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Saturday, 17 January, 2026
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पाकिस्तान से आज़ादी: भारत, आगे बढ़ो और उसे इतनी अहमियत देना बंद कीजिए

पाकिस्तान अधिकतर मामलों में भारत की बराबरी करे यह न केवल नामुमकिन है, बल्कि वह और पिछड़ता ही जाएगा. उसके नेता अपनी अवाम को अलग-अलग बोतल में सांप का तेल पेश करते रहेंगे.

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इस तरह की हेडलाइन के इस्तेमाल के साथ भारी जोखिम जुड़ा है. आपके ऊपर आरोप लगाया जा सकता है कि आप अपने लिंक पर ज्यादा क्लिक आकर्षित करने वाली पत्रकारिता कर रहे हैं; या आपसे अपने दिमाग का इलाज करवाने के लिए कहा जा सकता है. मैं गुजारिश करूंगा कि पहले आप मुझे सुन तो लीजिए!

कोई बेशक यह नहीं कह सकता है कि पाकिस्तान ने भारत को अपना उपनिवेश बना लिया है. कोई भी क्षेत्र हो, सेना हो, या बिजली उत्पादन या अर्थव्यवस्था, संस्कृति या ‘सॉफ्ट पावर’ (सांस्कृतिक, वैचारिक शक्ति), या ग्लोबल इमेज, क्या वह कभी भारत की बराबरी कर सकता है? यह मौका उसने 1983 में ही खो दिया था जब उसने भारत को हजारों घाव देकर लहूलुहान करने की नीति अपनाई थी. तब वह ज़िया-उल-हक़ का पाकिस्तान था, जो अफगानी जिहाद की लहर पर सवार था और हमारे पंजाब की परेशानियां बढ़ रही थीं. इस सबने पाकिस्तान को ऐसे पतन के रास्ते पर डाल दिया था जिससे उबरना नामुमकिन था.

बाद के दशकों में यह पतन और तेज हो गया. आज, उसकी प्रति व्यक्ति जीडीपी का आंकड़ा भारत के इस आंकड़े के करीब 55 फीसदी के बराबर है, और हर तिमाही में वह और पिछड़ता ही जा रहा है. उसकी आबादी भारत की आबादी के करीब पांचवें हिस्से के बराबर है और उसकी कुल जीडीपी भारत की कुल जीडीपी की 10 फीसदी है. साक्षरता, प्रति व्यक्ति अनुमानित औसत जीवनकाल, उच्च शिक्षा के क्षेत्रों में पाकिस्तान बहुत-बहुत पीछे है और यह खाई फैलती ही जा रही है.

हाल में पाकिस्तान के शेयर बाजार को लेकर थोड़ी सनसनी पैदा हुई क्योंकि वह दुनिया में सबसे तेजी से चढ़ते शेयर बाज़ारों में शुमार हो गया, जबकि भारत के शेयर बाजार करीब 18 महीने से स्थिर हैं. यह एक सच्चाई है. जरा पाकिस्तान के सोशल मीडिया के परदे के अंदर झांककर देखिए. 18 महीने तक निरंतर चढ़ते रहने के बाद कराची शेयर बाजार (केएसई) की कुल बाजार पूंजी करीब 70 अरब डॉलर के बराबर है. यह आंकड़ा लंबे गतिरोध के बावजूद भारतीय एनएसई के इस आंकड़े का ठीक 1.35 प्रतिशत ही है.

आज भारत की सात कंपनियों के अपने-अपने कुल मूल्य केएसई के मूल्य से ज्यादा हैं. रिलायंस का मूल्य उससे साढ़े तीन गुना; एचडीएफसी, भारती और टीसीएस का दोगुना या उससे ज्यादा है. थोड़ा नीचे उतरिए तो 14 कंपनियों के मूल्य 50 अरब डॉलर से ज्यादा के बराबर हैं. अमेरिका के साथ पाकिस्तान का व्यापार अमेरिका के साथ भारत के व्यापार के दसवें हिस्से से भी कम के बराबर है. अपने सबसे मूल्यवान सहयोगी, संरक्षक और सबसे बड़े व्यापारिक साझीदार चीन से वह केवल 16 अरब डॉलर मूल्य के आयात करता है जिनमें 85 फीसदी हिस्सा हथियारों के आयात का है. भारत चीन से 116 अरब डॉलर मूल्य के आयात करता है जिनमें, आपका शुक्रिया कि, हथियारों का हिस्सा शून्य है. पाकिस्तान की जीडीपी भारत की जीडीपी के 10 प्रतिशत के बराबर है और किसी भी अन्य आर्थिक संकेतक के मामले में उसकी स्थिति इससे भी बदतर है. विमानन का उदाहरण ही ले लीजिए. पाकिस्तान की दो सबसे बड़ी एयरलाइन कंपनियों (PIA और एयरब्लू) के पास कुल 44 विमान हैं, जबकि भारत की इंडिगो और एयर इंडिया के पास कुल 700 विमान हैं और उनकी संख्या में हर सप्ताह एक का इजाफा हो रहा है. यानी पाकिस्तान के विमानों के मुक़ाबले यहां करीब 16 गुना ज्यादा विमान हैं.

