध्य केरल के कोच्चि में इन्फोपार्क मौजूद था.
उन्होंने कहा, “तब से हम अनुमति पाने के लिए लगातार मेहनत कर रहे हैं. एक IT कंपनी ने तो हमसे कहा था कि जाकर सो जाओ. शुरुआत में बहुत से लोगों ने हमारा मज़ाक उड़ाया, क्योंकि यह सहकारी संस्था ज़्यादातर निर्माण मज़दूरों की थी.”
कुमार ने बताया कि ULCCS साइबरपार्क जैसे प्रोजेक्ट्स के ज़रिए बदलते दौर के साथ क़दम मिलाने की कोशिश कर रही है.
इसके अलावा, ULCCS के पास मैटर लैब भी है, जो मटेरियल टेस्टिंग, केमिकल एनालिसिस, पानी और खाद्य पदार्थों की माइक्रोबायोलॉजिकल जांच, पर्यावरण परीक्षण, धातु यानी स्टील की जांच, नॉन-डिस्ट्रक्टिव कंक्रीट टेस्टिंग और कंक्रीट संरचनाओं की फॉरेंसिक जांच करता है.
इसी तरह, कोल्लम में स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंफ्रास्ट्रक्चर एंड कंस्ट्रक्शन यानी IIIC की स्थापना 2018 में ULCCS ने राज्य सरकार की मदद से की. इसका उद्देश्य निर्माण क्षेत्र में कौशल विकास है.
कुमार ने कहा, “शुरुआत में संस्था सिर्फ़ अनुशासित थी. 1995 के बाद हमने सोच-समझकर जोखिम लेना शुरू किया.”
ऐसा ही एक जोखिम फरवरी 2025 में U-Sphere की शुरुआत से जुड़ा था. यह एक सहायक कंपनी है, जो भविष्य की तेज़ निर्माण ज़रूरतों को पूरा करने के लिए बनाई गई है. इसका फोकस स्टील और प्री-इंजीनियर्ड इमारतों पर है, ताकि काम जल्दी पूरा हो सके.
करीब 20 कर्मचारियों वाली U-Sphere टीम निजी ग्राहकों पर ध्यान देती है और राज्य से बाहर काम पाने का लक्ष्य रखती है.
U-Sphere के सदस्य रोहित प्रभाकर ने कहा कि उनका लक्ष्य तय बजट के भीतर आधे समय में प्रोजेक्ट पूरा करना है.
उन्होंने कहा, “ULCCS एक ऐसी संस्था है, जिसके पास 100 साल की विरासत और भरोसा है. लेकिन हमारे ज़्यादातर प्रोजेक्ट राज्य सरकार के लिए होते हैं. U-Sphere सौ प्रतिशत निजी ग्राहकों पर केंद्रित है और हमारा लक्ष्य केरल से बाहर विस्तार करना है.”
प्रभाकर के मुताबिक, U-Sphere को शुरू हुए एक साल के भीतर ही 50 करोड़ रुपये के ऑर्डर मिल चुके हैं. इनमें बेंगलुरु में एक हॉस्पिटैलिटी प्रोजेक्ट, तिरुवनंतपुरम की एक IT कंपनी और दिल्ली व आंध्र प्रदेश के प्रोजेक्ट शामिल हैं.
इसके अलावा, U-Sphere तिरुवनंतपुरम में यूनिटी मॉल का निर्माण भी कर रही है. यह केंद्र सरकार की पहल है.
बुज़ुर्गों की देखभाल से लेकर क्राफ्ट्स गांव तक
ULCCS मानवीय कामों में भी सक्रिय है.
कोझिकोड शहर के UL केयर नयनार सदनम में 23 साल का शफ़ीक नारियल के खोल काटने की मशीन से अर्धगोल आकार के खोल तराश रहा था. जब किनारे गिरते गए, तो उसके हाथ में एक सुंदर पंखुड़ी रह गई.
ज़िले का यह बौद्धिक रूप से दिव्यांग युवक उन पंखुड़ियों को जोड़कर एक सुंदर फूल बनाता है. वहीं उसके चार दोस्त ट्रेनर दिनु सी.पी. की निगरानी में खोल को पॉलिश करते हैं.
