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Saturday, 17 January, 2026
होममत-विमत‘महिला, ज़िंदगी, आज़ादी’ एक चेतावनी, जिसे ईरान ने नज़रअंदाज़ किया, अब शासन सख़्ती कर रहा है

‘महिला, ज़िंदगी, आज़ादी’ एक चेतावनी, जिसे ईरान ने नज़रअंदाज़ किया, अब शासन सख़्ती कर रहा है

जो बात अक्सर भुला दी जाती है, वह यह है कि इस नियंत्रण के खिलाफ विरोध तुरंत शुरू हो गया था. जब अनिवार्य पर्दा लागू किया गया, उसी पल से धर्मतांत्रिक शासन के खिलाफ लड़ाई शुरू हो गई.

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2022 में ईरान की मॉरैलिटी पुलिस की हिरासत में 22 साल की महसा अमीनी की बेरहमी से हुई मौत के बाद, “महिला, ज़िंदगी, आज़ादी” सिर्फ एक नारा नहीं रहा. यह एक निर्णायक मोड़ बन गया. लगभग चार साल बाद भी वह पल भुलाया नहीं गया है. तेहरान, इलाम, मशहद, लोरेस्तान, केरमानशाह और देश के सैकड़ों दूसरे शहरों की सड़कों पर एक बार फिर क्रांति के नारे गूंज रहे हैं—“तानाशाह को मौत,” “ख़ुमैनी को मौत.”

अब यह सिर्फ एक पर्दे या एक महिला की मौत का मामला नहीं है. यह उस समाज की बात है, जिसका सब्र टूट चुका है. महिलाओं पर ज़ुल्म ने आग जलाई, लेकिन आज ईरान में जो दिख रहा है, वह वर्षों के डर, गुस्से और घुटन का विस्फोट है—एक ऐसे शासन को खुली चुनौती, जिसने शरीरों को नियंत्रित करने, आवाज़ों को दबाने और डर के ज़रिये राज करने की कोशिश की है.

हालिया अशांति, जिसके बारे में कुछ मीडिया रिपोर्ट्स का दावा है कि इसमें 12,000 तक ईरानी मारे गए—इस्लामिक रिपब्लिक की ढहती अर्थव्यवस्था और तेज़ी से गिरती मुद्रा से भड़की थी, लेकिन यह कब का रोटी और दामों के सवाल से आगे बढ़ चुकी है. जो गुस्सा खाने-पीने की बढ़ती कीमतों और भारी महंगाई से शुरू हुआ था, वह अब राज्य के खिलाफ पूरी बगावत में बदल गया है. वर्षों के प्रतिबंध, कूटनीतिक अलगाव और नाकाम विदेश नीति धीरे-धीरे आम ज़िंदगी में उतरते गए और अब घरेलू राजनीति उन फैसलों की कीमत चुकाती दिख रही है.

महिलाओं के नेतृत्व वाली क्रांति

बेशक, किसी भी विद्रोह का एक ही कारण नहीं होता. ईरान की उथल-पुथल कई ताकतों के टकराने का नतीजा है—भू-राजनीति, विचारधारा, आर्थिक कुप्रबंधन और अंतरराष्ट्रीय दबाव, लेकिन एक वजह सबसे अलग नज़र आती है. मेरे लिए इस आंदोलन को देखना और यह न समझना नामुमकिन है कि महिलाओं की बराबरी की लड़ाई कैसे इसके केंद्र में आ गई है. महिलाओं ने विरोध प्रदर्शनों का रूप बदल दिया है. उनके प्रतिरोध ने शासन की गहरी सड़ांध उजागर कर दी और ऐसा करके शासन की नाकामी को एक नैतिक टकराव में बदल दिया, जिसे राज्य अब आसानी से दबा नहीं सकता.

चार दशकों से ज़्यादा समय से इस्लामिक रिपब्लिक महिलाओं को नियंत्रित करके शासन कर रहा है. उनके अधिकार धीरे-धीरे नहीं छीने गए; उन्हें जानबूझकर घेरा गया—शादी, तलाक, विरासत, बच्चों की कस्टडी, काम, अदालतें, राजनीतिक भागीदारी, यात्रा, जीवनशैली, यहां तक कि वे क्या पहनें. महिलाओं के शरीर सत्ता के औज़ार बना दिए गए, ऐसे प्रतीक जिनके ज़रिये राज्य ने अपनी ताकत दिखाई, जबकि उसी समय वह बार-बार और खुले तौर पर महिलाओं को लैंगिक हिंसा से बचाने में नाकाम रहा. यह ईरान की व्यवस्था की कोई छोटी खामी नहीं है; यह उसके स्तंभों में से एक है.

अक्सर यह भुला दिया जाता है कि इस नियंत्रण के खिलाफ विरोध तुरंत शुरू हो गया था. ईरान में धर्मतांत्रिक शासन के खिलाफ लड़ाई दशकों बाद नहीं उभरी—यह उसी पल शुरू हो गई, जब अनिवार्य पर्दा लागू किया गया और महिलाओं ने समझ लिया कि उनके जीवन पर किस तरह का भविष्य थोपा जा रहा है. जो कोई भी ईरान का इतिहास समझता है, वह जानता है कि महिलाओं के शरीर और “इज़्ज़त” उसकी राजनीतिक प्रतीकात्मकता में कितने केंद्रीय रहे हैं.