पड़ोसी लोग आज बिलकुल अलग ही लीग में बैटिंग कर रहे हैं. “खरबों डॉलर मूल्य के ’क्रिटिकल’ खनिजों”  और “तेल के विशाल भंडार” की बातें महज कपोल कल्पनाएं ही हैं. और फिलहाल उसके स्वयंभु फील्ड मार्शल पवित्र ग्रंथों का जिस तरह पाठ और विश्लेषण कर रहे हैं उसके मुताबिक पाकिस्तान चूंकि मदीना के बाद दूसरा ही ऐसा मुल्क है जो इस्लामी कलमे के तहत बना है इसलिए इसकी जमीन के नीचे सऊदी अरब की तरह तेल और खनिजों के भंडार जरूर होंगे. वैसे, ग़ालिब तो कह ही गए हैं : ‘… दिल के बहलाने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है’.

लब्ब-ओ-लुआब यह कि पाकिस्तान भारत की बराबरी करे यह न केवल नामुमकिन है, बल्कि वह वह और पिछड़ता ही जाएगा. उसके नेता समय-समय पर अपनी अवाम को अलग-अलग बोतल में सांप का तेल पेश करते रहेंगे, जैसे ‘क्रिटिकल’ खनिज, हाइड्रोकार्बन, सोना, आदि के भंडार; और अब इस्लामी दुनिया तथा उसके नागरिकता विहीन गिरोहबाजों के लिए सबसे ताजा : जेएफ-17 का अमेज़न. कठोर सच्चाई यह है कि पाकिस्तान एक ही मामले में भारत से अपनी दूरी को कम कर सकता है, और वह है भारत की आबादी. जनसंख्या वृद्धि की उसकी दर भारत की इस दर से दोगुना ज्यादा है. क्या आप यही चाहते हैं?

फील्ड मार्शल आसिम मुनीर समेत पाकिस्तान का कुलीन तबका जानता है कि वह पीछे छूट गया है. ‘डंपर ट्रक बनाम चमकदार मर्सिडीज’ वाला बयान इसी सोच को उजागर करता है. वे युद्ध तो क्या कोई झड़प भी नहीं जीत सकते. उनके पास एक ही ताकत है: भारत की रफ्तार में अड़ंगा लगाने, और परमाणु शक्ति से लैस इस उपमहादेश को लेकर महाशक्तियों की चिंताओं को बढ़ाने की ताकत.

इस नकारात्मक बढ़त का मुक़ाबला कैसे करना है, यही भारत को सीखना है. इसकी शुरुआत बड़ी तस्वीर पर नजर डालकर की जा सकती है. क्या पिछले एक दशक में पाकिस्तान को हमने अपने दिमाग में जरूरत से ज्यादा अहमियत तो नहीं दी? अपनी सियासत में उसे कहीं इतना ज्यादा वजन तो नहीं दे दिया जितना बुद्धिमानी भरा नहीं था? आर्थिक तथा रणनीतिक रूप से हारे हुए पाकिस्तान के लिए क्या हमने अपनी ध्रुवीकृत राजनीति में अनावश्यक जगह तो नहीं बनाई?

जनवरी 2016 में, पठानकोट हवाई अड्डे पर आतंकवादी हमले करके जब नरेंद्र मोदी की शांति की कोशिशों को नाकाम कर दिया गया था, उसके बाद से भाजपा की राजनीति हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण पर ज्यादा से ज्यादा केंद्रित होती गई है. इससे इनकार नहीं किया जा रहा कि जनकल्याण के मामले में ‘सबका साथ, सबका विकास’ नारे पर अमल हो रहा है और किसी को पहचान के आधार पर किसी लाभ से वंचित नहीं किया जा रहा है. लेकिन भावनात्मक अपील केवल हिंदू मतदाता तक सीमित है. और इसके लिए पाकिस्तान से खतरे का भाव बनाए रखना जरूरी है.

यह हमारे रणनीतिक हित और रुख को किस तरह जटिल बनाता है यह बांग्लादेश के साथ किए जा रहे खेल से जाहिर हो रहा है. भारत को शेख हसीना वाजेद से दोस्ती नहीं करने दी गई, इसका मतलब यह नहीं है कि उसे वहां कोई दोस्त मिलेगा ही नहीं. जमात, और मुहम्मद यूनुस भी पाकिस्तान के बारे में चाहे जो सोचें, बांग्लादेश तीन तरफ से भारत से घिरा है और वह अपरिहार्य जुड़ाव के कारण एक जरूरी तथा कहीं बड़ा पड़ोसी है.

