पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के जाने, अवामी लीग पर बैन और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के नेतृत्व में बदलाव के बीच जमात-ए-इस्लामी का तेज़ उभार—जैसे-जैसे बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले चुनाव पास आ रहे हैं, राजनीतिक मुकाबला साफ दिखाई देने लगा है.
हाल के समय में यह पहली बार होगा जब चुनावी मुकाबले में बांग्लादेश की राजनीति की ‘बेगमें’—शेख हसीना और खालिदा ज़िया, शामिल नहीं होंगी, जहां जमात-ए-इस्लामी दो अंकों का आंकड़ा पार करने की उम्मीद कर रही है, वहीं बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) अपने पारंपरिक वोट बैंक के सहारे पूर्ण बहुमत का लक्ष्य रखे हुए है.
हालांकि, जातियो नागरिक पार्टी—नेशनल सिटिजन पार्टी (एनसीपी)—जैसी दूसरी पार्टियां उन छात्र नेताओं की उम्मीदों और एम्बिशन्स के सहारे आगे बढ़ रही हैं, जो जुलाई 2024 में हसीना-विरोधी प्रदर्शनों का चेहरा थे. फरवरी 2025 में बनी एनसीपी, जो अपनी पहली वर्षगांठ पूरी कर रही है, ने भी 12 फरवरी को जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले इस्लामिक गठबंधन के साथ मिलकर सक्रिय चुनावी मुकाबले में कदम रखा है.
इस बीच, क्या एनसीपी के पास सात दशक के इतिहास और अनुभव वाली पार्टियों के खिलाफ कोई मौका है?
एनसीपी क्या पेश करना चाहती है?
“हिसाब दाओ” (जवाबदेही) एनसीपी के 36-बिंदुओं वाले चुनावी घोषणापत्र “युवा और गरिमा का घोषणापत्र” का एक मज़बूत नारा है. इसमें चुने गए प्रतिनिधियों और सरकारी अधिकारियों की आय और संपत्ति के लिए जवाबदेही तय करने का वादा किया गया है. यह भ्रष्टाचार की समस्या से निपटने की खुली प्रतिबद्धता दिखाता है—वही भ्रष्टाचार, जिसने हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग सरकार को खोखला कर दिया था.
लेकिन हसीना के बाद के बांग्लादेश में, जहां सुधार चुनावी प्रक्रिया की सबसे बड़ी ताकत बन गए हैं, एनसीपी भी अर्थव्यवस्था, व्यापार, शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्रों के लिए अपनी बात रखती है. इसका मुख्य फोकस रोज़गार और रोज़गार से जुड़ी सामाजिक सुरक्षा पर है, जिसमें अगले पांच साल में 1 करोड़ अच्छे रोज़गार और 100 टका (लगभग 0.81 डॉलर या 74 रुपये) का न्यूनतम वेतन शामिल है.
बांग्लादेशी प्रवासियों के लिए भी एक आकर्षक पैकेज है, जिसकी शुरुआत “डायस्पोरा डिजिटल पोर्टल” से होगी, ताकि राष्ट्रीय सेवाएं, निवेश के लिए रेमिटेंस से जुड़े मौके और पेंशन लाभ दिए जा सकें. यह इस बात को देखते हुए है कि दस लाख से भी कम विदेशी बांग्लादेशी डाक मतपत्रों के ज़रिये वोट डालेंगे. बांग्लादेश चुनाव आयोग द्वारा भेजे गए 7,66,862 डाक मतपत्रों में से 1,94,914 बांग्लादेश पहुंच चुके हैं.
इस बार कुल 12.77 करोड़ मतदाता मतदान करेंगे. ऐसे में प्रवासी समुदाय को एक अहम कारक माना जा रहा है—पहले वोटर के रूप में और फिर एक ऐसी ताकत के रूप में, जो देश में मौजूद अपने परिवार और दोस्तों के वोटिंग व्यवहार को प्रभावित कर सकती है.
एनसीपी के घोषणापत्र में भारत
अपने चुनावी घोषणापत्र में एनसीपी भारत को लेकर कोई संकोच नहीं करती. न तो वह कूटनीतिक भाषा अपनाने की कोशिश करती है और न ही शब्दों को नरम करती है. बिंदु संख्या 34 में पार्टी कहती है, “भारत से जुड़े सभी मुद्दों पर, जिसमें सीमा पर हत्याएं, अंतरराष्ट्रीय नदियों से बांग्लादेश का उचित जल हिस्सा, शेख हसीना और अवामी लीग के आतंकियों को वापस लाना और असमान द्विपक्षीय समझौते शामिल हैं—हम सर्वोच्च कूटनीतिक और राजनीतिक स्तर पर सख्त रुख अपनाएंगे.” आगे यह भी जोड़ा गया है, “और अगर ज़रूरत पड़ी, तो अंतरराष्ट्रीय संगठनों के ज़रिये कार्रवाई करेंगे.”
