लखनऊ: जुलाई 2023 में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के गोरखपुर दौरे के दौरान बीजेपी सांसद पंकज चौधरी के आवास पर मुलाकात की थी, लेकिन गोरखनाथ मंदिर नहीं गए थे, जिसके मुख्य पुजारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं. इसके बाद से चौधरी लगातार चर्चा में रहे और कयास लगाए जाते रहे कि पार्टी उन्हें कोई अहम जिम्मेदारी दे सकती है.
दो साल बाद, पंकज चौधरी उत्तर प्रदेश बीजेपी के अगले अध्यक्ष बनने की ओर बढ़ते दिख रहे हैं. शनिवार को पार्टी दफ्तर में इस पद के लिए उन्होंने ही अकेले नामांकन पत्र दाखिल किया.
61-वर्षीय चौधरी इस समय केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री हैं और गोरखपुर जोन की महाराजगंज लोकसभा सीट से सात बार सांसद रह चुके हैं. कुर्मी समुदाय से आने वाले चौधरी के बारे में कहा जाता है कि उन्हें प्रधानमंत्री मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का आशीर्वाद प्राप्त है.
पूर्वी यूपी से गैर-यादव ओबीसी चेहरे के रूप में पहचाने जाने वाले चौधरी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार वीरेंद्र चौधरी को 35,000 से ज्यादा वोटों के अंतर से हराया था और इसके बाद उन्हें केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री बनाया गया.
आज लखनऊ में भाजपा उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष पद हेतु माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी, माननीय उप मुख्यमंत्री श्री केशव प्रसाद मौर्य जी, माननीय उप मुख्यमंत्री श्री ब्रजेश पाठक जी, माननीय जल शक्ति मंत्री श्री स्वतंत्र देव सिंह जी की उपस्थिति में नामांकन पत्र दाखिल किया।
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— Pankaj Chaudhary (@mppchaudhary) December 13, 2025
सिर्फ पंकज चौधरी ही क्यों?
हालांकि, पंकज चौधरी गोरखपुर क्षेत्र से आते हैं, लेकिन उन्हें कभी भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के करीबी घेरे का हिस्सा नहीं माना गया. इसके बावजूद, उन्हें यूपी के लिए हाईकमान की पसंद माना जा रहा था, क्योंकि बीजेपी मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी की जगह किसी गैर-यादव ओबीसी चेहरे की तलाश में थी. भूपेंद्र चौधरी पश्चिमी यूपी के जाट नेता हैं और पार्टी में एक संतुलित आवाज के रूप में जाने जाते हैं.
दिप्रिंट से बात करते हुए पूर्वी यूपी के एक वरिष्ठ बीजेपी नेता ने कहा कि गोरखपुर जोन में पंकज चौधरी ही ऐसे नेता हैं जिनकी पहचान और पकड़ योगी आदित्यनाथ से अलग और स्वतंत्र है.
उन्होंने कहा, “राजनीतिक अनुभव के लिहाज से वह यूपी के मुख्यमंत्री से वरिष्ठ हैं. वे 1991 में संसद पहुंचे थे. हालांकि वे लो-प्रोफाइल रहते हैं, लेकिन शुरू से ही हाईकमान में उनकी सकारात्मक छवि रही है.”
उन्हें पूर्व यूपी बीजेपी अध्यक्ष रामापति त्रिपाठी के करीबी भी माना जाता है, जिन्हें वे अपना राजनीतिक गुरु मानते है और वे राजनाथ सिंह के गुट के भी माने जाते हैं. नेता ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी भी चौधरी की विनम्रता और मतदाताओं से उनके जुड़ाव से प्रभावित हैं.
उन्होंने कहा, “मुझे याद है कि 2023 में जब प्रधानमंत्री गोरखपुर में उनके घर गए थे, तो घर संकरी गली में होने की वजह से गाड़ी करीब 150 मीटर पहले ही रुक गई थी. पीएम पैदल चलकर घर तक गए. उस दौरे ने उस समय एक साफ संदेश दिया था और आज उसका नतीजा सबके सामने है.”
बीजेपी सूत्रों का कहना है कि कुछ दिन पहले पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की एक बैठक हुई थी, जिसकी अध्यक्षता बीजेपी महासचिव (संगठन) बी.एल. संतोष ने की थी. इसमें सुझाव दिया गया कि यूपी में यादवों के बाद दूसरे सबसे बड़े ओबीसी समूह माने जाने वाले कुर्मी समुदाय से किसी नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाना चाहिए.
सूत्रों ने बताया, स्वतंत्र देव सिंह (एक और कुर्मी चेहरा) और पंकज चौधरी—दोनों पर विचार किया गया. स्वतंत्र देव सिंह 2022 के विधानसभा चुनाव के दौरान प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और दूसरे कार्यकाल के मजबूत दावेदार माने जा रहे थे. हालांकि, उन्हें योगी आदित्यनाथ के करीबी के तौर पर देखा जाता है. इसलिए पार्टी ने चौधरी को चुनने का फैसला किया, जिनका मुख्यमंत्री से वैसा करीबी संबंध नहीं माना जाता.
बीजेपी सूत्रों के मुताबिक, बैठक के दौरान संतोष ने साफ किया कि संगठन और सरकार दो अलग-अलग इकाइयां हैं, भले ही उनका लक्ष्य एक ही हो और अंतिम फैसला पार्टी हाईकमान ही करेगा. उन्होंने इशारों में कहा कि हाईकमान अपनी पसंद के नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाना चाहता है. चौधरी के नामांकन से एक दिन पहले संतोष लखनऊ आए और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की. पार्टी पदाधिकारियों का कहना है कि इसी बैठक में उन्होंने हाईकमान का संदेश मुख्यमंत्री तक पहुंचाया.
