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Sunday, 8 February, 2026
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अमेरिका-भारत अंतरिम समझौता दिखाता है ट्रेड की भाषा का रणनीतिक इस्तेमाल—मिलेट्स, बादाम, DDGs

ट्रेड की भाषा उन लोगों को हाथ की सफाई जैसी लग सकती है, जिनकी ज़िंदगी पर इसके असर पड़ते हैं, लेकिन बिना पूरी जानकारी वाले आंदोलनों को इस पर प्रतिक्रिया तय करने देना एक बड़ी गलती होगी.

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अमेरिका-भारत के बीच ट्रेड को लेकर साझा बयान अब औपचारिक रूप से जारी कर दिया गया है और इसे उसी रूप में पढ़ा जाना चाहिए जैसा यह है: एक अंतरिम समझौता. यह एक तैयारी भरा कदम है, जो आगे चलकर एक कहीं ज़्यादा व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते की ओर ले जाएगा. इस तरह के इंतज़ाम बड़े और राजनीतिक रूप से संवेदनशील समझौतों में असामान्य नहीं होते. इससे दोनों पक्ष शुरुआती फायदे सुरक्षित कर सकते हैं, बाज़ार और साझेदारों को अपनी मंशा का संकेत दे सकते हैं और शुरुआत में हर विवादित मुद्दे से टकराए बिना गति बना सकते हैं.

लेकिन, ऐसे हर ढांचे की तरह, असली कहानी सिर्फ रियायतों की सूची में नहीं, बल्कि उन्हें बयान करने के लिए चुनी गई भाषा में छुपी होती है. शब्दों के स्तर पर ही यह समझौता संभावित रूप से विवादित बन जाता है.

ट्रेड समझौते एक वैश्विक, तकनीकी और जानबूझकर साफ-सुथरी भाषा में लिखे जाते हैं. वे शायद ही कभी घरेलू राजनीति या रोज़मर्रा के व्यापार की भाषा में बात करते हैं. व्यापक और अंतरराष्ट्रीय तौर पर स्वीकार किए गए शब्द बातचीत की मेज़ पर टकराव कम करते हैं, लेकिन साथ ही कई तरह के उत्पादों को दिखने में साधारण और तटस्थ शब्दों में समेट देते हैं, जो बात साझा बयान में मामूली लगती है, वह बाद में जब शेड्यूल और परिशिष्ट तय होते हैं, तो बड़े बाज़ार तक पहुंच में बदल सकती है.

भारत के लिए, जहां कृषि, भोजन और उपभोक्ता उत्पाद गहराई से राजनीतिक मुद्दे हैं, ट्रेड की शब्दावली और आम समझ के बीच का यह फर्क टकराव की वजह बन सकता है.

ट्री नट्स और ज्वार

फ्रेमवर्क में प्रमुख रूप से इस्तेमाल किया गया शब्द ‘ट्री नट्स’ को ही लें. भारतीय इस्तेमाल में आम आर्थिक या राजनीतिक बहस में इसका कोई सीधा शब्द नहीं है. हम बादाम, अखरोट, पिस्ता, काजू की बात करते हैं—अक्सर इन्हें मिलाकर सूखे मेवे कहा जाता है, लेकिन ‘ट्री नट्स’ एक क्लासिक ट्रेड कैटेगरी है. यह बिना किसी एक चीज़ का नाम लिए इन सभी चीज़ों और शायद कुछ और चीज़ों को भी अपने अंदर समेट लेता है.

उदाहरण के लिए, बादाम, जो भारत में सबसे ज़्यादा राजनीतिक रूप से संवेदनशील आयातों में से एक है—इस कैटेगरी में आराम से आ जाता है. अखरोट और पिस्ता भी इसी में आते हैं. एक ही ठंडा और तकनीकी शब्द इस्तेमाल करके यह समझौता उन अलग-अलग उत्पादों पर ध्यान जाने से बच जाता है, जिन पर पहले लॉबिंग और विरोध हो चुका है. भाषा सही है, लेकिन यह रणनीतिक भी है.

