UGC विवाद वह नया मैदान है जहां जाति की संस्थागत व्यवस्था पर फिर से बातचीत हो रही है और जहां राज्य की वर्गीकरण प्रणाली भारतीय समाज की वास्तविकताओं के साथ तालमेल बिठाने में जूझ रही है. भारत को यह समझना होगा कि जाति हमेशा से सत्ता की एक तकनीक रही है.
मध्यकालीन उदाहरण
इसे समझने के लिए चलिए मध्यकालीन भारत की दुनिया में चलते हैं. ‘मध्यकाल’ शब्द से भले ही बर्बरता या धर्मग्रंथों से सख्त चिपके रहने का भाव आए, लेकिन सच यह है कि मध्यकालीन भारत भी, आज की तरह, सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक उथल-पुथल से भरा हुआ था. सत्ता उनके पास थी जो ज़मीन, श्रम और संरक्षण को जुटा सकते थे, न कि उनके पास जो मनुस्मृति की श्रेणियों में ठीक-ठीक फिट बैठते हों. दक्कन के काकतीय (लगभग 12वीं–14वीं सदी ई.) और चोल साम्राज्य (लगभग 9वीं–13वीं सदी ई.) इसके दो अलग लेकिन उतने ही अहम उदाहरण देते हैं.
जैसा कि सिंथिया टैल्बट ने Precolonial India in Practice में दिखाया है, काकतीयों के पास पारंपरिक क्षत्रिय वंश नहीं था. (वास्तव में, उनके कुछ अभिलेख बताते हैं कि वे शूद्र थे—चार-वर्णीय ब्राह्मणवादी व्यवस्था में तकनीकी रूप से सबसे निचले). फिर भी उन्होंने अपनी सत्ता को सैन्य प्रतिष्ठा और मंदिर संरक्षण से जोड़कर एक टिकाऊ राज्य बनाया. उदाहरण के लिए, काकतीय राजा महादेव की मृत्यु का यह रंगीन वर्णन देखें: “एक महान युद्ध में मादा हाथी के दो मंदिरों पर सो जाने के बाद, यह वीरों में श्रेष्ठ स्वर्ग की एक प्रतिष्ठित अप्सरा के दो स्तनों पर जागा.” और उसी अभिलेख में महादेव के वंशज का ज़िक्र: “शंभु का एक मंदिर बनवाकर…उसने एक लिंग स्थापित किया…बारह घर और समृद्ध भत्ते देकर, उसने बारह ब्राह्मणों का पालन-पोषण किया, जो आदित्यों जैसे थे.” (एपिग्राफिया इंडिका III, पृष्ठ 94–103). मंदिर संरक्षण ने काकतीयों को सामाजिक पदानुक्रम में हस्तक्षेप करने का अवसर भी दिया. प्रोफेसर टैल्बट बताती हैं कि काकतीयों के दौर में बड़ी संख्या में महिलाओं और चरवाहों ने मंदिरों को दान दिया—जो व्यापक मध्यकालीन संदर्भ में असामान्य था.
चोल दुनिया, खासकर उसके बाद के समय में, एक अलग गतिशीलता दिखाती है. साम्राज्य के चरम पर, कई कृषक समूह—खासकर वेल्लाला किसान—सैन्य सेवा और मंदिर संरक्षण, दोनों के ज़रिये ऊपर आए. (वास्तव में, कुछ ब्राह्मण वेल्लालाओं को ‘शुद्ध’ शूद्र मानते थे), लेकिन जब साम्राज्य के पतन के साथ राजनीतिक सत्ता बिखरने लगी, तो ‘मध्य जातियों’—जैसे बुनकर, सुनार, योद्धा आदि, के गठबंधन बने, जिन्होंने भूमिहीन मज़दूरों पर अपना दर्जा जताने के लिए सामूहिक सभाएं बनाई. उन्होंने यह काम मंदिर पदों और भूमि अधिकारों पर नियंत्रण लेकर, साथ ही न्यायिक और कर-संबंधी काम अपने हाथ में लेकर किया.
