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Wednesday, 14 January, 2026
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विक्रमादित्य सिंह के ‘बाहरी’ अफसरों पर निशाने के बीच, सुक्खू सरकार के नौकरशाही पर नियंत्रण को लेकर बहस

हिमाचल के PWD मंत्री ने यूपी और बिहार से आए IAS, IPS अधिकारियों पर राज्य के हितों को नज़रअंदाज़ करने का आरोप लगाया, राज्यसभा चुनाव नज़दीक आने के बीच मुख्यमंत्री से कार्रवाई की मांग की. पार्टी नेताओं ने नेतृत्व को लेकर भी चिंता जताई.

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शिमला: हिमाचल प्रदेश के मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने मंगलवार को सार्वजनिक रूप से उन आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की आलोचना की, जो राज्य से नहीं हैं और उन पर राज्य के कल्याण से ज्यादा अपने निजी एजेंडे को प्राथमिकता देने का आरोप लगाया.

मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू से कड़ी कार्रवाई की अपील करते हुए सिंह ने हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस सरकार के खिलाफ नौकरशाही साजिशों को लेकर उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री की एक महीने पुरानी चेतावनी का समर्थन किया.

फेसबुक पर एक तीखे पोस्ट में मंत्री, जो छह बार के पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के बेटे हैं, उन्होंने लिखा: “हम मंडी में उपमुख्यमंत्री के भाषण से सहमत हैं. यूपी और बिहार के कुछ आईएएस और आईपीएस अधिकारी हिमाचली मूल्यों को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं. उन्हें हिमाचल के हितों की ज्यादा चिंता नहीं है. यहां तैनात रहते हुए उन्हें राज्य की सेवा करनी चाहिए, न कि शासक की तरह व्यवहार करना चाहिए.”

यह बयान 6 दिसंबर 2025 को मंडी में आयोजित एक राज्य स्तरीय कार्यक्रम में अग्निहोत्री की टिप्पणी के लगभग एक महीने बाद आया है. यह कार्यक्रम हिमाचल में कांग्रेस सरकार के तीन साल पूरे होने के मौके पर हुआ था. उपमुख्यमंत्री ने नौकरशाहों को “सरकार के खिलाफ लोगों से मिलने” को लेकर चेताया था और कहा था कि जो इसके खिलाफ काम करेंगे, उनसे “अंधेरे की रात में निपटा जाएगा.”

लोक निर्माण विभाग, शहरी विकास और आवास विभाग संभाल रहे विक्रमादित्य ने आरोप लगाया कि इन अधिकारियों की हिमाचल के प्रति कोई सच्ची प्रतिबद्धता नहीं है और चेतावनी दी कि अगर समय रहते इन पर ध्यान नहीं दिया गया तो राज्य के हितों को नुकसान हो सकता है.

मंगलवार को पत्रकारों से बात करते हुए सिंह ने किसी अधिकारी का नाम लेने से बचते हुए “अनुचित और मनमाने” फंड आवंटन को लेकर नाराजगी जताई.

उन्होंने कहा, “केंद्र से मिलने वाला फंड हिमाचल के लोगों के लिए है. किसी भी अधिकारी को इसे मनमाने ढंग से बांटने का अधिकार नहीं है, फिर भी ऐसा हुआ है.” उन्होंने कहा, “एक चुने हुए जनप्रतिनिधि के तौर पर हम किसी को भी राज्य के हितों को कमज़ोर नहीं करने देंगे.”

उन्होंने कुछ बाहर से आए आईएएस और आईपीएस अधिकारियों पर सड़कों और अन्य परियोजनाओं के लिए मिले केंद्रीय फंड के दुरुपयोग का आरोप लगाया, जिससे हिमाचल की पहचान और मूल्यों को ठेस पहुंची है. सिंह ने कहा, “मैं केंद्र-राज्य ढांचे का सम्मान करता हूं और किसी भी कैडर के अधिकारियों का स्वागत करता हूं, लेकिन राज्य के हित सबसे पहले हैं. उनकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है.”

उन्होंने कहा कि ऐसी ही चिंताएं पहले उपमुख्यमंत्री अग्निहोत्री और यहां तक कि राज्य के नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर सहित अन्य लोगों ने भी जताई हैं. सिंह ने जोर देकर कहा, “हिमाचल के संसाधनों का फायदा हिमाचल के लोगों को मिलना चाहिए, न कि निजी लाभ के लिए इस्तेमाल होना चाहिए.”

फिलहाल, 1997 बैच के आईएएस अधिकारी देवेश कुमार, जो उत्तर प्रदेश से हैं, पीडब्ल्यूडी, शहरी विकास और वित्त विभाग के प्रधान सचिव हैं—ये वही विभाग हैं, जिनकी जिम्मेदारी सिंह के पास है.

संपर्क किए जाने पर मंत्री ने बुधवार को कहा, “मुझे अपनी चिंता जताने की पूरी आज़ादी है. एक जनप्रतिनिधि और पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की विरासत के वाहक के रूप में, मैं कुछ अधिकारियों द्वारा अपनी शक्तियों के दुरुपयोग को बर्दाश्त नहीं कर सकता, अगर उससे हिमाचल के हितों को नुकसान पहुंचता है.”

