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Thursday, 15 January, 2026
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बांग्लादेश में हिंदुओं के पास चुनाव में डर बनाम डर का सियासी विकल्प

बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी ने पहली बार किसी हिंदू उम्मीदवार को टिकट दिया है और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने दो हिंदू उम्मीदवार उतारे हैं. कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह सिर्फ दिखावा है.

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बांग्लादेशी हिंदुओं के लिए जो देश का सबसे बड़ा धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय है और अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के गिरने के बाद से लगातार निशाने पर है, 12 फरवरी को होने वाले राष्ट्रीय चुनाव का कोई खास मतलब नहीं रह गया है. इस समुदाय की बस यही उम्मीद है कि अगली चुनी हुई सरकार बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा को रोक सके.

उनकी स्वाभाविक पसंद, बांग्लादेश अवामी लीग, जो बांग्लादेश के धर्मनिरपेक्ष विचार की बात करती थी, को चुनाव में शामिल होने से रोक दिया गया है. इससे 7.95 प्रतिशत या 1.31 करोड़ बांग्लादेशी हिंदुओं के सामने एक कठिन विकल्प बचता है: देश की दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) को वोट दें या सबसे बड़ी इस्लामी राजनीतिक पार्टी बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी को.

चुनाव में 49 और राजनीतिक पार्टियां भी हैं, लेकिन वे या तो बीएनपी या जमात के साथ गठबंधन में हैं, या चुनावी तौर पर बहुत कमज़ोर हैं. अगर पुराने इतिहास और हाल की घटनाओं को देखा जाए, तो बीएनपी और जमात के बीच चुनाव करना कहावत वाले “कुएं और खाई” के बीच चुनाव करने जैसा है.

नया साल, नई दहशत

बांग्लादेश के कई हिंदुओं के लिए हालिया हिंसा पर राजनीतिक प्रतिक्रिया ने भविष्य को लेकर अनिश्चितता और बढ़ा दी है. दो मुख्य पार्टियों ने हिंदू समुदाय पर हुए हमलों को जिस तरह से संभाला है, वही यह तय कर रहा है कि वे फरवरी के चुनाव को कैसे देख रहे हैं.

16 साल के ऋत्विक दास ने कहा, “हम हिंदुओं की आखिर राजनीतिक पसंद हो ही क्या सकती है?” वे फैक्ट्री मजदूर दीपु चंद्र दास के छोटे भाई हैं, जिनकी 18 दिसंबर को कथित तौर पर ईशनिंदा के आरोप में भीड़ ने सरेआम पीट-पीटकर हत्या कर दी और जला दिया. इस घटना ने दुनिया भर में सुर्खियां बटोरी थीं. ऋत्विक ने मयमनसिंह में अपने घर से दिप्रिंट से बात की.

हालांकि, उनकी वोट देने की उम्र नहीं है, लेकिन दास ने कहा कि जो हिंदू वोट देने की उम्र के हैं, उनके लिए भी उनके बड़े भाई की हत्या जैसी घटनाओं ने गहरी निराशा छोड़ दी है.

उन्होंने कहा, “वैसे भी हमारे पास राजनीतिक चुनाव करने का क्या अधिकार है? कोई भी राजनीतिक पार्टी अपने चुनावी भाषणों में दीपु के साथ जो हुआ, उस पर बात नहीं कर रही है. हम बस मेहनत करके कमाना चाहते हैं और जीने का हक चाहते हैं.”

दीपु चंद्र दास की हत्या पर अंतरराष्ट्रीय रोष के बाद भी बांग्लादेशी हिंदुओं के खिलाफ हिंसा नहीं रुकी है. नया साल अपने साथ नई-नई डरावनी घटनाएं लेकर आया.

शरियातपुर जिले के हिंदू व्यापारी खोकन चंद्र दास के साथ भी ऐसा ही हुआ.

न्यू ईयर की रात, जब वह केउरभांगा बाज़ार के पास अपनी दवा की दुकान से घर लौट रहे थे, तब भीड़ ने उन पर हमला किया. उन्हें चाकू मारा गया, पेट्रोल डाला गया और आग लगा दी गई. वह जान बचाने के लिए तालाब में कूद गए, लेकिन बुरी तरह झुलस गए. तीन दिन बाद ढाका के नेशनल बर्न इंस्टीट्यूट में उनकी मौत हो गई.

5 जनवरी तक के 35 दिनों में, रिपोर्ट के मुताबिक बांग्लादेश में सांप्रदायिक हमलों में 11 हिंदू मारे गए और हिंसा के थमने के कोई संकेत नहीं दिखे.

बांग्लादेशी-स्वीडिश राजनीतिक टिप्पणीकार प्रियंका आनबर्ग ने दिप्रिंट से कहा कि 12 फरवरी के चुनाव से पहले हिंदुओं को निशाना बनाना एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति है, न कि हालात बिगड़ने का कोई अनजाना नतीजा.

उन्होंने कहा, “बांग्लादेशी हिंदुओं के लिए चुनाव डर से ढके हुए हैं—जमात की कट्टर लामबंदी से और बीएनपी की वोट पाने के लिए हिंसा को बढ़ावा देने की पुरानी रणनीति से. सबसे दुखद बात यह है कि अगर हिंदू वोट डालने निकलते भी हैं, तो उन्हें इन्हीं दो पार्टियों या इनके सहयोगियों में से किसी एक को चुनना होगा.”

बांग्लादेशी पत्रकार साहिदुल हसन खोकन ने कहा कि दोनों पार्टियां यह संकेत दे रही हैं कि अगर हिंदू उनके पक्ष में वोट नहीं देंगे तो उनके साथ क्या होगा.

