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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की फाइल फोटो । पीटीआई
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पिछले सप्ताह गांधीनगर लोकसभा सीट से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने चुनावी मैदान में उतरने का निर्णय लेकर चौंका दिया है. अभी तक भाजपा के पितामह लालकृष्ण आडवाणी का गढ़ मानी जाने वाली इस सीट से उनका चुनावी मैदान में उतरना, उनकी महत्वकांक्षा की ओर इशारा कर रहा है. अमित शाह सिर्फ राजनीतिक रणनीतिकार और पॉलीटिकल मास्टरमाइंड ही नहीं है बल्कि उनके पास पोटेंशियल है एक जननेता बनने का. वह जब राजनीति के तार को खींचेंगे तो उनमें यह माद्दा है कि वह उसे मंजिल तक पहुंचाएंगे.

लोकसभा चुनाव लड़ने का मतलब यह नहीं है कि वह अगले गृहमंत्री बनने की रेस में शामिल हो गए हैं जैसी कि राजनीतिक हलकों में चर्चा गरम है.

पहला, गुजरात के पूर्व गृहमंत्री का राज्यसभा में अभी भी साढ़े चार साल का कार्यकाल बचा हुआ है. दूसरा उच्च सदन का सदस्य होना महत्वाकांक्षी मंत्री के रूप में नकारात्मकता नहीं है. बता दें कि नरेंद्र मोदी की कैबिनेट के 25 सदस्यों में से 11 मंत्री राज्यसभा से आते हैं.

अब अमित शाह मोदी सरकार में ठीक वैसे ही शामिल हो रहे हैं जैसे वाजपेयी के लिए आडवाणी थे. क्योंकि वह दूसरी बार भाजपा के अध्यक्ष रूप में उन्हें नहीं देखना चाहेंगे. भाजपा अध्यक्ष के रूप में उन्होंने अपना पहला टर्म इसी साल जनवरी में ही पूरा कर लिया है लेकिन उन्हें लोकसभा चुनाव तक उन्हें पार्टी पद पर बना कर रखा है. जुलाई 2014 में उन्होंने पार्टी प्रमुख की पारी शुरू की, तब पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह थे. सिंह को जब गृहमंत्री बनाया गया तो उनके कार्यकाल के बचे हुए समय को भी शाह ने ही अध्यक्ष के रूप में पूरा किया. अगर 2019 में भाजपा फिर से सत्ता में लौटती है तो भी यह अजब संयोग होगा कि अमित शाह राजनाथ सिंह के नक्शे कदम पर चल सकते हैं.

अमित शाह लोकसभा में इसलिए भी आना चाहते हैं क्योंकि अब उन्हें उनकी जननेता में स्वीकार्यता की जरूरत है. इस चुनावी रैली के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अप्रैल और मई में 150 -200 रैलियां कर सकते हैं. वहीं अमित शाह 250 रैलियां करेंगे. वह सभी उम्मीदवार जो चुनावी मैदान में हैं उनकी पहली पसंद नरेंद्र मोदी और दूसरी पसंद अमित शाह हैं. अब जब प्रधानमंत्री बहुत सारा समय नहीं निकाल सकते हैं तो भाजपा अध्यक्ष को ही अधिक से अधिक रैलियों को संबोधित करना होगा.


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अपने निर्वाचन क्षेत्रों में शीर्ष नेताओं की बैठकों को आयोजित करने के लिए बाध्य करने वाले कांग्रेस उम्मीदवारों के विपरीत भाजपा के प्रतिभागी मोदी और शाह को मतदाताओं को संबोधित करने के लिए बाध्य कर रहे हैं.

भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच अमित शाह की अपील के बारे में कोई संदेह नहीं है. जब वह बोलने लगते हैं तो कार्यकर्ताओं में उत्साह भर देते हैं. उनके भाषणों ने आम लोगों की तालियां भी बटोरीं हैं. भारत में अच्छे वक्ताओं की कमी है, नरेंद्र मोदी स्पष्ट रूप से बहुत अच्छे हैं. लेकिन अमित शाह भी अपने आप में एक वक्ता के रूप में उभर रहे हैं- न केवल अपने उत्तेजक भाषण के कारण, बल्कि अपनी भाषण की शैली के कारण जोकि विश्वास, दृढ़ता और उद्देश्य की स्पष्टता से भरपूर है.

