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Saturday, 31 January, 2026
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राज्यपालों का वॉकआउट, एजेंसियों की कार्रवाई पर रोक—केंद्र और राज्यों के रिश्तों को कैसे सुधारा जाए

तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक से लेकर पश्चिम बंगाल तक, राज्य केंद्र सरकार से टकरा रहे हैं. सहकारी संघवाद को फिर से ज़िंदा करने की ज़रूरत है.

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केंद्र और राज्यों के संबंधों में वर्तमान में बहुत तनाव दिख रहा है  पिछले ही सप्ताह गैर-बीजेपी शासित तीन राज्यों—तमिलनाडु, केरल, और कर्नाटक—के राज्यपालों ने विधानसभा सत्र के उदघाटन पर इन राज्य सरकारों द्वारा तैयार किया गया भाषण नहीं पढ़ा या आंशिक रूप से ही पढ़ा और सदन से वॉकआउट कर गए.

चेन्नै में राज्यपाल आर.एन. रवि ने भाषण न पढ़ने और सदन से वॉकआउट करने का यह कIरण बताया कि वह “प्रमाण रहित दावों और भ्रामक बयानों” से भरा था. तिरुवनंतपुरम में राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आरलेकर ने भाषण के वे अंश नहीं पढ़े जिन्हें वे हटाया जाना चाहते थे लेकिन जिन्हें नहीं हटाया गया था. बेंगलुरु में राज्यपाल थावर चंद गहलोत 43 पेज के भाषण को तीन वाक्यों में निबटाकर चले गए. भाषण में जिक्र किया गया था कि “टैक्स के हस्तांतरण और दूसरी कई केंद्रीय स्कीमों में राज्य के साथ अन्याय किया गया”, और ‘मनरेगा’ को “रद्द” करने के लिए केंद्र सरकार की आलोचना की गई थी.

इसके अलावा, केंद्र सरकार और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच गतिरोध की स्थिति पैदा हो गई थी. मुद्दा यह था कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, राज्य के डीजीपी, और कोलकाता पुलिस कमिश्नर ने राजनीति सलाहकार फर्म ‘आई-पैक’ के खिलाफ एक ‘पीएमएलए’ मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच ज में कथित रूप से बाधा डाली थी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस केस ने केंद्रीय एजेंसियों द्वारा जांच और उसमें “राज्य की एजेंसी द्वारा हस्तक्षेप” को लेकर “एक गंभीर मसाला उभरI” है. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि इससे “बड़े सवाल जुड़े हैं”, जिन का फैसला नहीं किया गया तो “स्थिति और खराब हो सकती है” और “अराजकता” जैसी स्थिति हो सकती है.

कोर्ट ने कहा: “यह सही है कि किसी केंद्रीय एजेंसी को राजनीतिक दल के चुनाव के कामकाज में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है. लेकिन जब केंद्रीय एजेंसी किसी गंभीर अपराध की जांच करने को प्रामाणिक रूप से अधिकृत है तब यह सवाल उठता है कि दलीय गतिविधियों की आड़ के बहाने क्या एजेंसियों को अपनी ड्यूटी करने से रोका जा सकता है?”

ये कोई अकेली घटनाएं नहीं हैं. इससे पहले बंगाल में राज्यपाल की भूमिका को लेकर और राज्य में सीबीआई जांच की आम सहमति देने को लेकर भी विवाद उभरा था.

तमिलनाडु का केंद्र के साथ असहज संबंध रहता आया है, चाहे केंद्र में किसी पार्टी की भी सरकार रही हो. हाल के वर्षों में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के जरिए कथित हस्तक्षेप, ‘नीट’ को थोपने, और विधानसभा द्वारI पारित विधेयकों को राज्यपाल द्वारा मंजूरी देने में निरंतर देरी को लेकर भी तनाव बढ़ा है.