उन्होंने कहा, “2001 में बीएनपी-जमात गठबंधन ने शेख हसीना की अवामी लीग को हराकर सत्ता संभाली थी. इसके बाद महीनों तक हिंदुओं पर जो नरसंहार हुए, उनके जैसे उदाहरण बांग्लादेश के स्वतंत्र इतिहास में बहुत कम मिलते हैं.”

खोकन ने आगे कहा कि अब जब अवामी लीग को चुनाव से बाहर कर दिया गया है और बीएनपी व जमात दोनों हिंदू वोट पाने की कोशिश कर रहे हैं, तो चुनाव से पहले की हिंसा का इस्तेमाल हिंदुओं को डराकर वोट दिलाने के लिए किया जा रहा है.

बीएनपी या जमात?

फरवरी में होने वाले राष्ट्रीय चुनाव में एक पंजीकृत हिंदू पार्टी भी हिस्सा ले रही है. बांग्लादेश चुनाव आयोग द्वारा उसके नौ उम्मीदवारों के नामांकन मंजूर किए जाने के बाद, बांग्लादेश माइनॉरिटी जनता पार्टी (बीएमजेपी) के नेताओं ने कहा कि वे किसी बड़ी पार्टी के साथ गठबंधन करना चाहते हैं. रिपोर्टों के मुताबिक बीएमजेपी बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी से बातचीत कर रही है, क्योंकि उसे लगता है कि जमात, बीएनपी से बेहतर अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करेगी.

इस बीच, जमात ने पहली बार किसी हिंदू उम्मीदवार को मैदान में उतारा है. खुलना-1 (डाकोपे-बटियाघाटा) सीट से कृष्णा नंदी को उम्मीदवार बनाना पार्टी की उस बदली हुई रणनीति को दिखाता है, जिसके तहत वह अपने पारंपरिक समर्थकों से बाहर भी समर्थन बढ़ाना चाहती है.

बीएनपी ने भी दो हिंदू उम्मीदवार उतारे हैं: मागुरा-2 से निताई रॉय चौधरी और ढाका-3 से गयेस्वर रॉय.

हिंदू अधिकार कार्यकर्ता रूपन गुहा ने दिप्रिंट से कहा कि इन कदमों के जरिए पार्टियां सिर्फ दिखावटी चिंता जता रही हैं.

उन्होंने कहा, “300 सीटों में हिंदू उम्मीदवारों की हिस्सेदारी सिर्फ 0.67 प्रतिशत है. ऐसे समय में जब पूरी दुनिया बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार की बात कर रही है, क्या यही संख्या है जो दो बड़ी पार्टियों को हिंदुओं को देनी चाहिए? और अगर चुनाव के समय भी बीएनपी और जमात का व्यवहार देखें, तो उनकी मंशा साफ हो जाती है.”

चिंताएं तब और बढ़ गईं जब बीएनपी के वरिष्ठ नेता मिर्ज़ा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने हाल ही में हिंदुओं की हत्या को “छोटी घटनाएं” और “मीडिया की बनाई हुई बात” कहकर खारिज कर दिया.

इसी समय, बांग्लादेश के धर्मनिरपेक्ष मतदाताओं में भी डर है कि अगर जमात सत्ता में आई तो वह शरीयत कानून लागू करने की कोशिश करेगी.

साहिदुल हसन खोकन ने कहा, “जमात बार-बार खुले तौर पर शरीयत कानून की वकालत करती रही है. ऐसे कानून में बांग्लादेश के किसी हिंदू के लिए क्या उम्मीद बचती है? और बांग्लादेश के धर्मनिरपेक्ष देश बने रहने की क्या उम्मीद है?”

डराने-धमकाने का माहौल हाल ही में तब साफ दिखा, जब एक हिंदू जिला आयुक्त अन्नपूर्णा देबनाथ को सांप्रदायिक गालियां और धमकियां दी गईं. उन्होंने दोहरी यूके-बांग्लादेश नागरिकता के आरोप में जमात-ए-इस्लामी के एक उम्मीदवार का नामांकन रद्द कर दिया था. इसके बाद प्रदर्शनकारियों ने उन पर अपशब्द फेंके और इस्तीफे की मांग करते हुए कहा कि वह “यहां रह नहीं सकतीं.”

बांग्लादेशी पत्रकार प्रोबीर कुमार सरकार ने दिप्रिंट से कहा कि देबनाथ के साथ जो हुआ, वह देश में हिंदुओं की रोज़मर्रा की हकीकत को दिखाता है. सरकार ने आरोप लगाया कि उन्हें पिछले नवंबर में ढाका ट्रिब्यून के न्यूज़ एडिटर पद से इसलिए इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया क्योंकि वह हिंदू थे और अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों की बात करते थे.

उन्होंने कहा, “इस्लामी भीड़ दो बार मेरे घर मुझे ढूंढने आई. सोशल मीडिया पर मुझे लगातार जान से मारने की धमकियां मिलीं. मुझे अपनी पत्नी और बच्चे के साथ बांग्लादेश छोड़ना पड़ा. चुनाव के बाद मुझे बांग्लादेश से हिंदुओं के बड़े पैमाने पर पलायन का डर है.”

जीने और सम्मान के अधिकार पर खतरे के बीच, बांग्लादेशी हिंदुओं को फरवरी के चुनावों से बहुत कम उम्मीद नज़र आती है.

(दीप हालदार लेखक और पत्रकार हैं. उनका एक्स हैंडल @deepscribble है. यह उनके निजी विचार हैं.)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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