नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट जब आवारा कुत्तों के प्रबंधन से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई जारी रखे हुए है, उसी बीच कम से कम चार राज्य सरकारों ने केंद्र को पत्र लिखकर कड़ी आपत्तियां और चिंताएं जताई हैं. ये आपत्तियां कोर्ट के आदेश के तहत आवारा कुत्तों को शेल्टर (आश्रय) में भेजने के लिए बनाई गई स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) को लेकर हैं.
7 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों से कहा था कि रेलवे स्टेशनों, स्कूलों, अस्पतालों, बस स्टॉप और अन्य सार्वजनिक जगहों से सभी आवारा कुत्तों को तुरंत हटाया जाए और उन्हें “निर्धारित शेल्टर” में भेजा जाए.
इसके बाद, 27 नवंबर 2025 को एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया (AWBI) ने इस आदेश के पालन में सभी राज्य सरकारों को एसओपी जारी की.
हालांकि, दिप्रिंट द्वारा देखे गए अलग-अलग पत्रों में उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर की सरकारों ने AWBI को जवाब लिखकर कहा है कि एसओपी को लागू करना प्रशासनिक और बजट के स्तर पर संभव नहीं है. साथ ही, कुत्तों के काटने के मामलों के आंकड़ों पर भरोसा नहीं किया जा सकता, मौजूदा नियमों और नए निर्देशों में गंभीर अंतर से भ्रम है, जानवरों से फैलने वाली बीमारियों (जूनोटिक डिजीज) के फैलने का डर है और पशु क्रूरता को लेकर भी चिंता है.
राजस्थान, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर की सरकारों ने कहा है कि यह साबित करने के लिए कोई भरोसेमंद आंकड़े नहीं हैं कि कुत्तों के काटने के मामलों में सच में बढ़ोतरी हुई है. इस तरह के अनुमान अविश्वसनीय मीडिया रिपोर्टों पर आधारित हैं.
राजस्थान, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर की सरकारों ने अपने पत्रों में लिखा है, “कुत्तों के काटने के मामलों की संख्या भरोसेमंद नहीं है, क्योंकि यह डेटा एंटी-रेबीज इंजेक्शन के आधार पर बनता है, न कि हर एक कुत्ते के काटने के मामले के लिए.”
उन्होंने यह भी कहा, “दूसरी बात, (यह डेटा) आवारा और पालतू कुत्तों के काटने के मामलों में फर्क नहीं करता.”
राजस्थान और जम्मू-कश्मीर की सरकारों ने आगे कहा है कि इसके चलते “सोशल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रिपोर्टों के आधार पर अनुमान लगाए गए हैं, जिन पर भरोसा नहीं किया जा सकता.”
कुत्ते के काटने के हर मामले में पांच एंटी-रेबीज इंजेक्शन लगाए जाते हैं.
इसके अलावा, राज्य सरकारों ने एसओपी के अनुसार, कुत्तों को शेल्टर देने के लिए जरूरी जगह (स्पेस) की गणना के तरीके पर भी सवाल उठाए हैं. यूपी सरकार ने कहा है कि कुत्तों के ब्रीडर्स को भी कानून के तहत कुत्तों को उससे ज्यादा जगह देनी होती है, जितनी AWBI ने अपनी एसओपी में कुत्तों के स्थायी आवास के लिए तय की है.
24 दिसंबर 2025 को लिखे यूपी सरकार के पत्र में कहा गया है, “निर्धारित स्थानों पर कुत्तों के स्थायी आवास के लिए एसओपी में तय की गई जगह ‘डॉग ब्रीडिंग एंड मार्केटिंग रूल्स, 2017’ में तय मानकों से भी कम है.”
पत्र में आगे कहा गया है, “इतनी कम जगह में कुत्तों को रखने से न सिर्फ उनकी आक्रामकता बढ़ेगी, बल्कि संक्रामक बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाएगा.”