जुलाई विद्रोह के दौरान हसीना-विरोधी प्रदर्शनों में एनसीपी के संस्थापक सबसे आगे थे, ऐसे में इसमें नई दिल्ली के लिए कुछ भी चौंकाने वाला नहीं होना चाहिए. हालांकि, चीन को लेकर या इस बात पर कोई ज़िक्र नहीं है कि अगर एनसीपी जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन में सत्ता में आती है, तो उसकी समग्र विदेश नीति कैसी होगी.
दिलचस्प बात यह है कि रोहिंग्या संकट को सुलझाने और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ रिश्ते बेहतर करने के लिए द्विपक्षीय और बहुपक्षीय कूटनीति का प्रस्ताव दिया गया है, वह भी “आसियान में शामिल होने” के ज़रिये, जिससे इस प्रस्ताव के भौगोलिक आधार पर एक तार्किक सवाल उठता है. हालांकि, यह सार्क से जुड़ी उम्मीदों के खत्म होने के बाद बांग्लादेश का जवाब हो सकता है.
एनसीपी की असुरक्षाएं
चुनावी वादों को एक तरफ रख दें, तो पार्टी अनुभव की कमी और भ्रमित नेतृत्व से जूझ रही है. नाहिद इस्लाम—युवा नेता और 2024 के प्रतिरोध आंदोलन का चेहरा, जिन्होंने मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार में सात महीने के छोटे और निराशाजनक कार्यकाल के बाद एनसीपी की स्थापना की.
अब वह बांग्लादेश की पहली छात्र-नेतृत्व वाली राजनीतिक पार्टी के संयोजक के रूप में आने वाले चुनावों में अपनी किस्मत आज़माने को तैयार हैं.
हालांकि, बड़े समर्थन आधार और युवाओं पर केंद्रित नेतृत्व के बावजूद, पार्टी ने पिछले साल हुए हाई-वोल्टेज विश्वविद्यालय चुनावों में हिस्सा नहीं लिया. उम्मीद की जाती थी कि एनसीपी विश्वविद्यालय चुनावों में बड़ा असर डालेगी; आखिरकार वह एक क्रांति से निकली थी, लेकिन लोकप्रियता का वोट बैंक में बदलना आसान नहीं होता, खासकर युवा राजनीति में.
समझा जा सकता है कि विश्वविद्यालय चुनावों में हार एनसीपी की राष्ट्रीय राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को खतरे में डाल सकती थी, इससे पहले कि वह असली राजनीतिक मैदान में उतरती.
लेकिन पिछले सितंबर ढाका विश्वविद्यालय और जहांगीरनगर विश्वविद्यालय में जमात की छात्र इकाई—इस्लामी छात्र शिबिर, की ज़बरदस्त जीत ने न सिर्फ बीएनपी जैसी स्थापित पार्टी को चुनौती दी, बल्कि एनसीपी के लिए भी मुश्किलें खड़ी कर दीं, जो अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही है.
इसलिए, आने वाले चुनावों के लिए जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले इस्लामिक गठबंधन से हाथ मिलाकर एनसीपी अकेले सब कुछ गंवाने के बजाय एक साझा भविष्य तलाशने की कोशिश कर रही है.
इधर, जैसा कि सब-कॉन्टिनेंट में देखा गया है, पारंपरिक पार्टियां अक्सर नई पार्टियों पर भारी पड़ती हैं. पड़ोसी देश नेपाल में, जहां पिछले साल सितंबर में जेन-ज़ी आंदोलन हुआ था, हालात फिर से पुराने खिलाड़ियों के हाथ में चले गए हैं. बांग्लादेश में भी कुछ ऐसा ही दिख रहा है, जहां चुनावों में जमात और बीएनपी मज़बूत होती नज़र आ रही हैं.
साफ है कि चुनावी राजनीति के लिए सिर्फ सोशल मीडिया या किसी और ज़रिये से मिली लोकप्रिय भावनाएं ही नहीं, बल्कि अनुभव भी ज़रूरी होता है.
आगे चलकर, एनसीपी ने भले ही जमात-नेतृत्व वाले गठबंधन में शामिल होकर चुनावी राजनीति में अपनी जगह बना ली हो, लेकिन चुनाव के बाद सरकार में हो या विपक्ष में, गठबंधन को बनाए रखना बेहद अहम होगा.
एनसीपी के सामने यह गंभीर सवाल भी होगा कि एक युवा-नेतृत्व वाली पार्टी जमात-ए-इस्लामी के महिलाओं के प्रति पिछड़े नजरिये, धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ कड़े रुख जैसे मुद्दों पर उसका बचाव कैसे करेगी?
ऋषि गुप्ता ग्लोबल अफेयर्स पर कॉमेंटेटर हैं. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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