कुछ समय बाद, देर-मध्यकालीन दौर की राजनीतिक उथल-पुथल में सैन्य श्रम बाज़ार और पलायन अहम साबित हुए. Naukar, Rajput and Sepoy: The Ethnohistory of The Military Labour Market in Northern Hindustan, 1450–1850 में इतिहासकार डिर्क कोल्फ दिखाते हैं कि खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश में, पुरबिया राजपूत और पठान पहचानें भाड़े के सैनिक दल अपने संरक्षक के धर्म के हिसाब से अपनाते थे. उदाहरण के लिए, गुजरात के सुल्तान के गंगा क्षेत्र के भाड़े के सैनिक खुद को पठान कह सकते थे; किसी और मौसम में, अगर वे किसी हिंदू राजा के लिए काम कर रहे हों, तो खुद को राजपूत कह सकते थे. कोल्फ बताते हैं कि यह प्रथा प्रथम विश्व युद्ध तक आम थी—जब युवा भर्ती दफ्तर में किसी ज़मींदार के बेटे के रूप में प्रवेश करते और बाहर सिख बनकर निकलते.
मुख्य बात यह है कि मध्यकालीन भारत में शास्त्रों से निकला कोई स्थायी ब्राह्मणवादी क्रम नहीं था. हर क्षेत्र की राजनीतिक अर्थव्यवस्था बदल रही थी और जाति कई पदानुक्रम सिद्धांतों में से एक थी. काकतीयों के लिए जातिगत दर्जा सैन्य और अनुष्ठानिक संस्थाओं से दावा किया गया. तमिल मध्य जातियों के लिए यह सामूहिक संगठन और मंदिर संस्थाएं थीं. उत्तर भारत के योद्धा समूहों के लिए यह श्रम बाज़ार और गतिशीलता थी.
हाल की मानवशास्त्रीय और समाजशास्त्रीय शोध बताती है कि यह गतिशीलता आज भी बनी हुई है. सुसान बेली की Caste, Society and Politics in India ज़ोर देती है कि जाति को ऐतिहासिक रूप में समझना चाहिए, न कि किसी स्थिर सार के रूप में. एम.एन. श्रीनिवास की Social Change in Modern India “प्रभावशाली जातियों” को ऐसे समूह मानती है जिनकी शक्ति ज़मीन, संख्या और राजनीतिक प्रभाव से आती है—न कि ग्रंथों में दर्ज रैंक से. श्रीनिवास “संस्कृतिकरण” की प्रक्रिया का भी वर्णन करते हैं, जिसमें प्रभावशाली जातियां ऊपर उठते समय अभिजात अनुष्ठानिक व्यवहार अपनाती हैं. यूजीसी विवाद को समझने के लिए ये समझ बेहद ज़रूरी हैं.
नई संस्थाएं, पुराने ढर्रे
आज की जाति व्यवस्था—खासकर ओबीसी के मामले में—आधुनिक संस्थाओं के इर्द-गिर्द बदल रही है: सरकारी श्रेणियां, आरक्षण और चुनावी गणित. इसी समय, प्रवासी मज़दूरों के नेटवर्क, गिग-इकॉनमी प्लेटफॉर्म और रेज़िडेंट वेलफेयर एसोसिएशन नई तरह की ऊँच-नीच बना रहे हैं. इस पूरे मिश्रण को और जटिल बनाती हैं ‘संस्कृतिकरण’ के नए तरीके: धार्मिक ग्रंथों तक आसान पहुंच, गुरु और तीर्थ स्थलों का ढांचा; ब्रॉडकास्ट मीडिया और तेज़ी से बढ़ता आध्यात्मिक उद्योग. ऐतिहासिक नज़र से यह सब होना स्वाभाविक है. जो बात साफ़ नहीं है, वह यह कि ये सब आज की एससी/एसटी/ओबीसी श्रेणियों से कैसे जुड़ते हैं. राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था इस बदलती ऐतिहासिक प्रक्रिया को पूरी तरह नहीं पकड़ पाती, लेकिन यह प्रक्रिया ज़रूर चल रही है.
क्रिस्टोफ जाफ्रलो की किताब India’s Silent Revolution और उनके बाद के लेख बताते हैं कि तकनीकी रूप से ओबीसी माने जाने वाले समूह—जैसे उत्तर प्रदेश और बिहार में यादव, हरियाणा और पश्चिमी यूपी में जाट, महाराष्ट्र में मराठा, और कर्नाटक में वोक्कालिगा और लिंगायत—ने ज़मीन के मालिकाना हक और चुनावी ताकत को जोड़कर बहुत बड़ी राजनीतिक शक्ति हासिल की है. इनमें से कई ने योद्धा वंशावली अपनाई है, मंदिरों को संरक्षण दिया है, या रक्षक/संरक्षक की भूमिका निभाई है—जो काफ़ी हद तक मध्यकालीन योद्धा जातियों जैसा है.