कमरे की खुली अलमारी में नारियल के खोल और फोम बोर्ड से बने फूल, बोतलें, ट्रक और अन्य गाड़ियों के मॉडल रखे हैं, जो उनकी प्रतिभा की गवाही देते हैं.

जहां शफ़ीक और उसके दोस्त खोल से सुंदर चीज़ें बना रहे थे, वहीं पास के कमरों में 18 साल से ऊपर के करीब 85 बौद्धिक रूप से दिव्यांग वयस्क दूसरे कामों में लगे थे. इनमें खादी का धागा बनाना, पेपर बैग बनाना और नर्सरी की देखभाल शामिल है.
ULCCS द्वारा संचालित यह संस्था आठ वरिष्ठ विशेष शिक्षकों के ज़रिए पाठ्यक्रम आधारित प्रशिक्षण देती है. इसमें संवाद, समय की पाबंदी, अनुशासन और समय प्रबंधन जैसे जीवन कौशल सिखाए जाते हैं और फिर उन्हें रोज़गार दिलाया जाता है.
इस पहल को कई स्थानीय दुकानें और संस्थान, यहां तक कि अस्पताल भी समर्थन देते हैं, जो इन लोगों को नौकरी देने के लिए तैयार हैं. KMCT मेडिकल कॉलेज में इसके 22 पूर्व छात्र काम कर रहे हैं.
ULCCS फाउंडेशन, जो इस सहकारी संस्था की सामाजिक ज़िम्मेदारी पहल है, अपने पूर्व छात्रों से नियमित संपर्क रखता है.
ULCCS फाउंडेशन के निदेशक डॉ. एम.के. जयराज ने बताया कि इसकी शुरुआत तब हुई, जब कोझिकोड ज़िला प्रशासन ने बौद्धिक रूप से दिव्यांग लोगों के लिए कुछ करने का अनुरोध किया. यह अनुरोध कई माता-पिता की ओर से आया था. जब काम शुरू हुआ, तो ULCCS आगे आया और ज़िम्मेदारी संभाली. फाउंडेशन का उद्घाटन 2005 में हुआ.
उन्होंने कहा, “हमारा शुरुआती लक्ष्य 25 लोगों को नौकरी दिलाने का था. लेकिन पिछले पांच सालों में हम करीब 170 लोगों को काम दिला पाए हैं.” उन्होंने बताया कि ULCCS फाउंडेशन को अपने सदस्यों के दान से सहयोग देता है, क्योंकि कंपनी के पास अलग से CSR फंड नहीं है.
उन्होंने कहा, “बौद्धिक और विकासात्मक रूप से दिव्यांग लोगों के लिए संरक्षित रोज़गार के विकल्प तो होते हैं. लेकिन खुले रोज़गार में उन्हें रखना बहुत मुश्किल होता है. जब हमने यह शुरू किया, तो काफी डर और संकोच था.”
नयनार सदनम ULCCS की कल्याणकारी पहलों में से एक है.
इसके अलावा, संस्था UL केयर सरगालय भी चलाती है. यह डाउन सिंड्रोम से ग्रस्त महिलाओं के लिए एक हस्तशिल्प आउटलेट है. उन्हें नयनार सदनम में प्रशिक्षण दिया गया है. इसे डाउन सिंड्रोम ट्रस्ट कोझिकोड, ULCCS फाउंडेशन और सरगालय ने मिलकर शुरू किया है.
ULCCS ‘मडिथट्टू’ भी चलाती है, जो बुज़ुर्गों के लिए डे-केयर सुविधा है. इसके दो केंद्र हैं. एक वडकारा में ULCCS मुख्यालय के पास और दूसरा कोझिकोड शहर में.
मडिथट्टू में आसपास के गांवों से बुज़ुर्गों को सुबह करीब 10 बजे लाया जाता है और शाम 5 बजे वापस छोड़ा जाता है. दिन की शुरुआत व्यायाम और योग से होती है. इसके बाद प्रार्थना और खेल होते हैं. एक शिक्षक पूरे समय उनके साथ रहता है और उन्हें अख़बार पढ़कर सुनाता है. यहां डॉक्टर की नियमित सेवाएं भी उपलब्ध हैं.
