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Friday, 23 January, 2026
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योगी का ‘कालनेमि’ बनाम मौर्य का ‘भगवान शंकराचार्य’—अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर यूपी सरकार में मतभेद

मौनी अमावस्या पर ज्योतिर्मठ के ‘शंकराचार्य’ और उनके अनुयायियों को यूपी सरकार द्वारा संगम में पवित्र स्नान से रोके जाने के बाद शुरू हुआ विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है.

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नई दिल्ली: मौनी अमावस्या के दिन उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उत्तराखंड के ज्योतिर्मठ के 46वें पीठाधीश्वर या ‘शंकराचार्य’ स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के साथ कथित तौर पर किए गए ‘अपमान’ ने न सिर्फ संत समाज को, बल्कि राज्य की भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सरकार को भी बांट दिया है.

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने आरोप लगाया है कि योगी आदित्यनाथ सरकार ने उन्हें मौनी अमावस्या के शुभ दिन प्रयागराज के त्रिवेणी संगम में पवित्र स्नान करने से रोका और उनके सहयोगियों के साथ दुर्व्यवहार किया. हालांकि, जिला प्रशासन ने इन आरोपों से इनकार किया है.

प्रशासन का कहना है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के साथ करीब 200–300 अनुयायियों का बड़ा समूह था और उनके पास ज़रूरी अनुमति नहीं थी, इसलिए उन्हें रोका गया.

कथित दुर्व्यवहार से नाराज़ शंकराचार्य मौनी अमावस्या से ही संगम तट पर धरने पर बैठे हैं और उन्होंने ऐलान किया है कि वे बसंत पंचमी पर भी पवित्र स्नान नहीं करेंगे.

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने योगी आदित्यनाथ पर भी हमला बोलते हुए कहा कि वे हिंदू कहलाने योग्य नहीं हैं.

उन्होंने मीडिया से कहा, “हम उन्हें अकबर और औरंगज़ेब कहते हैं. यह वही व्यक्ति है जो मंदिर गिराने का समर्थन करता है.”

यह मामला तब और बढ़ गया जब गुरुवार को यूपी के मुख्यमंत्री ने “कालनेमि जैसी ताकतों” के खिलाफ कड़ा बयान दिया. बिना किसी का नाम लिए मुख्यमंत्री ने कहा कि धर्म की आड़ में कुछ लोग सनातन धर्म को कमजोर करने की साजिश कर रहे हैं और सनातन धर्म के अनुयायियों को उनसे सतर्क रहने की ज़रूरत है.

हरियाणा में एक प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम के दौरान योगी आदित्यनाथ ने कहा, “एक योगी के लिए, सन्यासी के लिए, संत के लिए धर्म और राष्ट्र से बढ़कर कुछ नहीं हो सकता. उसकी निजी संपत्ति कुछ नहीं होती, धर्म और राष्ट्र ही उसका स्वाभिमान है. ऐसे कई कालनेमि होंगे जो धर्म की आड़ में सनातन धर्म को कमजोर करने की साजिश रच रहे होंगे. हमें उनसे सावधान और सतर्क रहना होगा.”

कालनेमि रामायण का एक पात्र है, जो राक्षस था और जिसने हनुमान को संजीवनी बूटी लाने से रोकने के लिए साधु का वेश धारण किया था.

लखनऊ में एसपी कार्यालय के पास शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में लगा पोस्टर | एएनआई
लखनऊ में एसपी कार्यालय के पास शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में लगा पोस्टर | एएनआई

मुख्यमंत्री के इस बयान के कुछ घंटे बाद ही उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में सामने आए.

संयम और सम्मान की बात करते हुए मौर्य ने शंकराचार्य को “भगवान शंकराचार्य” कहा और कहा कि किसी भी पूजनीय संत, आचार्य या शंकराचार्य का अपमान बिल्कुल स्वीकार नहीं किया जा सकता.

मीडिया से बात करते हुए मौर्य ने कहा कि यदि किसी तरह के अपमान या अनादर की बात सामने आती है तो इसकी जांच कराई जाएगी और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होगी.

उन्होंने कहा, “हम शंकराचार्य जी के चरणों में नमन करते हैं और उनसे पवित्र स्नान करने का अनुरोध करते हैं. मामला यहीं समाप्त होना चाहिए. जिसने भी कुछ गलत किया है, उसकी जांच होगी. किसी भी पूजनीय संत, आचार्य या शंकराचार्य का अपमान नहीं होना चाहिए. अगर किसी ने ऐसा किया है तो जांच के बाद कार्रवाई होगी. सबसे पहले मैं शंकराचार्य जी के चरणों में नमन करता हूं और उनसे अपना आंदोलन समाप्त कर पवित्र स्नान करने का आग्रह करता हूं.”

मौर्य से पहले यूपी बीजेपी नेता सुनील भालारा ने भी कहा था कि शंकराचार्य का अपमान करना सनातन धर्म का अपमान करने जैसा है.

उन्होंने कहा, “प्रयागराज में राक्षसी मानसिकता वाले अधिकारियों ने शंकराचार्य के शिष्यों की शिखा पकड़कर सनातन का अपमान किया. मैं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से ऐसे अधिकारियों पर कार्रवाई करने की मांग करता हूं.”

इस पूरे मामले में उत्तर प्रदेश बीजेपी भी असमंजस में फंसी हुई है.

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “योगी जी और केशव मौर्य जी के बयानों से पार्टी नेताओं में भ्रम की स्थिति बन गई है कि इस मुद्दे से कैसे निपटा जाए. यह बात सभी जानते हैं कि दोनों अलग-अलग खेमों से आते हैं, लेकिन यह पहली बार है जब किसी मुद्दे पर उनका खुला टकराव सामने आया है. राज्य इकाई एक बार फिर दो गुटों में बंटी नज़र आ रही है.”

विवाद यहीं नहीं रुका है. माघ मेला प्राधिकरण ने भी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा ‘शंकराचार्य’ की उपाधि के लगातार इस्तेमाल पर नोटिस जारी किया है. इसमें उनसे यह भी पूछा गया है कि 2022 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनके अभिषेक पर रोक लगाए जाने के बावजूद वे यह उपाधि क्यों इस्तेमाल कर रहे हैं.

हालांकि, मौर्य से समर्थन मिलने के बावजूद कई संतों और अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने योगी आदित्यनाथ का समर्थन किया है. उनका कहना है कि माघ मेले में शाही स्नान नहीं होता, इसलिए अविमुक्तेश्वरानंद को इस पर ज़ोर नहीं देना चाहिए था.

अब तक बीजेपी ने इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है. वहीं, विपक्षी समाजवादी पार्टी ने यूपी सरकार पर संत को निशाना बनाने और पवित्र धार्मिक परंपराओं का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया है.

शंकराचार्य और उनके समर्थकों का कहना है कि यूपी सरकार की कार्रवाई उनके राज्य सरकार और मुख्यमंत्री की आलोचना करने के कारण प्रेरित है.

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को कांग्रेस का भी समर्थन मिला है. कांग्रेस का आरोप है कि योगी आदित्यनाथ सरकार ने हिंदू संत को इसलिए निशाना बनाया क्योंकि उन्होंने कई मौकों पर बीजेपी के फैसलों की आलोचना की थी, जिसमें अयोध्या में “अधूरे” राम मंदिर का प्राण-प्रतिष्ठा समारोह, कुंभ मेले का कुप्रबंधन और कोविड-19 महामारी के दौरान गंगा में तैरती लाशों का मुद्दा शामिल है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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