केरल में भी निरंतर टकराव है. राज्य ने नागरिकता (संशोधन) एक्ट को चुनौती दी है, ‘एफआरबीएम’ व्यवस्था के तहत उधार लेने के अपने अधिकारों पर पाबंदी लगाने पर आपत्ति की है, और विश्वविद्यालयों में नियुक्तियों और विधेयकों को मंजूरी देने में देरी के मामलों पर राज्यपाल से बार-बार मतभेद होता रहा है.

पंजाब में कृषि कानूनों के खिलाफ किसान आंदोलन के दौरान केंद्र के साथ टकराव संघीय संबंधों में तनाव का एक और पहलू उजागर करता है. राज्य सरकार ने केंद्र पर आरोप लगाया कि वह कृषि और बाजार जैसे क्षेत्रों को, जो कि पारंपरिक रूप से राज्य के अधीन रहे हैं, प्रभावित करने वाले कानून बनाकर संघीय सिद्धांत की उपेक्षा करता है.

भारत का संविधान मजबूत केंद्र सरकार के साथ संघीय ढांचे को स्थापित करता है, जो कि क्षेत्रीय विविधता का सम्मान करते हुए राष्ट्रीय एकता की रक्षा करने के लिए बना है. लेकिन पिछले वर्षों में केंद्र सरकार और राज्यों के बीच तनाव निरंतर उभरता रहा है और इसमें कटुता बढ़ गई है. हाल में घटी घटनाएं भारत के संघीय कामकाज में गहरी बीमारी कI संकेत करती हैं. ये सत्ता संतुलन, संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका, और भारत में सहकारी संघीय व्यवस्था के भविष्य को लेकर बुनियादी सवाल खड़े करती हैं.

संघीय ढांचे में तनाव के कारण

इस लगातार टकराव के पीछे कई कारण हैं. पहला कारण तो सत्ता का बढ़ता केंद्रीकरण है. देश के कुछ हिस्सों में अलगाववादी और विघटनकारी प्रवृत्तियों के मद्देनजर केंद्रीकरण को कुछ उचित ठहराया जा सकता है. लेकिन राज्य इसके खिलाफ नाराजगी जताते हैं. संविधान में शक्तिशाली केंद्र का प्रावधान किया गया है लेकिन शक्ति के अतिवादी प्रयोग, खासकर केंद्रीय जांच एजेंसियों के जरिए, ने राज्यों में अविश्वास की भावना पैदा की है, खासकर विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों में.

दूसरे, संवैधानिक पदों के राजनीतिकरण ने उन परंपराओं को कमजोर किया है जो कभी अनौपचारिक सुरक्षा कवच का काम करती थीं. राज्यपाल के पद की कल्पना तटस्थ संवैधानिक मुखिया के रूप में की गई थी लेकिन अक्सर उन्हें केंद्र का एजेंट मान लिया जाता है, जो विधायी प्रक्रिया में हस्तक्षेप करता है, विधेयकों को मंजूरी देने में देर करता है या राजनीतिक बयान देता है.

तीसरे, संवाद की संस्थागत व्यवस्थाएं कमजोर हो गई हैं. संविधान केअनुच्छेद 263 के तहत, संघीय विवादों का निबटारा करने के लिए संवैधानिक रूप से अधिकृत अंतरराज्यीय परिषद की बैठक आमतौर पर नहीं होती है. इसका परिणाम यह है कि ज्यादातर राजनीतिक मतभेद निबटारे के लिए न्यायपालिका में पहुंच रहे हैं.

चौथा कारण यह है कि वित्तीय मामलों की संघीय व्यवस्था एक बड़ी दरार बन गई है. राज्यों की शिकायत है कि उनके लिए वित्तीय मौके सिकुड़ रहे हैं, हस्तांतरण के साथ कई शर्तें जोड़ी जाती हैं, जीएसटी क्षतिपूर्ति में देर की जाती है, और उधार लेने की सीमा प्रतिबंधात्मक है. वित्तीय निर्भरता राजनीतिक परतंत्रता बढ़ाती है.

अंत में, संवैधानिक नैतिकता का निरंतर क्षरण होता गया है— संयम बरतने, समायोजन, और पारस्परिक सम्मान की उन अलिखित परंपराओं का क्षरण होता गया है, जो किसी संघीय व्यवस्था के सहज कामकाज के लिए आवश्यक हैं.

