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Tuesday, 20 January, 2026
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पंजाब में ‘लापता सरूप’ मामला: मुख्यमंत्री भगवंत मान का कदम क्यों बन सकता है राजनीतिक जोखिम

‘139 अनधिकृत’ गुरु ग्रंथ साहिब की ‘बरामदगी’ को लेकर मान के दावे और इसे लापता सरूप मामले में अपनी सरकार की उपलब्धि के तौर पर पेश करने से पंजाब में बड़ा विवाद खड़ा हो गया है.

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चंडीगढ़: आम आदमी पार्टी (आप) को रविवार को बड़ा झटका लगा, जब बंगा से पार्टी के विधायक सुखविंदर सिंह सुखी ने कैबिनेट रैंक के पद और पंजाब स्टेट वेयरहाउसिंग कॉरपोरेशन के चेयरमैन पद से इस्तीफा दे दिया. उन्होंने यह इस्तीफा सरकार के उस दावे के विरोध में दिया, जिसमें कहा गया था कि उसने उनके निर्वाचन क्षेत्र के एक गुरुद्वारे से “139 अनधिकृत” गुरु ग्रंथ साहिब बरामद किए हैं.

यह कदम उस बड़े विवाद के बीच आया है, जो मुख्यमंत्री भगवंत मान द्वारा बुधवार को मुक्तसर में माघी मेले के दौरान की गई घोषणा के बाद खड़ा हुआ. मान ने कहा था कि बंगा के एक गुरुद्वारे में कुल 169 गुरु ग्रंथ साहिब रखे थे, जिनमें से 139 उनके मुताबिक “अनधिकृत” थे. मान ने इनकी “बरामदगी” को कथित रूप से लापता 328 गुरु ग्रंथ साहिब सरूप (प्रतियों) के मामले में अपनी सरकार की उपलब्धि के रूप में पेश किया.

सुखी ने 2022 का विधानसभा चुनाव अकाली दल के उम्मीदवार के तौर पर जीता था, लेकिन पिछले साल अगस्त में उन्होंने मान की मौजूदगी में AAP जॉइन कर ली थी. इसके बाद उन्हें कैबिनेट रैंक और पीएसयू का पद दिया गया था.

गुरुद्वारे की प्रबंध समिति ने गुरुवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में सरकार के इस कदम का जोरदार विरोध किया और कहा कि जिन गुरु ग्रंथ साहिब को “बरामद” बताया जा रहा है, वे लापता 328 सरूपों में से नहीं हैं.

गुरुद्वारा प्रबंध समिति के सदस्य अमरीक सिंह ने कहा, “मुख्यमंत्री को यह पूछने का क्या अधिकार है कि गुरुद्वारे में रखे सरूप कहां से आए?”. उन्होंने यह भी कहा कि वह इलाके में AAP के सक्रिय समर्थक थे, लेकिन अब उन्होंने पार्टी छोड़ने का फैसला कर लिया है.

इस इस्तीफे से मान और अकाल तख्त के बीच संबंधों में और तनाव आ गया है. पहले से ही ये रिश्ते तब से नाजुक हैं, जब सरकार ने पांच साल पुराने विवाद को फिर से उठाया और गुरु ग्रंथ साहिब के 328 सरूपों की छपाई और वितरण में कथित गड़बड़ी को लेकर पुलिस केस दर्ज किया. सिख गुरु ग्रंथ साहिब को जीवित गुरु मानते हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मान आग से खेल रहे हैं.

अमृतसर स्थित गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान विभाग के पूर्व प्रोफेसर जागरूप सिंह सेखों ने दिप्रिंट से कहा, “सरकार का इस निषिद्ध क्षेत्र में दखल देने का कोई काम नहीं है.”

उन्होंने कहा, “सरकार लोगों का ध्यान एक धार्मिक मुद्दे की तरफ मोड़ने की कोशिश कर रही है, क्योंकि उसे लगता है कि उसके पास प्रदर्शन के नाम पर ज्यादा कुछ दिखाने को नहीं है. मुख्यमंत्री को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा.”

उन्होंने आगे कहा, “विधायक का इस्तीफा भी एक राजनीतिक कदम है. समस्या यह है कि जिन्हें राजनीति तक सीमित रहना चाहिए, वे धर्म में दखल दे रहे हैं और जिन्हें धर्म तक सीमित रहना चाहिए, वे राजनीति में आ रहे हैं.”

