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Saturday, 24 January, 2026
होमदेशअलग होकर आगे बढ़ने तक—कैसे ISLAM पार्टी ने कुछ ही महीनों में मालेगांव की राजनीति को दिया नया रूप

अलग होकर आगे बढ़ने तक—कैसे ISLAM पार्टी ने कुछ ही महीनों में मालेगांव की राजनीति को दिया नया रूप

पूर्व कांग्रेस विधायक आसिफ शेख द्वारा बनाई गई ISLAM पार्टी मालेगांव नगर निगम चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, यह कहते हुए की गई आलोचना को नकारते हुए कि इसकी अपील सिर्फ धार्मिक आधार पर है.

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मुंबई: जब पूर्व कांग्रेस विधायक आसिफ शेख ने अक्टूबर 2024 में मालेगांव में एक नई राजनीतिक पार्टी बनाने की घोषणा की, तो बहुत कम लोगों ने सोचा था कि यह इतनी जल्दी शहर के राजनीतिक संतुलन को बदल देगी.

पार्टी का नाम—इंडियन सेक्युलर लार्जेस्ट असेंबली ऑफ महाराष्ट्र, जिसका संक्षेप ISLAM है, तुरंत विवाद का कारण बना. आलोचकों ने इसे जानबूझकर उकसाने वाला और राजनीतिक रूप से गैर-गंभीर बताया.

लेकिन इसी महीने की शुरुआत में ISLAM पार्टी ने इन आलोचनाओं को पीछे छोड़ दिया, जब 15 जनवरी को हुए मालेगांव नगर निगम चुनाव में यह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. पार्टी ने निगम की 84 सीटों में से 35 सीटें जीतीं.

मालेगांव की पहचान-आधारित राजनीति के मुकाबले खुद को एक सेक्युलर विकल्प बताते हुए, पार्टी समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर नगर निगम बनाने के करीब भी पहुंची. समाजवादी पार्टी को पांच सीटें मिलीं और गठबंधन का कुल आंकड़ा 40 पहुंच गया, जो स्पष्ट बहुमत से सिर्फ तीन सीट कम था.

शेख के लिए ISLAM पार्टी शुरू करने का फैसला कई सालों की राजनीतिक निराशा और ज़मीनी स्तर पर किए गए काम का नतीजा था. मालेगांव एक ऐसा शहर है जहां मुस्लिम मतदाता भारी बहुमत में हैं, लेकिन लंबे समय से वे राष्ट्रीय पार्टियों, क्षेत्रीय दलों और पहचान आधारित राजनीति में बंटे रहे हैं.

शेख ने दिप्रिंट से कहा, “मेरा परिवार 40 साल से राजनीति में है और ज्यादातर कांग्रेस से जुड़ा रहा है, जब हमने 2024 में ISLAM पार्टी शुरू की, तो मेरे साथ एक हज़ार से ज्यादा लोग काम कर रहे थे और मेरा समर्थन कर रहे थे.”

उन्होंने कहा, “लेकिन हमारी पार्टी के 90 प्रतिशत कार्यकर्ता हमारी अपनी बुनियाद से हैं और हम उसी को आगे बढ़ा रहे हैं. हमने बाहर से लोगों को नहीं लाया. वे कहीं और से टूटकर नहीं आए हैं. मैंने स्थानीय लोगों को चुना. सिर्फ कुछ लोग, जो जहां थे वहां खुश नहीं थे, वे खुद हमारे साथ जुड़ गए.”

एक नई पार्टी के रूप में ISLAM ने 2024 के विधानसभा चुनाव में मालेगांव सेंट्रल सीट से चुनाव लड़कर अपनी ताकत परखी. शेख ने कहा कि पार्टी सिर्फ 162 वोटों से हारी और उसे करीब 1,10,000 वोट मिले, जो “उस समय एक बड़ी जीत” थी.

शेख ने कहा कि इस चुनाव में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) से हार के बाद, ISLAM पार्टी ने नगर निगम चुनाव के प्रचार में तीन मुख्य मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया: AIMIM की लोगों के लिए काम करने में नाकामी, SIR (मतदाता सूची संशोधन) विवाद जो मालेगांव के मुसलमानों को प्रभावित कर सकता है और शहर का समग्र विकास.