सहकारी संघीय व्यवस्था में जान डालें

संविधान की सातवीं अनुसूची ने ‘पुलिस’ और ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ को राज्यों की सूची में रखा है. अब शायद मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा करने का समय आ गया है. बीते वर्षों में, आंतरिक सुरक्षा ने नया आयाम ग्रहण कर लिया है. आतंकवाद, साइबर अपराध, संगठित अपराध, और अंतरराज्यीय अपराधिक नेटवर्क राज्यों की सीमाओं को नहीं मानते. इनकी जांच के लिए राज्यों और केंद्रीय एजेंसियों के बीच निर्बाध तालमेल चाहिए. वर्तमान व्यवस्था अक्सर राजनीतिक सदभाव पर निर्भर करती है, जो टकराव के दौरान नहीं दिखती.

पूर्व गृह सचिव माधव गोडबोले ने ‘पुलिस’ और ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ को राज्य सूची से हटाकर समवर्ती सूची में डालने की जोरदार वकालत की थी. इसी तरह, प्रख्यात संविधान विशेषज्ञ फली नरीमन ने ‘इंडियन पुलिस फाउंडेशन’ की एक वार्षिक बैठक में कहा था कि जिस तरह ‘वनों’ को विनाश से बचाने के लिए राज्य सूची से हटाकर समवर्ती सूची में डाल दिया गया, उसी तरह  ‘पुलिस’ और ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ को राज्य सूची से हटाकर समवर्ती सूची में डाल देना चाहिए क्योंकि राज्य सरकारें पुलिस का अपने राजनीतिक लक्ष्यों के लिए दुरुपयोग करती हैं.

लेकिन ‘पुलिस’ और ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ को राज्य सूची से हटाकर समवर्ती सूची में डालने का राज्यों की ओर से जोरदार विरोध किया जाएगा. ज्यादा आसान और व्यावहारिक यह होगा कि,जैसा द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने अपनी पांचवीं रिपोर्ट में सिफारिश की है, ‘संघीय अपराध’ — आतंकवाद, संगठित अपराध, अंतरराज्यीय पैमाने के बड़े अपराध, राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा पहुंचाने वाले अपराध, गंभीर आर्थिक अपराध, आदि—को समवर्ती सूची में डाल देना चाहिए. ऐसा करने से, आंतरिक सुरक्षा के लिए उभरती चुनौतियों का समान मIपदंडों और बेहतर तालमेल के साथ ज्यादा असरदार राष्ट्रीय जवाब दिया जा सकेगा.

सहकारी संघीय व्यवस्था को भी पूरी तरह और सही तरीके से लागू करना जरूरी है. अंतरराज्यीय परिषद की बैठकें नियमित रूप से होनी चाहिए और राज्यों को प्रभावित करने वाले बड़ी नीतिगत पहल करने से पहले विचार-विमर्श किए जाएं. राज्यपाल की भूमिका को सरकारिया आयोग और पंछी आयोग की सिफ़ारिशों के आधार पर पुनः परिभाषित किया जाए. वित्तीय मामले की संघीय व्यवस्था का भी पुन: र्निर्धारण किया जाना चाहिए.

अंत में, संवैधानिक परंपराओं का निश्चित तौर पर सम्मान किया जाना चाहिए. बार-बार न्यायपालिका का सहारा लेनाकोई समाधान नहीं है. राजनीतिक परिपक्वता, संवाद, और संघीय भावना अपरिहार्य हैं.

केंद्र-राज्य टकराव से शासन कमजोर होता है, संस्थाओं का राजनीतिकरण होता है और न्यायपालिका पर बोझ बढ़ता है. समाधान भरोसा बहाल करने, संस्थाओं को शक्ति देने, और सहकारी संघीय व्यवस्था को लागू करने में निहित है.

लेखक रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी हैं. वह असम में पुलिस महानिदेशक थे, इससे पहले नागालैंड में भी काम कर चुके हैं. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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