नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें पिछले हफ्ते उन्नाव में 2017 में नाबालिग से बलात्कार के मामले में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को मिली उम्रकैद की सज़ा को निलंबित कर दिया गया था.
केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की अपील पर सुनवाई करते हुए, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुआई वाली बेंच ने कहा कि आमतौर पर अदालतें निचली अदालतों के ऐसे आदेशों पर रोक नहीं लगातीं, जिनमें किसी आरोपी या दोषी को रिहा किया गया हो, लेकिन चूंकि सेंगर एक अन्य मामले में अब भी जेल में है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाना सही समझा.
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलीलों से सहमत होते हुए सीजेआई ने कहा कि उन्हें इस बात की चिंता है कि हाई कोर्ट ने POCSO कानून के तहत ‘लोक सेवक’ की परिभाषा को कैसे समझा.
हाई कोर्ट ने सेंगर को राहत देने का एक बड़ा कारण यह माना था कि वह POCSO एक्ट की धारा 5 के दायरे में नहीं आता, जो किसी लोक सेवक द्वारा किए गए गंभीर यौन अपराध से जुड़ी है.
लोक सेवक की साफ परिभाषा न होने की वजह से हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का सहारा लिया और यह तय किया कि किन सरकारी कर्मचारियों को धारा 5 के तहत रखा जा सकता है. इस व्याख्या में एमएलए और एमपी को बाहर कर दिया गया.
इसी आधार पर सेंगर पर हल्की धारा लगाई गई — धारा 3, जिसमें अधिकतम सात साल की सज़ा का प्रावधान है. चूंकि, पूर्व बीजेपी विधायक सात साल से ज्यादा समय जेल में बिता चुका था, इसलिए हाई कोर्ट ने उसकी सज़ा निलंबित कर दी.
सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई ने जोरदार तरीके से हाई कोर्ट की इस राय का विरोध किया कि सेंगर लोक सेवक नहीं है.
मेहता ने बेंच से कहा, “POCSO कानून के मकसद और उद्देश्य को देखते हुए, ऐसा कोई भी चुना हुआ प्रतिनिधि, जिसके पास बहुत शक्ति हो और जो बच्चों पर प्रभाव रखता हो, उसे लोक सेवक माना जाना चाहिए. खासकर जब आरोपी उसी इलाके का विधायक था, जहां पीड़िता रहती थी.”
उन्होंने आगे कहा, “अगर ऐसा नहीं माना गया, तो यह अजीब स्थिति होगी — जैसे एक पुलिस कांस्टेबल पर ‘गंभीर अपराध’ लगे, लेकिन सांसद या विधायक उस दायरे में न आए.”
सीजेआई ने हाई कोर्ट की टिप्पणियों पर सीधे कुछ कहने से बचते हुए कहा कि सभी लोग, जज भी, “गलती कर सकते हैं.”
उन्होंने मौखिक टिप्पणी में कहा, “POCSO में लोक सेवक की परिभाषा देखिए…हमें चिंता है कि एक कांस्टेबल तो लोक सेवक माना जाए, लेकिन विधायक को बाहर कर दिया जाए.”
हाई कोर्ट ने कहा था कि POCSO की धारा 5(c) के तहत किसी लोक सेवक द्वारा बच्चे के साथ यौन अपराध में उम्रकैद की सज़ा हो सकती है, लेकिन यह सेंगर पर लागू नहीं होती क्योंकि आईपीसी की धारा 21 में दी गई लोक सेवक की परिभाषा में वह नहीं आता.
मेहता ने दलील दी कि लोक सेवक की परिभाषा को संकीर्ण शब्दों में नहीं, बल्कि व्यापक संदर्भ में समझा जाना चाहिए.
उन्होंने कहा, “वह उसी इलाके का विधायक था और बहुत प्रभावशाली था.”
मेहता ने यह भी कहा कि दिल्ली हाई कोर्ट ने POCSO कानून में 2019 में हुए संशोधन को लागू न करके गलती की, जिसमें न्यूनतम सज़ा बढ़ाकर 10 साल कर दी गई थी.
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि सेंगर जिस अपराध में दोषी ठहराया गया, वह संशोधन से पहले का है, इसलिए अधिकतम सज़ा सात साल ही होगी. इसी आधार पर अदालत ने उसे रिहा करने का आदेश दिया, जबकि ट्रायल कोर्ट ने उम्रकैद दी थी.
मेहता ने कहा कि यह तर्क गलत है, क्योंकि 2019 का संशोधन अपराध को नया नहीं बनाता, बल्कि सज़ा की न्यूनतम अवधि बढ़ाता है.
उन्होंने कहा, “POCSO की धारा 42A देखिए, जो बताती है कि अलग-अलग कानूनों में टकराव होने पर क्या लागू होगा. हाई कोर्ट ने इस पर ध्यान नहीं दिया. यह दोषी पीड़िता के पिता की हत्या के मामले में भी दोषी है और अब भी जेल में है. मैं अदालत से अपील करता हूं कि बच्चे के हित में इस आदेश पर रोक लगाई जाए.”
सुप्रीम कोर्ट ने सेंगर की ओर से पेश वरिष्ठ वकील एन. हरिहरन और सिद्धार्थ दवे को चार हफ्ते में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया.
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संज्ञान लिया कि सेंगर के वकील ने कहा था कि दिल्ली हाई कोर्ट के जजों को सोशल मीडिया और मीडिया में निशाना बनाया जा रहा है.
इस पर सीजेआई ने कहा, “यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है. हम किसी हाथीदांत के महल में नहीं बैठे हैं. लोग राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश करते हैं. सिस्टम को डराने की कोशिश न करें.”
मेहता ने भी जजों की आलोचना की निंदा करते हुए कहा कि उनकी ईमानदारी पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता.
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