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Thursday, 22 January, 2026
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भारतीय छात्र युद्ध क्षेत्रों में फंस रहे हैं—डॉक्टर बनाने के लिए परिवार बच्चों को कहीं भी भेज रहे हैं

मुझे उम्मीद है कि ईरान में भारतीय छात्र सुरक्षित घर लौट आएंगे. उन्होंने घर और विदेश में बहुत दुख झेला है. लेकिन एक ऐसा कल्चर जो 2026 में सिर्फ़ दो प्रोफेशन को ही स्वीकार करता है, वह इससे कुछ नहीं सीखेगा. अगली निकासी में मिलते हैं.

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दुनिया में कहीं भी युद्ध छिड़ता है, तो भारतीय छात्र अचानक भागते नज़र आते हैं. एक्स पर इन दिनों एक मीम शेयर हो  रहा है, जिसमें ओम शांति ओम का एक क्लिप लगा है, जहां जलते हुए मैदान के बैकग्राउंड में शाहरुख खान “भागो.” चिल्लाते हैं. यह मज़ेदार इसलिए है क्योंकि यह सच है. और उतना ही परेशान करने वाला भी है, क्योंकि यह सच है. भारत के महत्वाकांक्षी डॉक्टर और इंजीनियर दुनिया भर में इतने फैले हुए हैं कि अब वे हर कॉन्फ्लिक्ट का जैसे हिस्सा बन गए हैं.

ईरान में हुए जानलेवा प्रदर्शनों के साथ, यह चार साल में तीसरी बार है जब भारतीय छात्र किसी ऐतिहासिक संकट के बीच फंस गए हैं. 1979 की क्रांति के बाद सबसे बड़े इस विरोध में, रिपोर्ट के मुताबिक, शासन के खिलाफ प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई में ईरान में करीब 5,000 लोगों की मौत हो चुकी है. इंटरनेट बंद है और कमर्शियल उड़ानें रद्द हैं.

ईरान में मौजूद करीब 10,000 भारतीयों में से कई मेडिकल छात्र हैं. इनमें से बड़ी संख्या जम्मू और कश्मीर से है, जो तेहरान और इस्फहान की यूनिवर्सिटियों में पढ़ रहे हैं. अब निकासी शुरू हो चुकी है, जिसमें गोलिस्तान यूनिवर्सिटी, शाहिद बेहेश्ती यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल साइंसेज और तेहरान यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल साइंसेज के छात्र पहले समूह के तौर पर रवाना हुए हैं.

ऐसी ही स्थिति फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान देखने को मिली थी. ऑपरेशन गंगा के तहत 23,000 भारतीय नागरिकों को निकाला गया, जिनमें से ज़्यादातर एमबीबीएस के छात्र थे, जब रूसी सेनाओं ने खारकीव और कीव पर गोलाबारी की थी. उसी अभियान से मशहूर टैगलाइन भी निकली थी, “पापा वॉर रुकवा दी.” यूक्रेन में जारी संघर्ष ने कई एमबीबीएस छात्रों को असमंजस में छोड़ दिया, जिनमें से कुछ ने पूरी तरह यह पेशा छोड़ने का फैसला कर लिया. जून 2025 में ईरान-इज़रायल संघर्ष के दौरान ऑपरेशन सिंधु के तहत 1,000 से ज़्यादा भारतीयों को निकाला गया, जिनमें 285 छात्र शामिल थे.

लेकिन ईरान और यूक्रेन ही एकमात्र संकट नहीं हैं. मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे भारतीय छात्र अब उन CIS देशों में भी हैं, जिन्हें आमतौर पर इन क्षेत्रों से नहीं जोड़ा जाता.

डिस्काउंट डिग्री का जाल

हालांकि अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा अब भी गोल्ड स्टैंडर्ड माने जाते हैं, लेकिन सैकड़ों हज़ार छात्र कज़ाकिस्तान जा रहे हैं, जहां भारतीय छात्रों की संख्या 12,000 से ज़्यादा हो चुकी है, और किर्गिस्तान, जहां करीब 15,000 भारतीय छात्र हैं. ये एमबीबीएस पढ़ने के सबसे सस्ते देशों में शामिल हैं, चीन, बांग्लादेश, फिलीपींस और जॉर्जिया के साथ.