उदाहरण के लिए, लिंगायत गुरु परंपराएं 12वीं सदी के उत्तर कर्नाटक के जाति-विरोधी आंदोलनों से निकली हैं, लेकिन व्यवहार में वे दूसरी ज़मींदार हिंदू संप्रदायों की तरह ही काम करती हैं. वहीं, आज के तमिलनाडु में थेवर और वन्नियार जातियां चोल राजाओं के अधीन सेवा से अपना दर्जा जोड़ती हैं. हाल के महीनों में यह दर्जा दलितों के ख़िलाफ़ जाति-आधारित पहरेदारों द्वारा हिंसा के ज़रिये जताया गया है. हालांकि, यह भी कहा जा सकता है कि ज़्यादातर ओबीसी समूह आज भी भूमिहीन और असुरक्षित हैं, और ‘प्रभावशाली’ ओबीसी तथा ‘ऊपरी’ सवर्ण जातियों—दोनों—के हाथों भेदभाव और हिंसा झेलते हैं.
इस तरह, किसी वर्ण या जाति समूह से पाठ्य या सरकारी रूप से जो उम्मीद की जाती है, और वह भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में ऐतिहासिक रूप से कैसे अपने जातिगत दर्जे तक पहुंचा और उसे निभाता है—इन दोनों के बीच एक साफ अंतर दिखता है.
अब यूजीसी दिशानिर्देशों पर लौटें: दक्षिणपंथी आलोचकों का कहना है कि ये दिशानिर्देश कैंपस को राजनीतिक बना सकते हैं या सवर्णों के ख़िलाफ़ पहचान-आधारित उत्पीड़न को बढ़ावा दे सकते हैं. ऐतिहासिक नज़र से देखा जाए तो यह कहा जा सकता है कि कुछ ओबीसी समूह—खासकर विश्वविद्यालयी राजनीति में—सवर्णों जितनी, और कभी-कभी उनसे भी ज़्यादा, चुनावी ताकत रखते हैं. साथ ही यह भी सच है कि कई ओबीसी छात्रों को जातिगत भेदभाव से बचाने के लिए और सुरक्षा की ज़रूरत है, और जाति-आधारित हिंसा से निपटने के मौजूदा तरीके—तमिलनाडु जैसे अपेक्षाकृत प्रगतिशील राज्यों में भी—नाकाफी साबित हुए हैं. लेकिन ऐतिहासिक नज़र से असली सवाल यह नहीं है कि दिशानिर्देश ज़्यादा आगे चले गए हैं या नहीं.
असल मुद्दा यह है कि जाति व्यवहार में लगातार बदलती रहती है, जबकि हमारी सरकारी श्रेणियां जमी हुई हैं. जाति शक्ति की एक ऐतिहासिक तकनीक है, जो हर दौर में सबसे अहम संस्थाओं के ज़रिये बार-बार नए रूप में ढलती है. कभी मंदिर समितियां और उनकी संपत्तियां इसका मैदान थीं; आज, कई अन्य जगहों के साथ, विश्वविद्यालय और नौकरशाही इसकी अहम जगहें हैं.
जाति को समझने और खत्म करने के लिए इन बदलावों को पहचानना और उनके मुताबिक़ कदम उठाना ज़रूरी है. भारत की सबसे गहरी और पुरानी संरचनाओं में से एक को न तो नकारा जा सकता है, और न ही केवल नियम बनाकर मिटाया जा सकता है.
अनिरुद्ध कनिसेट्टि एक पब्लिक हिस्टोरियन हैं. वे लॉर्ड्स ऑफ द डेक्कन के लेखक हैं, जो मध्ययुगीन दक्षिण भारत का एक नया इतिहास है और इकोज़ ऑफ इंडिया और युद्ध पॉडकास्ट को होस्ट करते हैं. उनका एक्स हैंडल @AKanisetti है. उनके द्वारा व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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