फ्रेमवर्क में ‘जानवरों के चारे के लिए लाल ज्वार’ (red sorghum) का भी ज़िक्र है. यहां चुनौती छुपाने की नहीं, बल्कि अनुवाद की है—वैश्विक कृषि विज्ञान की भाषा और भारतीय खेती की भाषा के बीच. भारतीय बोलचाल में sorghum को ज्वार कहते हैं. बाजरा, जिसका ज़िक्र अक्सर ज्वार के साथ राजनीतिक बहसों में होता है, असल में pearl millet है और यह वनस्पति रूप से अलग है. ट्रेड से जुड़े दस्तावेज़ इन फर्कों को लेकर बहुत सटीक होते हैं, लेकिन सार्वजनिक बहसें अक्सर नहीं होतीं.

एक भारतीय किसान के लिए डर भविष्य को लेकर हो सकता है: अगर आज ज्वार को चारे वाली श्रेणी में खोल दिया गया, तो क्या कल दूसरे मिलेट्स पर भी दबाव आएगा? यह चिंता हर बार वैज्ञानिक रूप से सही न हो, लेकिन यह एक राजनीतिक सच्चाई है. एक बार फिर, ट्रेड की तटस्थ भाषा रोज़ी-रोटी से जुड़ी भावनात्मक भाषा से टकराने का जोखिम पैदा करती है.

DDGs, फल, तेल

शायद बयान में सबसे ज़्यादा अस्पष्ट शब्द ‘ड्राइड डिस्टिलर्स ग्रेन्स’ (DDGs) है. खास चारा और एथेनॉल से जुड़े दायरों के बाहर, भारत में यह शब्द लगभग अनजान है. DDGs अनाज से बनने वाले एथेनॉल प्रोडक्शन के by-product होते हैं, जिनका इस्तेमाल जानवरों के चारे के रूप में किया जाता है. अमेरिकी संदर्भ में, ये ज़्यादातर मक्का से बनते हैं.

फ्रेमवर्क बड़े अक्षरों में मक्का या कॉर्न के आयात की घोषणा नहीं करता, लेकिन व्यवहार में, DDGs एक ऐसा रास्ता बन सकते हैं, जिसके ज़रिए अनाज से जुड़ा व्यापार बिना मुख्य फसल का नाम लिए बढ़ सकता है. यह शब्दावली भ्रामक नहीं है; यह बस सार्वजनिक बहस से काफी दूर, एक ऊंचे स्तर की भाषा में काम करती है.

इसी तरह व्यापक हैं ‘ताज़े और प्रोसेस्ड फल’ जैसे शब्द और सोयाबीन तेल जैसे उत्पादों का ज़िक्र. ये छोटी श्रेणियां नहीं हैं. सिर्फ ‘प्रोसेस्ड फल’ में सूखे फल, डिब्बाबंद फल, फ्रोजन पल्प, जूस और कंसन्ट्रेट सब आ सकते हैं. हर उप-श्रेणी का घरेलू किसानों, प्रोसेसरों और रिटेलर्स पर अलग असर होता है.

लेकिन एक अंतरिम फ्रेमवर्क में इतनी व्यापकता सुविधाजनक होती है. इससे बातचीत करने वाले खुलेपन का संकेत दे सकते हैं, जबकि हर एक आइटम की अलग-अलग राजनीतिक रूप से मुश्किल जांच को बाद के लिए टाल सकते हैं.

शराब और डेयरी

जहां समझौता कम सूक्ष्म है, वह है ‘वाइन और स्पिरिट्स’ का ज़िक्र. ट्रेड कानून में ‘स्पिरिट्स’ का सीधा मतलब है डिस्टिल्ड शराब, लेकिन भारतीय राजनीति में यह शब्द ‘शराब’ में बदल जाता है, जो नैतिकता, राजस्व और राज्यों के अधिकारों के बीच खड़ा होता है. आयात बढ़ने की कोई भी धारणा सिर्फ उत्पादकों से ही नहीं, बल्कि उन राज्य सरकारों से भी विरोध खड़ा कर सकती है, जो अपने आबकारी अधिकारों को लेकर बेहद सतर्क रहती हैं.

