मेरा एक मन यह कहना चाहता है: ‘शुक्रिया मिस्टर डॉनल्ड ट्रंप कि आपने भारत के साथ व्यापार समझौते को बिलकुल ठंडे बस्ते में नहीं, तो अपने सबसे निचले दराज में बंद कर दिया!’ क्योंकि आपने ऐसा न किया होता तो यहां महत्वपूर्ण आर्थिक सुधार फटाफट न किए जाते, जैसा 1991 के बाद अब तक नहीं हुआ था. उदाहरण के लिए नए श्रम नियमों को ही ले लीजिए.
जैसा कि अमेरिकी कॉमर्स मंत्री हावर्ड लटनिक कह रहे हैं, इससे पहले, जुलाई में समझौता हो जाता तो भारत अपनी जीत घोषित करके निश्चिंत होकर बैठ जाता कि सब कुछ काबू में है. यह वह समय था जब अमेरिका-ब्रिटेन (16 जून) और अमेरिका-वियतनाम (2 जुलाई) के बीच व्यापार समझौते हुए थे. तब भारत के साथ समझौता हो जाता तो भारत सरकार ने किसी जोखिम भरे सुधार की हिम्मत न दिखाई होती. उसने थोड़े कदम उठाने की कोशिश की लेकिन टकराव से बचने के लिए कदम पीछे ही खींच लिये. नया भूमि अधिग्रहण विधेयक, कृषि कानून, सबको वापस ले लिया और जोखिम से बचने के लिए, श्रम क़ानूनों को लटका कर रख दिया.
आर्थिक प्रशासन, मसलन सरकारी बैंकों की बैलेंसशीटों की सफाई, उनकी मजबूती, और दिवालिया कानून आदि के मामले में कुछ सुधार किए गए. लेकिन इस बीच ‘सरकार माई-बाप’ वाला संरक्षण फिर वापस आया. शुल्कों (आज जिसे फैशन में टैरिफ कहा जाता है) में वृद्धि हुई और ‘क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर (क्यूसीओ) के रूप में भारी-भरकम नॉन-टैरिफ सुरक्षा दीवार खड़ी कर दी गई. भारतीय उद्योग के हर सेक्टर ने इनके लिए पैरवी की और इन्हें हासिल कर लिया.
तेजतर्रार भारतीय सिविल सेवाओं को मिलाकर बनी अंदरूनी मंडली ने ही इन्हें तैयार किया होगा. ट्रंप शायद भारत की इन्हीं ‘घिनौनी’ नॉन-टैरिफ बाधाओं का जिक्र कर रहे थे. दरअसल, इनका समय बीत चुका है. इन्हें अब हड़बड़ी से नहीं, तो वैसी मुस्तैदी से वापस किया जा रहा है जैसी मुस्तैदी स्कूली बच्चे तब दिखाते हैं जब टीचर ने उन्हें क्लास में मोबाइल पर फिल्म देखते पकड़ लिया हो. पूर्व कैबिनेट सचिव राजीव गौबा सरीखे ताकतवर, अनुभवी और भरोसेमंद अधिकारी, जो फिलहाल आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए नीति आयोग में तैनात हैं, इस वापसी परियोजना को आगे बढ़ा रहे हैं. भगवान उन्हें और शक्ति दे !
लेकिन, ट्रंप साहब आपका फिर से शुक्रिया. शुक्रिया नरमी दिखाने के लिए नहीं, बल्कि ऐसा अहंकार दिखाने के लिए कि आपने एक बेहद महत्वपूर्ण रणनीतिक संबंध को सिर्फ इसलिए खराब कर लिया कि किसी ने आपको फोन किया था या नहीं. शुक्रिया इस बात के लिए भी कि आप हमेशा अपने मन की बात कहते रहे हैं, और आपके पास एक ऐसी टीम है जो आपकी तरफ से आपकी ही भाषा में बोलती है. लुटनिक इसकी ताजा मिसाल हैं— कि बेबाकी से बात करना ‘मुंह में राम, बगल में छुरी’ वाली पुरानी कूटनीति से कहीं बेहतर है.
