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Saturday, 3 January, 2026
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हिजाब के नाम पर नियंत्रण या औरत के चयन की आज़ादी—ढाका से उठते सवाल

भारत और बांग्लादेश के सामाजिक अनुभवों के सहारे यह किताब बताती है कि मज़हब और राजनीति के बीच पिसती इंसानियत का सबसे बड़ा बोझ औरत उठाती है.

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(किताब को राजकमल प्रकाश ने छापा है जिसका अंश प्रकाशन की अनुमति से छापा जा रहा है.)

आय थिंक देयरफोर आय एम—देकार्त

(मैं सोचती हूँ इसलिए मैं हूँ.)

मेरे ज़ेहन में घूमने लगी, मसीह अलीनेजाद की ईरान में स्त्रियों की स्वाधीनता का सवाल उठाती हुई उनकी किताब (नाम याद नहीं कर पा रही हूँ), अपनी पुस्तक में वे हिजाब को संस्कृति का हिस्सा बनाने और उसके धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान पर आपत्ति उठाती हैं. वे बार-बार हर जगह अपना रुख स्पष्ट करती हैं कि वे हिजाब के ख़िलाफ़ नहीं हैं, वे ईरान की महिलाओं के लिए ‘चयन की आज़ादी’ चाहती हैं. जिस महिला की इच्छा न हो हिजाब पहनने की, उसे अपराधी करार देकर जेल में न डाला जाए.

मसीह अलीनेजाद हिजाब की अनिवार्यता को ठुकराती हैं. सोचिए कि जब सात साल की उम्र से एक बच्ची सोते समय भी हिजाब पहनती हो और तीसेक साल की उम्र के आसपास किसी दिन, हवा का एक झोंका आए और बिना हिजाब वाली उसकी ज़ुल्फ़ों की लटों को छूकर निकल जाए और उसकी छूअन की सिहरन लड़की को अन्दर तक महसूस हो, तो कैसा लगा होगा. हवा का जुल्फों में अटक जाना और बालों का उड़ना यदि उनको अपनी आज़ादी का आख्यान लगता है, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है.

उन्हें लगता है, सिर ढकना सिर्फ़ सिर ढकना नहीं है, औरत की पूरी सोच को नियंत्रित करने और उसकी तेजस्विता को कुंद करने की साजिश है. ज़ाहिर है, मसीह को यह आज़ादी ईरान में नहीं, बल्कि लन्दन में नसीब होती है. हालाँकि कुछ साथी महिला पत्रकारों के साथ हिजाब उतारने का संक्षिप्त एडवेंचर वे लेबनान में भी कर चुकी हैं.

जहाँ धर्म नहीं है, वहाँ स्त्री तन और मन, दोनों से ज़रूर आज़ाद है. प्रकृति पुजारी आदिवासी समाज में मैंने स्त्री को कहीं ज़्यादा उन्मुक्त और आज़ाद पाया. वहाँ मैंने यह दोहरा मापदंड नहीं देखा कि पुरुष सिगरेट पीये तो उसके फेफड़े ख़राब होंगे और औरत सिगरेट पीए, तो उसका चरित्र ख़राब होगा. वहाँ दोनों ही छककर हड़िया (स्थानीय शराब) पीते हैं, क्योंकि उनके धर्म के केन्द्र में प्रकृति और वे तत्त्व हैं जो जीने में सहायक होते हैं. वहाँ दूर-दूर तक मन्दिर तो छोड़िए, कोई मूर्ति तक नहीं मिलेगी. कोई कर्मकांड नहीं. आपको जानकर ताज्जुब होगा कि आदिवासी समाज की भाषाओं में बलात्कार जैसा कोई शब्द ही नहीं. यही बात जंगल में रहनेवाले जंगली जानवरों पर भी लागू होती है, जहाँ नर और मादा का कोई भेदभाव नहीं. समान अधिकार जैसा उन समाजों में है, हमारे जैसे धार्मिक और सभ्य समाज में नहीं.

