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Sunday, 8 February, 2026
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अमेरिकी हिंदू युवा क्यों धर्म से दूर हो रहे हैं और क्या बदलना होगा

हमें अमेरिकी हिंदुओं को यह मौका देना होगा कि वे नुकसानदेह प्रथाओं को चुनौती दे सकें, उनमें सुधार कर सकें और यहां तक उनसे छुटकारा भी पा सकें.

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पिछले कुछ वर्षों से कुछ हिंदू संगठन इस बात को लेकर काफी चिंतित दिख रहे हैं कि अमेरिका में रहने वाले हिंदू बच्चों का अपने बड़े होने पर खुद को हिंदू पहचान से जोड़ना कम हो रहा है.

दिसंबर में हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन ने एक वीडियो जारी किया. इस वीडियो का शीर्षक कुछ इस तरह था— “महत्वपूर्ण सार्वजनिक घोषणा / छिपे हुए जबरन धर्मांतरण का सच”. इस वीडियो में संगठन की कार्यकारी निदेशक सुहाग शुक्ला पैरेंट्स को यह समझाती हैं कि वे अपने बच्चों को ईसाई दबाव में धर्म बदलने से कैसे बचा सकते हैं.

उत्तरी अमेरिका में रहने वाले हिंदुओं के एक समूह ‘कोएलिशन ऑफ हिंदूज़’ की एक पहल है — ‘द हिंदू पेरेंट्स नेटवर्क’. इस पहल के तहत एक वेबसाइट बनाई गई है, जहां अभिभावकों को बताया जाता है कि वे अपने बच्चों को हिंदू धर्म के बारे में कैसे सिखाएं. इस वेबसाइट पर यह भी समझाया जाता है कि वेबिनारों के ज़रिये कैसे यह बताया जाता है कि हिंदू धर्म में जाति नहीं है और लेखों के ज़रिये यह सिखाया जाता है कि हिंदू अभिभावक अपने बच्चों को समाज विज्ञान के विद्वानों से कैसे दूर रखें.

प्यू रिसर्च सेंटर की एक स्टडी में पाया गया है कि अमेरिका में जिन लोगों की परवरिश हिंदू के रूप में हुई, उनमें से 18 प्रतिशत लोग अब खुद को हिंदू नहीं मानते. इसका मतलब यह भी है कि 82 प्रतिशत लोग अब भी खुद को हिंदू बताते हैं. जिन धार्मिक समुदायों पर यह सर्वे किया गया, उनमें हिंदुओं के अलावा किसी और समुदाय में अपने बचपन के धर्म से जुड़े रहने वालों का अनुपात इतना ज़्यादा नहीं था.

स्टडी के अनुसार, अमेरिका में पले-बढ़े 73 प्रतिशत ईसाई खुद को ईसाई मानते हैं. मुसलमानों में यह आंकड़ा 77 प्रतिशत है और यहूदियों में 76 प्रतिशत. वहीं बौद्धों में यह संख्या सिर्फ़ 45 प्रतिशत है.

अमेरिका के पांच प्रमुख धार्मिक समुदायों में हिंदुओं में धर्म से दूर होने की दर ज़्यादा पाई गई है.

इसके बावजूद, धार्मिक पहचान एक व्यक्तिगत पसंद का मामला है. हमें यह समझना चाहिए कि अमेरिका में रहने वाले हिंदू बच्चे अलग-अलग विचारों के संपर्क में आएंगे. वे चाहें तो अपनी आस्था से दूर हो सकते हैं या किसी दूसरी आस्था को अपना सकते हैं.

अगर कोई युवा खुद को हिंदू से ज़्यादा “भारतीय” मानता है, ईश्वर में विश्वास नहीं करता, या किसी और धार्मिक रास्ते को आध्यात्मिक शक्ति तक पहुंचने का बेहतर तरीका मानता है, तो इसमें कोई गलत बात नहीं है. दरअसल, वह तो सत्य की खोज करने की उसी हिंदू परंपरा का पालन कर रहा है, जिसमें आंख मूंदकर तय रास्ते पर चलने के बजाय खुद सच खोजने की बात कही जाती है.

बेशक, हिंदू माता-पिता का यह चाहना बिल्कुल स्वाभाविक है कि उनके बच्चों की एक पॉजिटिव हिंदू पहचान हो. एक हिंदू होने के नाते, जिसने खुद धर्मांतरण की कोशिशों, धमकियों और कल्चर के हिसाब से खराब सोशल स्टडीज़ की पढ़ाई का सामना किया है, मैं जानती हूं कि हिंदुओं और दूसरे धार्मिक अल्पसंख्यकों पर अपने धर्म से पहचान खत्म करने का दबाव कैसा महसूस हो सकता है.

यह भी सच नहीं है कि अमेरिका में जन्मे और पले-बढ़े हिंदू पूरी तरह हिंदू जीवन से दूर हो रहे हैं. बचपन में मैं हर रविवार 20–30 बच्चों के समूह के साथ ‘बाल विहार’ जाया करती थी. यह हिंदू धार्मिक शिक्षा देने वाला एक कार्यक्रम था. वहां स्थानीय अभिभावक स्वयंसेवक के रूप में हमें योग, हिंदू श्लोक, भजन, हिंदू कथाएं और भारतीय इतिहास सिखाते थे. (हमारा बाल विहार अब चिन्मय मिशन द्वारा चलाए जा रहे बाल विहार से जुड़ा नहीं था.)