ISLAM और समाजवादी पार्टी के बीच बने गठबंधन को मालेगांव सेक्युलर फ्रंट कहा गया. इस गठबंधन ने 65 सीटों पर चुनाव लड़ा. इनमें से ISLAM पार्टी ने 46 सीटों पर और समाजवादी पार्टी ने 19 सीटों पर चुनाव लड़ा.

समाजवादी पार्टी के मालेगांव अध्यक्ष मुस्तकीम डिग्निटी ने कहा, “यही वह आधार था जो बाद में इस चुनाव के लिए मालेगांव सेक्युलर फ्रंट गठबंधन बना. लोगों को लगने लगा कि अगर हम इन लोगों को निगम सौंपेंगे, तो 1,000 से ज्यादा अवैध बांग्लादेशी रोहिंग्या होने के आरोप जैसे मुद्दे सुलझाए जाएंगे.”

शेख के लिए मालेगांव नगर निगम चुनाव पार्टी लाइनों से ऊपर उठकर अपनी विश्वसनीयता साबित करने के लिए बेहद अहम था.

उन्होने दिप्रिंट से कहा, “हम विधानसभा चुनाव सिर्फ 162 वोटों से हारे थे, इसका मतलब है कि लोग हमें पहले ही स्वीकार करने लगे थे. तब और अब के बीच जो बदला, वह है वह काम जो हमने उन लोगों के लिए किया, जो लगातार जांच के दायरे में रहते थे.”

शेख ने नगर निगम चुनाव में ISLAM पार्टी को AIMIM के विकल्प के रूप में पेश किया.

उन्होंने कहा, “2024 में मालेगांव सेंट्रल से सीट जीतने के बाद एक साल में AIMIM की नाकामी, नया स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन जो मालेगांव के मुस्लिम अल्पसंख्यकों को प्रभावित करेगा, और शहर का विकास—यही हमारा मुख्य फोकस था.”

महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव धनंजय शिंदे ने कहा कि धार्मिक अपील पर आधारित चुनावी सफलता आखिरकार शहर की सबसे जरूरी समस्याओं को हल करने में नाकाम रहती है.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “मालेगांव की समस्याएं गरीबी, भोजन, कपड़ा और मकान हैं. यही असली मुद्दे हैं. धार्मिक राजनीति इन बुनियादी जरूरतों का जवाब नहीं दे सकती. अब MIM से उम्मीद की जा रही है कि वह उनका समर्थन करे. जैसे चरमपंथी हिंदू राजनीति होती है, वैसे ही चरमपंथी मुस्लिम राजनीति भी धार्मिक ध्रुवीकरण के जरिए काम करती है. ऐसी राजनीति समाधान नहीं, बल्कि विभाजन पैदा करती है.”

ISLAM पार्टी पर धार्मिक राजनीति का प्रतिनिधित्व करने के आरोपों पर जवाब देते हुए शेख ने कहा, “मीडिया कह रहा है कि हम एक मुस्लिम पार्टी हैं, जातिवादी इस्लामी पार्टी हैं. ऐसा नहीं है. हां, हमारी धार्मिक आस्था है, लेकिन हम पूरी तरह से सेक्युलर पार्टी की विचारधारा के साथ खड़े हैं. यह हमारे पूरे नाम में भी है.”

मालेगांव का तनावपूर्ण इतिहास

मालेगांव के राजनीतिक चुनाव उसके जनसांख्यिकीय और सांप्रदायिक इतिहास से अलग नहीं किए जा सकते. 2011 की जनगणना के अनुसार, शहर की लगभग 79 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है.

शहर भौगोलिक रूप से मौसमी नदी से बंटा हुआ है. नदी के पूर्वी किनारे पर ज्यादातर मुस्लिम इलाके हैं, जबकि पश्चिमी तरफ हिंदू इलाके बसे हुए हैं.

यह सामाजिक और भौगोलिक विभाजन 2006 और 2008 के बम धमाकों के बाद और गहरा हो गया. इन धमाकों में 40 से ज्यादा लोगों की मौत हुई और जांच को लेकर कई सालों तक विवाद चलता रहा. सितंबर 2006 के धमाके के मामले में महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधक दस्ते (ATS) ने नौ मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार किया और उन पर महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण कानून (MCOCA) के तहत आरोप लगाए.