यह पलायन आर्थिक रूप से समझ में आता है. इन देशों की डिग्रियां भारत के निजी मेडिकल कॉलेजों या अमेरिका और ब्रिटेन के मुकाबले बहुत सस्ती हैं. यह सांस्कृतिक रूप से भी समझ में आता है. “डॉ.” का टाइटल आज भी मिडिल क्लास के लिए सबसे बड़ा स्टेटस सिंबल है, जिसके लिए पुश्तैनी ज़मीन बेचने या लोन में डूबने तक के लिए लोग तैयार हैं. और यह सिस्टम के स्तर पर भी तार्किक लगता है. जब हर साल 22 लाख छात्र 1 लाख एमबीबीएस सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, तो बाकी 21 लाख को कहीं न कहीं जाना ही होता है.

लेकिन जब वे वापस आते हैं, तब यह सब मायने नहीं रखता.

इन डिग्रियों की भरमार के बावजूद, फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट एग्ज़ामिनेशन (FMGE) का पास परसेंटेज बेहद खराब 10 से 25 प्रतिशत के बीच रहता है. भारत में प्रैक्टिस करने के लिए इस परीक्षा में कम से कम 50 प्रतिशत अंक लाना ज़रूरी है. 2014 में यह आंकड़ा सिर्फ 4.93 प्रतिशत था. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, बांग्लादेश और नेपाल से पढ़े छात्रों का पास प्रतिशत आर्मेनिया, बेलारूस, जॉर्जिया और कज़ाकिस्तान जैसे देशों के मुकाबले “तुलनात्मक रूप से बेहतर” है.

NDTV की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, एक्सपर्ट्स ने लो पास परसेंटेज के कारणों में से एक वजह क्लिनिकल एक्सपोज़र की कमी और घटिया मेडिकल एजुकेशन को बताया: “भारत के मेडिकल कॉलेजों के उलट, विदेशों के कॉलेजों में सही इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है. इन मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन लेने वाले स्टूडेंट्स को अस्पतालों में ट्रेनिंग नहीं दी जाती है. दूसरी ओर, भारत के मेडिकल स्टूडेंट्स को अपनी MBBS डिग्री पूरी करने के लिए एक साल की इंटर्नशिप करना ज़रूरी होता है.”

दिल्ली के एक सीनियर डॉक्टर ने हालिया बातचीत में बताया कि दुनियाभर में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर करने की मांग है, लेकिन डॉक्टरों की संख्या ही पर्याप्त नहीं है.

उन्होंने कहा, “हेल्थकेयर एक ऐसी चीज़ है जो हर सरकार अपने लोगों को देना चाहती है. यह एक राजनीतिक ज़रूरत है. लेकिन देश जितना अमीर होता है, उसे उतनी ही बेहतर स्किल वाला मैनपावर मिलता है. इसका मतलब है कि विकल्प रखने वाले डॉक्टर दुबई, अमेरिका और ब्रिटेन में प्रैक्टिस करना चाहते हैं.”

इससे एक श्रृंखलाबद्ध कमी पैदा होती है. भारत कई AIIMS खोलकर और निजी मेडिकल कॉलेजों को अनुमति देकर क्षमता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. लेकिन डॉक्टर तैयार करने के लिए सिर्फ कॉलेज नहीं, बल्कि इंफ्रास्ट्रक्चर, टीचिंग स्टाफ और अस्पतालों से साझेदारी भी चाहिए.CIS की यूनिवर्सिटियों ने इस मौके को समझ लिया है, क्योंकि विदेशी छात्र उनके लिए कमाई का जरिया हैं. लेकिन इनमें से कई कॉलेजों में अच्छी सुविधाएं नहीं हैं. भारतीय सरकार नियमित रूप से छात्रों को डिग्री की वैधता जांचने की सलाह देती है. और अंग्रेज़ी माध्यम होने के बावजूद भाषा की बाधाएं भी हैं.

