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Friday, 30 January, 2026
होमविदेशचुनावों में बांग्लादेश के अल्पसंख्यक वोटर्स को 'सीधी चुनौती,' शीर्ष परिषद का राज्य पक्षपात का आरोप

चुनावों में बांग्लादेश के अल्पसंख्यक वोटर्स को ‘सीधी चुनौती,’ शीर्ष परिषद का राज्य पक्षपात का आरोप

एक बयान में, बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद ने यूनुस प्रशासन पर सांप्रदायिक हिंसा को कम आंकने और पक्षपातपूर्ण जनमत संग्रह कराने का आरोप लगाया.

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नई दिल्ली: बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के लिए 12 फरवरी को होने वाले आम चुनावों में हिस्सा लेना अब भी “एक बड़ी चुनौती” बना हुआ है. देश की सबसे बड़ी अल्पसंख्यक परिषद ने यह बात कही है.

यूनुस प्रशासन पर सीधा हमला करते हुए, बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई यूनिटी काउंसिल ने गुरुवार को ढाका में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरोप लगाया कि सरकार अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा को कम करके दिखा रही है और संविधान को तोड़-मरोड़ कर पेश करना चाहती है, जिससे अल्पसंख्यक खतरे में पड़ रहे हैं.

कार्यवाहक महासचिव मणिंद्र कुमार नाथ द्वारा पढ़े गए लिखित बयान में परिषद ने कहा कि अल्पसंख्यक मतदाता लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल करना चाहते हैं, लेकिन उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा, रोज़ी-रोटी, संपत्ति और सम्मान से जुड़ी चिंताएं अब तक दूर नहीं हुई हैं.

परिषद ने कहा, “हालांकि अल्पसंख्यक समुदायों के लोग लगातार चुनाव लड़ते रहे हैं, चुनाव प्रचार में हिस्सा लेते रहे हैं और गैर-सांप्रदायिक राजनीतिक ताकतों के पक्ष में वोट देते रहे हैं, लेकिन मौजूदा हालात में यह एक बड़ी चुनौती बन गया है. ऐसे हालात में अगर अल्पसंख्यक मतदाता वोट डालने से हतोत्साहित होते हैं, तो इसकी जिम्मेदारी उन पर नहीं डाली जा सकती.”

परिषद ने यह भी आरोप लगाया कि राष्ट्रीय चुनाव के साथ होने वाले संवैधानिक जनमत संग्रह में पक्षपात किया जा रहा है.

बयान में कहा गया, “इस राष्ट्रीय संसदीय चुनाव में जनमत संग्रह के नाम पर ‘हां’ और ‘न’ वोट का विकल्प दिया गया है, जिसके जरिए धर्मनिरपेक्षता को राज्य शासन के मूल सिद्धांत के रूप में हटाया जा रहा है. सरकार और चुनाव आयोग सीधे इसके पक्ष में प्रचार कर रहे हैं, जिसे हम दुखद, दुर्भाग्यपूर्ण और साफ तौर पर पक्षपाती मानते हैं.” यह बयान परिषद की वेबसाइट पर डाला गया है.

परिषद ने सरकार, प्रशासन, चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों पर आरोप लगाया कि वे अल्पसंख्यक मतदाताओं के लिए सुरक्षित और भरोसेमंद माहौल बनाने में नाकाम रहे हैं. परिषद ने अधिकारियों से तुरंत और प्रभावी कदम उठाने की मांग की.

परिषद ने कहा, “गैर-सांप्रदायिक, धर्मनिरपेक्ष और भेदभाव-मुक्त बांग्लादेश का संविधान, जो उस समय 7.5 करोड़ लोगों की उम्मीदों और 30 लाख शहीदों के सपनों के आधार पर मुक्ति संग्राम से बना था, आज गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है. हमारा मानना है कि इससे अल्पसंख्यक समुदायों को बराबर नागरिक अधिकार मिलने में बाधा आएगी. ऐसे में यह सुनिश्चित करना कि अल्पसंख्यक समुदाय सुरक्षित रूप से मतदान केंद्रों तक जा सकें और बिना डर के वोट डाल सकें, एक बड़ी चुनौती है.”

परिषद ने कहा कि सरकार और चुनाव आयोग की ओर से अब तक कोई ठोस पहल नहीं दिखी है, जिससे चुनाव से पहले, चुनाव के दौरान और बाद में, खासकर धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यकों तथा आदिवासी समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके.

