लखनऊ: जयपुर राजभवन से रिटायर हुए छह महीने बाद, वरिष्ठ बीजेपी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्रा एक बार फिर उत्तर प्रदेश की राजनीति में हलचल पैदा कर रहे हैं. 84 वर्षीय मिश्रा कई मुद्दों पर खुलकर बोल रहे हैं—विवादित यूजीसी इक्विटी नियमों से लेकर ‘शंकराचार्य’ स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद विवाद और राज्य में ब्राह्मणों से जुड़े सवालों तक.
मिश्रा ने कैंपस में जाति भेदभाव से निपटने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमों की आलोचना की है. उन्होंने 18 जनवरी को मौनी अमावस्या के दिन प्रयागराज में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थकों के साथ कथित बदसलूकी की भी निंदा की है.
मिश्रा ने ऐलान किया है कि आने वाले दिनों में वह अपने ब्राह्मण संगठन विश्व ब्राह्मण कल्याण परिषद की पहुंच बढ़ाएंगे. दिप्रिंट से बात करते हुए उन्होंने अपनी योजनाओं को विस्तार से बताया.
उन्होंने कहा कि यूजीसी के ये नियम, जिन पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई है, बुनियादी मानव अधिकारों का उल्लंघन करते हैं. उन्होंने बताया कि इन नियमों में संस्थानों के प्रमुखों द्वारा बनाई जाने वाली इक्विटी कमेटियों में एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों के प्रतिनिधित्व का प्रावधान है, लेकिन सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व का कोई ज़िक्र नहीं है. इन कमेटियों का काम जाति भेदभाव से जुड़े मामलों को देखना था.
उन्होंने पूछा, “इसमें बराबरी कहां है?” उन्होंने कहा, “कॉलेजों में सभी छात्र होते हैं, दोस्ती जाति से ऊपर होती है, लेकिन ऐसे नियम कैंपस की आपसी सौहार्द को बिगाड़ेंगे. इसलिए मैंने आवाज़ उठाई.”
मिश्रा ने यह भी कहा कि यूजीसी नियमों में झूठी शिकायत करने वालों के खिलाफ कार्रवाई का कोई प्रावधान नहीं है. उनके मुताबिक, इससे नियमों का दुरुपयोग हो सकता है और ऊंची जातियों के लोगों को निशाना बनाया जा सकता है.
उन्होंने कहा, “इसीलिए मैंने आवाज़ उठाई. मैं केंद्र सरकार के खिलाफ नहीं हूं, मैं सिर्फ यूजीसी के नियमों के खिलाफ हूं.” उन्होंने यह भी जोड़ा कि वह अपने ब्राह्मण संगठन के ज़रिये भी इन नियमों का विरोध करते रहेंगे.
मिश्रा ने बताया कि विश्व ब्राह्मण कल्याण परिषद का गठन उन्होंने 2025 में राजस्थान के राज्यपाल पद से रिटायर होने के बाद किया था और अब वह इसकी गतिविधियों को और सक्रिय रूप से आगे बढ़ाना चाहते हैं.
उन्होंने कहा, “इतिहास में ब्राह्मणों ने हमेशा सामाजिक सौहार्द में विश्वास किया है. ‘वो सबको साथ लेकर चलते हैं’. यह संदेश सब तक पहुंचना चाहिए, सत्ता के गलियारों तक भी.”
‘मैं केंद्र सरकार के खिलाफ नहीं हूं, मैं सिर्फ यूजीसी नियमों के खिलाफ हूं,’ कलराज मिश्रा ने कहा.
इसके बाद उन्होंने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के मुद्दे पर बात की. ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य उस वक्त विवाद के केंद्र में आ गए थे, जब प्रयागराज प्रशासन और पुलिस ने उन्हें मौनी अमावस्या के दिन त्रिवेणी संगम में स्नान करने से रोक दिया था. उनके समर्थकों का आरोप है कि इस दौरान पुलिस ने उनके साथ बदसलूकी की.
मिश्रा ने कहा, “मैं हमेशा संतों का सम्मान करता आया हूं. हम सभी शंकराचार्यों का आदर करते हैं. जिस तरह उनके करीबी सहयोगियों के साथ पुलिस ने बदसलूकी की, उसके दृश्य दुख पहुंचाने वाले थे. ऐसा नहीं होना चाहिए था.”
शंकराचार्य और यूजीसी से जुड़े इन विवादों से यूपी भाजपा के भीतर भी हलचल मच गई. कई स्थानीय नेताओं ने इस्तीफा दे दिया. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बिना नाम लिए शंकराचार्य की तुलना “कालनेमि जैसी शक्तियों” से की, जबकि उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने उन्हें “भगवान शंकराचार्य” कहा.
