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Tuesday, 1 April, 2025
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संभल हिंसा: ‘पत्थरबाजों’ के पोस्टर लगाएगी यूपी सरकार, प्रदर्शनकारियों से होगी नुकसान की भरपाई

राज्य सरकार ने 2020 में सीएए के विरोध में हुए प्रदर्शनों के दौरान भी ऐसा ही किया था, लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ‘नाम उजागर करने और शर्मसार करने’ और लोगों की निजता का उल्लंघन करने के लिए उसे फटकार लगाई थी.

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नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा है कि वह शाही जामा मस्जिद के रविवार को अदालत के आदेश पर हुए सर्वेक्षण को लेकर संभल में भड़की हिंसा के दौरान प्रदर्शनकारियों से सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान की भरपाई कराएगी.

सरकार के एक प्रवक्ता ने मीडिया को बताया कि “पत्थरबाजों” के पोस्टर प्रमुख सार्वजनिक स्थानों पर लगाए जाएंगे.

आदेश की पुष्टि करते हुए पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “सरकार जिले में कानून-व्यवस्था को बाधित करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई कर रही है. सर्वेक्षण टीम और पुलिस अधिकारियों पर पत्थर फेंकने वालों के पोस्टर लगाए जाएंगे. इसके अलावा, सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान की भरपाई भी उनसे की जाएगी.”

रविवार को संभल में उस समय तनाव की स्थिति पैदा हो गई, जब सर्वेक्षण दल शाही जामा मस्जिद पहुंचा और यह आकलन करने लगा कि क्या मस्जिद का निर्माण उस जगह हुआ है, जहां कभी मंदिर हुआ करता था. इस दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प हो गई. प्रकरण में चार लोगों की मौत हो गई और कई पुलिसकर्मी घायल हो गए.

रविवार को हुआ सर्वेक्षण 19 नवंबर को दायर एक याचिका के बाद दूसरा सर्वेक्षण था, जिसमें कहा गया था कि मस्जिद का निर्माण 1526 में एक मंदिर को गिराकर किया गया था. पहला सर्वेक्षण उस आदेश के कुछ ही घंटों के भीतर हुआ था.

अब तक तीन नाबालिगों और तीन महिलाओं समेत 27 लोगों को हिरासत में लिया गया है. संभल से समाजवादी पार्टी के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और सपा विधायक इकबाल महमूद के बेटे सोहेल इकबाल समेत सात एफआईआर दर्ज की गई हैं.

मुरादाबाद मंडल के मंडलायुक्त अंजनेय कुमार सिंह ने मीडिया को बताया, “जनता, कैमरा और वीडियो फुटेज की मदद से कुल 74 लोगों की पहचान की गई है. अन्य की पहचान की जा रही है. हमने लोगों से मदद मांगने के लिए उनके वीडियो और तस्वीरें भी जारी की हैं ताकि उन्हें आसानी से पहचाना जा सके.”

संभल प्रशासन ने हिंसा प्रभावित इलाकों में सीसीटीवी फुटेज में देखे गए 42 से अधिक संदिग्धों की तस्वीरें भी जारी की हैं, जिन्हें अभी तक गिरफ्तार नहीं किया गया है. उनमें से कुछ के हाथों में ईंटें देखी गईं और कुछ ने अपने चेहरे नकाब से ढके हुए थे.

यूपी सरकार ने 2020 में सीएए के विरोध में हुए प्रदर्शनों के दौरान भी ऐसा किया था.

2020 में नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरोध में भड़की हिंसा के बाद, यूपी सरकार ने राजधानी लखनऊ सहित विभिन्न स्थानों पर कथित रूप से बर्बरता के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों के पोस्टर भी लगाए थे, लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उस समय राज्य सरकार से इन “नाम और शर्म” वाले पोस्टरों को हटाने के लिए कहा था, इसे संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन बताया था.

हाईकोर्ट ने कहा था, “कुल मिलाकर, हमें इसमें कोई संदेह नहीं है कि राज्य की कार्रवाई, जो इस जनहित याचिका का विषय है, लोगों की निजता में अनुचित हस्तक्षेप के अलावा और कुछ नहीं है. जिला मजिस्ट्रेट और लखनऊ के पुलिस आयुक्त को सड़क किनारे से बैनर हटाने का निर्देश दिया जाता है. उत्तर प्रदेश राज्य को निर्देश दिया जाता है कि वह कानून के अधिकार के बिना व्यक्तियों के व्यक्तिगत डेटा वाले ऐसे बैनर सड़क किनारे न लगाए.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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