परिषद ने सात मांगें रखीं, जिनमें अल्पसंख्यक उम्मीदवारों और मतदाताओं के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना, चुनाव प्रचार में धर्म और सांप्रदायिक भावनाओं के इस्तेमाल पर रोक लगाना, और कानून प्रवर्तन एजेंसियों तथा जरूरत पड़ने पर सेना के जरिए पर्याप्त सुरक्षा देना शामिल है. परिषद ने अल्पसंख्यक बहुल इलाकों को उच्च जोखिम वाले क्षेत्र घोषित कर वहां कड़ी निगरानी की भी मांग की.

सांप्रदायिक हिंसा के आंकड़े

परिषद के मुताबिक, बांग्लादेश में हाल के महीनों में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं जारी रही हैं, जो पिछले साल के पैटर्न जैसी हैं. केवल 1 जनवरी से 27 जनवरी के बीच पूरे देश में कम से कम 42 ऐसी घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें 11 लोगों की मौत हुई.

बयान में कहा गया कि 2024 के आंदोलन के दौरान पूरे देश में कुल 2,184 सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं हुईं.

इसमें कहा गया कि 5 अगस्त 2024 के बाद से अब तक सांप्रदायिक हिंसा की कुल घटनाओं की संख्या 522 हो चुकी है.

परिषद ने बताया कि इनमें 61 हत्या की घटनाएं शामिल हैं, जिनमें 66 लोगों की मौत हुई. महिलाओं के खिलाफ हिंसा की 28 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें बलात्कार और सामूहिक बलात्कार शामिल हैं. पूजा स्थलों पर हमले, मूर्तियों को नुकसान, लूटपाट और आगजनी की 95 घटनाएं हुईं. पूजा स्थलों की जमीन पर कब्जे या कब्जे की कोशिश की 21 घटनाएं दर्ज की गईं. घरों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर हमले, तोड़फोड़, लूट और आगजनी की 102 घटनाएं हुईं. अपहरण, फिरौती की मांग और यातना की 38 घटनाएं दर्ज की गईं. हमले, जान से मारने की धमकी और यातना की 47 घटनाएं हुईं. तथाकथित धार्मिक निंदा के आरोप में 36 लोगों को यातना और गिरफ्तारी का सामना करना पड़ा. घरों, जमीन और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर जबरन कब्जे की 66 घटनाएं हुईं. इसके अलावा 29 अन्य घटनाएं दर्ज की गईं.

परिषद ने 19 जनवरी को अंतरिम सरकार की सांप्रदायिक हत्याओं पर जारी रिपोर्ट की भी कड़ी आलोचना की. इस रिपोर्ट में कहा गया था कि 2025 में कुल 645 घटनाओं की पहचान की गई, जिनमें से 71 घटनाओं में सांप्रदायिक तत्व पाए गए, जबकि बाकी 574 घटनाओं को आपराधिक या सामाजिक विवाद बताया गया.

परिषद ने कहा, “हम साफ शब्दों में पूछना चाहते हैं. क्या नोबेल शांति पुरस्कार विजेता प्रोफेसर डॉ. मोहम्मद यूनुस ‘सांप्रदायिकता’ को नए तरीके से परिभाषित करना चाहते हैं. क्या उनका मतलब यह है कि सिर्फ मंदिरों या पूजा स्थलों के परिसर में होने वाली हिंसा ही सांप्रदायिक हिंसा मानी जाएगी और समाज व राज्य में होने वाली बाकी घटनाएं सांप्रदायिक नहीं होंगी.”

परिषद ने कहा, “सरकारी रिपोर्ट में बताए गए 173 मौतों में से केवल एक हत्या को सरकार ने ‘सांप्रदायिक हत्या’ माना है. इस दौरान 58 हिंदू महिलाएं बलात्कार का शिकार हुईं, लेकिन इन घटनाओं को भी सरकार ने गैर-सांप्रदायिक बताया है. हम सांप्रदायिकता की इस बेतुकी परिभाषा की कड़ी निंदा और विरोध करते हैं.”

परिषद ने आगे कहा कि मौजूदा सरकार लगातार जारी सांप्रदायिक हिंसा से इनकार करती रही है और कई बार तर्कहीन स्पष्टीकरण देकर इस मुद्दे को भटकाने की कोशिश की गई है, ताकि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को गुमराह किया जा सके.

परिषद ने कहा कि फरवरी का चुनाव डर के माहौल में होगा, जिसे जारी भीड़ हिंसा और गंभीर बना रही है.

परिषद के अनुसार, अल्पसंख्यक समुदाय और आदिवासी लोग, खासकर महिलाएं और युवा, लगातार डर और चिंता में जी रहे हैं. वहीं अल्पसंख्यक कारोबारी सामान्य रूप से अपना काम नहीं कर पा रहे हैं. कुछ इलाकों में सुरक्षा चिंताओं के चलते परिवारों को अपने घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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