उन्हीं शुरुआती दिनों में एक शाम मैं घर से आधा किलोमीटर दूर स्थित ‘ऑस्ट्रेलियन हाई कमीशन’ के बाहर घूमने लगी. यह मेरे लिए रास्ता पहचानने का लैंडमार्क भी था. ऑस्ट्रेलियन हाई कमीशन के ऑफ़िस का मुख्य द्वार गुलशन एवेन्यू में खुलता है. यह इलाक़ा बेहद शान्त और सुन्दर है. दोनों आेर एक कतार में लगे बड़े-बड़े नीम के पेड़. बीच-बीच में बत्तियों से जगमगाता ‘खाना खजाना’. मंत्रमुग्ध मैं आगे-आगे बढ़ती गई. मेरा लैंडमार्क जाने कहाँ पीछे छूट गया. मैं सड़क पर बौखलाई चलने लगी कि तभी देखा एक बन्द गाड़ी, जिसके ऊपर लिखा हुआ था—रैपिड एक्शन बटालियन (RAB). मैंने रैब का नाम सुन रखा था. इसकी स्थापना आतंकवादियों और संगीन अपराधियों के सफाए के लिए हुई थी. शुरुआती दौर में रैब ने काफ़ी अच्छा काम भी किया था, पर धीरे-धीरे इसका राजनीतिक इस्तेमाल होने लगा और यह राजनीतिक विरोधियों को ठिकाने लगाने लगी. इसके लोमहर्षक यातना शिविर की कुछ कहानियाँ भी मेरे पत्रकार मित्रों के जरिये मुझ तक पहुँच चुकी थीं. मैं ग़ाैर से जाली वाली उस गाड़ी को देखने लगी कि तभी उसी गाड़ी के पास खड़े एक जवान ने मुझसे पूछा, ‘आपनी कोथाय थाकुन (आप कहाँ रहती हैं)?’ मैं थोड़ी डर गई. मेरे मुँह से निकला ‘आई ऍम इंडियन’. उसने बंगाली में विनम्रता से कहा, ‘नीचे सड़क पर नहीं फुटपाथ पर चलिए’

यदि समाचार पत्र पर ध्यान न दें, तो यहाँ हिन्दुस्तानी के लिए आम तौर पर अच्छी भावना है. मैं एक बार एक चश्मे की दुकान पर गई थी. मैंने अपना चश्मा ठीक करवाया और पूछा—कितना दे दूँ. उसने पलट कर पूछा ‘आपनी कि इंडियन?’ मेरे हाँ कहने पर उसने कहा ‘जा इच्छा दिये दिन’ (जो इच्छा हो दे दीजिए). भारतीय होने के चलते मेरे वीज़ा का विस्तार घर बैठे ही हो गया था. ट्रै‌िफ़क में एक बार हमारी गाड़ी ने ट्रै‌िफ़क नियम का उल्लंघन किया था, लेकिन भारतीय होने के चलते हम पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, बस चेतावनी देकर छोड़ दिया गया था.

कारण?

शायद मुजीब और शेख हसीना के हिन्दुस्तान से मधुर सम्बन्ध?

या इसलिए कि यहाँ की हिन्दुस्तान लीवर, टाटा मोटर्स, मैरिको, नेस्ले जैसी बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को भारतीय सीईओ ही सँभाल रहे हैं, क्योंकि भारतीयों का प्रबन्धन अनुभव बांग्लादेशियों से कहीं ज़्यादा और विविधतापूर्ण है.

या इसलिए कि बांग्लादेश के स्वाधीनता संग्राम में भारत ने भी अपना ख़ून बहाया था और अहम भूमिका निभाई थी और उसका लाभ हमें मिल रहा था.

या इसलिए कि हम दोनों पड़ाेसी देशों की पृष्ठभूमि, अतीत और संस्कृति एक ही है?

बहरहाल बाद में जब मोदी नागरिकता संशोधन क़ानून एनआरसी और सीएए लेकर आए और जब कोरोना काल में तब्लीगी जमातियों के प्रति दुष्प्रचार किया गया, तब शायद इस सद्भावना में कमी नज़र आई. उन्हीं दिनों कई बांग्लादेशियों ने ज़रूर मुझसे कहा था—आपके देश में मुसलमानों को मोदी क्यों मरवा रहा है?