वह अमित शाह ही हैं जिन्होंने नरेंद्र मोदी को नरेंद्र मोदी बनाया है. वह उनसे उस समय से जुड़े हैं जब वह एक छोटे से आरएसएस नेता थे और आज जब वह हिंदू हृदय सम्राट बन चुके हैं तब भी शाह उनके साथ है. शाह अब मतदाताओं को सम्मोहित कर सकते हैं. अगर किसी को वास्तव में पता है कि मोदी कैसे बनना है, तो वह अमित शाह हैं और अगर मोदी आज एक व्यक्ति पर भरोसा करते है, तो वह अमित शाह हैं.

अमित शाह का सरकार में प्रवेश भारतीय जनता पार्टी में उत्तराधिकारी बनने की योजना में भी पहला कदम है. 2024 के आम चुनावों में मोदी करीब 73 वर्ष से अधिक उम्र तक बने रहेंगे और एक और कार्यकाल की चाहत नहीं रखेंगे क्योंकि भाजपा में 75 वर्ष के बाद चुनाव नहीं लड़ने का मानक तैयार किया गया है. वे लोग कोई गलती नहीं करना चाहेंगे. मई में सरकार बनने की प्रक्रिया में अमित शाह की संभावित प्रविष्टि पांच साल बाद सत्ता परिवर्तन के लिए जमीन तैयार करने के लिए है.

शाह ने अपनी महत्वाकांक्षाओं को छुपाया नहीं है. 2014 में द इकोनॉमिक टाइम्स को दिए एक साक्षात्कार में जब उनसे पूछा गया कि क्या वे खुद को प्रधानमंत्री बनते देखना चाहेंगे, तो उन्होंने हंसते हुए जवाब दिया ‘मैं इस तरह से नहीं सोचता मैं पानी पर तैरती लकड़ी के सामान हूं. जहां भी पानी मुझे ले जाता है, मैं जाता हूं.


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जो लोग अमित शाह को जानते हैं, वे कहते हैं कि वह निश्चित रूप से पानी में रुकावट पसंद नहीं करेंगे या फिर वे इसके प्रवाह को नियंत्रित करेंगे. इस इंटरव्यू के बाद बीजेपी में काफी नाराज़गी देखने को मिली थी. अमित शाह को इसका श्रेय देना होगा -जितने लोग भाजपा में अमित शाह को प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार का समर्थन करेंगे उतने नेता कांग्रेस में राहुल गांधी को नहीं करेंगे.

हालांकि यह एक चेतावनी है. भाजपा में उत्तराधिकारी की योजना को इस धारणा पर टिका होना चाहिए कि भाजपा मई में सत्ता में वापस आ जाएगी या नहीं.  निश्चित रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बहुत आश्वस्त हैं. लोकसभा चुनावों के लिए पार्टी के उम्मीदवारों को अंतिम रूप देने के लिए भाजपा की केंद्रीय चुनाव समिति की बैठकों में मोदी अन्य राज्यों से आने वाले नेताओं के लिए सिर्फ एक सवाल था ‘सर्जिकल स्ट्राइक का क्या प्रभाव है?’ उत्तर-पूर्व के एक नेता ने जवाब दिया, ‘बहुत अच्छा है’ पूरा उत्तर-पूर्व बम-बम है, जब-जब नेता ने ऐसे जवाब दिए तब-तब मोदी दिल खोलकर हंसे.

अमित शाह के पास अगला कदम उठाने और लोकसभा में प्रवेश करने का कारण होना चाहिए. कौन जानता है कि अगर अटल बिहारी वाजपेयी को 2004 में जनादेश मिला होता तो लालकृष्ण आडवाणी आज क्या होते?

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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