नई दिल्ली: दिल्ली में आवारा कुत्तों से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में एक वकील ने कहा कि बेघर अनाथ बच्चों के लिए सड़क के कुत्ते “इकलौते रक्षक” हैं. यह दलील अनाथ बच्चों के अधिकारों और उनके आरक्षण के लिए लंबे समय से काम कर रहीं वकील पौलोमी पाविनी शुक्ला ने दी. वह ‘वीकेस्ट ऑन अर्थ: ऑरफंस ऑफ इंडिया’ किताब की लेखिका भी हैं.
शुक्ला ने कहा, “मुझे यह जानकर थोड़ा सुकून मिलता है कि रेलवे स्टेशन पर सो रही 13 साल की लड़की सुरक्षित है, क्योंकि उसके पास एक सड़क का कुत्ता सो रहा है.”
उन्होंने दलील दी कि सड़क के कुत्ते इन बच्चों के लिए “आखिरी सुरक्षा पंक्ति” हैं. उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि जब हजारों नाबालिग बच्चों के पास सिर छिपाने की जगह नहीं है, तब जानवरों के शेल्टर पर करोड़ों रुपये खर्च करना नैतिक रूप से कितना सही है.
उन्होंने पीठ से कहा, “अगर यह अदालत उन्हें आश्रय देने से पहले उनकी आखिरी सुरक्षा पंक्ति छीन लेती है, तो ये बच्चे दो बार अनाथ हो जाएंगे, एक बार राज्य द्वारा और दूसरी बार इस माननीय अदालत द्वारा.”
अपने तर्क के दौरान उन्होंने यह भी कहा कि शेल्टर में अधिक भीड़ होने से जानवरों में बीमारियों का खतरा बढ़ता है, जिनमें रेबीज भी शामिल है.
दिप्रिंट से बात करते हुए शुक्ला ने सड़क के कुत्तों और अनाथ बच्चों की स्थिति की तुलना की.
उन्होंने कहा, “भारत की जनगणना में अनाथ बच्चों को कभी गिना ही नहीं गया. 18 साल से वे अदृश्य और आवाज़हीन बने हुए हैं, ठीक वैसे ही जैसे सड़क के कुत्ते. ऐसी समस्याएं व्यवस्था से जुड़ी होती हैं. इन्हें सतही कदमों से हल नहीं किया जा सकता. इसके लिए लंबे समय की, मानवीय और करुणा पर आधारित रणनीतियों की जरूरत होती है.” उन्होंने आगे कहा, “इस मामले को कुत्तों बनाम बच्चों के रूप में पेश किया जा रहा है, लेकिन जो सच में बच्चों की परवाह करता है, वह दूसरे कमजोर जीवों की भी परवाह करेगा.”
सुप्रीम कोर्ट में यह मामला पिछले साल जुलाई में शुरू हुआ था, जब अदालत ने टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट का स्वतः संज्ञान लिया था. रिपोर्ट में एक बच्चे की आवारा कुत्ते के काटने के बाद रेबीज से मौत का जिक्र था. 7 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों, अस्पतालों और रेलवे स्टेशनों में कुत्तों के काटने की घटनाओं में “चिंताजनक बढ़ोतरी” का हवाला देते हुए आदेश दिया था कि दिल्ली में पकड़े गए आवारा जानवरों को नसबंदी और टीकाकरण के बाद तय शेल्टर में भेजा जाए और उन्हें दोबारा सड़कों पर न छोड़ा जाए.
अब सुप्रीम कोर्ट याचिकाओं के एक समूह की सुनवाई कर रहा है, क्योंकि वकीलों और पशु अधिकार कार्यकर्ताओं ने कहा है कि नवंबर का आदेश पारित करते समय उनकी बात नहीं सुनी गई थी. अदालत इस मामले की अगली सुनवाई 20 जनवरी को करेगी.
‘पहले बच्चों को हटाने की जरूरत’
शुक्ला ने अदालत से कहा कि गरीब इलाकों में सड़क के कुत्ते अक्सर रक्षक की भूमिका निभाते हैं, खासकर उन महिलाओं के लिए जिनके पास किसी तरह की सुरक्षा व्यवस्था नहीं होती.
उन्होंने कहा, “दिल्ली में अकेले रहने वाली एक महिला के तौर पर मुझे यह जानकर ज्यादा सुरक्षित महसूस होता है कि आसपास कुत्ते हैं, जो किसी हमले की स्थिति में भौंक सकते हैं.”