योगी आदित्यनाथ के करीबी सूत्रों ने दिप्रिंट को बताया कि मुख्यमंत्री ने कभी भी प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष पद के लिए किसी उम्मीदवार का समर्थन नहीं किया. उन्होंने कहा कि स्वतंत्र देव सिंह भी शुरुआत में केंद्र की पसंद थे, लेकिन बाद में वे मुख्यमंत्री के करीबी हो गए और संभव है कि इसी वजह से इस बार उन्हें पद न मिला हो.
मुख्यमंत्री कार्यालय के एक अधिकारी ने कहा, “पार्टी हाईकमान संगठन और सरकार को समानांतर लेकिन अलग-अलग इकाइयों के रूप में देखता है.”
‘अनुभवी, विवादों से दूर’
पंकज चौधरी एक राजनीतिक रूप से सक्रिय परिवार से आते हैं. उनकी मां उज्ज्वल चौधरी पहले महाराजगंज जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुकी हैं. पंकज चौधरी ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत 1989 में गोरखपुर नगर निगम के सदस्य के तौर पर की थी. इसके बाद वे एक साल तक नगर निगम के उप-महापौर भी रहे.
1991 में बीजेपी ने उन्हें महाराजगंज लोकसभा सीट से मैदान में उतारा. वे 1999 तक इस सीट से सांसद रहे, जब समाजवादी पार्टी के अखिलेश सिंह से हार गए. 2004 में उन्होंने फिर यह सीट जीती, लेकिन 2009 में कांग्रेस उम्मीदवार हर्षवर्धन से हार गए. 2014 में उन्होंने दोबारा जीत हासिल की और तब से लगातार लोकसभा में महाराजगंज का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं.
चौधरी का परिवार हरबंसराम भगवानदास नाम की एक मशहूर कंपनी का मालिक भी है, जो आयुर्वेदिक तेल ‘राहत रू’ बनाती है. 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए दाखिल अपने हलफनामे में चौधरी ने 41.9 करोड़ रुपये की संपत्ति घोषित की है.
हालांकि, संगठनात्मक जिम्मेदारियों का उनका अनुभव सीमित है, लेकिन बीजेपी के कई नेताओं का कहना है कि केंद्र के मार्गदर्शन में वे इस भूमिका को अच्छी तरह निभा पाएंगे. 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान, अमित शाह ने चौधरी के समर्थन में एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्हें “बीजेपी के सबसे अनुभवी सांसदों में से एक” बताया था.
शाह ने कहा था, “अगर आप दूर-दूर तक खोज लें, तो भी इनके जैसा सांसद नहीं मिलेगा.”
उत्तर प्रदेश बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने दिप्रिंट से कहा, “2024 में झटके के बाद पार्टी ने महसूस किया कि गैर-यादव ओबीसी, खासकर कुर्मी समुदाय तक पहुंच बनाना ज़रूरी है. कुर्मी, ओबीसी में यादवों के बाद दूसरा सबसे बड़ा समूह है. समाजवादी पार्टी भी उन्हें साधने की कोशिश कर रही है, इसलिए राज्य बीजेपी अध्यक्ष के तौर पर एक कुर्मी चेहरे को आगे लाना ज़रूरी हो गया. इसके अलावा, वे एक अनुभवी नेता हैं.”
उन्होंने आगे कहा, “वे शांत स्वभाव के नेता हैं, विवादों से दूर रहते हैं और उकसाने वाले बयान देने से बचते हैं. वे स्थानीय कार्यकर्ताओं से नियमित संपर्क में रहते हैं और साथ ही शीर्ष नेतृत्व से भी जुड़े हुए हैं.”
एक अन्य पार्टी नेता ने दिप्रिंट से कहा कि चौधरी को इसलिए भी फायदा मिला क्योंकि उन्हें योगी आदित्यनाथ का करीबी नहीं माना जाता. नेता ने कहा, “हालांकि, वे उसी गोरखपुर जोन से आते हैं, लेकिन चौधरी और योगी के बीच अच्छे संबंध नहीं रहे हैं. गोरखपुर या महाराजगंज में पार्टी कार्यक्रमों के दौरान दोनों को साथ बहुत कम देखा गया है. उनकी आमने-सामने की मुलाकातों की तस्वीरें भी शायद ही मिलती हैं. भले ही उन्होंने कभी सार्वजनिक तौर पर एक-दूसरे का विरोध नहीं किया, लेकिन अब मिशन 2027 (विधानसभा चुनाव) के लिए उन्हें साथ आना होगा.”
हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में पंकज चौधरी के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले कांग्रेस नेता वीरेंद्र चौधरी ने इस आकलन पर सवाल उठाए.
उन्होंने कहा, “बीजेपी ने उन्हें कुर्मी नेता होने के कारण राज्य अध्यक्ष चुना होगा, लेकिन अगर उन्हें वाकई कुर्मियों का इतना व्यापक समर्थन होता, तो मेरे खिलाफ उन्हें 5.5 लाख से ज्यादा वोट कैसे मिल गए? मैं भी कुर्मी समुदाय से ही आता हूं.”
उन्होंने आगे कहा कि कुर्मियों का वोटिंग व्यवहार अन्य जातियों से अलग होता है. उन्होंने कहा, “कुर्मी जिला स्तर के नेतृत्व को देखते हैं और बीजेपी के जाल में आसानी से नहीं फंसते.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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