लेकिन मोदी जी के एक काम को भारत के हिन्दुओं से बहुत सराहना मिली. मोदी जी के आने के पूर्व बांग्लादेश में अधिकांश गायें भारत से ही निर्यात होती थीं, बकरीद वगैरह में काटने के लिए. क़ानूनी और ग़ैर-क़ानूनी, दोनों ही तरीक़ों से. मोदी जी ने आते ही क़ानूनी रूप से गायों का निर्यात बांग्लादेश में रुकवा दिया. इसलिए वहाँ बकरीद पर गायें बहुत महँगी बिकीं क़ुर्बानी के लिए. अब बांग्लादेश में गायों की वृद्धि के लिए स्थानीय उत्पादनकर्ताओं को प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिससे अब बांग्लादेश में दूध बिकने और मिलने लगा है, अन्यथा पहले यहाँ सिर्फ़ पाउडर दूध की ही चाय मिलती थी.

गुलशन सर्किल से होते हुए मैं घर की ओर बढ़ चली. सिग्नल पर गाड़ी रुकी. नज़र एकाएक एक पोस्टर पर पड़ी, बंगाली में लिखा हुआ था—भिक्खा दिवेन ना, कारण भिखावृत्ति पीछूने दुष्टचक्र आछे (भीख मत दीजिए, भीख के पीछे दुष्टचक्र है). बीच में भीख माँगते एक मलीन से वृद्ध की तसवीर थी. नीचे लिखा था—भिक्षुकमुक्त घोषित इलाक़ा.

कबीर कुआँ एक है और पनिहारी अनेक

बर्तन सबके न्यारे हैं, पानी सबमें एक

ढाका को समझने के लिए शुरुआती महीनों में मैं अक्सर यहाँ के पार्कों में और सड़कों पर छोटी-छोटी डुबकियाँ लगाती रहती थी. उन्हीं दिनों सरे राह चलते-चलते मुझे गुलशन पार्क में कुछ नवयुवतियाँ मिलीं. वे कॉलेज की छात्राएँ थी. मुझे देखकर अच्छा लगा कि किसी ने भी अपने ऊपर बुर्क़ा तो दूर, हिजाब तक नहीं डाला हुआ था. कुछ दोस्ताना समय उनके साथ गुज़ारने के बाद मैंने यूँ ही पूछ डाला, ‘क्या आप इस्लाम को नहीं मानतीं?’

‘मानती हैं. क्यों नहीं मानती?’

‘तो फिर आपने बुर्क़ा क्यों नहीं पहना है?’

एक ने हँसकर कहा, ‘क़ुरान में कहीं भी बुर्क़ा या नकाब का ‌िज़क्र है ही नहीं, हिजाब का ज़रूर ‌िज़क्र है वह भी हदीस में. क़ुरान में तो सिर्फ़ यह है कि पोशाक चाहे मर्द की हो या औरत की, शालीन होनी चाहिए और पुरुष की निगाह पर पर्दा होना चाहिए. मैं क्या मेरी कोई भी सहेली बुर्क़ा नहीं डालती. बांग्लादेश की आधुनिक पीढ़ी को बुर्क़ा में कोई दिलचस्पी नहीं है. मैं यहाँ तक मानती हूँ कि मुझे डीसेंट कपड़े पहनने चाहिए, जो मैं पहनती हूँ. आप हाई सर्किल में चले जाइए, कोई भी नहीं मिलेगा आपको बुर्क़ा या हिजाब में.’

‘कमाल है. फिर भी आपके घर में हिजाब नहीं पहनने पर विरोध तो हुआ होगा?’

‘देखिए, हर नई चीज़ का पहली बार विरोध होता ही है. जब औरत ने पहली बार साइकिल चलाई, तब विरोध हुआ था. समाज ने बखेड़ा खड़ा कर दिया था. लेकिन वही औरत मैदान मार लेती है, जो पहला विरोध झेल जाती है. मैंने पहला विरोध झेल लिया.’