पत्र में यह भी कहा गया है, “यह पशु क्रूरता के दायरे में आ सकता है और इससे राज्य सरकार के लिए कानूनी और प्रशासनिक चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं.”
राजस्थान, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर की सरकारों ने भी इसी तरह कहा है, “यह साफ नहीं है कि जगह की ज़रूरत की गणना कैसे की गई है, और कई संगठनों ने वैज्ञानिक आधार पर इसे चुनौती दी है, क्योंकि इससे भीड़भाड़ होगी और कई संक्रमण व टाली जा सकने वाली मौतें होंगी.”
इसके अलावा, उन्होंने कहा है कि AWBI ने जानवरों की आवाजाही के लिए जगह, खाने की जगह, रेबीज और डिस्टेंपर से पीड़ित कुत्तों के लिए अलग जगह जैसी जरूरी बातों का जिक्र नहीं किया है, जो किसी भी शेल्टर के संचालन के लिए ज़रूरी होती हैं.
स्टाफ, ट्रेनिंग और बजट से जुड़े सवाल
अपनी एसओपी में AWBI ने सिर्फ इतना कहा है कि हर शेल्टर में कचरा प्रबंधन की ज़रूरत के हिसाब से केयरटेकरों की संख्या तय की जाए और संक्रमण फैलने से रोकने व बेहतर कचरा प्रबंधन के लिए शेल्टर की सफाई दिन में दो बार की जाए.
हालांकि, राज्य सरकारों ने सवाल उठाया है कि इसके लिए प्रशिक्षित स्टाफ आएगा कहां से. राज्य सरकारों का कहना है कि इसके लिए AWBI को हर राज्य में प्रशिक्षण संस्थान बनाने होंगे.
उन्होंने कहा, “एनिमल शेल्टर में कचरा प्रबंधन के लिए खास तौर पर प्रशिक्षित स्टाफ की ज़रूरत होती है. AWBI को स्टाफ की क्षमता बढ़ाने के लिए हर राज्य में प्रशिक्षण संस्थान बनाने होंगे, क्योंकि अब हर ULB (अर्बन लोकल बॉडी) और RLB (रूरल लोकल बॉडी) में भी ऐसी सुविधाएं बनाई जानी हैं.”
चिकित्सा विशेषज्ञों द्वारा जताई गई जूनोटिक बीमारियों के फैलने की आशंका से सहमति जताते हुए, राज्य सरकारों ने यह भी कहा है, “एसओपी में इन शेल्टरों की साफ-सफाई को लेकर विस्तार से नियम होने चाहिए, खासकर जहां डिस्टेंपर के मामले हों, वहां संक्रामक और घातक बीमारियों के फैलाव को रोकने के लिए खास सफाई प्रोटोकॉल ज़रूरी है.”
राजस्थान और जम्मू-कश्मीर की सरकारों ने अपने पत्रों में कहा है, “एनिमल शेल्टर में कचरा प्रबंधन के लिए खास तौर पर प्रशिक्षित स्टाफ की जरूरत होती है. AWBI को स्टाफ की क्षमता बढ़ाने के लिए हर राज्य में प्रशिक्षण संस्थान बनाने होंगे, क्योंकि अब हर ULB (अर्बन लोकल बॉडी) और RLB (रूरल लोकल बॉडी) में भी ऐसी सुविधाएं बनाई जानी हैं.”
चिकित्सा विशेषज्ञों द्वारा जताई गई जूनोटिक बीमारियों के फैलने की आशंका से सहमति जताते हुए, राजस्थान और जम्मू-कश्मीर की सरकारों ने यह भी कहा है, “एसओपी में इन शेल्टरों की साफ-सफाई को लेकर विस्तार से नियम होने चाहिए, खासकर जहां डिस्टेंपर के मामले हों, वहां संक्रामक और घातक बीमारियों के फैलाव को रोकने के लिए खास सफाई प्रोटोकॉल जरूरी है.”