ट्रंप न होते तो व्यापार से मुंह मोड़ने वाले इस भाजपाई सत्तातंत्र को, जो अटल बिहारी वाजपेयी के वैचारिक सूत्रों से ज्यादा अपने वैचारिक ग्रंथों को पढ़ता है, व्यापार समझौतों के जादू का पता न चला होता. यह स्थिति तब है जब वह विरासत में मिली चीजों को नष्ट करता रहा, द्विपक्षीय निवेश संधियों (बीआइटी) को भी. लेकिन अब ब्रिटेन और ‘यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन’ (ईएफटीए) के साथ व्यापार समझौता झोली में आ चुका है और यूरोपीय संघ (ईयू) के साथ भी समझौता होने वाला है, चीन को छोड़ (उसके लिए भी प्रतिबंधों को हटाया जा रहा है) ‘आरसीईपी’ (क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझीदारी) का लगभग हर सदस्य देश साथ आ गया है. इसके बाद व्यापार को लेकर भारत का दिमाग भी बदल गया है. इसलिए मिस्टर ट्रंप, आपको फिर से धन्यवाद.
जो भी कम सीधा और कम आक्रामक, ट्रंप के सबसे बुरे तेवर से कम उग्र कदम होगा, तो अपनी पीठ खुद ठोकते रहने वाला हमारा सत्तातंत्र सुकून की नींद लेने लगेगा. सात फीसदी की आर्थिक वृद्धि के साथ नगण्य मुद्रास्फीति दर, इसके साथ कट्टर हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद और जनकल्याण की कार्यकुशल डेलीवरी का मेल जबरदस्त चुनावी फॉर्मूला तो तैयार कर ही देता है. तो फिर अपनी नाव को जोखिम में क्यों डालें? पांच साल तक 272 के स्कोर का पीछा कर यह सरकार अपने दूसरे साल में ‘180 फॉर वन’ के स्कोर पर बैटिंग कर रही थी, जब ट्रंप ने पेंसिलवानिया एवेन्यू से बॉलिंग शुरू करके हमें याद दिलाया कि बच-बच के खेलना कोई विकल्प नहीं है. वजूद बचाना कठिन है इसलिए स्कोर बढ़ाओ, चाहे जो भी जोखिम हो.
यह तो उम्मीद की ही जा रही थी कि ट्रंप व्यापार को अपनी नीति का औज़ार बनाएंगे. लेकिन भारत यह अनुमान नहीं लगा पाया कि वे टैरिफ को ‘जनसंहार के अपने नये हथियार’ के रूप में इस्तेमाल करेंगे. वैसे, सच कहें तो बाकी दुनिया भी यह अनुमान नहीं लगा पाई. भारत सबसे ज्यादा आत्मतुष्ट, और व्यापार के प्रति उदासीन था और शायद यह मान बैठा था कि ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में आपसी संबंध रणनीतिक हितों से संचालित होते रहेंगे. लेकिन इसके विपरीत यह रणनीतिक पहलू हमारे लिए तब पलट गया जब ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान व्हाइट हाउस में वापस पहुंच गया. मोदी और ट्रंप के बीच सदभावना का जो भी थोड़ा-सा पानी बचा था वह ‘मेरा नोबल पुरस्कार कहां है?’ की गरमी में भाप बनकर उड़ गया.
भारत उनके नाम की सिफ़ारिश तो नहीं ही कर सकता था लेकिन हम इन ‘मूर्ख पाकिस्तानियों’ को अंतिम सबक सिखाते इससे पहले उन्हें होश में लाने और युद्धविराम की राह बनाने के लिए ट्रंप को धन्यवाद कहने पर विचार तो किया ही जा सकता था. गहरे सुरक्षा हितों की खातिर इससे इनकार करना एक रणनीतिक भूल थी.
मेरा दूसरा मन इस बात को कबूल करता है कि यह जो संकट जारी है वह कम वेतन वाले लाखों रोजगारों को किस तरह खत्म कर रहा है और बड़े पैमाने पर रोजगार देने वाले मछली पालन, गारमेंट्स, होजियरी, रत्न और ज्वेलरी बनाने जैसे क्षेत्रों को नुकसान पहुंचा रहा है. अब तक ये क्षेत्र कुछ तो सरकार की मदद से और कुछ अपनी अब तक की रफ्तार के बूते बचे रहे हैं. लेकिन तीन महीने और बीतने के बाद इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर छंटनी हो सकती है. इसलिए भारत इसे लंबे समय तक नहीं झेल सकता. समाधान ढूंढने पड़ेंगे.
