नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पसंदीदा शब्दावली में शामिल ‘कर्तव्य’ एक बार फिर केंद्रीय बजट 2026 में प्रमुखता से सामने आई. करीब डेढ़ घंटे लंबे बजट भाषण में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ‘कर्तव्य’ शब्द का इस्तेमाल 13 बार किया. यह पहला मौका है जब बजट भाषण नई दिल्ली के कर्तव्य भवन से तैयार किया गया.
प्रधानमंत्री मोदी ने अगस्त 2025 में सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना के तहत कर्तव्य भवन का उद्घाटन किया था. इसका उद्देश्य सरकारी मंत्रालयों को एक ही परिसर में लाकर आधुनिक और प्रभावी शासन व्यवस्था को मजबूत करना है.
बजट भाषण में सीतारमण ने कहा, “हम तीन कर्तव्यों से प्रेरित हैं—आर्थिक विकास को तेज़ और टिकाऊ बनाना, लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करना और ‘सबका साथ, सबका विकास’ के विज़न के अनुरूप काम करना.”
बजट के पहले ही पैराग्राफ में वित्त मंत्री ने चार बार ‘कर्तव्य’ शब्द का इस्तेमाल किया और कहा कि सरकार अपने कर्तव्यों को निभाने के लिए ‘रिफॉर्म एक्सप्रेस’ को लगातार आगे बढ़ाएगी.

औपनिवेशिक सोच से दूरी का संकेत
मोदी सरकार पहले भी ‘कर्तव्य’ शब्द को अहम स्थान देती रही है. प्रधानमंत्री मोदी ने ‘कर्तव्य भवन’ नाम यह संकेत देने के लिए रखा था कि भारत अब औपनिवेशिक विरासत से आगे बढ़कर कर्तव्य और जिम्मेदारी आधारित शासन की ओर बढ़ रहा है.
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, “कर्तव्य पथ और कर्तव्य भवन दोनों भारत के लोकतंत्र और संविधान की मूल भावना को दर्शाते हैं.”
2022 में मोदी सरकार ने दिल्ली के ऐतिहासिक राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ किया था. पिछले साल संविधान दिवस के मौके पर भी प्रधानमंत्री ने नागरिकों के कर्तव्यों को प्राथमिकता देने पर ज़ोर दिया था.
मोदी ने लिखा था, “महात्मा गांधी हमेशा नागरिकों के कर्तव्यों पर ज़ोर देते थे. उनका मानना था कि कर्तव्य निभाने से ही अधिकार अपने आप मिलते हैं.”
आलोचकों की अलग राय
हालांकि, सरकार के आलोचकों की इस सोच पर अलग राय है. लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य ने दिप्रिंट से कहा, “सरकार मौलिक अधिकारों से ध्यान हटाना चाहती है, इसलिए बार-बार कर्तव्यों पर ज़ोर दिया जा रहा है. अगर अधिकारों पर बात होगी तो यह सरकार के लिए नुकसानदेह हो सकता है.”
उन्होंने कहा कि जनता को सरकार से सवाल पूछने से रोकने के लिए कर्तव्यों की बात को नीति के तौर पर आगे बढ़ाया जा रहा है.
वहीं, आरएसएस विचारक और पूर्व राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा ने कहा कि पश्चिमी सोच नागरिकों को उपभोक्ता के रूप में देखती है, जबकि भारतीय परंपरा में जिम्मेदारियों को प्राथमिकता दी जाती है.
उन्होंने कहा, “हमारे यहां परिवार में भी पहले कर्तव्यों की बात होती है, अधिकारों की नहीं. संघ परिवार और मोदी सरकार देश को एक परिवार मानती है, इसलिए कर्तव्यों पर ज़ोर दिया जा रहा है.”
2019 में प्रधानमंत्री मोदी ने संसद में मौलिक कर्तव्यों का ज़िक्र करते हुए कहा था कि भारत को अधिकार-केंद्रित सोच से कर्तव्य-केंद्रित सोच की ओर बढ़ना चाहिए.
दिलचस्प बात यह है कि मौलिक कर्तव्य संविधान का हिस्सा शुरू में नहीं थे. इन्हें 1976 में आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी सरकार ने 42वें संविधान संशोधन के ज़रिए जोड़ा था, जिसे ‘मिनी संविधान’ भी कहा जाता है.
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह का बदलाव कई बार सत्तावादी शासन के लिए फायदेमंद साबित होता है.
2019 में दिप्रिंट के लिए लिखे एक लेख में वरिष्ठ संपादक विनीत कृष्णा ने कहा था, “जब नागरिक केवल कर्तव्यों पर ध्यान देने लगते हैं, तो अधिकारों के उल्लंघन जैसे मुद्दे हाशिए पर चले जाते हैं. इससे राज्य को अपने कदमों पर परदा डालने का मौका मिल जाता है.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: सीतारमण के खेलो इंडिया मिशन से देश के स्पोर्ट्स सेक्टर में क्या बदलेगा