हमारे बाल विहार समूह के ज़्यादातर बच्चे बड़े होकर हिंदू बने—कम से कम सांस्कृतिक रूप से तो ज़रूर, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो बड़े होकर खुद को हिंदू पहचान से नहीं जोड़ते. अमेरिका के यूजीन शहर में मंदिर नियमित रूप से जाने वाले, अमेरिका में जन्मे हिंदुओं की गिनती मैं उंगलियों पर कर सकती हूं. वहां किसी नेतृत्व समिति में शामिल एकमात्र व्यक्ति मैं ही हूं.

सकारात्मक हिंदू पहचान

हिंदू धर्म से दूर होने की एक बड़ी वजह यह भी है कि धर्म की लोकप्रियता कुल मिलाकर कम हो रही है. प्यू सर्वे के अनुसार, हिंदू धर्म ही नहीं, बल्कि सभी धर्मों से दूर होने वालों में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो किसी भी धर्म से खुद को नहीं जोड़ना चाहते. मेरे साथ पले-बढ़े कई लोग, जिन्हें हिंदू के रूप में बड़ा किया गया था, अब खुद को हिंदू नहीं मानते क्योंकि उन्हें ईश्वर में विश्वास नहीं है और हिंदू प्रथाओं में अंधविश्वास दिखाई देता है. नए धार्मिक जागरण के बावजूद, मुझे नहीं लगता कि धार्मिक समुदाय बढ़ती नास्तिकता और धर्म से दूरी की इस प्रवृत्ति को आसानी से रोक पाएंगे.

कुछ लोगों के हिंदू पहचान से दूर होने के पीछे उनके अपने समुदाय में मिले बुरे अनुभव भी हैं. इनमें मंदिर जाने की आज़ादी न मिलना, खुला इस्लाम-विरोध और परिवार में सुनी गई जातिगत भेदभाव की कहानियां शामिल हैं.

मेरी एक करीबी दोस्त की मां बाल विहार में बच्चों को श्लोक और भजन सिखाती थीं. लेकिन उनकी मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार में जाति और लिंग के आधार पर जो भेदभाव हुआ, उसे देखकर मेरी दोस्त ने खुद को हिंदू पहचान से अलग कर लिया. अंतिम संस्कार कराने आए पंडित ने उसे और उसकी बहन को यह आशीर्वाद दिया कि उन्हें “अच्छे ब्राह्मण पति” मिलें. इसके अलावा, उन्होंने जातिगत अनुष्ठान के लिए चार ब्राह्मण बुलाने पर ज़ोर दिया. धर्म और जाति का इतना गहरा जुड़ाव उसे असहनीय लगा और उसने हिंदू धर्म से दूरी बना ली.

अमेरिका में हिंदू जीवन की मुख्यधारा से जुड़ना इसलिए भी मुश्किल लगता है क्योंकि कई बार यह हमारे मूल्यों के खिलाफ जाता है. अमेरिका में जन्मी मेरी एक हिंदू दोस्त ने अपने बच्चों को चिन्मय मिशन के बाल विहार कार्यक्रम में भेजना शुरू किया, ताकि वे हिंदू परंपरा से जुड़े रहें. लेकिन कुछ समय बाद उसने और उसके पति ने बच्चों को वहां से हटा लिया, क्योंकि वहां बच्चों को बहुत सख्त और कट्टर हिंदू विचार सिखाए जा रहे थे, और वे नहीं चाहते थे कि उनके बच्चे ऐसे माहौल में बड़े हों.

अधिकतर अमेरिकी हिंदू अपने समुदाय से जुड़े रहना चाहते हैं, लेकिन वे ऐसा हिंदू धर्म चाहते हैं जो सबको साथ लेकर चले. अल्पसंख्यक होने के अपने अनुभवों के कारण वे अपने ही समुदाय में मुसलमानों, दलितों और महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव के खिलाफ खड़े होते हैं. अमेरिका जैसे समाज में, जहां स्वतंत्र सोच को महत्व दिया जाता है, वहां पले-बढ़े हिंदू मुख्यधारा और कट्टरपंथी हिंदू विचारों को चुनौती देने की आज़ादी चाहते हैं.

अगली पीढ़ी के लिए एक सकारात्मक हिंदू पहचान बनाने के लिए ज़रूरी है कि हम अपने धर्म में मौजूद व्यवहार और पिछड़े विचारों पर सवाल उठाएं. इसका मतलब यह स्वीकार करना भी है कि जातिवाद और लिंगभेद हमारे धर्म में मौजूद हैं. साथ ही, हमें ऐसे नए तरीके विकसित करने होंगे जिनसे हिंदू धर्म में समानता को बढ़ावा मिले.

इसका यह भी मतलब है कि अमेरिकी हिंदुओं को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वे नुकसानदेह प्रथाओं पर सवाल उठा सकें, उनमें सुधार कर सकें और ज़रूरत पड़े तो उन्हें पूरी तरह छोड़ भी सकें.

ईसाइयों के खिलाफ डर का माहौल बनाना या यह दिखावा करना कि हिंदू धर्म में जातिवाद नहीं है, हिंदू युवाओं को धर्म छोड़ने से नहीं रोकेगा. इसके बजाय, ऐसी हिंदू संस्थाएं और समुदाय बनाने होंगे जो जातिवाद और लिंगभेद को नकारें और हर व्यक्ति को समान सम्मान और गरिमा दें. यही रास्ता अमेरिकी हिंदुओं को हिंदू समुदाय से जुड़े रहने के लिए प्रेरित करेगा और एक खुशहाल व सामंजस्यपूर्ण दक्षिण एशियाई समाज बनाने में मदद करेगा.

श्रव्या तडेपल्ली हिंदूज़ फॉर ह्यूमन राइट्स की डिप्टी एग्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर हैं. ये उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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