कुछ अन्य लोगों का कहना है कि यह मामला हाथ से निकल सकता है.

चंडीगढ़ स्थित पंजाब यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र विभाग के पूर्व प्रोफेसर मनजीत सिंह ने कहा, “इतिहास साफ तौर पर दिखाता है कि धार्मिक मामलों में राजनीतिक दखल सत्ता में बैठे लोगों के लिए हमेशा नुकसानदायक रहा है. पुलिस की एक छोटी सी गलती भी बहुत बड़ा रूप ले सकती है.”

बंगा के रसुखाना श्री नभ कंवल राजा गुरुद्वारे से अपने फेसबुक पेज पर जारी एक वीडियो संदेश में सुखी ने कहा कि वह इस्तीफा दे रहे हैं क्योंकि वह और कई अन्य लोग “राजा साहिब” के अनुयायी हैं और सरकार की कार्रवाई से इस तीर्थस्थल का अपमान हुआ है.

उन्होंने कहा, “मैं मुख्यमंत्री और AAP के अन्य नेताओं को समझाने की कोशिश करूंगा कि जो हुआ है, वह सही नहीं है.”

अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज्ज ने गुरुवार को सरकार के कदम को “जल्दबाजी में लिया गया” बताया और कहा कि गुरु ग्रंथ साहिब को “अनधिकृत” और “बरामद” कहना अपमानजनक है.

चंडीगढ़ के सेक्टर 10 स्थित DAV कॉलेज में राजनीति विज्ञान विभाग की डॉ. कंवलप्रीत कौर ने कहा, “इस हद तक धार्मिक मामलों में दखल देना, पुलिस को शामिल करना, सरकारी अधिकारियों का गुरुद्वारों में जाना और उनके खातों की जांच करना—यह सब अच्छे अंजाम की तरफ नहीं जाएगा.”

उन्होंने आगे कहा, “पंजाब में हजारों गुरु ग्रंथ साहिब सरूप धार्मिक स्थलों और निजी घरों में स्थापित होंगे. क्या एसआईटी इन सभी जगहों पर जाकर कागजात जांचेगी? इससे बड़ा बवाल खड़ा होगा और मान जो भी राजनीतिक फायदा हासिल करना चाहते हैं, वह न सिर्फ खत्म हो जाएगा बल्कि उनके खिलाफ चला जाएगा.”

राजनीतिक सत्ता का खेल

ताज़ा विवाद तब शुरू हुआ, जब सरकार ने 7 दिसंबर 2025 को गुरु ग्रंथ साहिब के 328 सरूपों की छपाई और वितरण में कथित गड़बड़ियों को लेकर एक पुलिस मामला दर्ज किया. इस मामले में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) के कर्मचारियों के नाम भी शामिल किए गए. एसजीपीसी वही संस्था है, जो सिख ऐतिहासिक गुरुद्वारों का संचालन और प्रबंधन करती है और गुरु ग्रंथ साहिब की छपाई भी करती है.

“लापता सरूपों” का पता लगाने और यह सुनिश्चित करने के लिए कि वे गलत हाथों में न हों, एक विशेष जांच टीम बनाई गई.

एसजीपीसी का कहना है कि कोई भी सरूप लापता नहीं है.

एसजीपीसी प्रमुख हरजिंदर सिंह धामी ने पिछले हफ्ते एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “सरूपों की छपाई की गई थी और उन्हें उन्हीं लोगों को सौंपा गया था, जिन्होंने उनका ऑर्डर दिया था.”

उन्होंने कहा, “गड़बड़ियां उन संबंधित कर्मचारियों से जुड़ी थीं, जो प्रिंटिंग प्रेस में बिक्री से मिली रकम को एसजीपीसी के खाते में जमा कराने के बजाय खुद रख लेते थे. इन सभी कर्मचारियों को, साथ ही उन लोगों को भी, जिन्हें इस प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करनी थी, सेवा से हटा दिया गया या उन्होंने इस्तीफा दे दिया. गबन की गई कुछ रकम भी बरामद कर ली गई है.”

