नई दिल्ली: शुक्रवार को नागरिक उड्डयन महानिदेशालय यानी डीजीसीए ने दिल्ली हाई कोर्ट को बताया कि पायलटों के आराम के घंटों के मामले में किसी भी एयरलाइन कंपनी को छूट नहीं दी गई है.
एयरलाइन रेगुलेटर की ओर से पेश हुई वकील अक्षिता गोसाईं ने कोर्ट को बताया, पायलटों को साप्ताहिक अनिवार्य आराम का अधिकार है और यह कायम है. किसी भी एयरलाइन को कोई ढील नहीं दी गई है, सिवाय इंडिगो के, जिसे रात के ऑपरेशन के लिए कुछ छूट दी गई है, वह भी सिर्फ 10 फरवरी तक.
यह बात चीफ जस्टिस डी. के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की बेंच के सामने कही गई, जब कोर्ट ने डीजीसीए से पूछा कि क्या पायलटों के साप्ताहिक आराम और छुट्टियों से जुड़े नए नियमों को लागू करने में एयरलाइनों को अनिश्चितकालीन छूट दी गई है.
कोर्ट ने इस जनहित याचिका पर केंद्र सरकार, डीजीसीए और इंडिगो को नोटिस भी जारी किया. याचिका में कहा गया है कि यह मामला नागरिक उड्डयन, सुरक्षा, रेगुलेटरी विफलता, एकाधिकार, यात्री अधिकार, उपभोक्ता संरक्षण और भारत के नागरिक उड्डयन क्षेत्र में संवैधानिक शासन जैसे गंभीर जनहित के मुद्दों से जुड़ा है.
असल में, यह याचिका दिसंबर 2025 में एयरलाइन सेवाओं में भारी अव्यवस्था के बाद डीजीसीए के नए फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन यानी एफडीटीएल नियमों को निलंबित करने के फैसले को चुनौती देती है.
शुक्रवार को कोर्ट ने डीजीसीए से यह भी पूछा कि उसने नए फ्लाइट ड्यूटी नियमों को वापस क्यों लिया, जिनमें कहा गया था कि साप्ताहिक आराम की जगह किसी भी तरह की छुट्टी नहीं दी जा सकती.
नए नियम 1 नवंबर से लागू हुए थे, लेकिन सैकड़ों उड़ानें रद्द या देरी से चलने के बाद, 5 दिसंबर 2025 को डीजीसीए ने छूट दे दी. इसका मकसद यह था कि सबसे ज्यादा प्रभावित एयरलाइन इंडिगो ज्यादा पायलटों को ड्यूटी पर रख सके, ताकि सेवाएं सामान्य की जा सकें. उस समय इंडिगो ने कहा था कि वह पायलटों के लिए नए फ्लाइट ड्यूटी नियम लागू करने के लिए तैयार नहीं है.
अब निलंबित किए गए एफडीटीएल नियमों के तहत एयरलाइनों को पायलटों और क्रू को ड्यूटी के बाद अनिवार्य आराम देना होता है.
इस मामले की अगली सुनवाई चार हफ्ते बाद होगी.
याचिका में क्या कहा गया
सबरी रॉय लेंका द्वारा दायर याचिका में डीजीसीए से 5 दिसंबर 2025 को जारी उसके आदेश को वापस लेने या रद्द करने का निर्देश देने की मांग की गई है. साथ ही डीजीसीए से यह भी कहा गया है कि भारत में काम कर रही सभी अनुसूचित एयरलाइनों को खुद को ‘लो-कॉस्ट’ एयरलाइन बताने से रोका जाए.
याचिका में कहा गया है कि भारत में एयरलाइनों ने 2003 से खुद को ‘लो-कॉस्ट एयरलाइन’ बताना शुरू कर दिया, जबकि भारतीय उड्डयन कानून में ऐसी कोई श्रेणी नहीं है. इससे जनता को गुमराह किया जा रहा है.
दिसंबर 2025 में दायर याचिका में डीजीसीए के 5 दिसंबर के आदेश को वापस लेने को चुनौती दी गई है. इस आदेश के जरिए नागरिक उड्डयन आवश्यकताओं 2024 के तहत अनिवार्य थकान प्रबंधन सुरक्षा उपायों में केवल इंडिगो एयरलाइंस के लिए ढील दी गई थी. यह विमान नियम 1937 के नियम 133ए का सीधा उल्लंघन बताया गया है, जो डीजीसीए को विशेष निर्देश, नागरिक उड्डयन आवश्यकताएं और विमान के संचालन, उपयोग, रखरखाव और नेविगेशन से जुड़े आदेश जारी करने का अधिकार देता है.
याचिका में कहा गया है कि इस तरह की कार्रवाई से विमानन सुरक्षा खतरे में पड़ी, संविधान के अनुच्छेद 14 और 21, यानी समानता और जीवन के अधिकार का उल्लंघन हुआ, और भारत पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिम्मेदारी का खतरा बढ़ गया.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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