AWBI की एसओपी में कहा गया है कि कुत्तों को हटाने के बाद संबंधित नगर निगम या स्थानीय निकाय, जैसा भी मामला हो, यह सुनिश्चित करेंगे कि शेल्टर में रखने से पहले सभी कुत्तों की नसबंदी (स्टरलाइजेशन) की गई हो.
इस संबंध में, अगर नसबंदी केंद्र उपलब्ध नहीं है, तो वे पशुपालन विभाग के प्रशासनिक नियंत्रण में आने वाले स्थानीय पशु चिकित्सालयों की मदद ले सकते हैं या नसबंदी कार्यक्रम के लिए काम कर रहे किसी भी सिविल सोसाइटी, संगठन या ट्रस्ट की मदद ले सकते हैं.
हालांकि, राज्य सरकारों ने बताया है कि ऊपर बताई गई एसओपी मौजूदा नियमों के खिलाफ है.
राजस्थान और जम्मू-कश्मीर की सरकारों ने कहा है, “AWBI को यह साफ करना होगा कि क्या यह एसओपी अभी लागू एबीसी नियमों से ऊपर है, क्योंकि यह एसओपी पूरी तरह से एबीसी नियमों के खिलाफ है.”
वहीं, उत्तराखंड सरकार ने राज्य द्वारा संचालित पशु चिकित्सालयों से यह काम कराए जाने में आने वाली दिक्कतों की ओर इशारा किया है. उसने कहा, “स्थानीय पशु चिकित्सालयों में यह काम करना बहुत मुश्किल है, क्योंकि इसके लिए एक मानक ढांचा/सुविधा की ज़रूरत होती है.”
उसने आगे कहा, “सरकारी पशु चिकित्सालय पहले से ही अपने काम से बहुत ज्यादा बोझिल हैं, इसलिए बर्थ कंट्रोल को अलग रखा जाना चाहिए. और इसके लिए स्थानीय निकायों को अपने स्तर पर एक फुल टाइम पशु चिकित्सक की व्यवस्था करनी चाहिए.”
इसके आगे, AWBI की एसओपी में कहा गया है कि नसबंदी किए गए कुत्तों को ठीक होने के बाद रेबीज़ का टीका लगाया जाएगा और यह टीकाकरण कम से कम पांच साल तक हर साल जारी रहेगा.
हालांकि, राज्य सरकारों ने कहा है कि “इस तरह की क्षमता तैयार करने में बहुत ज्यादा बजट और जगह से जुड़ी दिक्कतें आएंगी.”
इसके अलावा, कानूनी असंगतियों का सवाल उठाते हुए, राज्य सरकारों ने पूछा है कि “क्या यह एसओपी अभी लागू एनिमल बर्थ कंट्रोल नियमों से ऊपर है, क्योंकि यह एसओपी पूरी तरह से एबीसी नियमों के खिलाफ है.”
अपने पत्र में यूपी सरकार ने भी कानूनी असंगति का यही मुद्दा उठाया है. उसने कहा है, “इस एसओपी के कई प्रावधान ‘ABC रूल्स, 2023’ और ‘रिवाइज्ड ABC मॉड्यूल 2025’ से मेल नहीं खाते, खासकर नसबंदी-टीकाकरण की प्रक्रिया और केनल (डॉग हाउस) के मानकों को लेकर.”
उसने आगे कहा, “एक ही समय पर अलग-अलग नियमों में अलग-अलग प्रोटोकॉल होने से जमीनी स्तर पर लागू करने में भ्रम पैदा हो सकता है.”
उसने यह भी साफ तौर पर कहा है कि यूपी जैसे बड़े राज्य में स्थानीय निकायों के पास “जानवरों को पूरी तरह से रोकने और धार्मिक व सार्वजनिक जगहों पर फेंसिंग लगाने के लिए जरूरी संसाधन और बुनियादी ढांचा नहीं है.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