असहमति की आवाज़ें

कांग्रेस सरकार के भीतर सभी लोग सिंह की व्यापक आलोचना से सहमत नहीं थे.

राजस्व और बागवानी मंत्री जगत सिंह नेगी ने दिप्रिंट से कहा, “बाहर से आए कई अधिकारी बहुत अच्छा काम कर रहे हैं. सामान्य बयान देने के बजाय, खास नाम लेने चाहिए. इस तरह के बड़े और सामान्य आरोप लगाना सही तरीका नहीं है.”

वरिष्ठ कांग्रेस नेता राशिद अल्वी भी इस विवाद में कूद पड़े.

अल्वी ने नई दिल्ली में पत्रकारों से कहा, “सिविल सर्वेंट पूरे भारत में सेवा करते हैं. इस तरह की टिप्पणियां देश को बांटती हैं, जैसे महाराष्ट्र में यूपी और बिहार के लोगों पर राज ठाकरे के हमले. भारत सभी का है. प्रशासनिक बंटवारे ठीक हैं, लेकिन आपसी हमले ठीक नहीं हैं.”

हालांकि, सिंह ने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन उनकी टिप्पणियों को सरकार के नौकरशाही पर कमजोर होते नियंत्रण के संकेत के रूप में देखा जा रहा है—यह आरोप हिमाचल प्रदेश में विपक्षी बीजेपी अक्सर लगाती रही है.

राज्य के एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने नाम न छापने की शर्त पर दिप्रिंट से कहा, “इसमें कुछ नया नहीं है. हम शुरुआत से यही कह रहे हैं. अधिकारी कांग्रेस नेताओं की बात नहीं सुन रहे हैं, और यहां तक कि मंत्री भी परेशान हैं.”

दिवंगत मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के करीबी और पूर्व मंत्री राम लाल ठाकुर ने हाल ही में प्रेस को बताया कि स्वास्थ्य मंत्री धनिराम शांडिल ने उनसे कहा था कि स्वास्थ्य सचिव उनके निर्देशों को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं.

नाम न बताने की शर्त पर एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी ने कहा, “यह साफ नहीं था कि सिंह किनकी बात कर रहे थे, लेकिन सरकार ने कुछ अधिकारियों को संरक्षण दिया है, जिससे बाकी अधिकारियों का मनोबल गिरता है. बैलेंस ज़रूरी है. अगर उपमुख्यमंत्री और मंत्री दबाव में हैं, तो स्थिति गंभीर है.”

अधिकारी ने यह भी कहा कि वरिष्ठ कांग्रेस नेता लंबे समय से नौकरशाहों को लेकर शिकायत करते रहे हैं, लेकिन उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया गया.

राजनीतिक विश्लेषक एम.पी.एस. राणा ने कहा कि कई कांग्रेस नेता मौजूदा सरकार की तुलना वीरभद्र सिंह के दौर से करते हैं. उन्होंने कहा, “वह अधिकारियों को अपने बड़े अनुभव के आधार पर अलग तरह से संभालते थे.”

राज्यसभा चुनाव नज़दीक

ये आरोप अप्रैल 2026 में होने वाले राज्यसभा चुनाव से पहले सामने आए हैं, जब बीजेपी सांसद इंदु गोस्वामी का कार्यकाल खत्म हो रहा है.

नाम न बताने की शर्त पर एक और वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा, “कुछ लोग वीरभद्र गुट को संतुष्ट करने के लिए प्रतिभा सिंह को राज्यसभा भेजना चाहते हैं. रजनी पाटिल का नाम भी चल रहा है, लेकिन मामला जटिल है, खासकर पिछली बार अभिषेक मनु सिंघवी की हार के बाद, जब क्रॉस-वोटिंग ने हमारी सरकार को लगभग गिरा दिया था. तब ‘बाहरी’ वाला नैरेटिव भी सामने आया था. अब क्या पक रहा है, कौन जानता है?”

एक तीसरे वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री ने कहा, “नौकरशाही सच में बेलगाम है. इसे काबू में करना मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी थी. उपमुख्यमंत्री का इसे सार्वजनिक तौर पर, केंद्रीय नेताओं और अधिकारियों के सामने कहना दिखाता है कि मामला तुरंत कार्रवाई का था. फिर भी, उसके बाद से कुछ बदला हुआ नहीं दिखता.”

फरवरी 2024 में हुए पिछले राज्यसभा चुनाव में बीजेपी के हर्ष महाजन ने कांग्रेस के अभिषेक मनु सिंघवी को अप्रत्याशित रूप से हरा दिया था. छह कांग्रेस विधायकों की क्रॉस-वोटिंग के कारण 34-34 की बराबरी हो गई थी, जिसे पर्ची डालकर बीजेपी के पक्ष में तय किया गया. इसके बाद संकट पैदा हुआ, जिसके चलते विधायकों की अयोग्यता हुई और उपचुनाव कराने पड़े, क्योंकि कांग्रेस अपनी सरकार बचाने में जुट गई थी.

हिमाचल प्रदेश राज्यसभा के लिए तीन सदस्यों का चुनाव करता है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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