नई दिल्ली: कॉलेज स्टूडेंट्स में बढ़ती आत्महत्याओं से निपटने के लिए, सुप्रीम कोर्ट ने उच्च शिक्षा संस्थानों (HEIs) में स्टूडेंट्स के मेंटल हेल्थ को ध्यान में रखते हुए एक मज़बूत और संस्थागत प्रतिक्रिया तैयार करने के लिए दिशानिर्देश जारी किए हैं.
गुरुवार को जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और आर. महादेवन की बेंच ने स्थिति की गंभीरता पर ध्यान दिया और कहा कि देश में कैंपस लेवल पर किए जा रहे प्रयास बिखरे हुए हैं और उनका सही मूल्यांकन नहीं हो पा रहा है.
पिछले साल मार्च में, अदालत ने कैंपस में आत्महत्या की स्थिति में एफआईआर का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन जैसे कदमों के साथ-साथ स्टूडेंट्स के मेंटल हेल्थ से जुड़े मुद्दों के समाधान के लिए एक नेशनल टास्क फोर्स बनाने के निर्देश दिए थे.
बेंच ने गुरुवार को कहा, “युवा और युवावस्था को अब अधिक संवेदनशील चरण के रूप में पहचाना जा रहा है क्योंकि अधिकतर मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं 24 साल की उम्र से पहले सामने आती हैं. 2022 की राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति भी युवाओं और स्टूडेंट्स को प्राथमिक समूह मानती है और बहु-क्षेत्रीय हस्तक्षेप की सिफारिश करती है. हालांकि, ऐसे बहु-क्षेत्रीय हस्तक्षेपों में यह पाया गया है कि भारत में शैक्षणिक कैंपस आधारित प्रयास बिखरे हुए हैं और उनका पर्याप्त मूल्यांकन नहीं हुआ है.”
पूर्ण न्याय करने की अपनी शक्ति का उपयोग करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने दिशानिर्देश भी जारी किए. सबसे पहले, अदालत ने कहा कि आत्महत्याओं से संबंधित सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम का डेटा, खासकर 15-29 वर्ष की आयु वर्ग से जुड़ा डेटा, को केंद्रीय स्तर पर रखा जाना चाहिए, ताकि HEIs में आत्महत्याओं के बेहतर और अधिक सटीक अनुमान लगाए जा सकें. इस डेटा को प्राप्त करने और बनाए रखने की व्यवस्था सार्वजनिक स्वास्थ्य और जनसांख्यिकी के क्षेत्र के विशेषज्ञों की मदद से विकसित की जा सकती है.
दूसरे, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) को अपनी वार्षिक रिपोर्ट में “छात्र आत्महत्याओं” की श्रेणी बनाते समय स्कूल जाने वाले छात्रों और उच्च शिक्षा के छात्रों के बीच स्पष्ट अंतर करना होगा.
तीसरे, सभी HEIs को छात्र की आत्महत्या या किसी भी तरह की अस्वाभाविक मौत की घटना की सूचना, चाहे वह कहीं भी हुई हो (जैसे कैंपस में, हॉस्टल में, पीजी में या कैंपस के बाहर), जैसे ही उन्हें इसकी जानकारी मिले, तुरंत पुलिस को देनी होगी. अदालत ने ज़ोर देकर कहा, “यह सभी स्टूडेंट्स पर लागू होगा, चाहे वो क्लास में पढ़ रहे हों, डिस्टेंस मोड में हों या ऑनलाइन मोड में.”
बेंच ने यह भी कहा कि छात्र आत्महत्याओं या अस्वाभाविक मौतों की एक वार्षिक रिपोर्ट विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) और अन्य संबंधित नियामक निकायों को भी सौंपी जानी चाहिए, जैसे कानून कॉलेजों के मामले में बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) और मेडिकल छात्रों के लिए नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी).
केंद्रीय विश्वविद्यालयों और राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों जैसे एनएलयू या आईआईएम के मामले में, यह वार्षिक रिपोर्ट उच्च शिक्षा विभाग को सौंपी जानी चाहिए.
अदालत ने यह भी कहा कि हर आवासीय संस्थान में चौबीसों घंटे योग्य चिकित्सा सहायता उपलब्ध होनी चाहिए. अगर कैंपस में यह सुविधा नहीं है, तो 1 किलोमीटर के दायरे में यह सुविधा होनी चाहिए, ताकि स्टूडेंट्स को आपातकालीन सहायता मिल सके. इसके साथ ही, फैकल्टी की कमी को भी दूर किया जाना चाहिए.
अदालत ने कहा, “कई सार्वजनिक और निजी HEIs में फैकल्टी की कमी की रिपोर्ट आई है. यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सभी खाली फैकल्टी पद (शिक्षण और गैर-शिक्षण दोनों) चार महीने की अवधि के भीतर भरे जाएं. इसमें हाशिए पर पड़े और कम प्रतिनिधित्व वाले समुदायों के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित पदों, जिनमें दिव्यांगों (PwDs) के लिए आरक्षित पद भी शामिल हैं, को प्राथमिकता दी जाए.”
जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए, अदालत ने सभी HEIs को निर्देश दिया कि वे हर साल केंद्र और संबंधित राज्य सरकारों को यह रिपोर्ट दें कि कितने आरक्षित पद खाली हैं, कितने भरे गए हैं, पद न भरने के कारण क्या हैं और इसमें कितना समय लगा, ताकि समय-समय पर जवाबदेही तय हो सके.
अदालत ने आदेश दिया कि लंबित सभी छात्रवृत्ति भुगतानों का बकाया संबंधित केंद्र और राज्य सरकार के प्राधिकरणों द्वारा चार महीने की अवधि के भीतर साफ किया जाना चाहिए.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