वरिष्ठ डॉक्टर ने कहा, “आप इसे क्लिनिकल इंटरैक्शन में देख सकते हैं. सीनियर क्लिनिशियंस के बीच यह धारणा साफ है. अगर आपके पास भारत में प्रशिक्षित ग्रेजुएट और CIS यूनिवर्सिटी से पढ़े ग्रेजुएट में से चुनने का विकल्प है, तो आप भारतीय को चुनते हैं.”

भारत का FMGE इसी क्वालिटी गैप को दूर करने के लिए डिज़ाइन किया गया था, ठीक वैसे ही जैसे UK का PLAB एग्जाम. यहां तक ​​कि नेशनल एक्रेडिटेशन बोर्ड फॉर हॉस्पिटल्स एंड हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स के पास भी फर्जी डिग्री को रोकने के लिए सख्त क्रेडेंशियल पॉलिसी हैं. लेकिन दुनिया के सारे चेक और बैलेंस भी इस विरोधाभास को हल नहीं कर पाएंगे. हमें ज़्यादा डॉक्टरों की ज़रूरत है, लेकिन उन्हें ट्रेन करने की क्षमता हमारे पास नहीं है. सीनियर डॉक्टर ने आखिर में कहा, “डॉक्टर की उपाधि पाने की बेचैनी आपको कहीं भी ले जा सकती है.”

डॉक्टर, इंजीनियर, या फिर कुछ नहीं

यहीं पर हम एक बार फिर उसी पुराने और थकाऊ सवाल पर पहुंचते हैं, जिसे 2010 के दशक की लगभग हर औसत वेब सीरीज़ ने समझाने की कोशिश की थी. परिवार आज भी डॉक्टर और इंजीनियर बनाने को लेकर इतने जुनूनी क्यों हैं.

इस जुनून के पीछे एक गहरी और कमजोर कर देने वाली डर की भावना है. वह डर है उस सामाजिक वर्ग में नीचे गिर जाने का, जिससे निकलने के लिए आपने बड़ी मुश्किल से संघर्ष किया है. दशकों में यह डर इतना बढ़ गया है कि इससे बचने के लिए सिर्फ दो ही बीमा माने जाते हैं—डॉक्टर और इंजीनियर. बाकी सब कुछ इसी से निकलता है.

कोटा और सीकर की कोचिंग फैक्ट्रियां इसलिए मौजूद हैं क्योंकि परिवार हर साल 1.5 से 3 लाख रुपये खर्च करने को तैयार रहते हैं, ताकि उनका बच्चा डॉक्टर न बन पाने की सामाजिक, और कई बार वास्तविक, मौत से बच सके. जब कोई छात्र तीन साल की कोचिंग के बाद भी सफल नहीं हो पाता, तो फिर ‘संक कॉस्ट फॉलसी’ हावी हो जाती है. ऐसे में किसी ऐसे देश के स्ट्रिप मॉल जैसे कॉलेज में दाखिला लेना, जिसका नाम ठीक से बोला भी नहीं जा सकता, निवेश को बचाने का एकमात्र तरीका बन जाता है. जब विकल्प मौजूद होते हुए भी उन्हें स्वीकार्य नहीं माना जाता, तो परिवार अपने बच्चों को युद्ध क्षेत्रों में भेजने से भी नहीं हिचकते, अगर वही रास्ता बचा हो.

मुझे उम्मीद है कि ईरान में फंसे भारतीय छात्र सुरक्षित घर लौट आएं. उन्होंने देश में भी और देश से बाहर भी काफी कुछ झेला है. लेकिन 2026 में भी जो संस्कृति सिर्फ दो पेशों को ही स्वीकार करती है, वह इससे कुछ नहीं सीखेगी. अगली निकासी में फिर मिलेंगे.

करनजीत कौर एक जर्नलिस्ट, Arré की पूर्व एडिटर और TWO डिज़ाइन में पार्टनर हैं. वह @Kaju_Katri पर ट्वीट करती हैं. विचार व्यक्तिगत हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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