जबकि पश्चिम बंगाल और असम के चुनाव होने वाले हैं, ध्रुवीकृत राजनीति का मतलब यह होगा कि भारत जब तक बांग्लादेश की नई निर्वाचित सरकार से तालमेल बैठाएगा इससे पहले उसके साथ संबंध और खराब ही होंगे. वहां की नई सरकार ने अगर पाकिस्तान के साथ दोस्ती की भी, तो वह बहुत दूर है और उसके पास संसाधन भी नहीं हैं. बांग्लादेश को अपनी राज्य-व्यवस्था और अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए भारत के सदभाव की जरूरत पड़ेगी. चीनी हथियारों की? हसीना भी ज़्यादातर हथियार चीन से खरीदती थीं. इसलिए कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

इसी बड़ी तस्वीर को ध्यान में रखते हुए हमें मुस्तफिजुर रहमान (IPL) के मामले पर विचार करना चाहिए. आजकल कुछ लोग ‘सॉफ्ट पावर’ जिक्र आते ही उत्तेजित हो जाते हैं. लेकिन इस उपमहादेश में क्रिकेट जितना महत्व रखता है उसके मद्देनजर यह तो भारत का ‘हार्ड पावर’ है.

जरा इस बात पर भी विचार कीजिए : हम अफगानिस्तान की क्रिकेट टीम की जो मेहमाननवाजी करते हैं या उसे संरक्षण देते हैं वह क्या है, ‘सॉफ्ट पावर’ या ‘हार्ड पावर’? क्या इसे आप इस बात से अलग करके देखेंगे कि मौजूदा अफगान सरकार पाकिस्तान को परेशान कर रही है? इसलिए, पाकिस्तान के साथ खेलते हुए उसके खिलाड़ियों से हाथ न मिलाना और उस ‘गुस्से’ को क्रिकेट तक सीमित रखना या IPL के एक फ्रेंचाइजी द्वारा चुने गए एकमात्र बांग्लादेशी खिलाड़ी को निकलवाना भारत के पड़ोस में पाकिस्तान को ज्यादा अहमियत देना ही है. इससे क्या घटती है, ‘सॉफ्ट पावर’ या ‘हार्ड पावर’? यह तो अपनी रणनीति को सोशल मीडिया के हवाले कर देना हुआ.

यह कोई हड़बड़ी में किया गया साधारणीकरण नहीं है. जब हाथ मिलाने से इनकार और किसी पाकिस्तानी से ट्रॉफी लेने से माना करने के मसले उभर रहे थे उसी दौरान, 14 अक्तूबर 2025 को मलेशिया में हॉकी का जूनियर सुल्तान जोहोर कप लीग मैच खेलते हुए सभी खिलाड़ी न केवल हाथ मिला रहे थे बल्कि खेल को 3-3 के ड्रॉ करने से पहले ‘हाई फाइव’ वाली ताली भी बाजा रहे थे. बेशक वहां पाकिस्तान नहीं, भारत ही फाइनल में पहुंचा था.

क्या हॉकी खिलाड़ी कम देशभक्त थे? क्या सरकार ने रेड कार्ड दिखाया था? कुछ भी नहीं हुआ. सिर्फ इसलिए कि सोशल मीडिया में उसके लोगों ने इस पर ध्यान नहीं दिया. हॉकी की कौन परवाह करता है? चैंपियन हेवीवेट फाइटर की तरह एक महाशक्ति भी अपनी आक्रामक शक्ति से ज्यादा अपनी चालों के बूते मुक़ाबला करता है. पाकिस्तान भारत की अहमियत को सीमित करना चाहता है. भारत को उस फंदे में नहीं फंसना है.

फिलहाल पाकिस्तान कुछ संयमित दिख रहा है. लेकिन हमारी रफ्तार को घटाने के लिए मुनीर कभी-न-कभी कुछ कर बैठेंगे. और कुछ नहीं तो किनारे पर ही जोरदार झटका दे सकते हैं, जैसे कोई डंपर किसी ‘चमकदार’ मर्सिडीज को बगल से रगड़ता हुआ निकल जाए. भारत को अगर इसे रोकना है तो उसे अपने पड़ोस से अच्छे रिश्ते बनाने होंगे, चीन से रिश्ते में स्थिरता लानी होगी, और देश के अंदर सामाजिक समरसता बनाए रखनी होगी. और अंत में, डिफेंस पर खर्च बढ़ाना होगा.

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था टूट चुकी है. उसके सामने हथियारों की नई होड़ का चारा डालना होगा, जो उसे और पीछे धकेल देगी. क्या ऐसा लगता है कि यह पड़ोसी को भिखारी देने वाली बात है? लेकिन जो पड़ोसी आपकी तरक्की की रफ्तार घटाने का ही खेल खेलता हो उसके साथ और क्या किया जा सकता है?

हमें अपनी राजनीति और अपने सोच में पाकिस्तान को वह अहमियत देने से इनकार करना होगा जिसका वह हकदार नहीं है. इसीलिए हमारे इस कॉलम की हेडलाइन है: पाकिस्तान से आज़ादी.

(नेशनल इंट्रेस्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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