क्रांति के दौरान, अयातुल्लाह ख़ुमैनी ने महिलाओं को आंदोलन में शामिल होने के लिए सक्रिय रूप से प्रोत्साहित किया, उन्हें भरोसा दिलाया, और बहुतों को यह विश्वास हुआ कि उनकी आज़ादी वापस नहीं ली जाएगी. सार्वजनिक रूप से बहुत कम संकेत थे कि अनिवार्य पर्दा या महिलाओं पर व्यवस्थित पाबंदियां तय हैं, लेकिन सत्ता मिलते ही लहज़ा बदल गया. पर्दा कानून बन गया, अधिकार वापस ले लिए गए और 8 मार्च 1979 को महिलाएं सड़कों पर उतर आईं, ऐसे नारे लगाते हुए जो आज भी दर्दनाक रूप से मौजूदा लगते हैं: “हमने पीछे जाने के लिए क्रांति नहीं की थी.”

यह वाक्य आज की अशांति की आत्मा को पकड़ता है. आज हम जो देख रहे हैं, वह एक लंबी, अधूरी लड़ाई की निरंतरता है. महिलाओं ने इसकी असली सच्चाई बहुत पहले पहचान ली थी और अपने शरीर, अपनी लाइफ और अपनी गरिमा को इस आंदोलन के केंद्र में रखकर, उन्होंने इस्लामिक रिपब्लिक की गहरी सच्चाई उजागर कर दी है: एक ऐसी व्यवस्था जो नियंत्रण के बिना टिक नहीं सकती और एक ऐसा समाज जो अब उसके नीचे जीने से इनकार कर रहा है.

ईरानी महिलाओं के प्रतिरोध ने दुनिया को भी मजबूर किया है कि वह ईरान के भीतर मानवाधिकारों की हकीकत को—सच में देखे. उनके साहस से अभिभूत हुए बिना रहना मुश्किल है. ये महिलाएं, अपने परिवारों और समर्थकों के साथ, उस व्यवस्था के खिलाफ अपनी जान के लिए लड़ रही हैं, जिसने उन्हें जन्म से डर सिखाया है. वे अवज्ञा की कीमत जानती हैं—जेल, यातना, निर्वासन, यहां तक कि मौत. फिर भी वे बार-बार आगे बढ़ती हैं, पीछे हटने से इनकार करती हैं. यह लापरवाह बहादुरी नहीं है. यह एक सोच-समझकर लिया गया फैसला है—आज़ादी की कीमत चुकाने का, ताकि अगली पीढ़ी सुरक्षित सांस ले सके.

शासन की नैतिक सत्ता को चुनौती

एक ऐसी दुनिया में, जहां आराम अक्सर अंतरात्मा को चुप करा देता है, ईरानी महिलाएं हमें याद दिला रही हैं कि असली प्रतिरोध कैसा होता है और जब सब कुछ दांव पर लगा हो तब भी गरिमा की चाह कितनी गहरी हो सकती है.

इसके अलावा, ईरानी महिलाओं की अवज्ञा ही इस आंदोलन को खास तौर पर ताकतवर बनाती है और ईरानी राज्य के लिए बेहद खतरनाक भी. तानाशाही व्यवस्थाएं आर्थिक ग़ुस्से, विदेशी दबाव और यहां तक कि रोटी-दामों पर हुए प्रदर्शनों से भी बच निकलती हैं, लेकिन वे जिस चीज़ से नहीं बच पातीं, वह है उनकी नैतिक सत्ता को सीधी चुनौती. जब महिलाएं अपने शरीर पर राज्य के नियंत्रण को नकारती हैं, तो वे शासन की सबसे बड़ी असुरक्षा उजागर कर देती हैं—कि उसकी ताकत आस्था या सहमति पर नहीं, बल्कि डर पर टिकी है. हर वह महिला जो बिना पर्दे के बाहर निकलती है, हर वह लड़की जो चुप रहने से इनकार करती है, उस सावधानी से गढ़ी गई कथा को कमज़ोर करती है कि यह व्यवस्था ईश्वर की दी हुई है. यही वजह है कि प्रतिक्रिया इतनी बेरहम रही है. राज्य जानता है कि जिस पल महिलाएं मानना बंद करती हैं, पूरी संरचना में दरार पड़ने लगती है.

ईरान में जो कुछ हो रहा है, वह हर उस समाज के सामने एक आईना है, जो मानता है कि महिलाओं पर नियंत्रण को परंपरा का जामा पहनाया जा सकता है, धर्म के नाम पर पवित्र बताया जा सकता है, या व्यवस्था के नाम पर जायज़ ठहराया जा सकता है. जब महिलाओं को नागरिक मानने के बजाय प्रतीक बना दिया जाता है, तो प्रतिरोध तय हो जाता है. और इतिहास बताता है कि जब ऐसी मांगों को बहुत देर तक नज़रअंदाज़ किया जाता है, तो दमन की कीमत हमेशा सुधार की कीमत से ज़्यादा होती है.

आमना बेगम अंसारी एक स्तंभकार और टीवी समाचार पैनलिस्ट हैं. वह ‘इंडिया दिस वीक बाय आमना एंड खालिद’ नाम से एक साप्ताहिक यूट्यूब शो चलाती हैं. उनका एक्स हैंडल @Amana_Ansari है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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