2016 में, एक विशेष MCOCA अदालत ने सबूतों की कमी और अभियोजन पक्ष की गंभीर प्रक्रियात्मक खामियों का हवाला देते हुए सभी नौ आरोपियों को बरी कर दिया. 2017 में, राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) द्वारा मामले की समीक्षा के बाद, 2006 के धमाकों से जुड़े मामले में कथित हिंदुत्ववादी चरमपंथियों के नाम चार्जशीट में डाले गए.

सितंबर 2008 के धमाके के मामले में, उस समय के ATS प्रमुख हेमंत करकरे के नेतृत्व में हुई जांच में हिंदू चरमपंथी संगठनों की भूमिका सामने आई. एटीएस ने साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित और पांच अन्य लोगों को मुख्य साजिशकर्ता बताते हुए गिरफ्तार किया. बाद में ठाकुर और पुरोहित दोनों को जमानत मिल गई.

2011 में एनआईए ने यह मामला अपने हाथ में लिया, MCOCA की धाराएं हटा दीं, लेकिन गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम और आर्म्स एक्ट के तहत आतंक से जुड़े आरोप बनाए रखे. 31 जुलाई 2025 को मुंबई की एक विशेष NIA अदालत ने सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया. अदालत ने कहा कि मामले को संदेह से परे साबित करने के लिए विश्वसनीय सबूत मौजूद नहीं हैं.

इन सभी घटनाओं का कुल असर यह हुआ कि मालेगांव की राजनीति में संस्थाओं के प्रति अविश्वास, पहचान के आधार पर एकजुटता और ऐसे प्रतिनिधित्व की लगातार मांग बनी रही, जो नागरिक अधिकारों की रक्षा करते हुए सरकारी तंत्र के साथ काम कर सके.

शेख के अनुसार, ISLAM पार्टी का एजेंडा इसी हकीकत से आकार लेता है.

उन्होंने कहा, “यह ज्यादा प्रतीकों की राजनीति नहीं थी, बल्कि रोजमर्रा के प्रशासन से जुड़ी थी, और खास तौर पर मालेगांव के लोगों पर किए जाने वाले गलत आरोपों के खिलाफ कानूनी सुरक्षा से जुड़ी थी.”

अलग रास्ता

मालेगांव सेंट्रल विधानसभा सीट महाराष्ट्र की उन गिनी-चुनी सीटों में से है, जहां आज़ादी के बाद से लगातार मुस्लिम विधायक चुने जाते रहे हैं. दशकों तक यहां की राजनीति दो परिवारों के इर्द-गिर्द घूमती रही—समाजवादी नेता निहाल अहमद और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रशीद शेख.

रशीद शेख कांग्रेस के टिकट पर मालेगांव सेंट्रल से दो बार विधायक रहे. वे पहली बार 1999 में और दूसरी बार 2004 में चुने गए. उन्होंने जनता दल के दिवंगत नेता निहाल अहमद के लगातार पांच बार जीतने के सिलसिले को तोड़ने में अहम भूमिका निभाई. शेख की पत्नी ताहिरा, जो कांग्रेस से थीं, जून 2012 में मालेगांव की पहली महिला मेयर बनीं. 2017 के नगर निगम चुनाव में रशीद शेख खुद मेयर बने और अपनी पत्नी के बाद यह पद संभाला.

दंपति के बेटे आसिफ शेख 2014 में कांग्रेस के टिकट पर मालेगांव सेंट्रल से विधायक बने, लेकिन 2019 में AIMIM के मोहम्मद इस्माइल अब्दुल खालिक से हार गए.

2021 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और अविभाजित राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में शामिल हो गए. वे एनसीपी की मालेगांव इकाई के अध्यक्ष भी बने, लेकिन 2024 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी से नाता तोड़ लिया और स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने का फैसला किया.

शेख ने कहा, “महाराष्ट्र में कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व पूरी तरह कमजोर हो गया था. हमारी जो समस्याएं थीं, हमारे जो सवाल थे, नेतृत्व के कमजोर होने की वजह से न तो विकास का काम हो पा रहा था और न ही अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दों का समाधान हो रहा था. इसी वजह से मैंने पार्टी से इस्तीफा दिया. इसके बाद हम शरद पवार साहब की एनसीपी में गए, लेकिन जब एनसीपी दो हिस्सों में बंट गई, तो हमने अपना अलग रास्ता चुना.”