थोड़ा रुककर उसने भी तीर छोड़ना अपना कर्तव्य समझा और मुझे बेधते हुए कहने लगी, ‘आपका देश तो धर्मनिरपेक्ष है, फिर भी सुनने में आ रहा है कि वहाँ मुसलमानों पर बहुत टाॅर्चर हो रहा है. उन्हें गाय पर ज़ुल्म और बीफ खाने के चलते मारा जा रहा है.’

मैंने संयत रहते हुए जवाब दिया, ‘ख़ुद हम इस ज़ुल्म के विरुद्ध हैं. भारत का आमजन इसके विरुद्ध है. यह हमारे संविधान की ‘वी दि पीपुल ऑफ़ इंडिया’ की भावना के ख़िलाफ़ है. देश के आमजन के लिए आज भी बिस्मिल के साथ अशफ़ाक़ के फाँसी चढ़ने का नाम है हिन्दुस्तान. सदियों से हम साथ-साथ रहते आए हैं और एक-दूसरे के मज़हब और संस्कृति को सम्मान से देखते आए हैं. मेरी शादी थोड़े देर से हुई, तो शादी के पूर्व मेरी माँ ने मन्नत माँगी थी कि उस वर्ष में मेरी मंगनी हो जाए, तो अजमेर शरीफ़ की दरगाह में वे चादर चढ़ाएँगी और उन्होंने चढ़ाई भी. आपने बनारस के बिस्मिल्लाह खान के बारे में सुना होगा, हमारे आदर्श तो वे ही थे. वे ऐसे मुसलमान थे, जो गंगा में वुज़ू करके नमाज़ पढ़ते थे और सरस्वती का स्मरण करके शहनाई की तान छेड़ते थे. उनकी शहनाई की गूँज के साथ बाबा विश्वनाथ मन्दिर के द्वार खुलते थे. वे पाँच वक़्त के नमाज़ी थे, पर संगीत द्वारा ईश्वर की साधना करते थे. लोग जब कहते उन्हें कि आपके मज़हब में तो संगीत हराम है तो वे हँसकर कह देते थे, क्या हुआ इस्लाम में संगीत की मनाही है, क़ुरान की शुरुआत तो बिस्मिल्लाह से ही होती है. तो यह जो समावेशीकरण है न, यही हमारी हिन्दुस्तानियत और भारतीय संस्कृति का प्राण तत्त्व है.

दरअसल, वर्तमान सत्ताधारियों के राष्ट्र राज्य का दर्शन जिस बुनियाद पर टिका है, वह है—एक नस्ल, एक भाषा और एक मज़हब, जिसके लिए उन्हें हमेशा एक काल्पनिक दुश्मन की ज़रूरत होती है. पर वे यह भी भूल जाते हैं कि इन्द्रधनुष इसीलिए तो ख़ूबसूरत होते हैं कि उसमें धरती के सभी रंगों का समावेश होता है. ऐसे अन्धभक्त रक्तबीजों की तरह बढ़ते ही जा रहे हैं, जो सत्ता के पाले हुए कुछ गुर्गों का अंजाम हैं. दरअसल, सत्ता कोई भी हो, जो भी आमजन की भलाई के लिए कुछ भी करने में नाकारा हो वह ऐसे ही हथकंडों द्वारा जनता का ध्यान उन्माद में उलझाकर रखता है. वह बात तो भविष्य की करेगा, पर जनता को उलझाकर रखेगा धर्म और अतीत में. अब देखिए न बहस होनी चाहिए बेरोज़गारी पर, महँगाई पर, स्वास्थ्य और शिक्षा के गिरते स्तर पर, भ्रष्टाचार पर, मनुष्य विरोधी विकास पर, नष्ट होते पर्यावरण पर, पर बहस हो रही है गाय गोबर पर, लव ‌िजहाद पर, मन्दिर-मस्जिद पर, गो मांस पर, हिन्दू-मुस्लिम पर.’