इसका मतलब यह नहीं है कि भारत ट्रंप के सामने खुलकर गिड़गिड़ाए, जिसकी अपेक्षा वे शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन को छोड़ दुनिया के हर नेता से रखते हैं. लेकिन भारत उन कई मामलों में ज्यादा लचीला रुख अपना सकता है, जो मामले ट्रंप के लिए काफी संवेदनशील हैं. उदाहरण के लिए, उनकी फार्म लॉबी. मैं जानता हूं कि भारत में इसका स्वाभाविक विरोध इस डर के कारण होता है कि यह भारतीय कृषि का सफाया कर देगा या यहां उन ‘जीएम’ उत्पादों की बाढ़ ला देगा जिन पर भारत ने रोक लगा रखी है (जिसे मैं लंबे समय से अनुचित मानता रहा हूं).
आक्रामक या कट्टर हुए बिना भी इसका रास्ता निकाला जा सकता है. जरा देखिए कि ढाका में अमेरिकी दूतावास वहां मात्र 58,000 अमेरिकी मक्के की आमद पर कितना खुश है. यह मुर्गियों का चारा है. भारत मुख्यतः मुर्गियों के लिए कुल चारे का आयात करता है. केवल ईथनोल बनाने या मुर्गियों के चारे के लिए बड़ी मात्रा में मक्का आयात करने में क्या दिक्कत है? अब यह मत कहिए कि हम अपनी मुर्गियों को ‘जीएम’ वाला चारा नहीं खिला सकते. ‘जीएम’ कपास की भूसी हमारी मवेशियों का प्रमुख चारा है. और इससे निकाला जा रहा तेल हमारे ‘फूड चेन’ में 23 वर्षों से मौजूद है.
पूरी दुनिया ट्रंप से निबटने के उपाय तलाश रही है. अब तक तो आप उनके तौर-तरीके और शैली को समझ ही चुके होंगे. बिना प्रचार किए उन्हें कुछ अहानिकर जीत का श्रेय लेने दिया जा सकता है. कुछ शोर हो सकता है, और टक्कर भी हो सकती जैसी इंदिरा गांधी और रिचर्ड निक्सन के बीच हुई थी. लेकिन वह कोई और ही वक़्त तथा संदर्भ था. शीतयुद्ध चरम पर था और इंदिरा गांधी जब अपनी सत्ता के शिखर पर थीं तब सोवियत संघ एक संधि से बंधा हमारा सहयोगी था. आज दुनिया बदली हुई है और यह एक नया भारत है. आप निक्सन के तेवरों की अनदेखी कर सकते थे लेकिन आज जब भारत आर्थिक और रणनीतिक रूप से अमेरिका से तथा वैश्विक व्यवस्था से इतना जुड़ चुका है तब वह ट्रंप के तेवरों की अनदेखी नहीं कर सकता. इस बीच, अगले सप्ताह सर्जिओ गोर भारत के नये राजदूत बनेंगे, तो उसके बाद के अगले कदमों का इंतजार कीजिए, और ठोस आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाइए क्योंकि ऐसा संकट पीढ़ियों के बीच एकाध बार ही आता है.
पोस्टस्क्रिप्ट: भारत-अमेरिका व्यापार समझौते से जुड़ी दो दंतकथाएं.
पहली कथा 1987 की है, जब राजीव गांधी अमेरिकी राष्ट्रपति रोनल्ड रीगन से उनके ओवल ऑफिस में मिले थे. राजीव ने जब सामने कटोरे में रखे बादामों में से एक बादाम उठाया तो रीगन ने उनसे पूछा: ‘मिस्टर प्राइम मिनिस्टर, भारत में अमेरिकी बादाम की बिक्री हो इसके लिए क्या करना होगा?’ यह सवाल अमेरिका की रिपब्लिकन पार्टी वालों और किसानों के बीच उनके जनाधार को लेकर उनके सरोकार के बारे में कुछ कहता है. दूसरी कथा पूर्व वाणिज्य सचिव और बाद में अमेरिका में भारत के राजदूत बने स्व. आबिद हुसैन सुनाया करते थे, कि एक बार उन्होंने अपने मंत्री वी.पी. सिंह से कहा था, ‘सर, हमें देश को यह नारा देना चाहिए— निर्यात करो, नहीं तो मरो.’
वी.पी. सिंह ने जवाब दिया था, ‘ऐसा मत कीजिएगा आबिद साहब, नहीं तो यह देश सामूहिक रूप से मरने का फैसला कर लेगा’. जब ये दोनों जीवित थे तब मैंने यह कथा अपने इस कॉलम में लिख दी थी, और दोनों खूब हंसे थे.
इसके बाद के चार दशकों में हमने कई तरह के डर को खत्म किया है. अगली बारी है मुक्त व्यापार से डर की.
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