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Wednesday, 28 January, 2026
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अपराध-सज़ा और तालिबानी नियम: पत्नी की पिटाई पर 15 दिन की जेल, बशर्ते ‘नील के निशान’ नजर आएं

अफगानिस्तान में नया 'आपराधिक कानून' 'जाति-आधारित गुलामी' को भी कानूनी बनाता है, 'पापियों' के लिए देखते ही कोड़े मारने की सज़ा तय करता है और 'इजाज़त' के बिना मायके जाने वाली पत्नी के लिए 3 महीने की जेल का प्रस्ताव देता है.

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नई दिल्ली: तालिबान द्वारा संचालित अफगान सरकार ने एक नया आपराधिक कानून लागू किया है, जो समाज को कठोर वर्गों में बांटता है. इसमें मुल्ला कानून से ऊपर हैं और बाकी लोग उनकी दया पर निर्भर हैं.

यह कानून पति द्वारा पत्नी की पिटाई, कथित विधर्म पर हत्या, महिलाओं के बाहर घूमने पर कोड़े मारने और गुलामी को वैध ठहराता है, जिसके लिए ‘गुलामी’ शब्द का प्रयोग किया गया है.

तालिबान का यह नया आपराधिक कानून पतियों और गुलाम मालिकों को महिलाओं और सेवकों को मनमाने ढंग से सजा देने की ताकत देता है.

पति अपनी पत्नी को मार सकते हैं, लेकिन अगर वे डंडे से मारते हैं और चोट के निशान पड़ते हैं, तो पति को 15 दिन की जेल होगी. पिता 10 साल के बेटे को नमाज न पढ़ने पर मार सकते हैं, लेकिन उसकी हड्डी नहीं तोड़ सकते. जो महिलाएं पति की अनुमति के बिना रिश्तेदारों से मिलने जाती हैं, उन्हें तीन महीने की जेल होगी.

इस नए कानून पर इसी महीने अफगानिस्तान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा ने साइन किए. यह कानून तीन हिस्सों, 10 अध्यायों और 119 धाराओं में है. इसमें वकील का अधिकार, चुप रहने का अधिकार और मुआवजे जैसे निष्पक्ष सुनवाई के बुनियादी अधिकार हटा दिए गए हैं.

अफगानिस्तान के अधिकार संगठन रवादारी के अनुसार, धारा 9 अफगान समाज को चार वर्गों में बांटती है. सबसे ऊपर धार्मिक विद्वान हैं, जिन पर कानून लागू नहीं होता, जबकि बाकी लोगों को जेल भेजा जा सकता है.

सजा वर्ग के आधार पर

कानून की धारा 9 के तहत तालिबान ने ऐसा सामाजिक ढांचा बनाया है, जिसमें अपराध नहीं बल्कि वर्ग सजा तय करता है.

धार्मिक विद्वान या मुल्ला अगर अपराध करते हैं, तो उन्हें सिर्फ सलाह दी जाती है और कोई असली सजा नहीं मिलती. उच्च वर्ग यानी अशराफ या अभिजात वर्ग को बुलाकर सलाह दी जा सकती है, लेकिन उससे ज्यादा कुछ नहीं होता. मध्यम वर्ग को उसी अपराध के लिए जेल हो सकती है. निचले वर्ग को जेल के साथ-साथ शारीरिक सजा भी दी जाती है.

यह व्यवस्था मुल्लाओं को लगभग पूरी छूट देती है, जबकि बाकी अफगान नागरिकों को उसी काम के लिए ज्यादा कठोर और हिंसक सजा दी जा सकती है.

तालिबान के विरोधी नेशनल रेजिस्टेंस फ्रंट ने इस व्यवस्था की तुलना भारत की ऐतिहासिक जाति व्यवस्था से की है, जहां ऊंचे वर्ग जवाबदेही से बच जाते थे और निचले वर्ग पर कठोर सजा लागू होती थी.

संस्थागत गुलामी और धार्मिक उत्पीड़न

कानून की धारा 15 कहती है, “जिस अपराध के लिए ‘हद’ यानी तय सजा निर्धारित नहीं है, वहां ताज़ीर यानी विवेकाधीन सजा दी जाएगी, चाहे अपराधी आज़ाद हो या गुलाम.”

यह कानून अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों से टकराता है. इसमें स्वतंत्र जांच के बिना सिर्फ “कबूलनामे” और “गवाही” पर भरोसा किया गया है, जिससे यातना की आशंका बढ़ जाती है.

धार्मिक अल्पसंख्यकों पर सख्त पाबंदियां लगाई गई हैं. हनफी मुसलमानों को सच्चा मुसलमान माना गया है, जबकि शिया, इस्माइली, सिख और हिंदुओं को ‘विधर्मी’ यानी मुब्तदेह कहा गया है.

धारा 14 ‘भ्रष्टाचार फैलाने वालों’ और ‘झूठी आस्था’ फैलाने वालों की हत्या की अनुमति देती है. धारा 26 के तहत हनफी मुसलमानों द्वारा धर्म छोड़ने पर दो साल की जेल का प्रावधान है.

तालिबान के तहत लड़कियों की शिक्षा

सख्त कानूनी सजा के अलावा, तालिबान की नीतियों ने अफगान लड़कियों और महिलाओं से शिक्षा का अधिकार भी छीन लिया है. अगस्त 2021 में सत्ता में लौटने के बाद से तालिबान ने लड़कियों और महिलाओं को माध्यमिक स्कूल, विश्वविद्यालय और रोजगार से रोक दिया है.

तालिबान अधिकारियों ने महिलाओं द्वारा लिखी गई सैकड़ों किताबों पर प्रतिबंध लगा दिया है और उन विषयों की पढ़ाई भी बंद कर दी है, जिन्हें महिलाएं पहले पढ़ा करती थीं. इससे बौद्धिक और शैक्षणिक क्षेत्रों से महिलाओं को और भी बाहर कर दिया गया है.

अफगान महिलाएं और नागरिक समाज के कार्यकर्ता इन पाबंदियों को लैंगिक रंगभेद बताते हैं, जो महिलाओं को दूसरे दर्जे का नागरिक मानता है.

अदालत को दरकिनार कर सजा

धारा 19 के तहत असहमति को अपराध बना दिया गया है. महिलाओं की शिक्षा पर रोक जैसी तालिबान नीतियों की आलोचना पर प्रतिबंध है. नेताओं का अपमान करने पर 20 कोड़े और छह महीने की जेल हो सकती है. नागरिकों को ‘विद्रोहियों’ की सूचना देनी होगी, नहीं तो दो साल की जेल होगी. अस्पष्ट नियमों के तहत फैसलों का मजाक उड़ाने या ‘नाचने’ तक पर रोक है.

सजा पूरी तरह अदालत के बिना दी जाती है. धारा 4 मुल्लाओं, नैतिकता पुलिस और आम नागरिकों को मौके पर ही ‘पापियों’ को कोड़े मारने की अनुमति देती है. जिन्हें ‘असुधारनीय विद्रोही’ कहा जाता है, उन्हें सीधे मौत की सजा दी जा सकती है.

रवादारी ने चेतावनी दी है कि यह कानून ऐसी व्यवस्था को मजबूत करता है, जहां मुल्ला सर्वोच्च हैं. यह घर, सड़क और यातना कक्ष के बीच की रेखा मिटा देता है और कमजोर लोगों के लिए न्याय को खत्म कर देता है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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