मेरी सारगर्भित बातों से थोड़ी कच्ची पड़ी वह लेकिन तीर गोले छोड़ना जारी रखा उसने, शायद इधर की अख़बारी ख़बरों का असर था उस पर, इसलिए हल्के से आक्रामक होते हुए किसी प्रचंड राष्ट्र के झंडे की तरह फड़फड़ाई वह, ‘आप लोगों के यहाँ चार वर्ण और सैकड़ों छोटी-मोटी जातियाँ हैं! मैंने सुना है कि आपके यहाँ जो ऊँची जाति के होते हैं, वे नीची जाति का छुआ हुआ पानी तक नहीं पीते हैं. एक ख़बर पढ़कर तो विश्वास ही नहीं हुआ कि घोड़े पर बैठकर एक दलित युवक शादी करवाने के लिए घर से निकला, तो उसे ऊँची जाति के लोगों ने घोड़े से ही उतार दिया.’ साँस भर फिर जल्दी-जल्दी कहना शुरू किया उसने, जैसे उसे एकाएक कोई बात याद आ गई हो, ‘आपका देश तो मूर्तियों का देश है, कहा जाता है कि धरती पर कहीं भी कुदाल की नोक ही लग जाए, तो भीतर से मूर्ति निकल आती है.’

उसकी भाषा पर मैं हो-होकर हँस दी, उसने बात जारी रखी, ‘आपके यहाँ मूर्तियों की पूजा होती है, उन्हें तरह-तरह के आभूषण पहनाए जाते हैं, जबकि हमारे यहाँ बुतपरस्ती कुफ़्र है, जो मुझे आपकी बूतपूजा से कहीं ज़्यादा तर्कसंगत लगता है. क्या है अल्लाह? दुनिया की सारी ख़ूबसूरतियों को इकट्ठा कर एक जगह धर दो, तो वो है अल्लाह! अल्लाह दरअसल एक रोशनी है, एक ज्ञान जो अनंत है, असीम है, जिसको मूर्त रूप में देखा भी नहीं जा सकता. क़ुरान में साफ़ कहा गया है, अल्लाह आकाशों और धरती का प्रकाश है. फिर भी मैं मूर्तियों विशेषकर महान लोगों की मूर्तियों का सम्मान करती हूँ. बीस वर्ष पूर्व बामियान में बुद्ध की जो प्रतिमा तोड़ी गई थी, वह हमारी धरोहर थी, पर उन तालिबान के लिए वह का‌िफ़रों की मूर्ति थी. मैं इसके सख़्त विरोध में थी. क्योंकि मेरे लिए बुद्ध का मतलब था करुणा, न्याय, सत्य, समानता और विस्तार.’

वह बोलती जा रही थी और सच ही बोल रही थी, जिसका कोई भी काट नहीं था मेरे पास. मुझे ध्यान आ रहा था कि जब हम मुम्बई से अपना सामान पैक कर रहे थे, तो मेरे पास बुद्ध की कई छोटी-छोटी प्रतिमाएँ थीं. मैं उनमें से एक प्रतिमा ‘सोए हुए बुद्ध’ को साथ लाना चाहती थी, पर हमें उसकी इजाज़त नहीं मिली थी. ख़ैर, हाल ही में पढ़ा हुआ एक इंटरव्यू याद आया, ऑस्ट्रेलिया के एक बौद्ध भिक्षु का इंटरव्यू था, जिसमें एक पत्रकार उससे पूछता है कि कोई अगर आपकी पवित्र धार्मिक पुस्तक त्रिपिटक को फाड़कर शौचालय के कमोड में फेंक दे, तब आप क्या करेंगे? बौद्ध भिक्षु ने उत्तर दिया कि मैं सबसे पहले प्लम्बर को फ़ोन करूँगा, ताकि नाली चोक न हो जाए. इस पर पत्रकार को हँसी आती है! दूसरा प्रश्न पूछता है कि बामियान में तालिबान द्वारा बुद्ध प्रतिमाएँ नष्ट कर दी गईं, इस पर आप क्या कहेंगे? भिक्षु ने कहा कि धम्म (धर्म) न तो मूर्तियों में है और न ही छपी किताबों में है! धम्म हमारे दिलों में और उससे भी आगे हमारे व्यवहार में जब तक ज़िन्दा है, तब तक किताबों को फाड़ने से कुछ नहीं होता है! किताब हम दोबारा छपवा लेंगे, मूर्तियाँ नई बना ली जाएँगी, लेकिन अगर हम अपने आचरण और अपने दिलों से धम्म को खो देते हैं और किताबों, मूर्तियों को बचा लेते हैं, तो कोई फ़ायदा नहीं है! तब केवल मूर्तियाँ और किताबें रह जाएँगी, धम्म खो चुका होगा, उसके प्राण खो चुके होंगे!