इस सवाल पर कि क्या वह फिर से राजनीतिक रूप से सक्रिय हो रहे हैं, मिश्रा ने कहा कि नेता कभी सच में रिटायर नहीं होते और अलग-अलग रूपों में सक्रिय रह सकते हैं. फिलहाल वह नोएडा और लखनऊ में सक्रिय हैं, जहां उनके घर हैं.
बृज भूषण की मुलाकात
कुछ दिन पहले, पूर्व सांसद बृज भूषण शरण सिंह और उत्तर प्रदेश के कुछ अन्य नेताओं ने कलराज मिश्रा से मुलाकात की और यूजीसी नियमों के खिलाफ खुलकर बोलने के लिए उनकी सराहना की.
उत्तर प्रदेश में बीजेपी के कुछ पदाधिकारियों का कहना है कि आने वाले दिनों में मिश्रा और ज्यादा सक्रिय हो सकते हैं, हालांकि पार्टी ने अब तक पुराने नेताओं में से किसी को औपचारिक भूमिका नहीं दी है.
कलराज मिश्रा दो बार उत्तर प्रदेश बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और तीन बार राज्यसभा सांसद रहे हैं. वह 2014 से 2017 तक केंद्रीय मंत्री भी रहे. 2019 में उन्हें हिमाचल प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया और उसी साल बाद में उन्होंने राजस्थान के राज्यपाल का पद संभाला.
आज आदरणीय @KalrajMishra जी से भेंट कर UGC से जुड़े विवाद पर न्यायसंगत एवं तर्कसंगत पक्ष रखने के लिए उनका आभार व्यक्त किया। pic.twitter.com/v172NqzSZf
— BrijBhushan Sharan Singh (@b_bhushansharan) February 2, 2026
पार्टी के अंदरूनी लोगों का कहना है कि “ब्राह्मण राजनीति” पर बढ़ते फोकस के बीच कलराज मिश्रा खुद को एक प्रमुख और मुखर ब्राह्मण नेता के तौर पर पेश कर रहे हैं, ताकि राजनीति में अपनी अहमियत दोबारा साबित कर सकें.
कलराज मिश्रा के करीबी माने जाने वाले यूपी भाजपा के एक नेता ने कहा कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण नेतृत्व को लेकर एक खालीपन है. उन्होंने कहा कि ब्रजेश पाठक और जितिन प्रसाद जैसे नेता, जो इस समय सत्ता में हैं, खुले तौर पर ब्राह्मण मुद्दों को नहीं उठाते. उनके मुताबिक, यह बात पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को पसंद नहीं आती.
84 साल की उम्र में कलराज मिश्रा के पास राजनीतिक रूप से खोने के लिए कुछ भी नहीं है. उनके समकालीन नेता या तो हाशिये पर चले गए हैं या भाजपा के मार्गदर्शन मंडल में हैं. उनके एक सहयोगी ने दावा किया कि कई ब्राह्मण नेता चुपचाप मिश्रा के रुख का समर्थन करते हैं और उन्हें “गुरु” के रूप में देखते हैं.
एक अन्य करीबी सहयोगी ने कहा कि मिश्रा का बेटा उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय है, लेकिन उसे कभी पार्टी टिकट नहीं मिला. 2014 में लखनऊ पूर्व विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव के दौरान मिश्रा अपने बेटे के लिए टिकट चाहते थे, लेकिन वह टिकट पूर्व राज्यपाल लालजी टंडन के बेटे आशुतोष टंडन को दे दिया गया था.
यूपी के राजनीतिक विश्लेषक डॉ. शिल्प शिखा सिंह ने कहा कि मुद्दे उठाना और ज़मीनी स्तर पर सक्रिय होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं.
उन्होंने कहा, “कलराज मिश्रा निस्संदेह यूपी की राजनीति का बड़ा नाम हैं. 1990 के दशक में कलराज-कल्याण (कलराज मिश्रा और कल्याण सिंह) की जोड़ी उत्तर प्रदेश बीजेपी में सबसे लोकप्रिय नेतृत्व संयोजनों में से एक थी. लेकिन मुझे शक है कि आने वाले चुनावों में भाजपा पुराने नेताओं पर भरोसा करेगी. पार्टी नया नेतृत्व आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है.”
हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि राजनीति में हर कोई प्रासंगिक बने रहने की कोशिश करता है और इसमें कुछ भी गलत नहीं है.
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