शेख ने 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से ठीक पहले ISLAM पार्टी बनाई और समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार शान-ए-हिंद—जो दिवंगत पांच बार के विधायक निहाल अहमद की बेटी हैं—के खिलाफ चुनाव लड़ने का ऐलान किया.

उस समय यह सीट AIMIM के मुफ्ती इस्माइल के पास थी, जो एक धर्मगुरु से राजनेता बने और 2006 के मालेगांव बम धमाकों के बाद चर्चा में आए थे.

ISLAM पार्टी की शुरुआत

2 जनवरी 2025 को, भाजपा महाराष्ट्र के उपाध्यक्ष और सांसद किरीट सोमैया ने आरोप लगाया कि मालेगांव के हज़ारों निवासियों ने धोखाधड़ी से जन्म प्रमाण पत्र हासिल किए हैं और वे बांग्लादेशी रोहिंग्या हैं.

इन आरोपों के बाद 8 जनवरी 2025 को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के आदेश पर एक विशेष जांच टीम (एसआईटी) गठित की गई. इसके बाद हजारों लोगों को जांच के लिए बुलाया गया, जिससे स्थानीय लोगों में व्यापक डर फैल गया.

26 जनवरी 2025 को, शेख और समाजवादी पार्टी के मालेगांव अध्यक्ष मुस्तकीम डिग्निटी ने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के साथ मिलकर माइनॉरिटी डिफेंस कमेटी (MDC) बनाई. इसका उद्देश्य जांच का सामना कर रहे लोगों को कानूनी और प्रशासनिक मदद देना था.

मुस्तकीम ने कहा, “उन्होंने (एसआईटी) उन 3,411 लोगों की जांच शुरू की जो मालेगांव में पैदा हुए थे. इसके साथ ही पुलिस, आईजी विभाग, जिला एसपी सहित एक बड़ी टीम जांच के लिए बनाई गई. हमारे पास कोई और रास्ता नहीं था. इसलिए हमने एक कमेटी बनाई और मिलकर काम शुरू किया. हमने उनके लिए ज़रूरी कानूनी काम किया. जांच के दौरान व्यावहारिक मदद भी की.”

मालेगांव सेंट्रल महाराष्ट्र विधानसभा में AIMIM के पास मौजूद एकमात्र सीट है. शेख ने संकेत दिया कि इसी वजह से सरकार मालेगांव को निशाना बना रही है.

मुस्तकीम ने कहा, “मुझे लगता है कि ये आरोप और एसआईटी का गठन MIM को कमजोर करने के लिए किया गया, जिसने 2024 में यहां से सीट जीती थी. मुझे नहीं लगता कि वे इसका सामना कर पाएंगे.”

शेख ने कहा कि भले ही गठबंधन ने माइनॉरिटी डिफेंस कमेटी बनाई, लेकिन “AIMIM स्थानीय लोगों की प्रभावी ढंग से रक्षा नहीं कर पाई और लोगों ने यह देखा.”

उन्होंने कहा, “वार्ड स्तर पर चर्चाओं और कार्यक्रमों के जरिए इस समूह को विरोध के मंच की बजाय समस्या सुलझाने वाले समूह के रूप में पेश करना ज़रूरी था.”

उनका तर्क था कि AIMIM ने मुस्लिम गुस्से और पहचान को तो एकजुट किया, लेकिन उसे नगर प्रशासन में नहीं बदल पाई. उन्होंने कहा, “लोगों को ऐसी पार्टी चाहिए थी जो बातचीत कर सके, प्रशासन चला सके और उनकी रक्षा कर सके.”

चुनाव के बाद की सियासी जोड़-तोड़

मालेगांव नगर निगम चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिलने के कारण, चुनाव के बाद राजनीतिक समीकरण अभी भी बदलते हुए हैं.

नतीजों में पारंपरिक पार्टियों को बड़ा झटका लगा. महाराष्ट्र के नासिक जिले में स्थित मालेगांव, जिसे कभी कांग्रेस का गढ़ माना जाता था, वहां पार्टी सिर्फ तीन सीटों पर सिमट गई. वहीं, राज्य के कई हिस्सों में नगर निकायों पर दबदबा रखने वाली भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) भी शहर में केवल दो सीटें ही जीत पाई.

असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाली AIMIM 26 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर रही, जिससे शहर में मुस्लिम वोटों के एकजुट होने का संकेत मिला. एकनाथ शिंदे की शिवसेना स्थानीय विधायक दादाजी भुसे के नेतृत्व में 18 सीटें जीतकर तीसरे स्थान पर रही.

AIMIM के साथ संभावित गठबंधन पर मुस्तकीम ने कहा, “हमने MIM से कहा है कि वे बिना किसी शर्त हमारे साथ आ सकते हैं, क्योंकि मेयर हमारे साथ है. चुनाव को काफी समय हो गया है, लेकिन उन्होंने अभी तक कोई जवाब नहीं दिया है.”

उन्होंने आगे कहा, “अगर MIM, शिंदे सेना, कांग्रेस और भाजपा एक साथ आते हैं, तो उन्हें 44 सीटें मिल जाएंगी. अगर ऐसा होता है, तो हम सीधे विपक्ष में बैठने को तैयार हैं. यह भी हमारे लिए एक बड़ी जीत होगी.”

लेकिन AIMIM के मालेगांव सेंट्रल से विधायक मुफ्ती इस्माइल ने दिप्रिंट से कहा कि 22 जनवरी को AIMIM महाराष्ट्र अध्यक्ष इम्तियाज जलील के मालेगांव दौरे के बाद पार्टी को सेक्युलर फ्रंट से बातचीत शुरू करने के निर्देश मिले हैं.

मुफ्ती ने कहा, “महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष इम्तियाज जलील साहब आए थे और उनके साथ पार्टी के अन्य लोग भी थे. उन्होंने कहा—‘ठीक है, उनसे बात करो.’ हमने अभी बातचीत शुरू नहीं की है, लेकिन हमें नेतृत्व से बात करने की अनुमति मिल गई है.”

महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव धनंजय शिंदे ने ISLAM पार्टी के साथ किसी भी चुनाव बाद समझौते से इनकार किया.

शिंदे ने दिप्रिंट से कहा, “कांग्रेस ने मालेगांव में कुछ (तीन) सीटें जीती हैं, लेकिन इस पार्टी के साथ कोई गठबंधन करने का मन नहीं है. धार्मिक आधार पर की जाने वाली राजनीति हमें स्वीकार नहीं है. अगर वे हमारी सोच, हमारी विचारधारा और हमारी राजनीति की शैली में विश्वास करते हैं, तो ऐसे फैसले नेतृत्व स्तर पर लिए जाते हैं. लेकिन गठबंधन सिर्फ सुविधा के आधार पर नहीं हो सकते.”

उन्होंने कहा, “असल सवाल यह है कि वे मालेगांव को कैसे चलाएंगे. चुनाव जीतना एक बात है, लेकिन जिम्मेदारी से शासन करना दूसरी.”

हालांकि, मालेगांव कांग्रेस अध्यक्ष एजाज बेग ने दावा किया कि पार्टी अब मालेगांव सेक्युलर फ्रंट को नगर निगम चलाने में समर्थन देने के लिए तैयार है. उनके समर्थन से कुल संख्या 43 हो जाएगी.

बेग ने दिप्रिंट से कहा, “हमने उन्हें समर्थन देने का फैसला किया है. मेयर उनका होगा और बाकी पदों को लेकर हम आपस में चर्चा करेंगे.”

मालेगांव से आगे?

फिलहाल, ISLAM का नेतृत्व तुरंत विस्तार की योजना बनाने के बजाय शहर में अपनी पकड़ मजबूत करने पर ध्यान दे रहा है.

पार्टी प्रमुख ने कहा, “इस समय फोकस मालेगांव पर है और यही पार्टी का राजनीतिक केंद्र बना रहेगा.”

लेकिन शेख “महाराष्ट्र में पार्टी का विस्तार करने के बारे में भी सोच रहे हैं.”

उन्होंने कहा, “महाराष्ट्र के अलग-अलग जिले हैं—मुंबई, भिवंडी, नांदेड़, अमरावती, औरंगाबाद, शोलापुर, कोल्हापुर और धुले. हमने तय किया है कि मेयर चुनाव के बाद इस पर काम करेंगे.”

यह देखना अभी बाकी है कि ISLAM सिर्फ एक अस्थायी उभार है या सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील मालेगांव की राजनीति का स्थायी हिस्सा बनेगी, लेकिन इसके उभार ने शहर की राजनीति की भाषा जरूर बदल दी है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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