बहरहाल बिना तल्ख हुए मैंने जवाब दिया, ‘मैं ख़ुद मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं करती, क्योंकि जो सत्य को जानता है, उसे प्रतीक की ज़रूरत नहीं, लेकिन जो अपने भीतर के सत्य को अभी तक पहचान नहीं पाया है, उसके लिए ज़रूरत है प्रतीक की. अपनी नन्ही पोती के लिए मैं मन्दिर सजाती हूँ कि उस नन्ही जान को कैसे समझाऊँ किसी परम सत्ता के बारे में. मेरा विश्वास है कि सगुन से ही आप निर्गुण ईश्वर और फिर मानवता की ओर देख सकते हैं. लेकिन बुद्ध की मूर्तियों को तोड़ने के पीछे असली कारण यह था कि हर सत्ता कला से डरती है, क्योंकि कला आपकी कट्टरता को कम कर आपको एक बेहतर इनसान बनाती है, साथ ही निर्भीक भी. हम ईश्वर को सगुण और निर्गुण दोनों रूप में देखते हैं. सबको साथ लेकर हम चलते हैं. हम विश्वास के साथ पत्थरों में भी प्राण प्रतिष्ठा कर लेते हैं. वैसे मैं यह मानती हूँ कि धर्म न तो मूर्तियों में है और न ही किताबों में, धर्म तो हमारे व्यवहार, आचरण और हमारी सोच में होना चाहिए. तालिबानी ने बुद्ध की मूर्तियाँ जला दी, तो क्या बुद्धत्व दुनिया से ख़त्म हो गया? क्या हमारे भीतर के बुद्ध को मार पाएँगे वे? अरे मूर्तियाँ तो फिर बन जाएँगी’, बोलते-बोलते मैंने फिर तीर चला दिया—‘वैसे आपके यहाँ भी तो अलग-अलग मुसलमान हैं, जैसे शिया, सुन्नी, इस्माइली (शिया की भी एक शाखा), अहमदिया, सूफ़ी, वहाबी वग़ैरह. अब देखिए न, बांग्लादेश बनने के पहले पंजाबी मुसलमान बंगाली मुसलमान को मार रहा था और बांग्लादेश बनने के बाद बंगाली मुसलमान पंजाबी मुसलमान को मारने लगा. वैसे ये सब भी हैं तो मुसलमान ही न! तो इनसानियत के गुनहगार तो आप भी हैं और हम भी हैं. सचाई सिर्फ़ यही है कि मज़हब और सियासत…इन दो पाटों के बीच यदि कोई चीज़ पिस रही है तो वह है इनसानियत और ज़रूरत है तो बस इसकी कि इबादत के हर दिखावे से दूर हम धर्म को सिर्फ़ इनसानी भाईचारे में खोजें.’

मेरे जवाब से उसका ग़ुस्सा कॉफी के झाग की तरह बैठ गया, पर तुरन्त ही अपनी ज्ञान की गंगा में वो डुबकी लगवाई उसने कि मुझे तो ज़ुकाम ही हो गया, कहना जारी रखा उसने, ‘दरअसल जब कोई धर्म व्यापक स्तर पर विस्तार पाता है, तो उसमें स्थानीय संस्कृति और परम्परा की नई-नई धाराएँ जुड़ जाती हैं. शुरुआत में तो हम सब मुसलमान एक ही थे. पैगम्बर मोहम्मद ने तो भाईचारे, बराबरी, सादगी और मानवीय प्रेम का सन्देश देकर जीवन को रोशनी से भरा. लेकिन बाद के वर्षों में अपने-अपने अहं और ईगो ने सारे मुस्लिम समुदाय को ही अलग-अलग गुटों में बाँट दिया. हर गुट ख़ुद को ही सच्चा—पाक—खालिस मानता रहा. और शेष मुसलमानों को का‌िफ़र और पापी मान उन्हें मौत के घाट उतारता रहा. मक्का और मदीना जैसी पाक जगह भी इनसानी ख़ून-खराबे से नहीं बची. नफ़रत की इन्हीं फसलों का नतीजा है—शिया, सुन्नी, इस्माइली, अहमदिया, सूफ़ी, वहाबी आदि.’