ULCCS से जुड़े लोगों या आय मानदंड पूरा करने वालों के लिए यह सेवा मुफ़्त है.
इसी इमारत में फिजियोथेरेपी की सुविधा और दो स्थायी डॉक्टर, एक बाल रोग विशेषज्ञ और एक अन्य विशेषज्ञ, नियमित रूप से उपलब्ध रहते हैं. यहां परामर्श शुल्क सिर्फ़ 50 रुपये और फिजियोथेरेपी का शुल्क 150 रुपये है.
77 साल की श्रीमती मालियेक्कल के लिए मडिथट्टू में रहना घर पर अकेले रहने से बेहतर है.
उन्होंने कहा, “जब हम यहां होते हैं, तो ज़्यादा मज़ा आता है.”
जयराज ने बताया कि ULCCS ने बुज़ुर्गों की देखभाल और बौद्धिक व विकासात्मक दिव्यांगता के क्षेत्र को सोच-समझकर चुना.
उन्होंने कहा, “हमने ये दोनों क्षेत्र इसलिए चुने, क्योंकि ये समस्याएं राज्य में तेज़ी से बढ़ रही हैं. इनमें शुरुआती हस्तक्षेप बहुत ज़रूरी है.”
उन्होंने कहा कि फाउंडेशन लोगों की ज़िंदगी की गुणवत्ता और ख़ुशी पर ध्यान देता है और उन्हें सिर्फ़ कल्याण का हिस्सा नहीं, बल्कि एक व्यक्ति के तौर पर देखता है.
मडिथट्टू से करीब 14 किलोमीटर दूर इरिंगल में सरगालय केरल आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स विलेज स्थित है. यह केरल पर्यटन विभाग की पहल है, जिसे ULCCS संचालित करता है. इसका उद्देश्य अनुभव आधारित पर्यटन स्थल बनना है.
20 एकड़ में फैले इस परिसर में, जो कभी बंजर ज़मीन था, पर्यटक राज्य भर के 100 से ज़्यादा कारीगरों द्वारा बनाई गई कलाकृतियां देख और खरीद सकते हैं.
यहां कला और शिल्प के साथ-साथ नौकायन, सामाजिक कार्यक्रमों के लिए ऑडिटोरियम और डेस्टिनेशन वेडिंग की सुविधाएं भी हैं.
यह गांव हर साल दो लाख से ज़्यादा पर्यटकों की मेज़बानी करता है.
कारीगरों के लिए यह जगह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम दिखाने, सहयोग और डिज़ाइन सहायता के साथ एक स्टूडियो का काम करती है.
सरगालय के सीनियर जनरल मैनेजर राजेश टी.के. ने कहा, “हम उत्पादों पर ध्यान दे रहे हैं और इस व्यवसाय को फिर से जीवित करने और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं.”
यह क्राफ्ट विलेज हर साल 20 दिन का अंतरराष्ट्रीय कला और शिल्प महोत्सव भी आयोजित करता है और चुनिंदा प्रदर्शनियों व आयोजनों में हिस्सा लेता है. कुछ कलाकारों को सरकारी प्रोजेक्ट भी मिलते हैं.
राजेश ने कहा, “हम कारीगरों को स्थिर और सही भुगतान, आय और सम्मान सुनिश्चित करते हैं.” उन्होंने बताया कि सभी फैसलों में कलाकारों की भागीदारी होती है और बिक्री से 15 प्रतिशत तक हिस्सा कारीगरों को दिया जाता है.
कोझिकोड के म्यूरल कलाकार नवीन कुमार ने कहा कि सरगालय ने उन्हें न सिर्फ़ स्टूडियो दिया, बल्कि स्थिर आमदनी और बाज़ार को समझने का मौका भी दिया.
उन्होंने कहा, “एक कलाकार के लिए स्टूडियो बहुत ज़रूरी होता है, ख़ासकर ऐसा स्टूडियो जहां लोग आते हों. मुझे लगातार बातचीत और सीखने का माहौल पसंद है.”
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