नई दिल्ली: काशी और मथुरा पर ध्यान केंद्रित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने गुरुवार को कहा कि संघ इन स्थलों को ‘पुनः प्राप्त’ करने के आंदोलन में शामिल नहीं होगा, लेकिन स्वयंसेवक चाहें तो इसमें भाग ले सकते हैं.
‘100 वर्षों की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ नामक भागवत ने आरएसएस शताब्दी व्याख्यानमाला के तीसरे दिन भागवत ने कहा, “संघ आंदोलनों में शामिल नहीं होता. केवल एक आंदोलन था जिसमें हम जुड़े — राम मंदिर — उसे हमने पूरी तरह से समर्थन दिया और अंत तक पहुंचाया. बाकी आंदोलनों में संघ शामिल नहीं होगा.”
वाराणसी का काशी विश्वनाथ मंदिर ज्ञानवापी मस्जिद से सटा हुआ है, जबकि मथुरा की शाही ईदगाह कृष्ण जन्मभूमि मंदिर परिसर से लगी है. भागवत ने कहा कि हिंदू मानसिकता में काशी, मथुरा और अयोध्या का विशेष महत्व है और ऐसे मामलों में हिंदू समाज आगे बढ़कर नेतृत्व करेगा.
1990 के दशक में दक्षिणपंथी संगठनों, जिनमें आरएसएस से जुड़ा विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) भी शामिल था, उसने नारा दिया था— “अयोध्या तो सिर्फ झांकी है, काशी-मथुरा बाकी है.”
भागवत ने अपने पुराने रुख को भी दोहराया कि “हर मस्जिद में शिवलिंग मत खोजिए.”
साल 2022 में नागपुर में एक संगठनात्मक प्रशिक्षण कार्यक्रम के समापन समारोह में उन्होंने कहा था कि विवादों को बढ़ाना नहीं चाहिए और ज्ञानवापी मस्जिद का मुद्दा भी आपसी सहमति से हल हो सकता है. उन्होंने सवाल किया, “हर दिन नया मुद्दा नहीं निकालना चाहिए…क्यों हर मस्जिद में शिवलिंग ढूंढना?”
गुरुवार को भी उन्होंने कहा कि हर जगह मंदिर ढूंढने की ज़रूरत नहीं है. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि यह तो केवल “तीन मंदिरों की ही बात है” और भाईचारे की भावना को ध्यान में रखना चाहिए.
उन्होंने कहा, “अगर मैं यह कह सकता हूं कि हर जगह मंदिर मत ढूंढो, हर जगह शिवलिंग मत ढूंढो, तो थोड़ा इतना भी होना चाहिए कि चलो तीन ही की बात है न (काशी, मथुरा और अयोध्या), ले लो. यह क्यों न हो? यह भाईचारे के लिए बहुत बड़ा कदम होगा.”
विश्व हिंदू परिषद का कहना है कि ज्ञानवापी मस्जिद के सर्वे में जो ‘संरचना’ मिली है, वह 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है, जिन्हें भगवान शिव का प्रतीक माना जाता है.
दिप्रिंट से बात करते हुए वीएचपी अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा था कि उन्हें विश्वास है कि वहां शिवलिंग है, लेकिन वह वाराणसी ज़िला जज के फैसले का इंतज़ार करेंगे. उन्होंने यह भी कहा कि अयोध्या की यात्रा “हमारी यात्रा थी, हमने शुरू की, नेतृत्व किया और हासिल किया,” लेकिन काशी की लड़ाई पूरे हिंदू समाज की है.
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