‘शिया-सुन्नी में क्या अन्तर है?’ मैंने जानना चाहा.

‘दरअसल हज़रत अली हज़रत मोहम्मद का ही दामाद था. उसी के नाम पर िशया सम्प्रदाय चला. ऐसा मानना है कि अली पैगम्बर मोहम्मद से ज़्यादा ताक़तवर था. हुसैन अली का पुत्र था. उसकी कर्बला में हत्या कर दी गई थी. माना जाता है कि मुहर्रम के महीने में पैगम्बर हज़रत मुहम्मद साहब को अपना जन्मस्थान मक्का छोड़कर मदीना जाना पड़ा, जिसे हिज़रत कहते हैं. उनके नवासे हज़रत इमाम हुसैन और उनके परिवार वालों की शहादत इसी महीने में हुई. इमाम हुसैन के बारे में तो रवीन्द्रनाथ टैगोर ने भी लिखा था—इन्साफ़ और सचाई को ज़िन्दा रखने के लिए फ़ाैजों और हथियारों की ज़रूरत नहीं होती है, क़ुर्बानियाँ देकर भी फतह हासिल की जा सकती है, जैसे हुसैन ने कर्बला में किया. तो मैडम, यह क़ुर्बानी इनसानियत की भलाई की एक अनमोल मिसाल है.’

‘सही कहा है आपने कि सदियों पहले दी गई यह क़ुर्बानी लोगों के दिलों पर आज भी राज करती है. इसीलिए भारत में मोहर्रम के दिन वे शोक मनाते हैं और हाय हुसैन बोलते हुए ख़ुद को चाकू और बेल्ट से चोटिल कर लहूलुहान कर बैठते हैं. क्या बांग्लादेश में भी होता है ऐसा?’

‘हाँ, बिलकुल होता है, शिया, सुन्नी दोनों ही मनाते हैं, यद्यपि यहाँ बहुमत सुन्नी मुस्लिमों का है, पर थोड़े बहुत शिया समुदाय के लोग भी हैं. सुन्नी ख़ुद को मुहर्रम में चोटिल नहीं करते हैं. इस्लाम के शिया मत के लोग हज़रत मुहम्मद के नवासे की शहादत को याद करते हुए महीने के प्रारम्भ से 10 तारीख़ तक मातम मनाते हैं. सुन्नी बंधु 8 से 10 तिथि के बीच तीन दिन रोज़ा रखते हैं. मुहर्रम हर तरह के ज़ुल्म के ख़िलाफ़ एक परचम है, मौलवी और मुल्ला कुछ भी कहते रहें, इसकी परम्परा चलती रहनी चाहिए.’

मैंने पूछा, ‘शिया लोगों का बहुमत कहाँ है?’

‘ईरान और इराक में है.’

‘क्या शिया लोगों की मस्जिद भी अलग होती है?’

‘हाँ, शिया लोगों की मस्जिद की डिज़ाइन थोड़ी अलग होती है. यहाँ इस्माइली मुसलमान भी रहते हैं. इस्माइली मुसलमान शिया का सपोर्ट करते हैं. लेकिन हमारे यहाँ यदि किसी शिया को नमाज़ पढ़नी है और आसपास शिया लोगों की मस्जिद नहीं है, तो वह भी हमारी मस्जिद में आकर नमाज़ पढ़ सकता है. और हमारे यहाँ छुआछूत तो बिलकुल भी नहीं है, नमाज़ में राजा और रंक आसपास बैठकर नमाज़ अदा कर लेते हैं, जबकि आपके यहाँ तो मन्दिरों में छोटी जाति के लोगों को घुसने तक नहीं देते ऊँची जाति के लोग.’

(मेरी ढाका डायरी (संस्मरण) की लेखिका मधु कांकरिया हैं.)

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