अंतरराष्ट्रीय मानक शब्दों का इस्तेमाल करके फ्रेमवर्क चर्चा को तकनीकी बनाए रखता है, लेकिन जब लागू करने की बात आएगी, तो यह ऐसा क्षेत्र है जहां राजनीतिक विरोध लगभग तय है.

ध्यान देने वाली बात यह है कि इस फ्रेमवर्क के अंश में दूध या डेयरी उत्पादों—जैसे चीज़, व्हे और मिल्क पाउडर, का खुलकर ज़िक्र नहीं है. यह बात कुछ लोगों को राहत देगी और कुछ को चिंता में डालेगी.

अनुभवी ट्रेड विशेषज्ञ जानते हैं कि असली प्रतिबद्धताएं अक्सर हेडलाइन में नहीं, बल्कि परिशिष्टों (annexes) में होती हैं. किसी सार में नाम न होना जरूरी नहीं कि उसे अंतिम समझौते से बाहर रखा गया हो. इसका बस इतना मतलब है कि उस मुद्दे को बाद के लिए छोड़ दिया गया है—या कहीं और शामिल किया गया है.

बदलाव के दबाव को संभालना

इतने सारे अर्थों की परतों को देखते हुए, किसान संगठनों और अलग-अलग सेक्टरों से कुछ विरोध होना समझ में आता है. जिन लोगों की ज़िंदगी पर इसका असर पड़ता है, उन्हें ट्रेड की भाषा हाथ की सफाई जैसी लग सकती है, लेकिन बिना पूरी जानकारी वाले आंदोलनों को प्रतिक्रिया पर हावी होने देना एक बड़ी गलती होगी.

भारत अब कोई नाज़ुक अर्थव्यवस्था नहीं है, जो बाहर की दुनिया को डरते-डरते देख रही हो. यह एक बड़ा बाज़ार है, जो एकीकरण, तकनीक, ऊर्जा सुरक्षा और मज़बूत सप्लाई चेन चाहता है. खासकर अमेरिका के साथ वैश्विक व्यापार में जुड़ना कोई वैचारिक शौक नहीं, बल्कि एक रणनीतिक फैसला है.

अगर किसी खास सेक्टर पर बदलाव का दबाव पड़ता है, तो उसे संभालने की ज़िम्मेदारी पूरी तरह सरकार की है और यह काम चरणबद्ध तरीके से लागू करने, सुरक्षा उपायों, टैरिफ-रेट कोटा, मानकों को सख्ती से लागू करने और ज़रूरत पड़ने पर सीधे मुआवज़े के ज़रिए किया जाना चाहिए. आधुनिक देश इसी तरह खुलेपन और सामाजिक स्थिरता के बीच संतुलन बनाते हैं.

जो चीज़ न किसानों के काम आएगी और न ही पूरी अर्थव्यवस्था के, वह है ट्रेड की शब्दावली को गलत समझकर होने वाले तात्कालिक विरोधों का सिलसिला. नीति पर बहस पूरे शेड्यूल, ठोस आंकड़ों और पारदर्शी बातचीत के आधार पर होनी चाहिए—न कि पहले से बनी आशंकाओं पर.

यह अंतरिम समझौता वही है—एक अंतरिम कदम. असली बातचीत अभी बाकी है. भारतीयों के सामने काम यह नहीं है कि वे ट्रेड की भाषा से डरें, बल्कि इसे ध्यान से समझें, मजबूती से बातचीत करें और ज़िम्मेदारी के साथ इसे लागू करें.

के बी एस सिद्धू पंजाब के पूर्व आईएएस अधिकारी हैं और स्पेशल चीफ सेक्रेटरी के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं. उनका एक्स हैंडल @kbssidhu1961 है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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