धामी ने मान पर धार्मिक मामलों में दखल देकर शिरोमणि अकाली दल (शिअद) को राजनीतिक रूप से निशाना बनाने का आरोप लगाया है. अकाली दल को एसजीपीसी पर नियंत्रण रखने वाला माना जाता है. मान ने एसजीपीसी के दावों को खारिज करते हुए कहा कि उनकी सरकार को इस मामले की जांच करने और इसे इसके तार्किक अंत तक ले जाने का अधिकार है.

डॉ. कंवलप्रीत कौर ने कहा, “इसमें कोई शक नहीं है कि मुख्यमंत्री का पांच साल पुराने विवाद में व्यक्तिगत रुचि लेना राजनीतिक मंशा को दिखाता है. तथाकथित लापता सरूपों का मामला इसलिए फिर से उठाया गया है, क्योंकि ऐसा लगता है कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में अकाली दल सत्ता के दावेदार बनकर उभर सकता है.”

पिछले 10 साल से पंजाब की सत्ता से बाहर रहे अकाली दल में अब पुनरुत्थान के संकेत दिख रहे हैं. तरनतारन उपचुनाव और ब्लॉक समिति तथा जिला परिषद चुनावों के नतीजों से उन्हें हौसला मिला है.

चंडीगढ़ स्थित एसजीजीएस कॉलेज के इतिहास विभाग के प्रोफेसर हरजेश्वर सिंह ने कहा कि मान का इरादा अकाली दल के सुखबीर बादल को रक्षात्मक स्थिति में बनाए रखने का है, ताकि वे सिख मतदाताओं के बीच अपनी विश्वसनीयता न बढ़ा सकें.

उन्होंने कहा, “AAP की नज़र अकाली वोटों और नेताओं पर है.”

इसके पीछे एक वजह है. 2022 के विधानसभा चुनावों के उलट, जब AAP को हिंदू और सिख—दोनों के वोट मिले थे, अब राजनीतिक हालात बदल चुके हैं. अकाली दल से नाता तोड़ने के बाद भाजपा ने कई शहरी इलाकों में अपनी स्थिति मजबूत कर ली है, हालांकि, ग्रामीण इलाकों में उसकी पकड़ अभी भी सीमित है.

अकाल तख्त की नैतिक और धार्मिक सर्वोच्चता का हवाला देते हुए जत्थेदार गर्गज्ज ने गुरुवार को मान को उनके “सिख-विरोधी” आचरण पर सफाई देने के लिए तलब किया.

उन्होंने बताया कि मान ने यह “स्वीकार” किया है कि उन्हें सिख आचार संहिता और परंपराओं की सीमित जानकारी है और उन्होंने भरोसा दिलाया है कि भविष्य में सिख धर्म पर बोलते समय वे अधिक सावधान रहेंगे.

गर्गज्ज ने कहा कि पांच सिंह साहिबान (उच्च पुजारी) अपनी अगली बैठक में मान की सफाई पर अंतिम फैसला लेंगे.

अमृतसर में अकाल तख्त के समक्ष पेश होने से पहले अरदास करते हुए पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान | पीटीआई
अमृतसर में अकाल तख्त के समक्ष पेश होने से पहले अरदास करते हुए पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान | पीटीआई

मान ने अकाल तख्त की सर्वोच्चता को स्वीकार किया है, लेकिन एसजीपीसी पर हमले जारी रखे हैं. रविवार को मजीठा में एक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि एसजीपीसी प्रमुख को इस्तीफा दे देना चाहिए और सिख संस्था को अकाली दल का विस्तार बनाकर इस्तेमाल करने के बजाय खुलकर अकाली दल समर्थक के तौर पर काम करना चाहिए.

विशेषज्ञों का कहना है कि मान धीरे-धीरे और ज्यादा अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं.

सेखों ने कहा, “मान ने एक गंभीर राजनेता के रूप में अपनी विश्वसनीयता काफी हद तक इसलिए खो दी है, क्योंकि वह जिस तरह से बोलते हैं. दूसरा, उन्होंने इतने ज्यादा दुश्मन बना लिए हैं कि वे राजनीतिक रूप से पूरी तरह अलग-थलग पड़ गए हैं. उन्हें धर्म में दखल देने के खतरों का पता है, फिर भी वे अपने राजनीतिक अस्तित्व के लिए ऐसा कर रहे हैं.”

उन्होंने कहा, “लेकिन उन्हें यह एहसास नहीं है कि आम लोगों को इस मुद्दे से सबसे कम मतलब है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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