शुक्ला ने उत्तर प्रदेश का उदाहरण देते हुए कुत्तों के पुनर्वास पर प्रस्तावित खर्च और अनाथ बच्चों के लिए घरों की कमी के बीच अंतर को भी सामने रखा.
उन्होंने कहा, “यह संवैधानिक रूप से उलटा है कि हम कुत्तों के शेल्टर पर 20,000 करोड़ रुपये खर्च करने की बात कर रहे हैं, जबकि उत्तर प्रदेश के 75 में से 45 जिलों में एक भी अनाथालय नहीं है.” उन्होंने आगे कहा, “घर के अंदर रहने वाले बच्चों की सुरक्षा, बिना घर वाले बच्चों के अधिकारों से ज्यादा अहम नहीं हो सकती.”
अनाथ बच्चों के साथ अपने काम का जिक्र करते हुए, जिसमें उनकी 2015 की किताब भी शामिल है, शुक्ला ने कहा कि उनकी दलीलें “जमीनी अनुभव” पर आधारित हैं. व्हार्टन स्कूल से स्नातक शुक्ला को भारत में अनाथ बच्चों के लिए ‘वीकेस्ट ऑन अर्थ’ अभियान के तहत किए गए काम के लिए 2021 में फोर्ब्स 30 अंडर 30 सूची में शामिल किया गया था.
बाल अधिकारों के अलावा, उन्होंने पशु शेल्टर में अधिक भीड़ से जुड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंताओं को भी उठाया. काटने के बजाय बूंदों के जरिए वायरस फैलने के मामलों का हवाला देते हुए उन्होंने बेंच से कहा कि जब एक जानवर बीमार पड़ता है, तो कई जानवर बीमार हो जाते हैं, जिससे वायरस के रूप बदलने और बड़े स्तर पर फैलने का खतरा बढ़ जाता है.
उन्होंने निष्कर्ष में कहा, “पहले बच्चों को सड़कों से हटाने की जरूरत है—कुत्तों को बाद में.”
शुक्ला की दलीलों का असर होता दिखा. सुनवाई के बाद के हिस्से में, जब दिल्ली की ‘डॉग अम्मा’ की ओर से पेश एक वकील ने आवारा कुत्तों को गोद लेने को बढ़ावा देने जैसी नीतियों की बात की, तो जस्टिस मेहता ने नाराजगी के साथ प्रतिक्रिया दी.
उन्होंने कहा, “क्या आप सच में ऐसा कह रहे हैं. अभी-अभी एक युवा वकील ने सड़क पर रह रहे अनाथ बच्चों के आंकड़े हमारे सामने रखे. हमें लगता है कि कुछ वकीलों को इन बच्चों को गोद लेने के लिए भी दलील देनी चाहिए थी.” उन्होंने आगे कहा, “2011 से, जब से मुझे पदोन्नत किया गया है, किसी ने किसी इंसान के लिए इतनी लंबी या इतनी संवेदनशील दलील नहीं दी.”
भावनाएं चरम पर
आवारा कुत्तों के इस मामले में दलीलें अक्सर निजी और भावनात्मक रही हैं. पशु कल्याण संगठन फ्रेंडिकोज की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने सोमवार को अपनी दलील की शुरुआत करते हुए पीठ से कहा कि अदालत एक “बेहद विवादित और भावनात्मक मुद्दे” से निपट रही है.
इस पर बेंच की ओर से तीखी टिप्पणी आई, “लगता है भावनाएं सिर्फ कुत्तों के लिए ही हैं.”
औपनिवेशिक दौर के सहमति से समलैंगिक संबंधों पर लगे प्रतिबंध को खत्म करने वाले ऐतिहासिक धारा 377 मामले में अपनी भूमिका के लिए जानी जाने वाली गुरुस्वामी ने तुरंत जवाब दिया, “नहीं, नहीं, माय लॉर्ड्स. मुझे इंसानों से बहुत लगाव है. माय लॉर्ड्स जानते हैं कि मैं बहुत मिलनसार व्यक्ति हूं.”
जब उनकी दलील आगे बढ़ी, तो बेंच ने कहा कि उन्होंने “मांगे गए तीन मिनट में से सात मिनट ले लिए हैं.” इस पर गुरुस्वामी ने मजाकिया अंदाज में कहा, “माय लॉर्ड्स, हर बार जब मैं आपके सामने होती हूं, समय पंख लगाकर उड़ जाता है. यह एक खुशी है, माय लॉर्ड्स. यही समस्या है.”
बेंच की ओर से हल्के-फुल्के अंदाज में जवाब आया, “नहीं, हमें भी आपको सुनकर खुशी होती है, लेकिन यहां और भी बहुत लोग हैं.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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